सोई तकदीर की मलिकाएँ - 11 Sneh Goswami द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सोई तकदीर की मलिकाएँ - 11

 

सोई तकदीर की मलिकाएँ 

 

11

 

 

गेजे जरा जाकर माया को उसके घर तक छोङ आओ । - बेबे ने गेजे को बुलाया ।
जी बेबे जी । अभी जाता हूँ । चलो चाची जी , चलें ।
गेजे ने अपनी साइकिल निकाली । उसके हैंडल पर आटे और गुङ वाले लिफाफे टांगे । कैरियर पर माया को बैठाकर उसके घर छोङने चल दिया । माया तो सारा सामान लेकर चली गयी पर केसर आँगन में ही खङी रह गयी । उसको यह सारा माजरा अभी तक समझ में नहीं आया था । उसने माया और बङी सरदारनी की बात आधी ही सुनी थी , उसमें से भी उसे आधी ही बात समझ में आयी थी । तो वह उस चौथाई बात का मतलब समझने की कोशिश कर रही थी । उनकी जितनी बातें उसने सुनी , उन सारी बातों में से उसे इतना ही समझ में आया था कि अब से उसे महीने के महीने परेशान होना नहीं पङेगा । माहवारी आएगी ही नही । तो यह तो खुश होने की बात हुई । हर महीने का झंझट खत्म हुआ । कोई खून नहीं जाएगा । न कमर दर्द होगा । तो यह मजे की बात हुई न । मतलब दवा बङी कारगर साबित हुई । फिर इसमें दुखी होने वाली कौन सी बात है । वो माया और बेबे जी इतना उदास होकर , एकदम गंदा सा मुँह बना कर धीरे धीरे क्यों बातें कर रही थी । उसने सोचा और सोचा फिर फिर सोचा पर उसे उदास होने का कोई कारण नजर नहीं आया । आखिर बीस मिनट सोचने के बाद भी कुछ पल्ले नहीं पङा तो उसने सिर को झटका दिया – ऊंह , होगी कोई बात जो मेरी समझ से बाहर है । चल मुझे क्या । मेरी तो सारी समस्या ठीक हो गयी और वह टप्पे के बोल गुनगुनाती हुई पाथियाँ पलटने पथकन में चली गयी । वहाँ काफी देर तक पाथियां उलट पलट करती रही । फिर सूखी पाथियाँ टोकरे में बर ली और टोकरा चौके के पास लाकर रख दिया ।
वक्त अपनी गति से आगे बढ रहा था पहले दिन बीते फिर हफ्ते और फिर महीना होने को आया पर सरदारनी वीर कौर के जहन में उस की वह घटना और माया की बातें बस गयी । वह केसर को घर के कामों में उलझे हुए देखती तो ठंडी सांसें भर लेती - इस बच्ची की किस्मत में तूने इतने ढेर सारे दुख क्यों लिख दिये भगवान । भला इससे कौन से पाप हुए होंगे इस छोटी सी उम्र में जो इतनी सजाएँ एक साथ मिल गयी । पहले माँ बाप मारे गये फिर भाई बहन । बेचारी का घर बाहर छूट गया । और अब ये अनहोनी । सारी जिंदगी मां बनने का सुख नहीं भोग पाएगी । तो शादी ही क्यों करेंगे । किसी भले मानुष की जिंदगी बरबाद करने का जुल्म क्यों करना । इस गरीब की सारी उम्र स घर का झाङू , कूङा करते ,पाथियां पथते ही बीतने वाली है ।
वे जितना इस बारे में सोचती , उतना ही अधिक उदास हो जाती ।
उधर भोले को ब्याहे हुए चार साल होने को आये थे पर अभी तक कोई आस औलाद नहीं हुई थी । वह उम्मीदभरी नजरों से बसंत कौर को देखती पर हर महीने निराशा ही हाथ लगती । धीरे धीरे उसके मन में यह ख्याल आने लगा था कि यह सब केसर के साथ हुए अन्याय के कारण है । शायद भगवान नाराज हो गया है कि तकदीर रूठ गयी है । बसंत कौर की कोख सूनी रख कर वह इस तरह सजा दे रहा है ।
वह पीर की दरगाह में जाती । झुक झुक सजदा करती – हे बख्शनहार , मेरे सारे गुनाह बख्श दे । मंदिरों में जाती । एक एक मूर्ति के सामने हाथ जोङ कर बैठी रहती । तरह तरह की भेंट चढाती । दान करती । वह बार बार केसर के सामने हाथ जोङती । सौ सौ माफियाँ मांगती – मुझे माफ कर दे केसर । मुझसे बहुत बङी गल्ती हो गयी ।
केसर हैरान परेशान बेबे जी का मुँह देखती रह जाती – तू ऐसा क्यों कहती है बेबे । तूने क्या किया । वीर कौर की तसल्ली किसी तरह न होती । केसर को देख देख वह आँसू बहाती रहती ।
बेबे जी ने इस बात को इतना दिल से लगा लिया कि चारपाई पकङ ली । केसर और बसंत कौर उन्हें बार बार समझाती – बेबे जी आप क्यों खुद को कसूरवार मान बैठे हो । सब नसीब की बातें है । जो होना था , वह तो हो चुका । भाग्य से कौन लङ सका है । जब जो होना है , वही होता है । हम तो निमित्त मात्र हैं । करने कराने वाला तो वह ईश्वर है । उसके किये से ये सारा जगत चलता है । आप यही तो कहते हो और आपकी बाणी में भी यही लिखा है –
करन करावन आपे हार ।
मानस के कछु नाही हाथ ।।
या
सोचे सोच न होवई जे सौचे लख वार । यानि यह क्रिया को करने वाला वह स्वयं है । मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है ।
सोचने से सोच का समाधान नहीं मिलता , बेशक लाख बार सोचा जाय ।
इसलिए सोच छोङ दो । खुश रहने की कोशिश करो । सब भला होगा । सब ठीक हो जाएगा । बेबे सूनी नजरें छत पर टिकाये सब सुनती रहती । हार कर बसंत कौर आँखें पौंछती उठ जाती । केसर पैताने बैठी हाथ पैर दबाती रहती ।
भोला सिंह हकीमों से दवाई खरल कराके लाता । वैद्यों के चक्कर काटता । तरह तरह की दवाइयां दी जाती पर कोई फर्क न पङता । पास पङौस के लोग तक चिंता करने लगे । वे सुबह शाम बेबे का हाल पूछने आते । तरह तरह की बातें करके बेबे का मन बहलाने की कोशिश करते पर बेबे की उदासी कम न हुई । पङोस की बुजुर्ग औरतें पीर से धागा करवा कर लाई और बेबे की मंजी से बाँध दिया पर बेबे की सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ । भोला सिंह एक दिन अपनी बैलगाङी में डाल कर शहर भी ले गया । अंग्रेजी डाक्टर ने अच्छी तरह से जाँच की फिर कुछ गोलियां और कैप्सूल लिख दिये । पूरे पाँच दिन लगातार दवा खिलाने के बाद जब भोला दोबारा डाक्टर के पास लेकर गया तो उसने सीधे सीधे कह दिया कि अम्मा को कोई बहुत गहरा सदमा लगा है । पहले इनके दिमाग से वह सदमा निकालो । इनके हाथ से खूब दान पुण्य करवाओ । इनकी उदासी का कारण ढूंढो तब कोई दवा असर करेगी वरना कुछ भी हो सकता है । अभी इस समय अंटसंट दवा देने का कोई फायदा नहीं है ।
हार कर भोला बेबे को घर ले आया ।

 

बाकी कहानी फिर ...