नकाब - 10 Neerja Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नकाब - 10

भाग 10

पिछले भाग में आपने पढ़ा की राघव और वैदेही गुड़िया से मिलने बनारस जाते है। दोनो अस्सी घाट पर दर्शन करते है। इस बीच कुछ समय के लिए वैदेही गायब हो जाती है। उसे कोई मिल जाते है जिससे वो बात करती है। पर राघव से कुछ नही बताती की वो कौन था.? इधर गुड़िया का भी व्यवहार उसे कुछ बदला बदला सा लगता है। अब आगे पढ़े:–

भईया राघव के सवालों से बचने के लिए गुड़िया रोने लगती है, और बदले में उन्ही से सवाल करने लगती है। "आप हर छोटी छोटी बात को इतना ज्यादा क्यों खींचते हो..? मैने ये क्यों नही किया..? मैने वो क्यों नहीं किया..? अरे…! भईया सामान्य सी बात है मैं अभी अभी कॉलेज आई थी गेट पर ही थी की आप दिख गए। और रही बात पापा की तो …! आज नही आए क्योंकि भाभी आई है। और नही आए तो जाहिर सी बात है की उन्हे कुछ ना कुछ हुआ होगा। अब उन्हे क्या होगा…? क्या मैं जानती नहीं की वो ब्लड प्रेशर के पेशेंट है…? कुछ ज्यादा ऑयली खा लिया होगा…? या बेकार का स्ट्रेस लिया होगा इस लिए ब्लड प्रेशर बढ़ गया होगा। रही बात भाभी को देख कर खुश होने की। तो सच बताऊं मुझे पापा को देख कर ज्यादा खुशी होती। अब आप तो होना उन्हें देख कर खुश होने के लिए…? क्या मेरा उन्हे देख कर खुश होना जरूरी है..? अब आपकी पत्नी हैं आप ही खुश हो. अब क्या ये भी प्रेशर डालोगे आप....! "

गुड़िया के इस तरह ताबड़ तोड़ जवाब से और उसके बहते आंसू से राघव घबरा गया। कहां तो वो गुड़िया से नाराज हो कर सवाल कर रहा था…? कहां अब गुड़िया ही नाराज हो कर उससे सवाल कर रही थी…? अगर जो कही पापा को इस बात की जानकारी हो गई की उसके सवालों से गुड़िया दुखी हो गई और वो रो ...दी, तब तो पापा राघव की अच्छी क्लास लगाएंगे। पापा किसी भी हालत में अपनी लाडली बेटी के आंसू नहीं बहने देना चाहते थे। राघव ने साइड में ले कर गाड़ी रोक दी। क्योंकि गुड़िया के कमरे पे पहुंच कर ठीक से बात नही हो पाएगी क्योंकि वहां आस पास और भी लड़कियां रहती थीं। गाड़ी रोक कर राघव बाहर निकाला और गुड़िया को मनाने के लिए उसकी साइड की तरफ का दरवाजा खोल कर गुड़िया को बाहर निकलने को बोला। पर गुड़िया सर झुकाए नाराज सी बैठी रही। गुड़िया को गाड़ी से बाहर नही निकलते देख राघव ने गुड़िया का हाथ पकड़ बाहर निकाला और रोड के साइड में ले गया। राघव गुड़िया को मनाते हुए बोला, "क्या गुड़िया…! जरा सा कुछ पूछ लिया तो रोने लगी। इसमें रोने या नाराज होने की क्या बात है..? मैं तेरा बड़ा भाई हूं अगर मुझे कुछ गड़बड़ लगेगा तो मैं तुझ से पूछूंगा की नहीं..? क्या इतना भी हक नही है मेरा तुझ पर..?" राघव ने गुड़िया को मनाते हुए कहा।

फिर गुड़िया का चेहरा अपने हाथों में थाम उसके दोनो आंखों से आंसू पोंछ दिए।

जवाब में गुड़िया अपने प्यारे भईया के गले लग गई। अब दोनों भाई बहन के दिल का फांस निकल गया था। राघव ने चैन की सांस ली। राघव ने ड्राइविंग सीट संभाली और गुड़िया भाई के बगल की सीट पर बैठ गई। राघव को तसल्ली थी की गुड़िया मान गई.. वरना पापा..?

