एक था ठुनठुनिया - 18 Prakash Manu द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक था ठुनठुनिया - 18

18

नए दोस्तों के साथ नौका-यात्रा

अगले दिन मनमोहन शाम के समय छिद्दूमल की बगिया में सुबोध से मिला, तो वह वाकई एक बदला हुआ मनमोहन था। उसने मन ही मन कुछ गुन-सुन करते हुए सुबोध से कहा, “वाकई ठुनठुनिया में है कुछ-न-कुछ बात!”

“कैसी बात, कौन-सी बात?...मैं भी तो सुनूँ।” सुबोध को हैरानी हुई। वह पहली बार मनमोहन से ठुनठुनिया की तारीफ सुन रहा था।

“बस, जादू ही समझो...!” अब के मनमोहन ने जरा और खुलकर कहा।

“अरे! कुछ बता न, पूरी बात क्या है?” सुबोध थेड़ा चिढ़ गया।

तब मनमोहन ने कल की पूरी घटना बता दी। फिर बोला, “सुबोध, मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा कि यह जादू हुआ कैसे? यही ठुनठुनिया था जो पतंग देखते ही काँपता था। इससे-उससे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ाकर कहता था कि यार, जरा पतंग तो उड़ा दे...यार, जरा छुड़ैया ही दे दे! मगर कल पहली बार इसने पतंग उड़ाई और पहले ही दिन क्या कमाल दिखाया  एक-एक कर जाने कितनी पतंगें काट डालीं। मेरी पतंग तो काटी ही, रामेसर, लखिया, मानबहादुर, बबलू, टिंकू सब रो रहे थे कि अरे, जरा-से ठुनठुनिया ने यह कमाल कर दिखाया, जिसे हम अपने आगे चींटी भी नहीं समझते थे। पतंग तो हमने भी सीखी, मगर पहले ही दिन यह कमाल! हो न हो, कुछ जादू तो है इस गोलू-मटोलू ठुनठुनिया के पास...!”

“बेकार ही उससे दुश्मनी मोल ली।” सुबोध बोला, “उसे खामखा चिढ़ाकर हमें क्या मिला!”

“मैं भी यही सोच रहा हूँ।” मनमोहन ने कहा। फिर हँसकर बोला, “ठुनठुनिया बातें ऐसी मजेदार करता है कि हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाएँ।”

“हाँ, मैं समझता हूँ, उसके दिल में कोई खोट नहीं है।” सुबोध ने पहली बार अपने मन की बात कही।

“अब देखो न, मैंने तो कल हद दर्जे तक उसके साथ बदतमीजी की।” मनमोहन बोला, “उसकी पतंग उड़ाकर देने से इनकार किया। फिर जान-बूझकर उसकी पतंग काटनी चाही...पर जब मेरी पतंग कट गई तो वह उलटा मुझे बुलाकर कहता है कि आ मनमोहन, इधर आ। हम लोग मिलकर पतंग उड़ाएँगे।” उसके शब्द आत्मग्लानि से भरे थे।

इस बात से मनमोहन ही नहीं सुबोध भी रीझ गया और मनमोहन के साथ-साथ वह भी ठुनठुनिया की जमकर तारीफ करने लगा। फिर बोला, “सच्ची बात तो यह है, हमीं ने ठुनठुनिया को खासा तंग किया। याद है, चार फुँदने वाली टोपी? बेचारे के सारे फुँदने कटवाए...”

अभी ये दोनों बातें कर ही रहे थे कि कहीं से घूमता-टहलता ठुनठुनिया आया। मनमोहन हँसकर बोला, “हम तेरा ही गुणगान कर रहे थे।”

“अच्छा...? वाह रे वाह, मैं!” ठुनठुनिया हँसा।

फिर तो खूब बातें चल निकलीं। बहुत-से गिले-शिकवे थे, बह गए। तीनों गले मिले और पिछली बातें भुलाकर पक्के दोस्त बन गए। तीनों गली के नुक्कड़ पर एक पेड़ के सहारे खड़े खूब खिलखिलाकर बातें कर रहे थे। एक-एक कर ढेरों पुराने किस्सों पर किस्से याद आ रहे थे और न हँसी रुकने में आती, न बातें।

इतने में ही मीतू भी आ गया, जो बिल्कुल ठुनठुनिया के घर के पास रहता था और बड़े मनमौजी स्वभाव का था। बातें बनाने और चुटकुले सुनाने में उस्ताद था। दोस्तों पर मुश्किल आती, तो कुछ भी करने को तैयार रहता था।

अब तो चारों की पक्की दोस्ती हो गई। वे मिलकर रहते, मिलकर स्कूल जाते, शाम को मिलकर खेलते। मनमोहन का अकड़ूपन एकदम गायब हो चला और ठुनठुनिया के साथ रहकर उसने भी सीख लिया था कि सबके साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए।

कुछ दिन बीते। फिर एक दिन की बात है। इतवार का दिन था। चारों दोस्त घर के पास वाले मैदान में इकट्ठे हुए और मिलकर लँगड़ी कबड्डी खेलने लगे।

इस बीच बादल घिर आए थे। बड़ी ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। मीतू ने सुझाव दिया, “जरा देखो तो, मौसम कितना अच्छा है! चलो जंगल में चलें। नदी के किनारे-किनारे घूमेंगे, बड़ा मजा आएगा।”

