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नकाब - 12

भाग 12

पिछले भाग में आपने पढ़ा की वैदेही अपने मन की दुविधा को त्याग कर अपने पति राघव को सब कुछ सच सच बताने का फैसला करती है। राघव पहले तो ध्यान नही देता पर वैदेही क्या बताना चाहती है…? पर वैदेही के अनुरोध पर वो उसकी सारी बात ध्यान पूर्वक सुनता है।

अब आगे पढ़े।

राघव वैदेही के मुंह से अपनी बहन गुड़िया का नाम सुन कर अचंभित रह जाता है..! पहले तो उसे यकीन नही हुआ, वैदेही की बातों पर। गुड़िया के प्यार में वो ये कल्पना भी नहीं कर सकता की वो ऐसा भी कर सकती है..? पर पुनः वो सोचता है आखिर वैदेही झूठ क्यों बोलेगी..? क्या मिलेगा उसे इस तरह गुड़िया पर आरोप लगा कर..? दिल के दोनों कोनों में प्यार भरा है उसके। एक ओर लाडली बहन के लिए अथाह समुद्र सा प्यार है तो दूसरे कोने में पत्नी वैदेही के लिए अनंत आकाश सा प्यार था। दोनों में से कोई भी काम या ज्यादा नही था।  फिर वो सब कुछ ध्यान से सोचता है, जो कुछ उस दिन घटा था जब वो वैदेही को साथ ले गुड़िया से मिलने बनारस गया था। गेट पर उसका इंतजार करना, गुड़िया का वैदेही को देख कर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना, वैदेही से नाराजगी जाहिर करना, ये सब बातें ऐसी थी जो वैदेही की बातों के सच होने का सबूत दे रही थीं। कोई वजह नहीं थी की वो पत्नी वैदेही की बातों पर यकीन नही करता।

राघव वैदेही की बातों को सुन कर गहरी सोच में डूब जाता है। इस परिस्थिति का हल वो कैसे निकले..? कैसे घर की इज्जत को रुसवा होने से बचाएं..? वो अपने पापा ठाकुर गज राज सिंह से इस बात को बताए या ना बताए..? अगर वो पापा से ये सब बाते नही बताता है और गुड़िया कोई ऐसा वैसा कदम उठा लेती है तो फिर वो पापा को क्या जवाब देगा..? क्या फिर पापा उसे माफ कर पाएंगे की उसने सब कुछ जानते हुए भी उन्हें अंधेरे में रक्खा। राघव मन में निश्चय करता है की, नही... नही ...वो पापा से कुछ भी नहीं छुपाएगा..? वो सब कुछ उन्हे सच सच बता देगा। पर वो कैसे बताए… उन्हे..? वो ब्लड प्रेशर के पेशेंट है । कहीं तबियत ज्यादा बिगड़ गई तो..? पर बताना तो होगा ही चाहे जो भी हो। अब इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद राघव का दिमाग थोड़ा सा शांत हो गया। इन सब बातों में काफी देर हो गई थी। राघव को बाहर जाना था। पर अब तो खाने का वक्त हो रहा था अब वो कहां जायेगा..? इधर राघव और वैदेही के कमरे का दरवाजा बंद था तो संजू दो तीन बार आई और लौट गई। उसे वैदेही से पूछना था की रात के खाने में क्या बनाए..? पर बंद दरवाजे को खट खटाने की उसकी हिम्मत नही हुई। उसे जो समझ आया सब की पसंद को ध्यान में रखते हुए, अपने हिसाब से उसे ही बना दिया।

वैदेही ने राघव से पूछा, "क्या..? सोचा आपने..? अब क्या करें हम..? "

फिर राघव को समझाया आप परेशान ना हो हम मिलजुल कर कोई न कोई हल निकाल ही लेंगे। मैं तो यही ठीक समझती हूं की पापा जी से सारी बातें बता दी जाए। फिर जैसा वो उचित समझें वैसा ही हम करेंगे। क्या कहते है आप..?" वैदेही ने राघव से पूछा।

राघव बोला, "हां तुम ठीक कहती हो। मैने भी यही निर्णय लिया है की पापा को सब कुछ बता देना चाहिए।" पर अभी तुरंत नहीं मैं समझता हूं दो चार दिनों में सही मौका देख कर हम दोनों पापा से बात करने की कोशिश करेंगे। इसके पश्चात राघव कमरे के बाहर निकल आया वैदेही के साथ।

खाने लगाने की पूरी तैयारी संजू कर चुकी थी। वैदेही के कमरे से बाहर आते ही वो बोली, "बहू रानी आपके कमरे का दरवाजा बंद था तो मैंने सोचा हो सकता है आपकी तबियत ठीक हो..? इस लिए आप लेटी हों। बहू रानी…! आप देख लो सब ठीक बनाया है ना..! अगर कुछ और चाहिए हो तो मैं जल्दी से बना देती हूं।" संजू वैदेही से बोली।

