नियति Asha Parashar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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नियति

अचानक पंडाल का शोर थम गया और धीमी-धीमी खुसुर-पुसुर होने लगी, ”बड़ी मां आ गई, बड़ी मां आ गई।“ श्रोताओं से काफी ऊँचाई पर सुसज्जित मंच पर सफेद धोती गर्दन से पांव तक लपेटे, केशविहीन चेहरा व हाथ में रूद्राक्ष की माला पकड़े साध्वी अनुरंजना यानि बड़ी मां प्रगट हुई। मंच की मद्धिम रोशनी में उन्हें स्पष्ट देखा नहीं जा सकता था। उन्होने एक हाथ ऊपर उठा सबको आसन ग्रहण करने का इशारा किया। एक छोटे से मंत्र के साथ प्रवचन आरम्भ किया। गजब का शब्द-विन्यास व सधी हुई आवाज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने के लिये पर्याप्त थी। एक-एक शब्द के पांच छः प्र्यायवाची उनकी विद्वता का परिचय थे। परन्तु आज उनकी वाणी में कम्पन था, रह-रह कर उनकी नजरे पंडाल के बाहर सामने दिखाई दे रहे तीन मंजिला आंधी’बरसात से मटमैले हुए घर की ओर उठ जाती और वह अपने विषय से भटक जाती। लेकिन फिर उसमें सुधार करने का प्रयास करती। जैसे-तैसे सत्र समाप्त कर वह पंडाल के पीछे बने तम्बू के कक्ष में चली गई। शाम का सत्र आरम्भ होने में अभी तीन घन्टे का समय था। इस समय वह एकान्तवास करती थी। पर कहने को एकान्तवास था, वह अकेली कहां होती थी, पिछली यादें उसे घेरे रहती थी।

साध्वी अनुरंजना, हां यही नाम तो दिया था गुरू मां ने, इससे पहले तो वह अनुजा तिवारी थी। सरकारी विद्यालय के अध्यापक नारायणदत्त तिवारी ने अपनी दोनों पुत्रियों के नाम मिलते-जुलते रखे थे, बड़ी शैलजा व छोटी अनुजा। दोनों बहनों की आयु में दो वर्षों का अन्तर था। जहां शैलजा का सांवला सलोना चेहरा व घनी काली चिकनी केशराशि मोहित करती थी वही अनुजा गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें और घुंघराले केशों के कारण किसी को भी आकर्षित कर लेती थी। दोनों बहनों के स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था। शैलजा घर के काम में अम्मा का हाथ बटाती, और अनुजा सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की की सलाखें पकड़े पूरे मौहल्ले के लोगों का आंखों देखा हाल बयान करती। अनुजा बड़ी बहन की प्रत्येक वस्तु पर नजर रखती और जो उसे भा गई वह लेकर ही रहती। शैलजा एक-दो बार मना करती फिर उसका उतरा चेहरा देख बेहद पसंदीदा चीज खुशी से उसे दे देती।

”हाय शैली दी, कित्ता सुन्दर कुत्र्ता पहना है।“ अनुजा आंखे फैलाती, ”कब सिलाया? रंग तो बहुत खिला हुआ है, बस, आज-आज पहन लो, कल से यह मेरा।“

”नहीं अनु, अभी आज ही तो दर्जी से लाई हूँ।“ ”तो क्या हुआ? तुम मेरे लिये इतना भी नहीं कर सकती?“ और उदासी का नाटक करती। बस, यहीं शैलजा पिघल जाती और अनु उस कुर्ते को अपने वक्से में छुपा लेती। मंजू चाचाी का दिया बटुआ, पंजाबी जूती, कशीदे वाला दुपट्टा धीरे-धीरे सब शैलजा की अलमारी से अनुजा के कोष को समृद्ध करने चले जाते।