और गुड़िया खुश थी की उसके आंसू ने आज उसे भईया के सवालों का जवाब देने से बचा लिया। उसका भेद भाई के सामने खुलते खुलते रह गया। वो अपनी अक्ल मंदी पर खुश थी। इन सब से बिलकुल विरक्त सी वैदेही खामोशी धारण किए बैठी थी।

राघव गुड़िया के कमरे पर गुड़िया और वैदेही के साथ पहुंचता है। वो पापा ने जो कुछ भी भेजा था सब गुड़िया के कमरे में गाड़ी से उतार कर रखता है। गुड़िया सारी चीजे देख देख कर करीने से रख देती है। गुड़िया कहती है "भईया आप बस दस मिनट बैठो मैं आपके और भाभी के लिए अच्छी सी इलायची वाली चाय बनाती हूं।" ये बोल कर गुड़िया कमरे से ही सटे किचेन में चाय बनाने चली जाती है। कमरे में राघव और वैदेही ही रह जाते है। अभी गुड़िया की रूम पार्टनर और सहेली मीनाक्षी नही आई है। गुड़िया तो राघव की वजह से जल्दी चली आई थी कॉलेज से। मीनाक्षी तो अब शाम को ही आएगी क्लास समाप्त होने पर ही। राघव वैदेही के चेहरे की ओर देखता है। वो वैसे ही खामोश है। राघव ये समझने में नाकामयाब रहता है की आखिर वैदेही चंद घंटे में कैसे चेंज हो गई…? वैदेही के चेहरे पर तनाव स्पष्ट देख जा सकता था। पर ये तनाव किस बात का ये राघव के समझ से परे था।

अभी राघव इस विषय में सोच ही रहा था की गुड़िया चाय की ट्रे लेकर आ गई। ट्रे में तीन कप चाय के साथ एक प्लेट में बिस्कुट नमकीन भी था। गुड़िया हाथ में ट्रे लिए बोली, "हां तो साहिबान अब आप तैयार हो जाइए मिस गुड़िया के हाथ की जायकेदार चाय पीने के लिए।"

इतना कहते हुए गुड़िया ने चाय की ट्रे भाई राघव के आगे रख दी।

देर हो रही थी राघव ने चाय खत्म की और वैदेही से बोला,"चलो वैदेही देर हो रही है। रात होने पर रास्ता वीरान हो जाता है। चलो जल्दी करो।"

वैदेही जाने को उठ खड़ी होती है। राघव और वैदेही बाहर आ कर गाड़ी में बैठ जाते है।

राघव गुड़िया के सर पर हाथ रख कर कहता है, "अच्छा गुड़िया चलता हूं.. अपना ध्यान रखना और मन लगा कर पढ़ाई करना। जल्दी ही मैं पापा को भी साथ ले कर आऊंगा।"

गुड़िया भाई राघव से पूछती है, "भईया पापा ने सिर्फ ये सब सामान ही भेजा है..? रुपए नही भेजे है..? मेरे पास जो भी था सब खत्म हो गया।"

राघव हंसते हुए कहता है,"हां..! दिया है ना पापा ने तुझे देने के लिए। पर .. मुझे लगा तुझे नहीं चाहिए।"

"भईया…! बंद करो फालतू की बात। मुझे मेरे रुपए दो।

अगर मैं ना याद दिलाती तो आप तो वापस ही लेकर चले जाते।" गुड़िया ने राघव के आगे अपने हथेली करते हुए कहा।

राघव बोला, "पगली .. मुझे सब याद था। मैं बिना दिए जाता क्या..? मैं तो देख रहा था की तू मांगती है या नही।"

इतना कह कर राघव ने अपने पैंट की जेब से पर्स निकला और पापा ने जो रुपए गुड़िया को देने के लिए दिए थे, उसे निकाल कर गुड़िया की हथेली पर रख दिया। रुपए हथेली पर राघव बोला, "अब खुश अब जाऊं मैं..?"