वैदेही ने संजू के कंधे पर हाथ रक्खा और अपनी आंखे हां के अंदाज में झपकाते हुए बोली, "हां ..! संजू मेरा सर कुछ भारी सा लग रहा था, इसलिए आराम करने लेट गई थी। "

फिर ढक्कन हटा हटा कर हर व्यंजन को देखा और संतुष्ट हो गई। संजू से उसकी तारीफ के लहजे में वैदेही बोली, "संजू तुम्हें तो अब बताने की भी जरूरत नहीं है। सब कुछ बिलकुल परफेक्ट बनाया है सब की रुचि के अनुसार। पापा जी की परहेजी बिना तेल की लौकी है तो इनके (राघव) पसंद का दम आलू और पनीर भुर्जी भी है। मेरा फेवरिट चना दाल भी बनाया है। और क्या मैं इससे अलग और अच्छा मैं बनवाती..? बस अब गरमा गरम रोटियां सेंक दो संजू। मैं पापा जी और इन्हें बुला कर लाती हूं।" संजू सभी का खाना परोस कर रोटियां सेंकने लगी। और वैदेही सब को रात के खाने के लिए बुलाने चली गई।

ठाकुर गजराज सिंह, राघव और वैदेही तीनों स्वाद लेते हुए खाना खा रहे थे और बीच बीच में कुछ कुछ थोड़ी बहुत बातें भी करते जा रहे थे। तभी राघव ने खाते हुए ही अपने पापा की ओर देखा और बोला, "पापा मैं सोचता हूं की अब हमें गुड़िया की शादी कर देनी चाहिए।"

ठाकुर साहब चुपचाप खाते ही रहे। राघव ने सोचा शायद पापा ने सुना नही फिर अपनी बात वो दोहराता है और कहता है, "पापा मैं सोचता हूं की अब गुड़िया बड़ी हो गई है। उसकी शादी कर देनी चाहिए। क्या कहते है आप..?" राघव ने कहा।

ठाकुर साहब नीचे निगाह किए खाते ही रहे और राघव की बात को गंभीरता से लिए बिना बोले, "आज अचानक से गुड़िया के ब्याह की बात कैसे तुम्हारे दिमाग में आ गई..? तुम जानते नही हो उसकी पढ़ाई अभी बीच में ही है। डेढ़ साल बाद पूरी होगी। क्या बीच पढ़ाई में शादी करके उसकी पढ़ाई छुड़वा दूं..? नही अभी नही..! पढ़ाई पूरी होने के बाद ही शादी होगी। मैं भी चाहता हूं की अपनी प्यारी बेटी को दुल्हन बने देखूं। तबियत ठीक नहीं रहती मेरी। कहीं कुछ हो न जाए। पर अभी मैं किसी भी कीमत पर गुड़िया के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता..? जो सपना मैने उसके लिए देखा है। उसमे शादी बाद में है पहले उसका अपने पैरों पर खड़ा होना है।" ठाकुर साहब राघव से बोले।

राघव का प्रस्ताव ठाकुर गजराज सिंह ने सिरे से खारिज कर दिया। राघव को उम्मीद थी की पापा उसके इस बात पर ध्यान देंगे। अगर गुड़िया की शादी के लिए तैयार हो जाते है तो उसे पूरी बात नही बतानी पड़ेगी। गुड़िया का सच सदा के लिए उसके और वैदेही के सीने में दफ़न हो जायेगा। बात पापा के कान तक पहुंचने से बच जायेगी। पर उनके इनकार ने राघव को निराश कर दिया। वो अपने बात का समर्थन करवाने के लिए बड़ी आशा से वैदेही की ओर देखता है। आखों ही आखों में इशारा करता है की वो भी पापा से यही बात कहे। पहले तो वैदेही "ना" का इशारा करती है की ये सोच कर की कि जब इसके पति राघव की सलाह को ठाकुर साहब ने सिरे से नकार दिया तो वो तो बहु है। उसकी बात पर क्या ही गौर करेंगे..? पर राघव ने फिर आंखों ही आखों में इसरार किया बात करने का तो वो मना नहीं कर पाई। हिम्मत जुटा कर वो बोली, "पापा जी ये..! (राघव) ठीक कह रहे है। हमें गुड़िया बेबी की शादी कर देनी चाहिए। फिर कुछ समय तो अच्छा घर वर तलाशने में भी तो लगेगा। तुरंत ही थोड़े ना रिश्ता मिल जायेगा..? हम गुड़िया की शादी किसी ऐसे वैसे घर में तो करेंगें नही। ऐसा घर वर ढूढेंगे जो गुड़िया की पढ़ाई के पक्ष में हो। उसे रोक नही।" वैदेही ने ससुर ठाकुर साहब की ओर झुकी नजरो से देखते हुए कहा।

