नकाब - 6 Neerja Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नकाब - 6

भाग 6

पिछले भाग में आपने पढ़ा की ठाकुर गजराज सिंह अपने बेटे राघव के साथ अपनी बेटी के रिश्ते के लिए जगदेव जी घर आते है। सब कुछ ठीक रहता है। लड़की भी लीला को बहुत पसंद आती है। पर जगदेव जी थोड़ा सा नाराज हो जाते है। अब आगे पढ़े….

पत्नी लीला के समझाने पर जगदेव जी का गुस्सा ठंढा हो जाता है। वो समझ जाते है की आखिर अभी कुछ देर बाद तो वो रुपए भी उन्ही के पास आ जायेंगे। ऐसे ही आगे भी होगा। ये सोच कर वो रिलैक्स हो गए।

इधर मिठाई ने लीला से अपनी तनख्वाह के रुपए जगदेव जी से दिलाने को कहा। पर जगदेव जी ने उसे सौ रुपए देकर टाल दिया बोले बाकी अगले महीने देंगें।

मिठाई उदास हो गया। उसकी मां की तबियत खराब थी। उसे रुपया की बहुत जरूरत थी। पर जगदेव जी ने आज उसे फिर से टाल दिया था। वो अनमना सा काम करने लगा।

मिठाई को उदास देख लीला समझ गई की बिचारे को पैसे की बहुत जरूरत है। धीरे से मिठाई को अपने पास रसोई में बुलाया और बोली, "क्यों रे..! ये चेहरा क्यों उतरा हुआ है..?"

मिठाई बोला, "मां जी क्या बताऊं…? मेरी मां की तबियत खराब है। बाबूजी ने उनके इलाज के लिए रुपए मंगवाए थे। पर.. बाऊ जी ने मुझे बस यही दिए..! अब आप बताइए मां जी इसमें मैं अपनी मां का इलाज करवाऊ या घर का खर्च..?" वो उदास स्वर में बोला।

लीला ने उसकी ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोली, "तेरे बाऊ जी तो ऐसे ही है। कभी पूरा पैसा दिया है जो आज देंगे..? इसमें उदास होने की क्या बात है..? मैं हूं ना..!" इतना कह कर लीला ने जो रुपए उसे गजराज सिंह ने दिए थे। उसे मिठाई की मुट्ठी में थमा दिया।

मिठाई आश्चर्य से लीला की ओर देखने लगा। लीला बोली, "अब टुकुर टुकुर मत देख। चल मेरी मदद कर। जल्दी जल्दी काम निपटा दे फिर अपने घर चले जाना। सुबह फिर आ जाना रुपए दे कर, और मां को देख कर।"

"जी मां जी" कह कर मिठाई खुशी खुशी काम में लग गया। वो काम करते हुए मन ही मन सोच रहा था। मां जी जितनी भली है। बाऊ जी उतने ही. विचित्र.?

सुहास उस दिन जब दुकान से घर आया तो मिठाई अपने घर जा चुका था। उसके आने तक जगदेव जी खाना खा चुके थे। सुहास के हाथ मुंह धोने के बाद लीला खाने की थाली ले कर उसके कमरे में आई।

सुहास ने मां से थाली ले कर पूछा, "मां आप क्यों खाना ले कर आई..? मिठाई कहां गया..? " कह कर लीला के हाथ से खाने की थाली ले ली।

लीला सुहास को थाली पकड़ा कर वही बिस्तर पर बैठ गई और बोली, "वो मिठाई अपने घर गया है। उसकी मां की तबियत खराब है। वही उन्हे देखने गया है।"

सुहास रोटी का कौर तोड़ते हुए बोला, "उसे कुछ रुपए दिए बाऊ जी ने या खाली हाथ ही भेज दिया।" सुहास ने मां से पूछा।

लीला हंसते हुए बोली, "अरे कहां..? वो बदलने वाले नही। मांगा था बिचारे ने। उसे बस सौ रुपए पकड़ा दिए। अब इतने में क्या करता बिचारा..? मुंह लटका लिया था उसने। पर मैने उसे और कुछ रुपए तेरे बाऊ जी से छुपा कर दे दिया। उन्हे ले कर ही वो आने घर गया है।" लीला ने सुहास की बताया।

सुहास भी मुस्कुराने लगा। तभी उसे ध्यान आया और पूछा, "मां आपने खाना खाया..?"

लीला बोली, "नही बेटा..! अभी खा लूंगी।"

सुहास ने अपना खाना रोक दिया बोला "मां आप भी आओ मेरे साथ ही खाओ। जाइए अपनी भी थाली ले कर आईए।"

लीला ने मना किया पर सुहास नही माना। लीला को अपनी भी थाली लानी ही पड़ी। दोनों मां बेटे ने एक साथ खाना खाया। खाने के पश्चात लीला सुहास के पास

आकर बैठ गई और अपने हाथ में पकड़े लिफाफे से फोटो निकाल कर सुहास के सामने रख दिया।

उस फोटो को दिखाते हुए बोली, "बेटा ये ठाकुर गजराज सिंह जी बेटी है। आज ये अपने बेटे राघव के साथ आए थे, तुम्हारे लिए रिश्ता लेकर। देख लो बेटा और बताओ कैसी है..? मुझे तो बहुत पसंद है। मैं तो ऐसी ही बहू चाहती थी।"

