नकाब - 19 Neerja Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नकाब - 19

भाग 19

पिछले भाग में आपने पढ़ा की वैदेही से तेज आवाज में बात करती गुड़िया की आवाज सुन कर ठाकुर गजराज सिंह से बर्दाश्त नहीं होता की वो उनकी लक्ष्मी समान बहू से ऐसे बात करे। वो गुड़िया पर तेज स्वर में चिल्लाते है। जिससे उनकी तबियत खराब हो जाती है। राघव उन्हे लेकर अस्पताल जाता है। अब आगे पढ़े –

राघव ठाकुर साहब को लेकर गाजीपुर के सिटी हॉस्पिटल में जाता है। डॉक्टर चेक अप करते हैं और बताते है की उन्हे हार्ट अटैक हुआ है। अभी कुछ भी नही कह सकते। जो कुछ भी होगा सुबह ही बता पाएंगे। ठाकुर साहब को आईसीयू में एडमिट कर दिया गया और इलाज शुरू हो गया।

राघव पूरी रात आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठे रहा। वही पास में हरी राम भी बैठा रहा। पूरी रात आंखो में ही कट गई। हरी राम बीच बीच में झपकी लेता रहा। सुबह डॉक्टर आए । चेक अप करने के बाद बोले, "हालत में कुछ सुधार तो है, पर पूरी तरह खतरे से बाहर नहीं हैं अभी भी ठाकुर साहब।"

डॉक्टर के जाने के बाद हरी राम बोला,"छोटे मालिक आप घर जाइए नहा धो कर, कुछ खा पी कर आइए। मैं यहां हूं बड़े मालिक के पास।"

राघव जाना तो नही चाहता था पापा को छोड़ कर। पर हरी राम के बार बार कहने पर वो राजी हो गया घर जाने को। फिर घर पे भी तो सब इंतजार कर रहे होंगे, ठाकुर साहब की तबियत के बारे में जानने के लिए। बुआ और वैदेही इंतजार कर रही होगी।

राघव घर पहुंचता है। वो रास्ते भर ये सोचते आता है की पापा की तबियत ज्यादा खराब है वो किसी को नही बताएगा। क्या फायदा……? सच बता के। सभी परेशान होंगे। इससे अच्छा है की जो कुछ भी है खुद ही सह ले।

 

बुआ जो अपने प्यारे छोटे भाई के अस्पताल जाने के बाद से ही अनवरत रोए जा रही थीं। वैदेही उन्हे लगातार समझा रही थी की, " बुआ आप चिंता मत करो.., आप मत रोओ। पापा जी ठीक हो जाएंगे।"

राघव बैठक में घुसता है तो सामने ही सोफे पर बुआ और वैदेही बैठी दिखती है। राघव के अस्त व्यस्त बाल, चेहरे पर चिंता की रेखाएं, बिना कुछ कहे ही सच बयां करने को काफी थी। राघव बुआ को देख भावुक हो कर उनके कंधे पर सर रख कर अधलेटा सा हो जाता है। बुआ प्यार से राघव के सर पर हाथ फेरती है और पूछती है, "क्यों बेटा राघव..? कैसा है मेरा गज्जू…? वो ठीक तो हो जायेगा ना..?"

राघव ने जो कुछ सोचा था सब कुछ भूल गया। उससे बुआ से झूठ नही बोला गया। आखिर वो भी तो अभी बच्चा ही था। वो सच बोलने से खुद को रोक नहीं पाया।

"बुआ…! पापा की तबियत ठीक नहीं है। डॉक्टर अभी ठीक ठीक कुछ नही बता पा रहे है। हार्ट अटैक आया था पापा को। पर आप चिंता मत करो बुआ.. पापा ठीक हो जाएंगे।"

