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अपंग - 4

4---

सूर्य देवता गरमाने लगे थे | जगह-जगह से धूप के टुकड़े सामने पेड़ों के झुरमुट से छिप-छिपकर यहाँ-वहाँ फैलने लगे | भानुमति वहीं बैठी थी | उन टुकड़ों को समेटती –उनकी गर्मी महसूस करती रही ---

ये टुकड़ों में बंटी धूप

और

मेरा जीवन

कहीं संग-संग ही तो हम

जन्मे न थे –छिपते-छिपाते

अपनों से और औरों से ---

‘न्यु जर्सी में थी वह उन दिनों !हर रोज़ नई बातें, नई रातें ! शरीर वहाँ तो मन माँ-बाबा के पास ! हर रोज़ पार्टी और पार्टी के समय की ज़बरदस्ती ओढ़ी गई मुस्कान से उसका मुख दुखने लगता \

राजेश का मुँह फूला हुआ था | भानुमति उसे इतना बच्चा नहीं स्म्झ्ती थी, बिलकुल इम्मेच्योर! क्या उसे अपने भले-बुरे की समझ भी नहीं है ? कैसा पति है वह?

खाने की मेज़ पर भानुमति को ही बातों का सिलसिला शुरू करना पड़ा | 

“क्या बात है --? वह मौन था | 

“क्या तुम मुझे इसीलिए लाए हो ?” फिर भी वह मौन था, कुछ क्षण बाद बोला

“नहीं, तुम्हें घूरते रहने के लिए --?”

“प्लीज, इतना जलील न करो मुझे, तुम्हारे लिए सब कुछ वही किया जो तुमने चाहा, अब तो तुम्हें तसल्ली होनी चाहिए ---“

“क्या कर रही हो तुम ? एक पत्नी का फर्ज़ निबाह रही हो ?”

“मैं समझ रही हूँ, क्यों नाराज़ हो ?—अच्छ ! ये रोज़ की पार्टी-वारती ---तुम्हें नहीं लगता, हमारा जीवन कैसा बनावटी, खोखला होता जा रहा है ? ऐसी किसी पार्टी से बाहर निकलकर मेरा मुँह ऐसे दुखने लगता है जैसे मैं लगातार चार घंटों से कुछ खा रही हूँ ---ठूँस-ठूँसकर ---सच ! तुम्हें नहीं लगता जब ज़बरदस्ती की ओढ़ी मुस्कान ---“उसने हँसने की नाकाम कोशिश की | 

“मैं जानता हूँ तुम हर बार मुझे नीचे गिरना चाहती हो ताकि मैं कुछ न कर सकूँ, आगे न बढ़ सकूँ –“

वह हताश हो उठी –--“राज ! मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, मैंने तुमसे प्रेम विवाह किया है और मैं तुम्हारी वैल-विशार हूँ | तुम्हारी पत्नी होने के नाते तुम्हारी प्रेमिका, तुम्हारी मित्र और सच्चा मित्र सदा वही करेगा जो तुम्हारे लिए उचित होगा | मर्यादा का पालन तो करना ही होगा | ”

“किस मित्रता की बात कर रही हो ?किया ही क्या है तुमने मेरे लिए ?तुम अच्छी तरह जानती हो रिचर्ड मेरा बॉस है और वह तुम्हें बेहद पसंद करता है –लेकिन तुम ---!!”

“हाँ, जानती हूँ और यहा भी जानती हूँ कि रिचर्ड की निगाहें मेरे शरीर पर इधर-उधर फिसलती रहती हैं और पति होकर तुम मेरा अपमान सहन करते हो ---कर सकते हो ?

“अपमान ? इसे अपमान कहती हो ? अरे ! करोड़पति आदमी है | जिस किसीको भी आँख उठाकर देख भर ले मालामाल हो जाता है | ---और पिछली कितनी ही पार्टीज से वह तुम्हें अपना डांस-पार्टनर बनाना चाह रहा हैऔर तुम हो कि उसे टाले ही जा रही हो | जानती हो, इसका प्रभाव मेरे कैरियर पर क्या पड़ेगा ?”

