अपना घर Asha Parashar द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अपना घर

वह सिर्फ दो दिन के लिए जबलपुर आयी थी, वहाँ के कन्या महाविद्यालय में बाह्म परीक्षक के रूप में। पर आज आठ दिन हो गये हैं, उसका मन ही नहीं कर रहा वापस घर जाने का! पाँच वर्ष पहले आयी थी बाऊजी के देहावसान पर। अम्मा के जाने के बाद बाऊजी ही एकमात्र मायके का आकर्षण थे। सुधा भाभी-राकेश भैया से दिन त्यौहार पर औपचारिक बातें हो जाती थीं। राकेश भैया का एक छोटा-मोटा कोचिंग संेटर है और सुधा भाभी एक निजी विद्यालय में पढ़कर भैया का हाथ बंटाती हैं। बकौल जतिन, “उनके रहने का स्तर निम्न मध्यम वर्ग का है, जो हमारे स्टेटस से मेल नहीं खाता।“ पर जतिन शायद नहीं जानते कि किसी भी औरत का सबसे नाजुक मर्म उसका मायका होता है और वहां लगी चोट वह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसलिये उसने न कभी भैया-भाभी को अपने घर बुलाया और न ही जतिन को वहां ले जाने की हिम्मत की। ऐसा भी नहीं है कि जतिन खानदानी रईस हैं, उनके पिता पंडित सुंदर लाल एक कपड़ा मिल में साधारण से ड्राफ्ट्समैन थे। वह तो उसकी किस्मत और जतिन की मेहनत थी जो आज उनका शुमार शहर के चन्द रईसों में होता है। वह कहते है न कि नया-नया पैसा आदमी में गुरुर ले ही आता है और वही हाल जतिन का भी था। उसकी हर बात में दिखावा टपकता। उसने तो कॉलेज की नौकरी भी जतिन की नाराजगी झेलते हुए जारी रखी है। जतिन की नजर में उसे कॉलेज की दो टके की नौकरी छोड़ समय बिताने के लिए क्लब, जिम या किटी में जाना चाहिए।

“कहाँ खो गई बुआ?“ अंशु के हाथ में पकड़ी प्लेट में रखे पकौड़े की महक कमरें में फैल गई। “जल्दी जाओ, ठण्डे हो रहे हैं, माँ चाय ला रही हैं।“ 

सुधा भाभी को उसने फोन कर आने की संक्षिप्त-सी सूचना भर दी थी, पर राकेश भैया तो शाम को कॉलेज के गेस्ट हाऊस में लेने गए थे और वह भी मायके आने का लोभ न छोड़ सकी। जब से यहां आयी है, कोई परहेज नहीं कर रही। सवेरे भाभी खूब मीठी अदर की चाय के दो कप पिला ही देती।

कैसे बताये, वहां सवेरे बेस्वाद बिना चीनी की ‘हर्बल टी’ पीने के बदले उसने चाय ही छोड़ दी। आधा चम्मच चीनी लेने पर जतिन उसे बड़ी हिकारत से देखते।

“रज्जी, तुम लोअर मिडल क्लास की आदतें क्यों नहीं छोड़ देतीं?“

यहाँ वे ‘अपर हाई क्लास’ धूरती हुई आंखें नहीं थीं, और वह भी जैसे जतिन के अभिजात्य की धज्जियां बिखेरने की ठाने थी। नाश्ते में आलू के दो-तीन परांठों के साथ मिर्च का तीखा अचार खूब चटखारे ले कर खाती। उसे याद नहीं कि कितना अर्सा हुआ उसे परांठे खाये। जहाजाकार डाइनिंग टेबल पर अकेले बैठ आधा प्लेट ओट्स खा कर सरका देती पर कोई दुबारा पूछने वाला भी न था। नेपाली कुक नारायण भावविहीन चेहरे से बर्तन उठा लेता। जतिन और बबल दोनों ही सेहत के प्रति बहुत सजग हैं। 

नाश्ते के बाद भैया के दोस्तों और भूले बिसरे रिश्तोदारों के समाचारों का मनोरंजक सिलसिला शुरू हो जाता।