राघव की गाड़ी की आवाज सुन कर गुड़िया भी बैठक में आ जाती है। वो भी पापा की तबियत को ले कर परेशान थी। गुड़िया राघव के सामने ही बैठी रही। पर राघव ने एक नज़र भी उसकी ओर डालने की जरूरत नहीं समझी। उसकी नज़रों में गुड़िया ही दोषी थी। पापा अगर आज अस्पताल में है, उनकी ऐसी हालत है तो उसकी जिम्मेदार क्या वो (गुड़िया) नही है..? वो ऐसा जाहिर करता रहा जैसे गुड़िया वहां है ही नही। ऐसी उपेक्षा गुड़िया की राघव ने कभी नही की थी। भईया राघव का बर्ताव देख कर गुड़िया के दिल को बहुत ठेस पहुंची। पर क्या इस बर्ताव के लिए सिर्फ राघव जिम्मेदार था…? क्या उसकी खुद की (गुड़िया) कोई गलती नही थी..? आखिर क्यों जो भाई उसकी हर छोटी सी छोटी, बड़ी सी बड़ी इच्छा का ख्याल रखता था। उसे पूरी करने की पूरी कोशिश हर हाल में करता था। आखिर कुछ तो बात हुई होगी जो राघव उसे अनदेखा कर रहा है..? क्या पापा की बिगड़ी तबीयत के लिए वो जिम्मेदार नहीं है? गुड़िया खुद से ही सवाल कर रही थी।

थोड़ी देर बुआ के पास बैठ कर राघव उठ खड़ा हुआ। वो वैदेही से बोला, "वैदेही..! मेरे कपड़े निकाल दो। मैं नहा कर आता हूं। जब तक मैं नहाता हूं तुम नाश्ता लगवा दो। मुझे जल्दी अस्पताल जाना होगा।"

राघव के साथ ही वैदेही भी उठ खड़ी होती है। कमरे में आकर राघव नहाने चला जाता है। वैदेही उसके कपड़े निकाल कर बिस्तर पर रख देती है। फिर संजू से नाश्ते की टेबल लगवाने चली आती है।

नाश्ते की टेबल लगने तक राघव अस्पताल जाने के लिए तैयार हो कर आ जाता है। वो नाश्ता करता है जाने के लिए उठ खड़ा होता है। राघव को जाते देख वैदेही उससे पूछती है,"मैं भी पापा जी को देखना चाहती हूं। मेरा भी जी नही लग रहा है। बस एक नजर देख कर वापस चली आऊंगी।" वैदेही ने आशा पूर्ण नजरों से पति राघव को देखा।

राघव कुछ सेकेंड सोचता है। फिर वैदेही को अस्पताल साथ चलने के लिए "हां" कह देता है। वैदेही संजू को बुआ जी का ध्यान रखने को बोल कर राघव के साथ अस्पताल जाने लगती है।

वैदेही को भाई के साथ जाते देख गुड़िया से रहा नही गया। वो बोली, "भईया मैं भी चलूं..?"

राघव उपेक्षा से बोला,"अभी कुछ कसर बाकी रह गई है क्या..? जो उसे पूरा करने चलोगी..?"

राघव के सवाल से गुड़िया बिलख पड़ी उठ कर गुड़िया राघव के पास आई और फूट फूट कर रोने लगी। और दोनो हाथ जोड़ कर बोली, "भईया..! प्लीज मुझे भी पापा के पास ले चलो। मैं ऐसा कोई व्यवहार नहीं करूंगी जिससे उन्हें दुख पहुंचे। मैं सब कुछ उनकी इच्छा अनुसार ही करूंगी। प्लीज भईया…! मैं… मैं… मैं माफी मांग लूंगी पापा से। सब ठीक हो जायेगा। मेरी वजह से ही पापा बीमार हुए है। अब मैं ही उन्हे अच्छा करूंगी।"

अपनी लाडली बहन को यूं बिलखते देख राघव को अच्छा नही लगा। गुड़िया के चेहरे पर पछतावे का भाव छाया हुआ था। उससे साफ झलक रहा था की जो कुछ भी हुआ, उसे लेकर वो बहुत दुखी है।

वो बोला, "अच्छा ठीक है चलो। पर तुम बाहर ही रहना। जब मैं अंदर जाकर पापा की स्थिति देख लूंगा। फिर तुम्हे बुलाऊंगा।"

गुड़िया तो इसके लिए राजी ही थी। वो भईया और भाभी के साथ पापा को देखने अस्पताल चल पड़ी।

क्या हुआ जब राघव अस्पताल पहुंचा..? क्या ठाकुर साहब की तबियत में कुछ सुधार हुआ था? गुड़िया क्या मिल पाई अपने पापा से..? क्या हुआ जब वो उनसे मिली..? पढ़े अगले भाग में।

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