एक सुबह बाबुजी ने अम्मा को बताया कि कल कुछ लोग शैलजा के रिश्ते के लिये आने वाले हैं। अच्छा सम्पन्न परिवार है और लड़का सरकारी नौकरी करता है। शैलजा और अम्मा ने मिलकर पूरा घर चमका दिया, कुशन, चदरें, पर्दे सब बदल दिये गये। अनुजा चेहरे पर हल्दी बेसन का उबटन लगाये शैली-अम्मा के काम में मीन-मेख निकालती रही। अम्मा ने उसे मेहमानो के सामने न आने की सखत हिदायत दे रखी थी। दोपहर में दो महिलायें, सफेद बालों वाला प्रौढ़ तथा एक सुदर्शन युवक आये। अनुजा दरवाजे के पर्दे के कोने को खिसका कर सब देख रही थ्ीा। शैलजा लाल बार्डर की हरी साड़ी पहने नीची नजरें किये अनके सवालों के जवाब दे रही थी। कुछ देर उन महिलाओं ने प्रौढ़ और युवक से धीमे स्वर में मंत्रणा की और फिर हीरे की सर्चलाइट सी लौंग पहने हुए महिला ने बटुवे में से चैन निकाल कर शैलजा के गले में पहना दी। अम्मा के चेहरे पर खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी, प्रौढ़ व्यक्ति ने उठ कर बाबूजी को गले लगा लिया और शैलजा भाग कर अन्दर आ गई। मेहमानों से जाते समय अनुजा का परिचय कराया गया। उन सबकी नजरों में अपने लिये प्रशंसा के भाव अनुजा से छुप न सके। शैलजा का भावी वर आलोक तो अनुजा को अपलक देखता रहा। विवाह की तिथि भी जल्दी की निकाली गई। एक ही शहर होने के कारण आलोक कभी अंगूठी और चूड़ी का नाप लेने, कभी कपड़े पसंद करवान के बहाने शैलजा को बाहर ले जाने लगा और अम्मा न चाहकर भी अनुजा को उनके साथ भेज देती। आलोक हंसमुख व हाजिर जवाब था, मितभाषिणी शैलजा की ओर से अनुजा ही उसकी बातों का जवाब देती। शैलजा ने कई बार आलोक व अनुजा को एक-दूसरे की ओर मुग्ध दृष्टि से देखते हुए पकड़़ा था, पर आलोक चतुराई से शैलजा के संदेह को खारिज कर देता।

घर में विवाह के शगुन आरम्भ हो चुके थे। अनुजा पर फिर शैलजा की प्रिय वस्तु छीनने की आदत हावी होने लगी थी। बारात आने से तीन दिन पहले आलोक के मामाजी आये, बैठक के बंद दरवाजे से बाबूजी के जोर से बोलने की आवाज से अनुजा कांप उठी। कुछ देर में दरवाजा खुला और बाबूजी अनुजा को जलती हुई निगाहों से देखते हुए अन्दर चले गये। घर में सन्नाटा छा गया, पता चला कि आलोक शैलजा से नहीं बल्कि अनुजा से विवाह की जिद पकड़े हुए है। शैलजा स्वयं बाबूजी के पास गई।

”अम्मा, बाबूजी आप क्यो परेशान हो रहे हैं? मैं न सही अनु सही। बहन है मेरी, मुझे कोई आपत्ति नहीं है इसे आज तक अपनी प्रत्येक प्रिय वस्तु देती आई हूँ। यह भी सही, उठिये वक्त कम है, और हमें बहुत तैयारियां करनी हैं।“ शैलजा के चेहरे पर तूफान से पहले की शांति थी। परन्तु अगली सुबह अम्मा के विलाप ने सबको उठा दिया, शैलजा की निष्प्राण देह नई साड़ी से पंखे से झूल रही थी। वह इस बार अनुजा की इच्छा पूरी करने में असमर्थ थी। अम्मा, बाबूजी, पड़ौसी और रिश्तेदारों की नजरों से घबरा कर अनुजा रात के अन्धेरे में दुपट्टे से मुंह छुपाये घर से निकल पड़ी। स्टेशन पर सामने जो रेल खड़ी थी उसमें बैठ गई। इसी गाड़ी में साध्वीयों का एक जत्थ भजन कीर्तन करता जा रहा था। वह खिड़की से सिर टिका कर शून्य में ताक रही थी। 

