नकाब - 11 Neerja Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नकाब - 11

भाग 11

पिछले भाग में आपने पढ़ा की राघव और वैदेही गुड़िया से मिल कर घर वापस आते है। वैदेही खामोशी से खुद को परख रही है की क्या वो खामोश रहे या पति को सब कुछ शेयर करे..? और अगर वो बता भी दे राघव से तो क्या वो उसकी बातों का यकीन करेगा। वैदेही से सहन नही हो रहा की वो अपने पति से झूठ बोले। उसकी आत्मा उसे कचोटती है। वैदेही राघव से सब कुछ बताने का डिसीजन लेती है जो भी आगे होगा वो देखा जायेगा। अब आगे पढ़ें।

वैदेही अपनी खामोशी को तोड़ने का फैसला लेती है। और राघव से बताने की कोशिश करती है। पर वो us वक्त कुछ भी सुनने के मूड में नहीं होता और वैदेही चाह कर भी नही बता पाती। उस दिन बात वहीं समाप्त हो जाती है। थके होने की वजह से राघव और वैदेही दोनो जल्दी ही रात का खाना खा कर सो जाते है।

सुबह से वैदेही व्यस्त हो गई, घर के काम काज करवाने में। दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। शाम को राघव आया तो वैदेही ने चाय की तैयारी कर रखी थी। वो राघव और ठाकुर गजराज सिंह को चाय और नाश्ता संजू से मंगवा कर देती है। चाय खत्म कर ठाकुर गजराज सिंह शाम की सैर के लिए अपनी हवेली के बगीचे में चले जाते है। वैदेही बड़े ही प्यार से राघव को बेड रूम में चलने को कहती है। राघव वैदेही के इस परिवर्तन से बेहद खुश होता है। क्योंकि कल अस्सी घाट के दर्शन बाद की वैदेही की चुप्पी उसे खाए जा रही थी। अगर ऐसी जिंदगी जीनी हो तो वो घुट घुट कर मर जाता। राघव सोचता है चलो कम से कम वैदेही की खामोशी तो टूटी। इसी सोच की लय में वो अपने बेड रूम में जाते हुए उससे कहता है, "वेदू कल तुम्हे क्या हो गया था..? तुम आज तक कभी ऐसा व्यवहार नहीं की हो। प्लीज तुम ऐसे ही रहा करो ...हंसती मुस्कुराती, सबका ख्याल रखती।" राघव ने कहा और वैदेही का हाथ इस आशय से पकड़ लिया की वो वादा करे उससे।

वैदेही ने राघव की आंखों में देखा और अपनी पलके झपका कर उसकी बात का समर्थन किया। ये वैदेही का मूक वादा था राघव से।

वैदेही राघव को अपने साथ कमरे ले लाती है और बिस्तर पर बैठने को ये कहते हुए कहती है की "मुझे आपसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।" और खुद वो दरवाजा बंद करने लगती है। राघव शरारत के मूड में आ जाता है, वैदेही को दरवाजा करते हुए देख कर।

दरवाजा बंद कर वैदेही वापस आती है और राघव के पास बैठ जाती है। वैदेही बड़े ही इत्मीनान से राघव रोकती है और कहती है,"प्लीज राघव आप जो समझ रहें है वो मेरा मतलब नहीं है। मुझे सच में आपसे बहुत जरूरी बात करनी है। कल के अस्सी घाट के बाद आप मेरे बदले व्यवहार के बारे में जानना चाहते थे ना….! मैं क्यों खामोश हो गई थी..? मैं … मैं …..फैसला नही कर पा रही थी की मैं आपसे बताऊं या नही। ! और बताऊं भी तो आप मेरा यकीन करेंगे भी या नही..? मैं कैसे इस बात को आपसे बताऊं…? यही नहीं सोच पा रही थी। आखिर कार मैने फैसला किया की नही…! मैं… आपसे कुछ भी नहीं छुपाऊंगी। कल भी मैने आपसे बताने की कोशिश की पर आपने रोक दिया। प्लीज अब आप मेरी बात सुन लीजिए।" वैदेही ने राघव से संजीदा स्वर में कहा।

राघव जो अभी तक शरारत के मूड में था। अस्सी घाट का जिक्र आते ही वो भी गंभीर हो गया। आखिर वो भी तो जानना चाहता था की कौन मिला था वहां पर उससे…? आखिर उसे छोड़ कर अचानक से वैदेही कहां चली गई थी। राघव अब गंभीर था वो वैदेही से बोला, "हां वैदेही बताओ मुझे मैं सच में बहुत परेशान था इस बात को ले कर। तुम तो मेरे पीछे आ रही थी। फिर अचानक से कहां चली गई…?"

