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सोई तकदीर की मलिकाएँ - 8

 

सोई तकदीर की मलिकाएँ 

 

8

 

बसंत कौर केसर को उसी तरह नलके के पास बैठा छोङ रोटी के जुगाङ में लग गयी । बेबे जी के लिए यह बहुत बङा सदमा था । उन्हें ब भी न केसर की बात पर विश्वास हो रहा था न बसंत कौर की । ऐसा कैसे कर सकता था भोला ।
केसर वैसे ही घुटनों में सिर दिये बैठी रही । इस बीच उसे दो उल्टियाँ और हो चुकी थी । पीला रंग सफेद हो गया था । वह सोच रही थी , इससे अच्छा वह भी अपने घर वालों के साथ जन्नतनशींन हो जाती तो कितना अच्छा होता । इन लोगों ने उसके सारे परिवार को तलवारों से काट डाला , उसे ही क्यों छोङ दिया । जीकर उसने क्या कर लेना था ।
यहाँ आने के तीसरे दिन आधी रात को जब सब लोग सो रहे थे तब सरदार उसकी कोठरी में आया था । उस समय एक पल को उसे लगा था कि आज उसकी जिंदगी की आखिरी रात है । अभी सरदार अपनी कृपाण निकालेगा और उसके सीने में घोंप देगा । डर के मारे उसकी घिग्गी बंध गयी थी । पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।
डर मत , चुपचाप सो जा । शोर मत करना , समझी । सारे सो रहे हैं । तेरी आवाज सुनेंगे तो जाग जाएंगे ।
उसने समझदार बच्ची की तरह गरदन हिलाई और डरी सहमी चुपचाप मंजी पर इकट्टी होकर लेट गयी । सरदार भी उसके साथ उसकी मंजी पर लेट गया था । भय के मारे उसने अपनी सांस रोक ली और आँखें बंद कर ली । थोङी देर में उसे अपने बदन पर हाथों की सख्त सी छुअन महसूस हुई । वह चीखना चाहती थी पर उसके होंठ सरदार के होंठों में दबे पङे थे । चीख उसके गले में ही घुट कर रह गयी । सरदार ने उसे बुरी तरह दबोच रखा था । फिर एक एक कर कपङे उसके जिस्म से जुदा हो गये । थोङी देर तक उसे बुरी तरह से मसला जाता रहा फिर सरदार उठ कर जाता हुआ बोला – सुन किसी से कुछ मत कहना । आज से तू मेरी दूसरी घरवाली है ।
और वह हँसकर चौबारे चला गया । उस रात सारी रात उसका बदन चीसता रहा था । वह समझ ही नहीं पा रही थी कि उसके साथ क्या हो गया । हाँ जो हुआ , अच्छा तो बिल्कुल नहीं था । फिर तो यह रोज का क्रम ही हो गया । जब भी उसका मन करता या मौका मिलता , वह उसकी कोठरी में आ जाता । जितनी देर मन करता , उसे मसलता और फिर बसंत कौर के पास जा पहुँचता ।
पर इस सबमें वह क्या करे । ऊपर से यह उल्टियाँ अलग उसकी जान की दुश्मन बनी हुई थी । वह बच्ची समझ ही नहीं पा रही थी कि उसे हुआ क्या है ।
बेबे जी अलग उदास हुई सिर पकङे बैठी थी । जब भोला इस बच्ची को घर में लेकर आया था तो उन्हें लगा था कि अनाथ बच्ची है । किसी ने इसके सारे घर वालों का कत्ल कर दिया । अकेली रो रही होगी तो भोला इस पर तरस खाकर ले आया है । यहाँ घर के कामों में मदद कर दिया करेगी । दो वक्त रोटी ही तो चाहिए इसे । दे दिया करेंगे । नया पुराना कपङा भी दे देंगे । यहाँ घर में घर की बच्ची की तरह पल जाएगी । सही वक्त पर किसी जरुरतमंद से ब्याह कर देंगे । पर भोले की नीयत में खोट था , यह वह उस दिन क्यों नहीं देख पाई । बेचारी बच्ची का सर्वनाश कर दिया कमबख्त ने । अब इस मुसीबत का क्या किया जाय । कैसे छुटकारा मिले इस मुसीबत से । अगर किसी दाई को घर में बुलाया तो सारे गाँव में खबर फैल जाएगी । यहाँ वहाँ फालतू का चर्चा होगा ।