सुहास संकोच कर रहा था। उसने फोटो नही देखी। बोला, "तुम्हे पसंद है ना मां..? बस.. मैं देख कर क्या करूंगा..?" सुहास ने कहा।

पर लीला नही मानी। उसने जबरन फोटो सुहास के सामने कर दिया। मजबूरन सुहास को देखना ही पड़ा।

नजर पड़ते ही सुहास भी देखता ही रह गया। ऐसी खूबसूरती थी की किसी को भी बांध ले।

जब सुहास फोटो की ओर देख रहा था तब लीला उसके चेहरे को पढ़ रही थी। फिर सुहास से पूछा, " बेटा तुम से मिले थे न गजराज जी कैसे लगे वो तुम्हें…?"

सुहास बोला, "मैं तो अपने काम में व्यस्त था मां ठीक ही होंगे।"

मां की बात से जैसे सुहास को कुछ याद आ गया। वो बिस्तर से उठ कर खूंटी में टंगे हुए अपने कपड़े के पास गया। फिर अपनी पैंट की जेब से गजराज की दी हुई नोटो की गड्डी को निकाल लिया। उसे ले कर मां के पास आया और उनके हाथों में थमा दिया फिर बोला, "मां ये ठाकुर साहब ने दिया था मुझे। आप बाऊ जी को से देना। मैं भूल गया था।" लीला जान रही थी की अगर जगदेव जी को रुपए नही दिए सुहास ने तो तिल का ताड़ बनाने में उन्हे समय नहीं लगेगा। ये तो अच्छा हुआ की उसने खुद ही दे दिया। लीला ने चैन की सांस ली की अब पति का उलाहना नही सुनना पड़ेगा उसे। लीला ने जान बुझ कर गज राज जी की बेटी की फोटो वही सुहास के कमरे में छोड़ कर सारे रुपए ले कर पति को देने उनके पास चली आई।

उनके हाथ में रूपए पकड़ाते हुए लीला बोली, "आप बहुत परेशान हो रहे थे न की ठाकुर साहब ने आपको रुपए नही दिए बल्कि सुहास को दे दिए। अब क्या बाप बेटा अलग अलग है..? देखो आखिर उसने आप ही को तो दिया। वो चाहे जिसे भी दे आया तो आखिर आपके ही पास। और आप बेकार ही में मुंह फुलाए हुए थे।

जगदेव जी झेपते हुए बोले, "मेरा ये मतलब थोड़े ही ना था। मैं तो बस यूं ही कह रहा था।" कह कर जगदेव जी उठे और रुपए तिजोरी खोल कर रख दिए। रुपए रख कर बिस्तर पर आकर इत्मीनान से लेट गए और लीला से बोले, "अपना सुहास तो है ही लायक बेटा अब कोई कुछ भी कहे कुछ भी करें पर वो हमसे दूर थोड़े ही होगा।" कह कर वो सोने की मुद्रा में लेट गए।

लीला भी पास ही बिछी चारपाई पर लेट गई। वो लेटे लेटे सोचने लगी की अभी तक जो बेटे से इतना नाराज थे अब कैसे मान गए..? अपनी बात से भी कितनी सफाई से पलट गए। आज पूरे दिन हुई बात सोचते सोचते वो सो गई। मन में एक शंका थी की पता नहीं ठाकुर साहब को हमारा सुहास और हमारा घर परिवार पसंद आया या नहीं।

अगले दिन मिठाई सुबह ही आ गया और घर के काम काज में लग गया। अभी वो बाहर झाड़ू ही लगा रहा था की तभी एक व्यक्ति आ गया और बोला, "जगदेव सिंह जी से मिलना है। मुझे गज राज साहब ने भेजा है।"

हाथ में पकड़ा झाड़ू छोड़ कर मिठाई उसे लेकर बाऊ जी के पास गया और बोला, "बाऊ जी आप से मिलने ये ठाकुर साहब के यहां से आए है। शायद आपके लिए कोई संदेश ले आए है।"

आने वाला शख्स गजराज सिंह का मुनीम था। उसने जगदेव जी के पांव छू कर अभिवादन किया। जगदेव जी ने उसे बैठने को कहा और ठाकुर साहब का संदेश पूछा।

मुनीम ने बताया, "मेरे सरकार ने रिश्ते के बारे में पंडित जी से बात किया था। पंडित जी ने बताया है की कल तीन बजे के बाद बहुत ही शुभ मुहूर्त है। वो कल शगुन ले कर आना चाहते है, अगर आपकी हां हो तो।"

लीला ने मिठाई के हाथो मुनीम के लिए जलपान भिजवा दिया। जगदेव जी इस अचानक प्रस्ताव से घबरा गए।

क्या जगदेव जी कल ही शगुन लेने के लिए तैयार होंगे..? इस तरह अचानक क्या बात हो गई जो ठाकुर साहब कल ही शगुन ले कर आना चाहते थे। पढ़े अगले भाग में।

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