एक था ठुनठुनिया - 19 Prakash Manu द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक था ठुनठुनिया - 19

19

रहस्यमय गुफा

नौका-यात्रा करते चारों मित्र नदी के दूसरे किनारे पर पहुँचे, तो एक क्षण के लिए सहम गए। सचमुच सब ओर सन्नाटा पसरा हुआ था—एक अजब तरह की सुनसान शांति।...पत्ता भी हिले तो आवाज हो! ऐसा चुप-चुप...चुप-चुप...चुप-चुप सन्नाटा।

“मैं तो आज तक कभी इधर नहीं आया।” ठुनठुनिया ने गौर से इधर-उधर देखते हुए कहा।

“हाँ...और मैं भी!” मीतू बोला, “देखो तो, कितना सन्नाटा है। डर-सा लग रहा है। दूर-दूर तक कोई आदमी नहीं...!”

“हम जंगल के बारे में सुना करते थे। असली जंगल तो यह है, पहाड़ी चट्टानों के बीच!” मनमोहन ने उन विशालकाय घने पेड़ों की ओर देखते हुए कहा, जिनकी वजह से दिन में भी यहाँ अँधेरा लग रहा था।

“कहीं कोई जंगली जानवर आ गया तो...?” सुबोध ने सहमकर कहा।

“अरे, जानवर चाहे कोई भी हो, तुम चुपचाप अपनी राह पर चलते जाओ, बगैर डरे, तो वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।” ठुनठुनिया ने समझाया।

तब तक सुबोध को भी एक काम की बात याद आ गई। बोला, “मेरा एक दोस्त कह रहा था कि डरना नहीं चाहिए। अगर तुम बाघ की भी आँख में आँख डालकर देखो तो वह डरकर भाग जाएगा। हाँ, पर अगर तुम डरे, तो मरे!”

अभी वे नौका को वहीं छोड़, इसी तरह धीरे-धीरे बातें करते हुए आगे बढ़े ही थे कि ठुनठुनिया को दूर एक पहाड़ी गुफा दिखाई दे गई। बोला, “देखो-देखो, पहाड़ के बीच वह गुफा। चारों ओर पेड़ों से घिरी हुई है, मगर फिर भी यहाँ से दिखाई दे रही है...!”

“चलो, चलते हैं। वहाँ शायद कोई रहता हो।” मनमोहन ने कहा तो चारों दोस्तों के पैर उधर ही बढ़ गए।

“और अगर...” सुबोध ने धीरे से फुसफुसाकर कहा, “वहाँ कोई शेर हुआ तो....?”

इस बात से सबके कदम ठिठक गए। पर ठुनठुनिया हिम्मत के साथ बोला, “अरे! शेर हुआ तो क्या! शेर की गंध तो दूर से ही पहचान में आ जाती है। शेर हुआ तो हम सब चुपके-चुपके लौट आएँगे।”

चलते-चलते वे गुफा के पास पहुँचे। वे गुफा के अंदर झाँककर देखना चाहते थे। पर उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि गुफा का मुँह तो एक भारी पत्थर रखकर बंद कर दिया है। उसके आसपास खूब सारी जंगल की कँटीली झाड़ियाँ रख दी गई हैं, ताकि किसी का ध्यान इस गुफा की ओर न जाए।

“इसका मतलब तो यह है कि गुफा के अंदर कोई नहीं है।” ठुनठुनिया ने उत्साह के साथ कहा, “चलो दोस्तो, अंदर चलकर देखते हैं।”

बड़ी मुश्किल से गुफा के मुँह पर रखे भारी पत्थर और कँटीली झाड़ियाँ हटाकर गुफा का रास्ता खोला गया। बाहर से ही गुफा को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि गुफा का मुँह सँकरा है, पर अंदर वह काफी चौड़ी है।

चारों दोस्त सावधानी से बिना पैरों की आवाज किए चुपके-चुपके अंदर की ओर बढ़े। उन्होंने इशारे से एक-दूसरे को समझा दिया था कि कुछ बोलना नहीं है। बस, चुपचाप सब कुछ देखना है। वे भीतर से कुछ सहमे हुए भी थे। सोच रहे थे, पता नहीं क्या कुछ देखने को मिल जाए? पर थोड़ा भीतर जाने पर ही उनका भय खत्म हो गया। इसलिए कि वह गुफा एकदम खाली थी। चारों उसमें इधर-उधर निगाह घुमा रहे थे, हालाँकि कहीं कुछ नजर नहीं आया।

पर अचानक मीतू चौंका। गुफा में चहलकदमी करते हुए एक पत्थर के नीचे उसे नीले रंग के कुछ कागज दबे हुए मिले। लग रहा था, इन्हें छिपाने के लिए ही ऊपर पत्थर रख दिया गया है।

मीतू ने झट से वे कागज बाहर निकाले तो चारों दोस्त दौड़कर वहाँ इकट्ठे हुए। मनमोहन ने इशारा किया, ‘देखो, देखो, यह भारत का नक्शा बना है!’