“मैं नहीं जानती, तुम किस कैरियर की बात कर रहे हो ? आज जबकि सारा संसार भारतीय सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहा है, हम स्वयं अपनी सभ्यता, अपनी मर्यादा, अपनी सीमाएँ तोड़ने पर लगे हैं !ऐसा क्यों है राज ? मुझे दुख होता है, असीम दुख –“

भानु की आँखों से लगातार आँसू बहे जा रहे थे | उसे पश्चाताप था अपने निर्णय पर, अपने चुनाव पर –लेकिन अब क्या करती ? फँस चुकी थी एक ऐसे रिश्ते में जिसमें से निकलना इतना आसान भी नहीं था | अपने माता-पिता की एकमात्र संतान ! कैसे उन्हें छोड़कर आ गई थी एक झटके में ? हर बार उसकी आँखों में आँसु भर आते | एक प्रेम के पीछे वह दौड़ी चली आई और वही प्रेम उसके समक्ष अब प्रश्नचिन्ह बनाकर खड़ा है | उसने सुना राज बड़बड़ कर रहा था ;

“पता नहीं, किस मर्यादा की बात करती रहती हो ?पत्नी वही जो पति की निगाह का इशारा पहचंकार ही बात समझ जाए, यहाँ तो मैं तुम्हें समझा-समझाकर थक चुका हूँ –लेकिन तुम हो कि ---“

भानु ने अपनेको सँभलने की कोशिश की, पूछा ;

“राज ! अच्छा, एक बात बताओ –मैं रिचर्ड के साथ डांस कर लूँ और फिर वह मेरे सामने प्रपोज़ कर दे –अपना बैड-पार्टनर बनाने के लिए तो तुम क्या करोगे ?”

“भानुमति ! इतनी भाग्यशाली नहीं हो तुम !अरे! महाराज जैसा है वह ! किसी पर आसानी से निगाह नहीं जमती उसकी | वो तो पता नहीं क्या दिखा तुम्हारे अंदर जो वो ---“

भानु का सिर चकराने लगा, आखिर राज ने उसमें क्या देखा था जो उसके पीछे पड़ा रहा | वह प्रेम था या प्रेम के नाम पर लालच –उसके माता-पिता सब समझ गए थे, कितना समझाया था उसे ! कितने लाड़–प्यार में पाली गई थी और आज अपनी दुर्दशा पर उसे आँसु बहाने पड़ रहे हैं!वह क्रोधित हो उठी ;

“बस, केवल तुम ही कुछ नहीं देख पाए राज ! सब कुछ भूल गए ? ये भी कि हम उस देश के हैं जहाँ एक पुरुष को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, वह एक पत्नी के साथ पूरी उम्र गुज़ार लेता है और तुम –अपनी पत्नी से उसकी मर्यादा खंडित करने की बात कर रहे हो ? पता नहीं, कैसे तुम्हारे मुँह से यह सब निकल सका है – पता नहीं कैसे ?”वह क्रोध में लगभग चिल्लाने लगी थी | आँसु उसकी आँखों से लगातार बहे जा रहे थे और उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था, वह क्या करे? कितना लज्जित कर रहा था उसका ही पति उसे ! वह पति था ?दुख व क्रोध से उसकी आवाज़ भर्राई जा रही थी | 

यह इतने दिनों में पहली बार हुआ था जब वह बोले बिना अपने को रोक नहीं पाई थी | 

“पता नहीं, क्यों मुझसे तुम्हारा सती-सावित्री वाला रूप देखा नहीं जाता –वो पत्नियाँ ही होती हैं जो अपने पति की आज्ञा मानकर सब कुछ स्वीकार करके चलती हैं | ”

आज्ञा शब्द ने भानु के दिल में जैसे छूरा घौंप दिया जैसे कोई दिल में गहरी टीस से उसे मरोड़ रहा था | 

“चाहे उसे मानने में उनका सब कुछ स्वाहा क्यों न हो जाए ?” उभानु ने दुखी होकर पूछा | 

“शादी के बाद उसका अपना रहता ही क्या है ?तन, मन और--- ”

“धन भी –यही न ? मैंने तुम्हें इसके लिए कहाँ मना किया राज ?आज भी तुम भारत वापिस लौट चलो, माँ-बाबा के पास कम पैसा नहीं है, वह सब तुम्हारा ही तो है | अपना देश, अपने लोग! क्या यहाँ परेपन की भावना कभी नहीं कचोटती तुम्हें ?”भानु बहुत–बहुत दुखी थी | 

“देखो, और ज़्यादा बोर मत करो मुझे –--मुझसे, मुझसे सहा नहीं जाता अब ये तुम्हारा रूप | हर बात में मुझसे बराबरी करने लगती हो | पति समझा ही कहाँ है तुमने मुझे, गुलाम ही समझा है | जैसा तुम कहो, वही करूँ, वही कहूँ | अरे ! जीवन जीकर तो देखो, सब भूल जाओगी सतीपना | जीवन जीने का नाम है, रोने का नहीं | जब तक जीओ, खिलकर, खुलकर जीओ | ये जो तुम्हारा शरीर है न जिस पर इतना गुमान कर रही हो, मिट्टी में ही तो मिल जाना है एक दिन !रिचार्ड जैसा आदमी फिर फँसने वाला नहीं है | आज शाम उसने फिर बुलाया है तुम्हें| मुझे समझ में नहीं आता उसके साथ नाचने में तकलीफ़ क्या है तुम्हें ? और ये जो हर समय तुम अपनी आरती उतारती रहती हो न, कोई नहीं पूछता | बेहद छोटी बातें हैं | अरे! आदमी वो ही है जो सबको अपना मानकर चले | सारा संसार उसका अपना हो, सब उसके अपने---–अपना तो अपना होता ही है उसमें क्या बड़पन्न है –बड़ाई तो उसमें है जो दूसरे को अपना समझे| ”