वैदेही ने राघव से कहा, "मैं आपसे बता तो रही हूं, पर आप वादा करें की जो मैं बताऊंगी उसे सुन कर आप अपना आपा नहीं खोएंगे। शांत दिमाग से सब कुछ सुनेंगे। फिर उसका समाधान हम मिल कर सोचेंगे।

वैदेही ने राघव को बात शुरू करने से पहले समझाया।

राघव ने वादा किया वैदेही से की वो बिलकुल भी नाराज नहीं होगा और सब कुछ शांत दिमाग से सुनेगा। फिर जो वो बोलेगी वही करेगा।

राघव का आश्वाशन पा कर वैदेही निश्चिंत हो गई और बताना शुरू किया। राघव उस दिन आप आगे आगे आप जा रहे थे, और पीछे पीछे मै भाग रही थी आपको पकड़ने। तभी मेरा पैर लड़खड़ा गया और मैं संभलने के लिए झुकी। तभी मेरी निगाह तेज स्वर में हंसती एक लड़की पर पड़ी। वो थोड़ी दूर नीचे गंगा घाट की ओर चली जा रही थी। साथ में एक लड़का भी था। दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ रक्खा था। वो नीचे की ओर जा रहे थे और मुझसे दूर हो रहे थे। तभी मुझे ऐसा लगा की इस हंसी को तो मैं पहचानती हूं। कहीं सुना है मैने इस आवाज को। दूर होने की वजह से मैं कोई फैसला नहीं कर पा रही थी की ये कौन है..? पर है कोई परिचित.. ! इसका मुझे यकीन हो गया था। यही जानने के लिए मैं एक दूरी बना कर उनके पीछे चलने लगी। वो दोनों आगे जाकर घाट पर बैठ गए। पानी में दोनो ने अपने डाले हुए थे। और लड़की का सर लड़के के कंधे पर था। वो हाथों में हाथ डाले बैठे थे। अब मेरी ओर उन दोनों का चेहरा नहीं था मैं निश्चिंत हो कर तेजी से आगे बढ़ने लगी। अब वो लड़की खामोश थी बस गंगा की बहती हुई धारा को देख रही थी। मैं उन दोनों से चार सीढ़ी ऊपर खड़ी थी। तभी मेरे हाथों से पकड़ा गाड़ी की चाभी का गुच्छा छूट गया और चाभी हाथों से छूटते ही मैं घबरा गई की गाड़ी की चाभी अगर गंगा जी में चली गई तो फिर मिलना मुश्किल हो जायेगा। मेरे मुंह से एक चीख निकली और उसे पकड़ने के लिए मैं तेजी से लपकी। मेरी चीख सुनकर उस लड़के ने चाभी गिरते और मुझे उसके पीछे भागते देख माजरा समझ गया। चाभी सीढ़ी दर सीढ़ी गिरते हुए उनके सामने से जाने लगी। लड़के ने फुर्ती से चाभी पकड़ ली । तब तक मैं भी वहां पहुंच गई।" थोड़ी देर को वैदेही रुकी और एक लंबी सांस ले कर बोली, राघव मैं आपसे बता नही सकती…! मैने जब लड़के से उसके हाथो से चाबी ली। वो बोला, "रिलैक्स मैम आपकी चाभी बच गई। वरना कहीं गंगा मइया की शरण में चली जाती तो..?"

मैने देखा उस लड़के के साथ की लड़की के चेहरा घबराहट से फक्क् पड़ गया था। वो मेरी और ही आंखे फाड़ कर देख रही थी। चाभी ले कर मैने उस लड़की की ओर देखा। राघव मैं बता नही सकती आपको..? मेरी क्या हालत हुई।"

फिर पति का हाथ अपने हाथों में ले कर सहलाते हुए वैदेही बोली, "आप सोच सकते है..! राघव... की वो लड़की कौन थी..?"

