आँख की किरकिरी - 25 Rabindranath Tagore द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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आँख की किरकिरी - 25

(25)

उसी गंभीर भाव से सिलाई करती हुई विनोदिनी बोली - भाई साहब, तुम यहाँ नहीं रहोगे।

 अपने उठते हुए आग्रह पर चोट पा कर महेंद्र व्याकुल हो उठा। गदगद स्वर में बोला - क्यों, तुम मुझे दूर क्यों रखना चाहती हो? तुम्हारे लिए सब-कुछ छोड़ने का यही पुरस्कार है?

 विनोदिनी - अपने लिए मैं तुम्हें सब-कुछ न छोड़ने दूँगी।

 महेंद्र कह उठा- अब वह तुम्हारे हाथ की बात नहीं - सारी दुनिया मेरी चारों तरफ से खिसक पड़ी है - बस, एक तुम हो - तुम विनोद...

 कहते-कहते विह्वल हो कर महेंद्र लौट पड़ा और विनोदिनी के पैरों को पकड़ कर उन्हें बार-बार चूमने लगा।

 पाँव छुड़ा कर विनोदिनी उठ खड़ी हुई। बोली - याद नहीं, तुमने क्या प्रतिज्ञा की थी?

 सारी शक्ति लगा कर महेंद्र ने अपने को जब्त किया। कहा - याद है मैंने शपथ ली थी कि तुम जो चाहोगी वही होगा, मैं कभी कोई एतराज न करूँगा। उस शपथ को मैं रखूँगा। बताओ, मुझे क्या करना है?

 विनोदिनी - तुम अपने घर पर रहोगे।

 महेंद्र - एक मैं ही क्या तुम्हारी अनिच्छा की वस्तु हूँ, विनोद! अगर यही बात है तो तुम मुझे खींच क्यों लाई? जो तुम्हारे भोग की चीज न थी, उसके शिकार की क्या जरूरत पड़ी थी? सच-सच बताओ, मैंने स्वेच्छा से तुम्हें पकड़ लिया या तुमने जान कर मुझे पकड़ा? मुझसे तुम इस तरह खिलवाड़ करोगी और यह भी मुझे सहना पड़ेगा? फिर भी अपनी शपथ मैं रखूँगा, जिस घर को मैं लात मार कर आया, वहीं जा कर रहूँगा।

 विनोदिनी जमीन पर बैठी फिर से सिलाई में जुट गई।

 कुछ देर तक उसके मुँह की ओर एकटक देख कर महेंद्र बोल उठा - बेरहम! निर्दयी हो तुम, विनोद! मैं बड़ा ही अभागा हूँ कि मैंने तुम्हें प्यार किया।

 विनोदिनी से सिलाई में कोई गलती हो गई। रोशनी के पास बड़ी मेहनत से वह धागे को खोजने लगी। महेंद्र के जी में आ रहा था कि विनोदिनी के संगदिल को अपनी मुट्ठी में ले कर पीस डाले। उसकी इस मौन निर्दयता और अडिग उपेक्षा को धक्का दे कर बाहु-बल से शिकस्त देने को जी चाह रहा था।

 महेंद्र बाहर निकला और फिर-फिर लौट आया। बोला - मैं न रहूँगा तो यह तुम्हारी हिफाजत कौन करेगा?

 विनोदिनी - उसकी तो तुम फिक्र ही न करो। बुआ ने उस छमिया नौकरानी को जवाब दे दिया है। आज से वह यहीं रहेगी। अंदर से घर बंद करके हम दोनों मजे में यहाँ रह लेंगी।

 भीतर-भीतर उस पर जितना ही गुस्सा आने लगा, विनोदिनी के लिए उसका उतना ही जबरदस्त खिंचाव होने लगा। उस टस से मस न होने वाली मूरत को वज्र की ताकत से छाती से चिपका कर चूर-चूर कर देने की इच्छा होने लगी। अपनी उस प्रबल इच्छा के हाथों से छुटकारा पाने के लिए महेंद्र दौड़ कर कमरे से बाहर चला गया।

 रास्ते से जाते हुए महेंद्र प्रतिज्ञा करने लगा, उपेक्षा के बदले में वह विनोदिनी की उपेक्षा ही करेगा। संसार में महेंद्र के सिवाय अब विनोदिनी का और कोई सहारा नहीं, ऐसी हालत में भी इस निडरता और अडिगता से उसे ठुकराना - किसी मर्द के नसीब में ऐसा भी अपमान कभी हुआ है। महेंद्र का गर्व चूर-चूर हो कर भी मटियामेट न हुआ - पीड़ित और दलित होता रहा। वह सोचने लगा - ऐसा नाचीज हूँ मैं! मेरे लिए ऐसी स्पर्धा उसके मन में कैसे आई? मेरे सिवाय इस समय उसका और है कौन?