“चाहे उसमें उसका अपना व्यक्तित्व टूटकर ही क्यों न गिर जाए?क्रोध में भानु के दाँत किटकिटाने लगे | 

“पत्नी का व्यक्तित्व तो तभी टूट जाता है जब उसका विवाह होता है | तभी तो उसे पति के नाम से जाना जाता है | आज तुम्हें सब ‘मिसेज राज ‘ के नाम से ही जानते हैं न ? भानुमति को कौन जनता है ?”

“यही बात तो ---भानुमति पता नहीं कहाँ खो गई---पता नहीं कहाँ ---?”

“इसका दुख है तुम्हें ? पहले इसके बारे में कभी नहीं सोचा था ?”

सोचा था कि भानुमति से मिलकर राज एक सुदृढ़ व्यक्तित्व बन जाएगा जिसे ‘भानुराज’ समझा जाएगा | ऐसा व्यक्तित्व जो कभी हिल ही न सकेगा, दो को एक में बनाकर मिला हुआ एक बलशाली व्यक्तिव !पर –यहाँ तो भानुमति टुकड़ों में बांट रही थी –राज का पता नहीं – खैर, मनुष्य की सब सोची हुई बात कहाँ हो पाती है !!यहाँ तो भानु टुकड़ों में बँट रही है –राज का पता नहीं !

अब तक राजेश उठ चुका था, अल्मारी से बोतल निकालकर पैग बनाकर चुसकियाँ लेने लगा था | भानुमति उसे बहुत बार समझा चुकी थी, इतना कि थक चुकी थी, खिन्न हो गई थी वह राज से ! अब और कुछ कहना दीवार पर सिर फोड़ने जैसा था | 

उसका पीने का कोई भी समय नहीं रहा था, पीने का ही क्या किसी भी चीज़ का कोई समय नहीं | अभी तो विवाह को केवल दो वर्ष ही व्यतीत हुए थे | इन दो वर्षों में वह एक बार माँ-बाबा के पास भारत आई थी| तब तक इतनी हद नहीं हुई थी, सोचती –सब ठीक हो जाएगा | अब तो प्रश्नों का काफिला उसके कंधे पर लदा हुआ है | ढेर सारे प्रश्न उसकी आँखों के समक्ष तैरते रहते जिनका कोई भी समाधान उसको दिखाई नहीं देता था | वह गुमसुम सी, चुप्पी में अपने जीवन की परिभाषा ढूँढती रहती है | जीवन की शक्ल में एक लंबा-चौड़ा प्रश्न उसके सामने खड़ा उसे चिढ़ाता रहता है, खिलखिलाता रहता है !जाने आगे क्या होगा ? एक लंबी, सियाह सड़क पर पसरकर उसे दिग्भ्र्मित करता रहता है | 

न जाने कहाँ खड़ी हूँ मैं ?

सामने वाली हिलती चट्टान के

लुढ़कते पत्थरों की तरह

हर पल –-

हर क्षण –

साँझ के उतार-चढ़ाव को थमती, रोकती

न जाने, कहाँ चढ़ी हूँ मैं –

और

तुम जैसे प्यारे दोस्तों की बदौलत

मैं गुम हो गई हूँ

उस दिशाहीन अँधेरे में

जिसका उजाला तुमने छीन लिया है

और

डंके की चोट पर, हर तीखे प्रहार के बीच

तान से मधुर स्वर में

मुझे तुम आज, अब भी अपना दोस्त कह रहे हो –

और

मेरी आत्मा के भीगे हुए कागज़ पर

बेरङी सियाही से उतर आए हैं

कुछ नाम

जो बिखरते हुए सूरज के समान

लाल हैं

और

उनमें ही एक नाम

हाँ---केवल एक नाम

तुम्हारा भी है !!

सांझ के गहराने के साथ ही भानुमति का हृदय धक-धक करने लगा | वह राज के साथ पार्टी में जाने का प्रपोज़ल स्वीकार करे या न करे | वह एक त्रिशंकु की भाँति इधर-उधर भटकती रही, लटकती रही जिससे उसका सारा व्यक्तित्व कराह उठा ---

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