ठाकुर साहब खाते खाते रुक गए। वो एक बार राघव की ओर निगाह डालते दुबारा फिर बहू वैदेही की ओर। हाथ का कौर हाथ में पकड़े पकड़े ही वो थोड़ा चिंतित स्वर में बोले, "ये आज तुम दोनो गुड़िया के विवाह के लिए क्यों जोर दे रहे हो..? ये अचानक क्या हो गया तुम दोनों को..? आज के पहले तो तुमने कभी नही कहा ऐसा..?" वो उसी स्थिति में राघव और वैदेही से पूछते है।

राघव और वैदेही एक स्वर में कहते है, "बस ऐसे ही कोई बात नही है पापा..।"

ठाकुर साहब समझ जाते है की दोनों के एक स्वर में बोलने कोई न कोई अर्थ तो जरूर है। कुछ आगे पीछे राघव और वैदेही ने गुड़िया की शादी की चर्चा छेड़ी थी। और अब वो एक स्वर में मना कर रहे है की कोई बात नही है। वो खाना समाप्त कर अपने कमरे में जाने लगते है। जाते जाते वो थोड़ा ठहराते है और राघव से कहते है, "बेटा राघव ऐसा करो.. सोने से पहले मेरे कमरे में आ जाना। जरा सा सर में दर्द सा महसूस हो रहा है। थोड़ा मेरे माथे पर बाम मल देना। राघव अपने हाथ धोते हुए ठाकुर साहब से बोलता है, "जी !! पापा आप चलिए बस मैं अभी आता हूं।"

ठाकुर साहब अपने कमरे में चले जाते है। राघव वैदेही से पूछता है, "वैदेही बाम कहां रक्खा है..?" वैदेही जो रसोई समेटने में संजू की मदद कर रही थी। साथ ही उसे घर ले जाने के लिए बचे हुए खाने को अलग रख रही थी। वो काम निपटाते निपटाते ही बताती है की "पापा जी के कमरे ही उनके सिरहाने वाले रैक में रक्खा है।"

राघव "अच्छा" कहता हुआ ठाकुर साहब के कमरे की ओर चला जाता है। वो ठाकुर साहब के कमरे में भिड़े दरवाजे को हल्के से धक्का दे कर खोलता है और "पापा ..!" आवाज लगाता है।

ठाकुर साहब अपने कमरे में बेड पर तकिए का टेक लगा कर अध लेटे से अपनी आंखे बंद किए हुए पड़े थे। वो बोलते है, "हां ..! बेटा राघव आ जाओ।"

राघव अंदर आ कर सीधा वैदेही की बताई जगह पर बाम ढूंढता है। मिल जाने पर बाम की डिब्बी हाथों में ले कर उसे खोलता है और थोड़ा सा बाम अपनी उंगलियों पर लगा कर ठाकुर साहब के पास बिस्तर पर बैठ जाता है। राघव अपनी उंगलियों के बाम को हल्के हल्के से ठाकुर साहब के माथे पर मलने लगता है। ठाकुर साहब को असीम आनन्द को अनुभूति होती है। अपने इकलौते पुत्र की आज्ञा कारिता और सेवा भाव ने उन्हे हर संताप से अब तक दूर ही रक्खा था। आज भी उन्हे विश्वाश था की राघव की कोई भी बात निर्मूल नही होती। अगर वो गुड़िया के ब्याह के लिए कह रहा है और वो भी बीच पढ़ाई में तो कोई न कोई वजह जरूर होगी। वरना वो यूं ही नहीं कहता। पहले तो उन्हे लगा की उसे गुड़िया को दुल्हन बने देखने का उतावला पन है। पर राघव और वैदेही दोनो का एक साथ ही ब्याह का जिक्र करना उतावला पन नही हो सकता।

थोड़ी देर आत्म मनन करने के बाद उन्होंने राघव हाथ पकड़ लिया और माथे से हटाते हुए बोले, "बस बेटा राघव रहने दे..। तेरे तो उंगलियों में जादू है छूते ही सारा दर्द छू मंतर हो जाता है। इसी लिए मैं और किसी से बाम नहीं लगवाता..! बस.. बेटा बस..।"

राघव उठने लगा तो उसके हाथो को धीरे से पकड़ कर बोले, "बेटा तुम रुको थोड़ी देर। तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।" राघव फिर से वापस बैठ जाता है।

बिस्तर पर रक्खे राघव के हाथो के ऊपर अपने हाथों को फेरते हुए बोले, "बेटा राघव मुझे पूरी आशा है की को कुछ भी पूछूंगा उसके जवाब में तुम झूठ नही बोलोगे। अपने नाम के अनुरूप ही सच बोलने की मर्यादा का पालन करोगे।"

क्या पूछा आखिर ठाकुर गजराज सिंह ने राघव से..? क्या अपने पिता के उम्मीद पर वो खरा उतरा..? क्या उसने सब कुछ सच सच बताया ठाकुर गज राज सिंह को..? क्या सच सुन कर ठाकुर साहब को यकीन हो पाएगा.? क्या प्रतिक्रिया होगी ठाकुर साहब की..? पढ़े अगले भाग में।

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