 सोचते-सोचते अचानक याद आ गया - बिहारी। सहसा उसके कलेजे का रक्त-प्रवाह थम गया। बिहारी को ही उसने अपना भरोसा माना है - मैं तो उपलक्ष्य-मात्र हूँ, उसकी सीढ़ी हूँ, पैर रखने की, कदम-कदम पर ठोकर मारने की जगह। इसी साहस पर मेरी ऐसी अवज्ञा।

 महेंद्र को शंका हुई कि विनोदिनी से बिहारी की चिट्ठी-पत्री चलती होगी और इसे कोई भरोसा मिला होगा।

 सोचा और उसी दम वह बिहारी के घर की ओर चल पड़ा।जब उसके घर पहुँचा, तो रात नहीं के बराबर बाकी रह गई थी। बड़ी मुश्किल से दरवाजा पीटते-पीटते बैरे ने दरवाजा खोल कर बताया - बाबूजी घर पर नहीं हैं।

 महेंद्र चौंक उठा। सोचा, मैं इधर नासमझ की तरह मारा-मारा फिर रहा हूँ और इस मौके का फायदा उठा कर बिहारी विनोदिनी के पास गया है। इसीलिए उसने इस बेरहमी से मेरा अपमान किया और मैं भी मार कर भगाए गए गदहे की तरह भाग आया।

 महेंद्र ने उस जाने-पहचाने पुराने बैरे से पूछा -भज्जो, मालिक तुम्हारे घर से किस वक्त निकले हैं?

 भज्जो ने कहा - जी, चार-पाँच दिन हो गए। पछाँह की ओर कहीं घूमने गए हैं।

 महेंद्र की मानो जान में जान आई। जी में आया, अब आराम से थोड़ी देर सो लूँ। तमाम रात भटकते रहने की अब हिम्मत नहीं है।

 वह ऊपर गया और बिहारी के कमरे में सोफे पर सो गया।

 जिस रात महेंद्र ने बिहारी के घर जा कर ऊधम मचाया, उसके दूसरे ही दिन बिना कुछ तय किए बिहारी न जाने कहाँ चला गया। उसने सोचा, यहाँ रहने से जाने कब अपने दोस्त से ऐसा घिनौना संघर्ष हो जाए कि जन्म-भर पछताना पड़े।

 दूसरे दिन महेंद्र जगा तो ग्यारह बज चुके थे। उठते ही उसकी निगाह सामने की तिपाई पर पड़ी। देखा, बिहारी का एक पत्र पड़ा था। ठिकाने के हरफ विनोदिनी के थे। लिफाफा पत्थर के पेपर-वेट से दबा था। महेंद्र ने झपट कर उसे उठा लिया। लिफाफा खोला नहीं गया था। प्रवासी बिहारी के इंतजार में बंद पड़ा था। काँपते हाथों से महेंद्र ने उसे फाड़ डाला और पढ़ने लगा। यही चिट्ठी विनोदिनी ने अपने गाँव से बिहारी को भेजी थी, जिसका उसे कोई जबाव नहीं मिला था।

 चिट्ठी का एक-एक अक्षर महेंद्र को काटने लगा। छुटपन से सदा ही बिहारी महेंद्र की ही ओट में पड़ा था। प्रेम-स्नेह के नाते महेंद्र देवता के गले की उतरी माला ही उसे नसीब हुआ करती। आज महेंद्र स्वयं प्रार्थी तथा बिहारी-विमुख था, फिर भी विनोदिनी ने महेंद्र को ठुकरा कर बिहारी को अपनाया। विनोदिनी की चिट्ठियाँ महेंद्र को भी दो-चार मिली थीं, मगर इसके मुकाबले वे निरी नकली हैं, नासमझ को फुसलाने का बहाना!

