एक खूबसूरत सफर Rama Sharma Manavi द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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एक खूबसूरत सफर

सत्य ही कहा गया है कि दुनिया बहुत छोटी है, कब किस मोड़ पर कौन बिछड़ा हुआ मिल जाय कुछ कहा नहीं जा सकता था।मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि अब कभी जिंदगी में उससे मुलाकात हो पाएगी।हर बार सफर करते समय सोचता था कि किसी राह पर एक बार उससे मुलाकात हो जाय।आज यात्रा प्रारंभ करते समय नहीं ज्ञात था कि दशकों पुरानी ख्वाहिश इस तरह पूर्ण हो जाएगी।

ट्रेन में अपनी सीट पर व्यवस्थित होने के पश्चात जब मैंने अपने चारों तरफ निगाहें दौड़ाई तो अगले कम्पार्टमेंट की खिड़की वाली सीट पर बैठी प्रौढ़ा कुछ जानी पहचानी प्रतीत हुई।अपने आसपास से बेखबर वह तन्मयता से बाहर भागते दृश्यों को अपनी आंखों में समेट रही थी।ध्यान से उसे देखकर यादों के एलबम से मैं उसकी पहचान खोजने का प्रयास कर रहा था।दाहिने माथे पर श्वेत बालों की लट,आँखों पर चश्मा,हल्की लिपिस्टिक, मेकअप विहीन चेहरा,भरा शरीर,गम्भीर व्यक्तित्व उसे प्रभावशाली बना रहा था।चंद मिनटों में मैंने विदिशा को पहचान लिया था क्योंकि पांचवें दशक में उम्र का पर्याप्त प्रभाव होने के बावजूद पुरानी छवि तो वही थी जिसे मैंने प्यार किया था, जिससे विवाह करना चाहता था लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद मैं सफल नहीं हो सका।

पुरानी यादें ताजा हो गईं।पोस्टग्रेजुएशन में हमारी मुलाकात हुई थी, पीएचडी करने के पश्चात हम लेक्चररशिप ज्वाइन करना चाहते थे।हमारी मित्रता के कुछ माह में ही मैं अपने रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहता था, इसलिए एक दिन मौका देखकर प्रपोज़ कर दिया।आशा के विपरीत उसने बिना लाग- लपेट के स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैं इस मित्रता को प्रेमबन्धन में नहीं परिवर्तित कर सकती क्योंकि मैं अपने घर की बड़ी सन्तान हूँ।जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए यहाँ आ रही थी तो मेरी माँ ने अपने विश्वास को न टूटने देने की उम्मीद जताई थी, क्योंकि मेरे किसी भी ऐसे कृत्य का दुष्प्रभाव मेरी छोटी बहनों के भविष्य पर पड़ेगा।मैं अपनी माँ से किया वादा कदापि नहीं तोड़ सकती औऱ मेरे सख़्त पिता अंतरजातीय विवाह को बिल्कुल नहीं स्वीकार करेंगे,अतः मैं अरेंज मैरिज करूँगी,इसलिए तुम मुझसे ऐसी कोई उम्मीद मत रखो,जिससे हम दोनों को तकलीफ हो।दोस्ती को गर्लफ्रैंड-ब्वॉयफ्रेंड में बदलने की जिद मत पालो।उससे ऐसे जबाब की मुझे कतई उम्मीद नहीं थी।

खैर, बात को सम्हालते हुए मैंने प्रत्युत्तर दिया कि कोई बात नहीं, तुम मुझसे मुहब्बत न करो,न सही,लेकिन मैं करना नहीं छोड़ सकता।वास्तव में मैं इस गफलत में था कि एक न एक दिन मैं उसे अपने रँग में रँग ही लूँगा।उसका व्यवहार पूर्ववत था,जिसे मैं सकारात्मक रूप से लेता था।भले ही उसने स्वयं को मेरी प्रेमिका बनने से मना कर दिया था लेकिन हम युवक महिला मित्र,सहकर्मी,प्रेमिका,पत्नी सभी पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं, इसलिए उसका किसी अन्य मित्र से बात करना,हँसना मुझे बर्दाश्त नहीं होता था,कई बार मैं उसे टोक भी देता था कि तुम इस तरह सबसे बात करती हो तो सभी पीछे मेरा मज़ाक उड़ाते हैं कि देख,तेरी गर्लफ्रैंड सबसे घुलती-मिलती है।उसने झुंझलाकर कहा कि तुम बताते क्यों नहीं कि हम मात्र मित्र हैं।मैं उसे समझाने का प्रयास करता कि लड़के सिंगल लड़कियों के बारे में काफी अनर्गल एवं अशोभनीय बातें करते हैं जो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ।

फाइनल में आने पर उसके घर वाले उसके लिए वर की तलाश करने लगे। फ़ाइनल एक्ज़ाम से पूर्व उसकी एंगेजमेंट हो गई।वैसे मैं दुःखी तो वाकई था उसे खोने से,साथ ही मेरा मेल ईगो अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं था, अतः मैंने उसपर इमोशनली प्रेशर डालने के लिए आँसू भरी आँखों से देखते हुए कहा कि मैं तुम्हारी जगह किसी को नहीं दे सकता,इसलिए मैं तो शादी नहीं करने वाला।वह मेरी बातों से बेहद विचलित हुई थी,इक्जाम समाप्त होने तक मुझे समझाने का प्रयास करती रही जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए।