चारों मित्रों को हैरानी हुई कि जितने भी नीले रंग के कागज थे, सभी पर भारत का नक्शा बना हुआ था। उन सभी नक्शों पर तारीखें पड़ी थीं। सब पर लाल स्याही से कुछ खास जगहों पर निशान लगाए गए थे। साथ ही अजब-सी भाषा में हाशिए में जगह-जगह कुछ लिखा हुआ था, जो बिल्कुल पढ़ने मे नहीं आ रहा था।

गुफा में रोशनी बहुत कम थी, फिर भी अब धीरे-धीरे दीवारें और आसपास की चीजें कुछ साफ दिखाई देने लगी थीं। ठुनठुनिया ने देखा कि गुफा की दीवारों पर कुछ अजीब-से चित्र बने हैं। उनके नीचे अजीब-सी भाषा में कुछ लिखा हुआ है। ये ही चित्र उन नक्शों के पीछे भी बने थे और उन पर भी यही सब लिखा हुआ था।

‘इनका मतलब क्या है?’ किसी को यह ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन इतना तय था कि यह रहस्यमय गुफा अब उनके लिए इतनी रहस्यमय नहीं रह गई थी। साफ लग रहा था कि यहाँ कोई गुप्त षड्यंत्र चल रहा है। जरूर किसी दुश्मन देश के जासूस यहाँ छिपकर मीटिंग करते हैं। हो सकता है, पूरे देश में उथल-पुथल फैलाने के लिए आतंकवादी योजनाएँ यहाँ बनती हों। शायद...

ठुनठुनिया बोला, “मुझे तो भारी गड़बड़ लग रही है। जरूर यह देश के दुश्मनों का अड्डा है। ओफ, कैसी जगह ढूँढ़ निकाली उन्होंने?”

मनमोहन ने कहा “जरूर ये दुश्मन के जासूस होंगे। मैंने एक किताब पढ़ी थी, उसमें लिखा था। दुश्मन के जासूस किस तरह भेद लेकर फिर षड्यंत्र करते हैं। देख रहे हो न, भारत का नक्शा? उस पर जगह-जगह लाल स्याही से निशान...! जरूर देश पर आतंकवादियों के हमले की योजना इसमें छिपी है। यानी अलग-अलग दिनों में अलग-अलग जगहों पर हमले या विस्फोट...! जरूर कुछ ऐसा ही है।”

“हो सकता है, ये लोग रात में यहाँ छिपकर योजना बनाते हों और दिन में अपना काम करने के लिए इधर-उधर निकल जाते हों।” मीतू ने कहा।

“चलो, अब जल्दी से चलें।” सुबोध बोला, “वरना इन लोगों को शक हो सकता है।”

मीतू ने नीले कागजों में से एक कागज उठाया और चुपके से जेब में डाल लिया। बाकी कागज उसने उसी तरह पत्थर के नीचे दबे रहने दिए।

फिर चारों दोस्त झटपट बाहर आए। उसी तरह गुफा के दरवाजे पर पत्थर रखा, झाड़ियाँ भी जस की तस रख दीं और फिर नौका लेकर चल पड़े। शाम हो जाने से पहले ही वे दूसरे किनारे पर सुरक्षित पहुँच जाना चाहते थे।

रास्ते में ठुनठुनिया ने कहा, “कुछ-न-कुछ तो करना होगा। क्यों न थाने जाकर पुलिस को बता दें!”

“पर पता नहीं, वे हमारी बात पर विश्वास करेंगे भी कि नहीं?” मनमोहन ने कहा, “उलटे बात और फैल जाएगी। तब तक ये लोग यहाँ से डेरा उठाकर कहीं और चल पड़ेंगे।”

“तो चलो, गजराज बाबू के यहाँ चलते हैं।” ठुनठुनिया ने सुझाया, “वे जरूर कुछ-न-कुछ करेंगे। उन्हें हम सारी बात बता देंगे। वे हमारे साथ पुलिस थाने चलेंगे तो पुलिस भी कुछ-न-कुछ जरूर करेगी।”

“हाँ-हाँ, ठीक...बिल्कुल ठीक!” सभी को ठुनठुनिया की यह बात जँच गई।

आखिर चारों दोस्त नदी पार करते ही तेज कदमों से रायगढ़ की ओर चल दिए। शहर आते ही वे गजराज बाबू की हवेली की ओर बढ़े। गजराज बाबू ने उन्हें परेशान देखा तो हड़बड़ाकर कहा, “क्यों ठुनठुनिया, सब ठीक तो है न? आज लगता है, तुम फिर किसी परेशानी में घिर गए हो!”