 अपना नया ठिकाना बताने के लिए महेंद्र को गाँव के डाकखाने में भेजने की व्याकुलता महेंद्र को याद आई और अब उसका कारण उसकी समझ में आया। विनोदिनी बिहारी के पत्र का बेसब्री से इंतजार कर रही है।

 जैसा कि पहले किया करता था, मालिक की गैरहाजिरी में भज्जो ने महेंद्र को बाजार से ला कर चाय-नाश्ता दिया। नहाना महेंद्र भूल गया। तभी जैसे रेत पर राही जल्दी-जल्दी कदम उठा कर चलता है, उसी तरह विनोदिनी की जलाने वाली चिट्ठी पर वह तेजी से नजर दौड़ाने लगा। वह प्रतिज्ञा करने लगा कि विनोदिनी से अब हर्गिज भेंट न करूँगा। फिर मन में आया, और दो-एक दिन में जब उसे बिहारी का जवाब न मिलेगा, तो वह बिहारी के यहाँ आएगी और तब सारा हाल जान कर उसे तसल्ली होगी। यह संभावना महेंद्र के लिए असह्य हो गई।

 आखिर उस पत्र को अपनी जेब में डाल कर वह पटलडाँगा पहुँचा। महेंद्र की यह गत देख कर विनोदिनी को दया आ गई। वह समझ गई - हो न हो तमाम रात वह रास्ते के ही चक्कर काटता रह गया है। पूछा - रात घर नहीं गए?

 महेंद्र ने कहा - नहीं।

 विनोदिनी ने परेशान हो कर पूछा - अभी तक खाया-पिया भी नहीं क्या? कह कर सेवा-परायणा विनोदिनी ने उसके खाने का इंतजाम करना चाहा।

 महेंद्र बोला - रहने दो, मैं खा चुका हूँ।

 विनोदिनी - कहाँ खाया?

 महेंद्र - बिहारी के यहाँ।

 पल भर के लिए विनोदिनी का चेहरा पीला पड़ गया। जरा देर चुप रह कर उसने अपने को सँभाला और पूछा - बिहारी बाबू कुशल से तो हैं न?

 महेंद्र बोला - कुशल से ही है। वह तो पछाँह चला गया। महेंद्र ने कुछ इस लहजे से कहा मानो बिहारी आज ही गया है।

 विनोदिनी का चेहरा फिर एक बार पीला पड़ गया। फिर अपने को सँभाल कर बोली - ऐसा डाँवाडोल आदमी तो मैंने नहीं देखा। उन्हें हम लोगों का सारा हाल मालूम पड़ गया है? खूब नाराज हो गए हैं क्या?

 महेंद्र - नाराज न हुआ होता तो इस शिद्दत की गर्मी में भी कोई भला आदमी पछाँह घूमने जाता है!

 विनोदिनी - मेरे बारे में कुछ कहा?

 महेंद्र - कहने को क्या है। यह उसकी चिट्ठी लो!

 चिट्ठी उसके हाथ में दे कर महेंद्र तीखी नजर से उसके मुँह के भाव पर गौर करने लगा।

 विनोदिनी ने झट से चिट्ठी ले कर देखी, खुली थी वह। लिफाफे पर उसी के हरफ में बिहारी का नाम लिखा था। अंदर से चिट्ठी निकाली। वह उसी की लिखी वही चिट्ठी थी। उलट कर देखा, बिहारी का जवाब तो कहीं न मिला।

 थोड़ी देर चुप रह कर विनोदिनी ने पूछा - यह चिट्ठी तुमने पढ़ी है?

 विनोदिनी के चेहरे के भाव से महेंद्र को डर लगा। वह झूठ बोल गया - नहीं।

 विनोदिनी ने चिट्ठी फाड़ डाली। उसके टुकड़े-टुकड़े किए और खिड़की से बाहर फेंक दिए।

 महेंद्र बोला - मैं घर जा रहा हूँ।

 विनोदिनी ने कोई जवाब न दिया।

 महेंद्र - तुमने जैसा चाहा है, मैं वैसा ही करूँगा। सात दिन मैं वहीं रहूँगा। कॉलेज आते समय रोज नौकरानी की मार्फत यहाँ का सारा प्रबंध कर जाया करूँगा। तुमसे भेंट करके तुम्हें आजिज न करूँगा।

 विनोदिनी महेंद्र की कोई बात सुन भी पाई या नहीं, कौन जाने, मगर उसने कोई जवाब न दिया। खुली खिड़की से बाहर अँधेरे आसमान को ताकती रही।

 अपनी चीजें उठा कर महेंद्र वहाँ से निकल पड़ा।

 सूने कमरे में विनोदिनी बड़ी देर तक काठ की मारी-सी बैठी रही और अंत में मानो जी-जान से अपने को सजग करने के लिए छाती का कपड़ा फाड़ कर अपने पर बेरहमी से चोट करने लगी।

 आवाज पा कर नौकरानी दौड़ी आई - दादी जी, क्या कर रही हैं?