गुड़िया ने "हां" में सर हिलाया।

बाय किया गुड़िया ने और राघव गाड़ी स्टार्ट कर के चला गया।

जो सफर आते वक्त इतना सुहाना था। वो जाते वक्त बेहद बोझिल हो गया था। वैदेही और राघव दोनो खामोश थे। जैसे बात करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। राघव ने बात शुरू करने की कोशिश भी की पर वैदेही ने सिर्फ हूं हां में जेब देकर बात शुरू होने से पहले ही समाप्त कर दिया।

राघव ने भी पूरा फोकस गाड़ी ड्राइव करने पर कर लिया और पूरी रफ्तार से गाड़ी ड्राइव करने लगा। कुल तीन घंटे का रास्ता था। रात गहराने से पहले ही राघव और वैदेही घर पहुंच गए।

ठाकुर गजराज सिंह अपने कमरे में लेटे हुए उन दोनो के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। राघव गाड़ी बाहर लॉन में खड़ी कर पापा से मिलने और उनकी तबियत के बारे में पूछने उनके कमरे में गया। राघव के साथ साथ वैदेही भी गई। दोनों ने उनके पांव छुए। राघव और वैदेही के सर पर हाथ रख वो बोले, "खुश रहो…, सदा सुहागन रहो।"

फिर उन दोनो से उतावले पन से ठाकुर साहब ने पूछा,

" बेटा राघव कैसी है गुड़िया रानी मेरी..?"

राघव बोला," वो बिलकुल ठीक है..। पर आप बताइए पहले आपकी तबियत अब कैसी है..?"

ठाकुर साहब बोले,"अब आराम है सुबह की तुलना में। बस थोड़ा सा सीने में जलन सी हो रही है। और वैदेही बेटा तुमने देखा गुड़िया का कॉलेज, कमरा..? कैसा लगा बेटा तुम्हे..?" वो प्यार से वैदेही से पूछते है।

वैदेही इतनी देर बाद ससुर के पूछने पर कुछ जवाब देती है। कहती है वो,"बहुत अच्छा लगा पापा..! और गुड़िया जी भी बिल्कुल ठीक है। आपके सीने में जलन है..? मैं अभी आपको सादी दलिया बना कर दूंगी तो आराम हो जायेगा। आप जरा सी भी चिंता मत करें। मैं जाऊं .. पापा जी..?" वैदेही बोलती है अपने ससुर गजराज सिंह जी से।

ठाकुर साहब कहते है वैदेही से "हां..! हां..! बेटा जाओ।

तुम भी थक गई होगी आराम करो। और तुम्हे रसोई में जाने की कोई जरूरत नहीं..? संजू है ना.! वो बना देगी। जो बनाना हो तुम उसे बस बता देना।" ठाकुर साहब वैदेही से कहते हैं।

"जी पापा जी" कह कर वैदेही उनके कमरे से चली जाती है। वैदेही अपने कमरे में जाती हुई मन में सोचती हुई जाती है की आखिर वो कब तक अपने दिल में इस बात को छिपा पाएगी..? क्या इस सच को छिपाना अपने घर परिवार को धोखा देना नही होगा। सच ज्यादा दिन तो छिपेगा नही। जैसे आज अप्रत्याशित रूप से उसके सामने आ गया। वैसे ही पापा जी और राघव के सामने भी आज नही तो कल आ ही जाएगा। फिर वो क्या करेगी..? क्या ये कहेगी की उसे कोई जानकारी नहीं थी..? अगर कहीं कुछ ऊंच नीच हो गई तो पापा जी तो सदमे से ही मर जायेंगे। अब वो भी इस घर का एक हिस्सा है। इस घर की इज्जत और मर्यादा को संजोना,सहेजना क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं है..? और राघव जो उस पर जान छिड़कते है। उसकी चुप्पी से उन्हें कितना कष्ट होता होगा..? वो तो उसकी खुशी के लिए उसे लेकर अस्सी घाट पर गए थे। राघव को क्या पता था की वहां जा कर वो अपना और मेरा प्यार और सुकून को देंगे। क्या सच जानने का हक राघव को नही है..? इस तरह सोचती हुई वैदेही अपने कमरे में जाती है। फिर वो अपने बेचैन दिल दिमाग को शांत करने के लिए बाथ रूम में नहाने चली जाती है। झरने के नीचे खड़े होकर वो बहते पानी के संग अपने मन का बोझ भी बहा देती है। वो खुद से एक वादा करती है की वो राघव से झूठ नही बोलेगी। समय मिलते ही वो सब कुछ राघव को बता देगी।

वैदेही के पीछे पीछे राघव भी जाने लगता है।

ठाकुर साहब जाते हुए राघव से पूछते है, "तुमने रुपए गुड़िया को दे दिया था बेटा..? कम तो नही थे..?वो कुछ बोली तो नही..?"