रज्जी तुम्हें याद है, वो... से किस्सा शुरू होता और खत्म होते-होते बीच में दो-तीन बार हंसी के दौरे पड़ते। बहुत अर्से बाद वह दिल खोल कर हंसी है। जतिन की नजर में जोर से हंसना फूहड़ता की निशानी है। वह तो बात भी बहुत कम करते हैं। बबल को भी सवेरे-शाम कानों पर हैडफोन लगाये बातें करते देखती और वह दूर से ही ‘हाय मॉम’ उछाल देता। उसका मन करता वह भी उससे कभी लाड से लिपट कर कुछ कहे पर कभी नहीं हुआ। रविवार को भाभी अंशु और भैया को धूप में बैठा हाथ में गरम तेल का कटोरा लिए दोनों से सिर पर मालिश करती, उसे तो बबल के बचपन में भी यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। जतिन ने बबल के पैदा होने के दस दिन बाद ही उस मंगोल चेहरे और चपटी-सी नाक वाली आया ‘रोजी’ को सौंप दिया था।

रात का खाना सब जमीन पर चटाई बिछा कर खाते। भगोने, कढ़ाई सब वहीं रख लिए जाते। वह भी पालथी लगा चावल-अरहर की दाल उंगलियां सान-सान कर खाती। भैया कच्चे प्याज को जमीन पर रख मुक्का मार कर फोड़ते। वह किसी भी इटैलियन सलाद से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट था। मना करने पर भी भाभी उसकी प्लेट में और परोस देतीं।

“खाओं रज्जी, डाइटिंग कर-कर तुमने अपना क्या हाल बनाया है।“ 

“बुआ, आप नहीं खाओगी तो मैं भी नहीं खाऊँगा।“ अंशु प्यार से इसरार करता और वह मना न कर सकती। सच कहती थी अम्मां, जब तक खिलाने वाला मनुहार न करे खाने वाले की भूख जागृत नहीं होती। बोन चाइना के महंगे डिनर सेट में भाप उड़ाते व्यंजनों की लपटें मारती महक भी उसे तृप्ति नहीं देती थी। 

जतिन और बबल तो रात को खाना मूर्खता समझते। इम्पोर्टेड बाउल में बड़े से चम्मच से पनीला-सा मशरूम का सूप बड़े बेमनसे पीती थी। खाना खाने के बाद शुरू होता ‘मूंगफली उत्सव’, भैया यही कहते। तीनों ही बैठै रहते और अंशु बीच में मूंगफली का छोटा-सा ढेर रख देता और फिर शुरू होती छिलका-फेंक-प्रतियोगिता। तीनों पूरे कमरे में छिलके उछालते।

कल वह सुधा भाभी के साथ बाजार गई थी छोटी-मोटी खरीददारी करने, लौटने में थोड़ी देर हो गई, इस बीच अंशु और भैया के अनगिनत फोन आ गये। 

“माँ कहाँ हो? जल्दी आओ।“

“भाई सुधा, दो घन्टे हो गये तुम्हे गये।“ और भैया जल्दी आने की ताकीद करने लगे। उसे याद आया, एक दिन कॉलेज में कोई सेमीनार था। उसे घर लौटने में काफी देर हो गई, पर न तो जतिन और न बबल, किसी को उसकी जरूरत महसूस न हुई। किसी ने उसके देर से आने की कैफियत नहीं मांगी। उसके शिकायत करने पर जतिन ने रटा-रटाया वाक्य उछाल दिया।

“यार रज्जी, तुम ये बेतुकी नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती?“

पता ही नहीं चला, उसके जाने का दिन आ गया। वह भैया-भाभी अंशु के स्नेह से सराबोर हो गई। वह तो अपने घर आने का न्यौता भी नहीं दे सकती। जतिन द्वारा उनकी अवहेलना वह सह न सकेगी और उसके दम्भी व्यवहार से वह उनका निश्चल मन तोड़ नहीं सकती। स्टेशन पर तीनों उसे छोड़ने आए। भैया ने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में लिफाफा पकड़ा दिया और सर पर हाथ रख दिया।

“आ जाया कर जब भी दिल करे।“

“फिर जल्दी आना बुआ।“ अंशु की आवाज भग गई रंेगती ट्रेन के साथ तीनों लगभग दौड़ने लगे थे। उसने मुंह फेर कर आंसू छुपा लिये। उसे समझ नहीं आया, वह ‘घर’ लौट रही थी या ‘घर’ छोड़ आई है।

 

आशा पाराशर

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