राघव ने "ना" में सर हिलाया। उसके परिचय की कोई लड़की बनारस में नही रहती थी। जिसका अनुमान लगाता वो । राघव को कोई अंदाजा नहीं था की वो कौन हो सकती है..?

वैदेही ने लंबी सांस लेते हुए कहा,"वो कोई और नहीं अपनी गुड़िया थी। हां ..! अपनी गुड़िया थी। मुझे देखते ही वो घबरा गई। उसने सपने में भी नही सोचा होगा कि इस तरह गंगा घाट पर मुझे सामना हो जायेगा। वो कुछ देर तक चुप रही।

फिर गुड़िया बोली, "भाभी आप…? यहां..?"

मैं भी खुद को यकीन नही दिला पा रही थी की जिस गुड़िया को हम सब इतने प्यार से पाल रहे है। इतने अरमानों से उसे पापा जी ने पढ़ने भेजा है। और वो इस तरह एक लड़के के साथ इस तरह घूम रही है। बात सिर्फ घूमने की होती तो भी कोई बात नही थी। पर जिस तरह मैने उन्हें एक साथ चिपक कर बैठे देखा था। वो सिर्फ दोस्ती नहीं हो सकती थी..? राघव गुड़िया के सवाल को नजर अंदाज कर मैं उनसे सवाल किया। "गुड़िया बेबी मेरी छोड़िए पहले आप बताइए की आप यहां.. इस अजनबी लड़के के साथ क्या कर रही है..? आपको तो इस समय कॉलेज में होना चाहिए। फिर यहां कौन सी पढ़ाई हो रही है…? मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी की किसी लड़के के हाथ हमारी गुड़िया को छुएं। मेरे गुस्से को देख गुड़िया घबरा गई। उसने मुझे बताया की वो लड़का उसके साथ पढ़ता है। दोनों एक दूसरे को पसंद करते है। इसी लिए यहां कुछ वक्त अकेले बिताने आए थे। मैं उसी जगह आपको गुड़िया और उस लड़के को सामने कर सब कुछ बताना चाहती थी। पर गुड़िया ने मुझे आपकी काम दे कर रोक लिया। वो बोली, "अगर मैने आपको कुछ भी बताया तो वो ठीक नही होगा। भाभी आपको भईया के सर की कसम है।"

मैं क्या करती एक अजीब सी दुविधा ने डाल दिया था गुड़िया ने मुझे। मैं इसी लिए इतनी परेशान थी। एक तरफ घर की इज्जत थी, तो दूसरी तरफ गुड़िया की दी हुई कसम थी। इसी अंतर द्वंद में मैं उलझी हुई थी। आखिर में मैने फैसला किया की खानदान की प्रतिष्ठा से बढ़ कर कोई कदम नहीं हो सकती। अगर इस पर कोई दाग लग जायेगा तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी..? पापा जी और आपको मैं धोखा नही दे सकती थी। इस लिए मैंने आपको सब कुछ सच सच बता दिया।" इतना कह कर वैदेही चुप हो गई। वो पति राघव की प्रतिक्रिया देखना चाहती थी।

और राघव…! वो तो सोच रहा था की कोई और होगा जो उसके परिचय का नही होगा। पर गुड़िया..? अपनी गुड़िया का नाम सुनकर उसका दिमाग सुन्न हो गया था। अगर कोई और ये बात कहता तो यकीन करना तो दूर वो कहने वाले का मुंह तोड़ देता। पर ये बात वैदेही उसे बता रही थी। वो क्यों झूठ बोलेगी उससे..?"

अगले भाग मे पढ़े क्या राघव इस बात पर विश्वास कर पाएगा की उसकी गुड़िया ऐसा कर सकती है..? क्या ये बात यही समाप्त हो गई या राघव ने ठाकुर गजराज सिंह को भी बताई..? क्या इसके बाद गुड़िया ने उस लड़के से दूरी बना ली या पहले की तरह ही मिलती रही..? पढ़े अगले भाग में।

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