उसकी शादी में भी मैं अपने मित्रों के साथ शामिल हुआ था, शायद दिल के किसी कोने में उम्मीद जिंदा थी कि क्या पता कोई चमत्कार हो जाय या शायद मैं उसकी आँखों में मुझे ठुकराने का पछतावा देखना चाहता था लेकिन उसके चेहरे की चमक ने मुझे निराश कर दिया और मैं दुःखी मन से वापस लौट आया।मैं एक आदर्श आशिक़ की तरह उसे उसकी खुशहाल जिंदगी के लिए दुआ न दे सका,अपितु मन ही मन बद्दुआ ही दिया था कि मुझे छोड़ने की गलती पर एक न एक दिन जरूर पछताना पड़ेगा।

मेरी सच्ची मुहब्बत का दावा दो-चार महीनों में ही धराशाई हो गया और परिवार की पसंद से खासे दान-दहेज के साथ दिया से विवाह कर लिया और एक वर्ष के भीतर ही एक बेटी का पिता बन गया।चार -पाँच वर्षों बाद एक बार उसे मैंने फोन किया, वह पहचान नहीं सकी।मेरे परिचय देने पर उसने सामान्य ढँग से पुराने मित्र की भांति वार्तालाप किया।जब मैंने कहा कि एकाध माह में हाल-चाल लेते रह सकते हैं क्या हम?तो उसने दृढ़ शब्दों में मना कर दिया कि अगर तुमने दुबारा फ़ोन किया तो मैं नम्बर बदल दूँगी।उसके बाद मैंने फ़ोन तो नहीं किया,किंतु अपरोक्ष रूप से उसके बारे में पता करता रहता था।

वह पूर्णतः हाउसवाइफ बन कर रह गई थी।न जाने क्यों मैं इस बात से अत्यधिक प्रसन्नता महसूस करता था, शायद मेरा आहत मेल ईगो उसे मुझे अस्वीकार करने पर दुःखी देखना चाहता था।खैर, जिंदगी अपनी गति से गुजरती रही,लेकिन एक बार उससे मिलने की ख्वाहिश बरकरार रही।आज किस्मत ने मुझे मौका दे दिया था।जब मैं आश्वस्त हो गया कि वह अकेली है तो मैं उसके बर्थ के सामने जा बैठा।मेरे "हैलो विदिशा",कहते ही उसके चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान उभर आई।बातों का सिलसिला जारी हो गया।

मेरे उत्सुकता का जवाब देते हुए उसने बताया कि दो साल जॉब किया था लेकिन बेटे के जन्म के बाद उसकी परवरिश,पति के स्थानांतरण तथा वृद्धा सास के कारण जॉब छोड़ दिया।अभी वह किसी रिश्तेदार के यहाँ फंक्शन में सम्मिलित होने जा रही थी।मैं ध्यान से देख रहा था कि वह अपनी गृहस्थी,अपनी जिंदगी में पूर्णतया संतुष्ट थी।मैंने उत्सुकतावश पूछा,"तुम्हारे पति कैसे हैं?"उसने प्रत्युत्तर दिया,"अच्छे हैं, समझदार एवं व्यवहारिक हैं।"किसी के व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए ये शब्द पर्याप्त हैं।

मेरे अहं को यह बात अच्छी नहीं लगी।मैंने अपने परिवार,अपनी पत्नी दिया के बारे में विस्तार से कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताकर विदिशा को जताना चाहा कि मुझे तुमसे बेहतर पत्नी मिली है लेकिन उसके चेहरे पर ईर्ष्या का नामोनिशान न पाकर अपनी बचकानी नासमझी पर मैं झेंप गया।उसके होठों पर वही प्यारी सी गहरी मुस्कान थी जिसपर मैं दिलोजान से फिदा था।विदिशा को चाहकर भी कभी अपने मन-मस्तिष्क से नहीं निकाल सका।

उसने तसल्ली की सांस लेते हुए प्रसन्नता पूर्वक कहा कि मैं तुम्हारे लिए बेहद खुश हूँ।मैं जानती थी कि तुम मुझसे बेहतर डिज़र्व करते हो।भले ही मैंने तुमसे कोई कमिटमेंट नहीं किया था किंतु तुम्हारी जिद से डरकर बेहद दुःखी एवं चिंतित थी।बाद में भी तुमने जब आखिरी बार फ़ोन किया था तो शायद मुझे सताने के लिए ही अपनी शादी की बात नहीं बताई।अगर तुमने बता दिया होता तो मैं फ़ोन करने के लिए मना नहीं करती,क्योंकि मैं सिर्फ़ इतना चाहती थी कि तुम बीती बातों को बिसराकर जिंदगी में आगे बढ़ो।खैर, चलो अच्छा हुआ जो किस्मत ने हमें यूँ दुबारा मिलाया, अब हम दोनों की गलतफहमियां, दुश्चिंताएँ दूर हो गईं।अब हम अच्छे दोस्तों की तरह गाहे-बगाहे एक- दूसरे का कुशल-क्षेम जानने के लिए फ़ोन कर सकते हैं।मैंने नम्बर नहीं बदला है।

फिर बातें करते हुए यह खूबसूरत सफ़र मुकम्मल हुआ।इस सफर ने मेरे मन में उसके प्रति जमी हुई ईर्ष्या-द्वेष, क्रोध सब पिघला कर समाप्त कर दिया।अब शेष जीवन बिना किसी मलाल के मैं व्यतीत करने वाला हूँ।

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