दो घंटे के करीब वह ऐसे ही बैठी रही , इस बीच बसंत कौर ने शिकंजवीं बना कर केसर को पकङाई । रोटी बना कर बेबे को रोटी खाने के लिए दो बार कह गयी पर बेबे का रोटी खाने को मन ही न हुआ । आखिर हिम्मत करके वह उठी और माया दाई के घर जा पहुँची ।
माया घर पर ही थी । बेबे को अचानक आया देख कर चौंक गयी ।
आ सरदारनिए । माथा टेकती हूँ । आज अचानक कैसे कष्ट किया । किसी को भेज कर मुझे बुलवा लिया होता । मैं ही हवेली आ जाती ।
तेरा सुहाग भाग बना रहे माया । बस थोङी सी सलाह लेनी थी इसलिए खुद ही चली आई ।
कह सरदारनी ।
एक बेचारी अभागन विधवा है । मुसलमानों ने खराब कर दी । कुछ दिन ऊपर हो गये है . कोई पंद्रह कु दिन । कोई दवा काढा बता तो उसे बनवा दूँ ।
मैं बना कर दे आती हूँ । आप कहां मत्था मारते रहोगे ।
मैं कहां बना रही हूँ . यहाँ नहीं रहती वह । मेरी बहन हैं न समालसर में , उसकी दूर की देवरानी लगती है । बहन ने कोई रास्ता पूछा था ,तू जानती है घर की इज्जत का सवाल है । तो मैंने सोचा , माया से अच्छा इस बीमारी का इलाज किसके पास होगा ।
माया ने फिर कुछ नहीं कहा । एक काढा बनाने का तरीका बता दिया ।
बेबे ने पाँच रुपए माया के हाथ में रखे ।
इसकी जरूरत नहीं है सरदारनी । मेरी अच्छी तकदीर कि तेरे किसी काम आ सकूँ ।
कोई न रख ले , बच्चों को मेले में जलेबी ले देना ।
बेबे हलका फुलका मूड लेकर हवेली लौटी । उसने सोंठ , अजवाइन , गुङ , जामुन के पत्ते जैसी कई जङी बूटियाँ डाल कर काढा बनाया और केसर को गिलास भर कर पकङा दिया ।
ले पी ले केसर . तेरी उल्टियाँ ठीक हो जाएंगी ।
सच्ची बेबे । केसर वह एकदम कङवा काढा एक सांस में पी गयी । उसका मुंह का स्वाद कङवा हो गया था पर जिसकी जिंदगी का स्वाद बिगङा पङा हो , वह मुँह का स्वाद क्या देखे ।
बेबे जी और बसंत कौर हैरानी से उसका मुँह देखते रहे । पर केसर की जबान से सी नहीं निकली ।
रोटी खाएगी । डाल दूँ ।
नहीं छोटी सरदारनी , अभी मेरा दिल नहीं कर रहा । रख दो बाद में खा लूँगी ।
बसंत कौर ने बेबे को थाली पकङाई और खुद भी रोटी लेकर खाने लगी । केसर दुपट्टे से सिर बाँध कर लेटी रही ।
करीब घंटे बाद बसंत कौर दोबारा उसे देखने आई तो केसर अपने कमरे में नहीं थी ।
कहाँ गयी यह लङकी । बसंत कौर ने इधर उधर देखा । उसे कहीं दिखाई नहीं दी । हार कर उसने अपनी सास को पुकारा – बेबे जी यह केसर पता नहीं कहाँ चली गयी । कहीं दिखाई नहीं दे रही ।
अपने कमरे में होनी है और कहाँ जाएगी ।
वहाँ नहीं है । मैंने सारा घर देख लिया ।
पथकन देखी । वहाँ चली गयी होगी ।
थोङी देर बाद बसंत कौर की आवाज आई – बेबे जी वहीं थी पथकन में । गोबर के तसले ले जाकर उपले बना रही थी । सुबह से दोपहर हो गयी । अब रोटी दी है । अगर हजम हो जाए तो ।
केसर छोटे छोटे टुकङे तोङ कर रोटी खा रही थी ।


बाकी कहानी फिर ...

 

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