”लो मां“ एक साध्वी ने उसके सामने दोने में कुछ कटे हुए फल रखे, पर अनुजा ने पलकें तक न झपकाई। साध्वियों की दलपति, जो सामने ही लेटी हुई थीं वह बड़े गौर से अनुजा को देख रही, ने आंख के इशारे से उसके सामने से दोना हटाने को कहा। रात को जब साध्वियों के के मद्धिम खर्राटें गाड़ी के पहियों की ताल से लय मिलाने लगे तो वही साध्वी अपनी सफेद चादर को समेटती हुई अनुजा के पास बैठ गई। उसकी अनुभवी आंखें अनुजा के चेहरे पर उसके अदृश्य गुनाह को पढ़ चुकी थीं।

”हम कुछ नहीं करते हैं, जो कुछ भी होता है वह सब पहले से तय होता है“ साध्वी ने उसके सिर पर हाथ रखा तब भी वह जड़वत बैठी रही, ”अपना सब कुछ उस शक्ति पर दोड़ दो“ ऊपर की ओर अंगुली उठाई, ”मां. सब मोह-माया के बंधन है ये रिश्ते, इन्हें काटकर फेंक दो और मुक्त हो जाओं सब दुखों से।“ और अपनी सफेद चादर अनुजा के कंधों पर डाल दी। सवेरे अनुजा साध्वियों के उस दल के पीछे-पीछे चली जा रही थी। वह प्रतिदिन साधना कक्ष में बैठती और ध्यान लगाती। अखाड़े की गुरु मां का अनुजा से विशेष स्नेह था। धीरे-धीरे वह उनकी प्रिय शिष्य बन गई। गुरु मां विभिन्न शहरों में प्रवचन देने जाती थीं, और अनुजा हमेशा उनके साथ जाती। कुछ समय बाद उनसे दीक्षा ले अनुजा तिवारी से साध्वी अनुरंजना बन गई। घनी काली केशराशि अखाड़े की ही एक साध्वी ने उस्तरा चलाकर एक टोकरी में समेट ली, कपड़े के एक थैले में दो सफेद धोती और पीतल की थाली, लोटा अनुजा की दौलत बन गई। जब भी आंखे बंद कर ध्यान लगाती उसे शैलजा का पंखे से झुलता शरीर, अम्मा का हृदय-विदारक रूदन व बाबूजी की फटी आंखें याद आ जाती। दुख ने उसकी वाणी को मार्मिक बना दिया था, जब वह प्रवचन करती तो श्रोता सम्मोहित से सुनते, कुछ तो सिसकने लगते। अनुजा एक शहर से दूसरे शहर में प्रवचन करते गुरू मां के पद पर पहूंच गई। श्रावण मास में एक बार प्रवचन करने के लिए उसी शहर में आना हुआ। जिस शहर से बरसों पहले वह रात के अंधेरे में पलायन कर गई थी, नियति ने बड़ी क्रूरता से उसे फिर वहीं ला पटका था। पंडाल के सामने ही नारायणदत्त तिवाड़ी का तिमंजिला मकान खड़ा था। जहाँ शैलजा-अनुजा की खिलखिलाहटें गूंजती थीं, छज्जो पर अम्मा की रंग-बिरंगी धोतियां सूखती थी। वह एक बार उस दरवाजे को छूना चाहती थी, आंगन देखना चाहती थी। निश्चय किया कि रात के समय पिछले दरवाजे से निकल जायेगी। पर क्या इतनी बदनामी लेकर अम्मा-बाबूजी उसी शहर में रह पाये होंगे? और फिर उसके जिस अतीत के बारे में अखाड़े में किसी ने सवाल न कर आश्रय दिया, क्या दुनिया की नजर में साध्वीयों को बदनाम कर दे? दीक्षा लेते  समय उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह अब न किसी की पुत्री है, न बहन, न प्रेयसी। केवल ईश्वर ही उसका परिवार है। क्षमा मांगनी है तो ईश्वर से मांग अनुजा क्योंकि तुम्हे शैलजा की कमजोरी पता थी वह तुम्हें सब कुछ दे सकती है। पर इस बार वह मजबूर हो गई।

प्रवचन का दूसरा सत्र आरम्भ हो गया बड़ी मां, साध्वी अनुरंजना ने धारा-प्रवाह प्रवचन देना शुरू किया, आंखों से बहती अश्रुधारा ने सामने अध्यापक नारायणदत्त तिवारी के मकान को धुंधला कर दिया था।

 

आशा पाराशर विशाल

डी-20, हीरा बाग, फ्लैटस्,

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