राघव वापस लौट आता है अपने पापा ठाकुर साहब को समझाते हुए कहता है, " नही.. पापा। दे दिया उसे कम नही थे। वो आपकी प्रतीक्षा कर रही थी। वैदेही को साथ देख उसे निराशा हुई। अब आप जल्दी ठीक हो जाए। फिर आपको ले कर चलूंगा मिलवाने गुड़िया से।"

पापा को समझा कर जब राघव को लगा की उन्हे तसल्ली हो गई है तो वो वापस अपने कमरे में लौट पड़ा ये कहते हुए कि,"जाऊं पापा हाथ मुंह धो कर कपड़े चेंज कर लूं..? रास्ते में बहुत धूल थी। पूरी आंखो और नाक में भर गई है।"

ठाकुर साहब बोले, "हां!! हां..! बेटा जाओ..!"

राघव अपने कमरे में आ गया। आया तो देखा वैदेही कमरे में नही है। बाथ रूम की लाइट बंद थी पर नल से पानी गिरने की आवाज आ रही थी। वो पुकारता है उसे," वैदेही ..! वैदेही ..! पर कोई आवाज नहीं आती। वो घबरा जाता है। बाथ रूम का दरवाजा जोर से धक्का देता है तो खुल जाता है। दरवाजे की कड़ी थोड़ी सी लगी थी। राघव देखता है वैदेही ब्लाउज पेटीकोट में झरने के नीचे खड़ी है और नहा रही है। पानी के शोर से उसे कुछ पता नही चलता की राघव उसे बुला रहा है या बाथ रूम का दरवाजा धक्का देकर अंदर आ गया है। अंधेरे बाथ रूम में बाहर से आती झीनी झीनी रौशनी में वैदेही बला की दिलकश लग रही थी। सर से बहता पानी उसके पूरे शरीर को गीला कर रहा था। ब्लाउज और पेटीकोट उसके पूरे बदन से चिपक गया था। हर अंग अपनी खूबसूरती को व्यक्त करने को आतुर प्रतीत हो रहा था। राघव हल्के अंधेरे में वैदेही के अनुपम सौंदर्य को खड़ा हो कर निहारता है। वैदेही अपने आप में खोई हुई नहाती रहती है।

राघव धीरे से वैदेही के पास जाता है, और वैदेही के कमर में हाथ डाल कर अपने दोनों हाथों से घेरा बना लेता है।

इस तरह अचानक अपने कमर पर हाथ लगने से वैदेही पहले तो चौकती है। पर फिर आश्वस्त हो जाती है की उसके कमरे में, उसके बाथ रूम में उसके पति राघव के सिवा कोई भी आने की हिम्मत नही कर सकता। फिर ये छुवन, ये स्पर्श ये हाथ उसके लिए नए तो नही थे। घुप्प अंधेरे में उसने इन हाथों को अनेकों अनेक बार महसूस किया था। इन्हें पहचानने में वो गलती कैसे कर सकती थी..? वैदेही ने राघव के हाथों पर अपने हाथ रख कर उसे अपनी कमर पर राघव ही हाथों के घेरे को और मजबूत कर लिया। राघव सोच रहा था की वैदेही उससे नाराज है इसी लिए इतनी खामोश है। पर जब उसने अपने हाथ उसके हाथ पर रक्खे तो राघव को लगा की वैदेही उससे नाराज नहीं है। वो वैदेही के चेहरे को अपनी ओर घुमाता है और कहता है,"वेदू तुम मुझसे नाराज़ तो नही हो न..?"

राघव इन करीबी पलों में वैदेही को वेदु कह कर ही पुकारता था। वैदेही ने राघव के सीने पर रक्खे अपने सर को ना में हिलाया और बोली, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं। आप जानना चाह रहे थे ना की अस्सी घाट पर मैं कहां .. चली गई थी..? जिससे मैं बात कर रही थी वो कौन थे।" वैदेही बस इतना ही बोला पाईं। राघव को अब और कुछ भी जानने में इंट्रेस्ट नही था की अस्सी घाट पर कौन मिला था..? या क्या हुआ था..? उसने अपने होठों से वैदेही के होठ बंद कर दिए। वैदेही कुछ कहने की कोशिश ही करती रह गई। राघव को बस अब सिर्फ और सिर्फ वैदेही को पाना था। पूरी वैदेही को।

अगले भाग मे पढ़े। क्या वो राज था जो वैदेही अपने पति राघव को बताना चाहती थी..? क्या राघव जान पाया वैदेही के अस्सी घाट के सच के बारे में..?

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