सोई तकदीर की मलिकाएँ - 6 Sneh Goswami द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सोई तकदीर की मलिकाएँ - 6

 

सोई तकदीर की मलिकाएँ

 

6

 

भोला सिंह का भूख के मारे बुरा हाल था पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह नीचे उतरे इसलिए ऊपर ही बैठा ऊपर से नीचे के हालात का जायजा ले रहा था । अभी तक तो स्थिति नियंत्रण में थी पर कब तूफान आ जाए , क्या पता । इसी डर में आज वह पूरा दिन काम का बहाना करके बाहर भटकता रहा था । पूरा दिन बसंत कौर और बेबे के सामने आने से बचता रहा था । पर रोटी तो खानी थी । आखिर उसने हिम्मत जुटाई और रोटी खाने के लिए नीचे उतरा । सामने चौंके में बसंत कौर रोटियाँ सेक रही थी । नलके से हाथ धोकर वह चौंके के बाहर चौंकी बिछा कर बैठ गया । बसंत कौर ने थाली परोस कर आगे रखी । साथ में गाढी मक्खन डली लस्सी तीन पाव के कङे वाले गिलास में डाल कर । भोले ने चुपचाप रोटी खाई और बिना इधर उधर देखे बिना कुछ बोले दोबारा चौबारे में चला गया ।
एक अपराध बोध उसे भीतर से खाये जा रहा था । यह ठीक है कि पाकिस्तान में मुसलमानों ने हिंदुओं और सिक्खों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था । उनके घर लूट लिए थे । मंदिर गुरद्वारे नापाक किये गये थे । घर दुकानें जला दिए गये । लङकियाँ उठा ली गयी । उनको सरेआम बेइज्जत किया गया । बेकसूर निहत्थे लोगों को मार डाला गया । कइयों को जबरदस्ती मुसलमान बनने पर विवश किया गया पर सारे मुसलमान तो कट्टर जुनूनी नहीं होते न । उनमें से कितनों ने हिंदुओं को छिपाया भी था । अपनी जान पर खेल कर उन्हें सुरक्षित हिदुस्तान भेजा था फिर उन पागल हो गये लोगों का बदला यहाँ के मासूम बेगुनाह लोगों को मार कर क्यों लिया जाय । क्या परमात्मा इससे खुश होगा । क्या उन सताये हुए लोगों की रूहें इस कत्लेआम से खुश हो जाएंगी । लोग धर्म जैसी पाक पवित्र चीज के नाम पर हिंसक क्यों हो जाते हैं । जबकि सारे धर्म एक ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करते हैं । सारे धर्म रहम की सिफारिश करते हैं । अगर सिक्ख धर्म में दसवंध का विधान है कि हर सिक्ख को अपनी नेक कमाई में से दसवां हिस्सा गरीब गुरबों पर खर्च करना चाहिए तो कुरान में भी जकात यानि दान का महत्व बताया गया है । हिंदुओं के तो सारे ही धरम ग्रंथ जीवों पर दया का संदेश देते हैं । दान की महिमा गाते हैं फिर ये सारे धर्म और इन्हें मानने वाले एक दूसरे के दुश्मन कैसे हो गये ।
. उसे केसर का भी ख्याल आया । उस बदनसीब का क्या कसूर था कि सारा परिवार उसकी आँखों के सामने काट डाला उन लोगों ने । अब बेचारी कहाँ जाएगी । घर तो ले आया है वह पर बेबे जी और बसंत कौर उसे घर पर रखेंगी या बाहर का रास्ता दिखा देंगी । सोचता हुआ वह बेचैनी से सारी छत के चक्कर लगाता रहा । बसंत कौर सारा काम निपटाकर दूध का लोटा लिए जब छत पर आई , तब भी वह अपनी सोचों में खोया खोया छत पर टहल ही रहा था ।