 तू चली जा यहाँ से- डपट कर विनोदिनी ने छमिया को कमरे से बाहर निकाल दिया। उसके बाद जोरों से किवाड़ बंद करके दोनों हाथों से मुट्ठी बाँध कर जमीन पर लोट गई - तीर खाए जानवर जैसी रोने लगी। अपने को इस तरह विक्षत और श्रांत बना कर विनोदिनी रात-भर खिड़की के पास नीचे पड़ी रही।

 सुबह जैसे ही सूरज की किरणें कमरे में आईं, विनोदिनी को अचानक ऐसा लगा, बिहारी गया नहीं होगा, कहीं उसे चकमा देने के लिए महेंद्र ने यों ही झूठ कह दिया हो। उसने छमिया को बुला कर कहा - छम्मी, तू फौरन जरा बिहारी भाई साहब के यहाँ जा उन लोगों का हाल पूछ आ।

 छमिया कोई घंटे-भर बाद लौट कर बोली - उनके घर के सारे खिड़की-दरवाजे बंद हैं। दरवाजा पीटने पर अंदर से बैरा निकला। बोला - वे घर पर नहीं हैं। वे घूमने के लिए पछाँह गए हैं।

 विनोदिनी के संदेह का कोई कारण ही न रहा।

 महेंद्र रात में ही उठ कर चला गया, यह सुन कर राजलक्ष्मी बहू पर बहुत नाराज हुईं। उन्होंने समझा बहू की लानत-मलामत से ही वह चला गया। उन्होंने आशा से पूछा - महेंद्र रात चला क्यों गया?

 आशा ने सिर झुका कर कहा - मालूम नहीं, माँ!

 राजलक्ष्मी को लगा, यह भी रूठने की बात है। आजिजी से कहा - तुम्हें नहीं मालूम तो किसे मालूम होगा? कुछ कहा था उससे?

 आशा ने सिर्फ नहीं कहा।

 राजलक्ष्मी को यकीन न आया। ऐसा भी हो सकता है भला। पूछा - कल वह गया कब?

 सकुचाकर आशा बोली - नहीं जानती।

 राजलक्ष्मी ने जोर दे कर यह भी कह दिया कि आशा के आचरण और स्वभाव की वजह से महेंद्र घर से निकल गया। सिर झुका कर यह फटकार झेलती हुई आशा अपने कमरे में जा कर रोने लगी। अपने मन में सोचने लगी, पता नहीं क्यों कभी मेरे स्वामी ने मुझे प्यार किया था और यह भी नहीं जानती कि उसका वह प्यार मैं फिर कैसे पा सकूँगी। जो प्यार करता है, उसे कैसे खुश करना चाहिए, हृदय आप ही यह बता देता है, लेकिन जो प्यार नहीं करता, उसके हृदय को कैसे पाया जा सकता है, आशा यह क्या जाने। जो आदमी किसी और को प्यार करता है, उससे सुहाग पाने-जैसी शर्मनाक कोशिश वह कैसे करे?

 शाम को परिवार के ज्योतिषी जी और उनकी बहन आई। बेटे की ग्रहशांति के लिए राजलक्ष्मी ने उन्हें बुलवाया था। बहू की जन्म-कुंडली और हाथ देखने का राजलक्ष्मी ने उनसे अनुरोध किया, और इसके लिए आशा को वहाँ बुलवाया गया। दूसरों के आगे अपनी बदनसीबी की चर्चा के संकोच से कुंठित हो कर आशा किस तरह से अपना हाथ निकाल कर बैठी कि इतने में अपने कमरे के पास वाले अँधेरे बरामदे में राजलक्ष्मी को जूतों की हल्की-सी आहट सुनाई दी - कोई जैसे दबे पाँव जा रहा हो। राजलक्ष्मी ने पूछा - कौन?