“बाबू साहब, बात तो ठीक है।” ठुनठुनिया बोला, “पर यह परेशानी मेरी नहीं, हम सबकी है। और अगर जल्दी ही कुछ न किया गया, तो कल कुछ भी हो सकता है।”

“अच्छा, ऐसी क्या बात हो गई?” गजराज बाबू चौंके। बोले, “भीतर आओ, तसल्ली से सारी बात बताओ।”

इस पर ठुनठुनिया ने शुरू से लेकर आखिर तक सारी बात बता दी। उस रहस्यपूर्ण पहाड़ी गुफा का पूरा ब्योरा दिया और बताया कि उसमें ऐसे कागज हैं जिनमें देश का नक्शा बना है। उन पर अजीब-सी भाषा में कुछ लिखा है और लाल स्याही से बीच-बीच में गोल निशान बने हैं। लगता है, यह देश के किसी दुश्मन का काम है, जो हमारे देश के अलग-अलग शहरों में हमले...या विस्फोट...!

अभी ठुनठुनिया यह बता ही रहा था कि मीतू ने झट जेब से कागज निकालकर दिखा दिया। बोला, “बाबू जी, यह लीजिए कागज। ऐसे ढेरों कागज वहाँ हैं। सबमें अलग-अलग निशान लगे हैं, अजीबोगरीब चित्र भी बने हैं। मैं उनमें से बस एक उठा लाया हूँ, ताकि किसी को ज्यादा शक...!”

वह कागज देखते ही गजराज बाबू गंभीर हो गए। बोले, “सचमुच, यह तो देश के दुश्मनों का काम है, एक साथ देश के कई हिस्सों में हमला करने की योजना बन रही है। संसद, प्रधानमंत्री निवास, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट—एक साथ हर जगह बम-विस्फोट करने की योजना! ये लोग तो बहुत शातिर अपराधी लगते हैं...बहुत भयंकर!”

उसी समय गजराज बाबू ने कपड़े पहने और बच्चों को साथ लेकर थाने की ओर चल दिए। थानेदार ने सारी बात सुनी तो भौचक्का रह गया। कुछ सोचते हुए बोला, “हो सकता है, उन लोगों के पास अति-आधुनिक हथियार हों। हम उनका मुकाबला कैसे करेंगे?”

आखिर में आनन-फानन में पास के मिलिट्री कैंप तक खबर भेजी गई। सेना के जवानों ने आधी रात के समय नदी पार करके गुफा को चारों ओर से घेर लिया और पूरी मोरचेबंदी कर ली। अब तक आतंकवादी लौटकर गुफा के अंदर छिप चुके थे। उन्होंने अंदर से गोलियाँ चलाकर सेना के जवानों का मुकाबला करना चाहा।...बम-विस्फोट की धमकी दी! पर सुबह होते-होते वे सब पकड़ लिए गए। पता चला कि बच्चों का अंदेशा एकदम सही था। वे पड़ोसी देश के जासूस ही थे, जो भारत में आतंक पैदा करने के लिए भेजे गए थे।

अगले दिन ‘नव प्रभात’ अखबार में सेना के द्वारा पकड़े गए आतंकवादियों के फोटो छपे, तो साथ ही ठुनठुनिया और उसके दोस्तों के भी। उस रहस्यमय गुफा की पूरी कहानी भी लिखी गई थी, जिसे ठुनठुनिया और उसके दोस्तों ने खोज निकाला था।

गजराज बाबू और मिलिट्री के अधिकारियों का भी बयान छपा कि अगर ये चारों नन्हे दोस्त समय पर सूचना न देते, तो कुछ भी हो सकता था।

सेना के अधिकारियों ने चारों नन्हे मित्रों को वीरता का सर्टिफिकेट देने के साथ-साथ एक-एक हजार रुपए का खास इनाम भी दिया। एक बड़ी-सी सभा हुई, जिसमें गजराज बाबू ने ठुनठुनिया और उसके दोस्तों की पीठ ठोंकते हुए कहा, “ये चारों नन्हे दोस्त गुलजारपुर का गौरव हैं। हमें इन पर नाज है!”

सभा के बाद ठुनठुनिया ने आकर माँ के पैर छुए, तो माँ ने प्यार से उसका माथा चूमकर कहा, “जुग-जुग जिओ बेटे...आज मैं सचमुच बहुत खुश हूँ रे ठुनठुनिया!”