क्या हुआ जी , सब ठीक है न । तबीयत ठीक हैं तुम्हारी ?
ठीक है । तबीयत को क्या हुआ है । मैं तो सोच रहा था , तुम लोगों से बिना पूछे ही उस लङकी को घर ले आया । पता नहीं , तुम कैसे संभालोगी । कैसे सोचोगी । यतीम है बेचारी । कोई नहीं है इसका । इसके घर वाले सब मार डाले गये । बेचारी गरीब इतनी बङी दुनिया में अकेली कहाँ रहेगी ।
कुछ गलत नहीं किया आपने । बङी प्यारी बच्ची है । काम काज में बङी तेज है । आज सारा गोहा कूङा इसी ने किया । पाथियाँ पथ आई । जोरे के साथ मिल कर चारा डाला । सारे कपङे धोए । इतना काम करेगी तो दो रोटी खाकर कोठे में पङी रहेगी ।
भोले ने श्रद्धा से बसंत कौर के हाथ पकङ लिए । कितनी सुलझी हुई है यह बसंत कौर । खानदानी लोगों की यही सिफत होती है कि हर बात को शांति से संभाल लेते हैं । किसी माङे , ओछे घर की औरत होती तो रो रो कर घर में क्लेश खङा कर देना था । नरक बना देती घर को ।
बसंत कौर उसका हाथ पकङ कर कमरे में ले आई और मंजे पर बैठा दूध का लोटा हाथ में पकङा दिया । दूध पीकर भोला निश्चिंत होकर सोया ।
बसंत कौर उस लङकी केसर के पीले हल्दी हो गये चेहरे को याद कर उदास हो गयी । अभी यह लङकी मुश्किल से तेरह चौदह साल की है और इतनी पङाङ जैसी मुसीबतें जिंदगी में झेलने को आ पङी हैं । कैसा लगा होगा बेचारी को जब मां बाप बहन भाई सब मार दिये गये होंगे । घर बार सब पीछे छूट गया । सीने पर पत्थर रख लिया है इस लङकी ने । न बोलती है , न रोती है । बस मुँह सिल कर काम में जुटी रही सारा दिन ।
सोचते सोचते कब वह सो गयी , उसे पता ही नहीं चला ।
केसर यहीं घर में रहने लगी थी । वह स्वेच्छा से नोहरा साफ करती । कूङा फेंकती । गोबर उठाकर पथकन में ले जाती और पाथियाँ बना देती । गीली पाथियां जाकर कई बार पलट आती । सूखी पाथियां जलावन के लिए चौंके में ले आती । सारे घर के कपङे धो देती । आँगन गोबर और चिकनी मिट्टी मिला कर लीप देती । गाय भैंसों का सानी चारा कर देती । बदले में दो वक्त की रोटी उसे मिल जाती । इससे ज्यादा की उसे तमन्ना भी नहीं थी । वह कम से कम बोलती । जितना पूछा जाता , उतना ही जवाब देती । न एक शब्द ज्यादा न एक शब्द कम । गुमसुम सी सूनी आँखें लिए दुपट्टा सिर और गले में कस कर लपेटे हुए काम में लगी रहती । बसंत कौर का आधे से कहीं ज्यादा काम उसने संभाल लिया था । बसंत कौर को अब सिर्फ चूल्हे चौंके का काम देखना होता ।
बाहर भी अब हालात थोङा संभले थे । कत्लेआम रुक गये थे । रिफ्यूजी लोगों के लिए सरकार ने जगह जगह शरणार्थी शिविर लगा रखे थे जिनमें लोग ठूंसे हुए थे । कई स्वयंसेवक दल इन्हे अनाज , राशन , कपङे , दवाइयां उपलब्ध करवा रहे थे । जमीनों के क्लेम मिलने लग पङे थे । उजङ कर आये लोगों के लिए सरकार नौकरियों की व्यवस्था कर रही थी । कुछ पढे लिखे नौजवान इनके बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबंध कर रहे थे । इस तरह दानवता पर मानवता की विजय हो रही थी । दानव अब किसी कंदरा या खोह में जा चुके थे ।

बाकी फिर ...