और बस चारों दोस्त उछलते-कूदते और बीच-बीच में दौड़ लगाते हुए, जंगल की तरफ चल दिए। सभी मस्ती के रंग में थे।

भागते-दौड़ते वे नदी के किनारे पहुँचे और नदी की रेत पर मजे से खेलने और उछलने-कूदने लगे। ठुनठुनिया ने रेत पर एक के बाद एक पचासों दफा ऐसी-ऐसी कलामुंडियाँ खाकर दिखाईं कि सभी दोस्त झूम उठे। फिर पकड़म-पकड़ाई का खेल शुरू हो गया। और वो भागमभाग हुई...वो भागमभाग और पेड़ की डालियों से उछल-कूद, कि सभी पसीने-पसीने। सभी की बुरी तरह हँफनी छूट रही थी।

आखिर बुरी तरह थककर वे आम के बगीच में सुस्ताने के लिए बैठे। ठुनठुनिया और सुबोध ढेर सारे आम तोड़ लाए। उन्हें नदी के पानी में धोकर सभी चूसने लगे। फिर गपशप भी शुरू हो गई।

ठुनठुनिया बोला, “अगर आज मेरे पास बाँसुरी होती तो एक से एक बढ़िया सुर निकालकर दिखाता। तुम लोगों को खूब मजा आता।”

इस पर मनमोहन बोला, “कोई बात नहीं। अगली बार आना तो बाँसुरी साथ लाना। जंगल में बाँसुरी की आवाज खूब गूँजती है। सुनकर सचमुच मजा आता होगा...!”

सुबोध ने सुझाव दिया, “बाँसुरी नहीं है तो क्या हुआ? आज अपन नौका-यात्रा की करते हैं।”

मीतू ने नदी की ओर देखकर कहा, “नाव तो यहाँ है, पर नाव चलाने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा।”

“तो क्या हुआ?” ठुनठुनिया बोला, “नाव मुझे चलाना आता है। बस, कहीं से चप्पू मिल जाएँ।”

इतने में सुबोध चप्पू ढूँढ़ लाया। बोला, “अजीब बात है, ये चप्पू किसी ने झाड़ियों के बीच छिपाकर रखे हुए थे, ताकि किसी को नजर न आएँ।”

“मगर किसने किया होगा ऐसा!...और मल्लाह गया कहाँ?” ठुनठुनिया थोड़ा परेशान होकर सोचने लगा।

“अरे, किसी ने छिपाकर रखे हैं, इससे हमें क्या! बस, चप्पू तो मिल गए न! अब मजे से नाव चलाएँगे और नौका-यात्रा का पूरा मजा लेंगे।” सुबोध अपनी तरंग में था।

“चलो भई ठुनठुनिया और मीतू...तुम लोग चप्पू सँभालो। हो जाओ तैयार!” मनमोहन ने कहा।

और सचमुच नदी की लहरों पर नौका इस तरह मजे से हिचकोले लेते हुए चलने लगी, जैसे किसी सपने की दुनिया में ले जा रही हो। फिर नदी की ठंडी-ठंडी हवा का अपना आनंद था। लग रहा था, यह सुहानी हवा चारों के शरीर को नरम उँगलियों से गुदगुदा रही है।

चारों दोस्तों के मन खुशी से थिरक रहे थे। कभी वे आपस में जोर-जोर से बातें करने लगते और कभी उमंग में आकर कोई सुर छेड़ देते। सोच रहे थे, ऐसी मस्ती क्या रोज मिलती है?

मीतू को एक प्यारी-सी कविता याद आई। बोला, “सुनो भाई सुनो, यह हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय की कविता है। जाने-माने फिल्मी अभिनेता, मगर कविताएँ भी क्या गजब की लिखी हैं! सुनकर तुम्हारा जी भी खुश हो जाएगा।” और वह उछल-उछलकर गाने लगा—

नाव चली, नाव चली

नानी की नाव चली,

नानी की, नानी की

नानी की, नाव चली...

मीतू गाता तो सारे दोस्त जोर-जोर से कविता की पंक्तियाँ दोहराने लगते। पूरे जंगल में मानो कविता के सुर गूँज रहे थे, “नानी की नाव चली...नानी की नानी की नानी की नाव चली...!”

“मैं तो पहली बार इस नदी पर नौका-यात्रा कर रहा हूँ। मुझे पता नहीं था, यहाँ इतना अच्छा लगता है।” मनमोहन हँसकर बोला, तो ठुनठुनिया खूब मजे में ठठाकर हँसा और उसने अनोखा सुर छेड़ दिया, “हेऽऽऽ...हे...हे...हे...! राम जी की नौका, राम जी का चप्पू, खेवनहार ठुनठुनिया रे...हेऽऽ हेऽऽ...!”

“देखो भाई ठुनठुनिया, आराम से चलाओ—आराम से! गिरा न देना। कहीं नाव उलट गई तो...!” मनमोहन को थोड़ा डर लग रहा था।

“कैसे उलट जाएगी?” ठुनठुनिया हँसकर बोला, “कोई मजाक है! और उलट भी गई, तो खुद को बाद में बचाऊँगा, पहले तुम सभी को...! आखिर मेरा नाम इसीलिए तो ठुनठुनिया है।”

इस पर चारों दोस्त एक साथ खिलखिलाकर हँसे। यह हँसी भी चारों ओर बिखर गई। लगा, नदी और उसकी तरंगें भी साथ-साथ हँसी हैं। और जंगल की हवा भी...!

“तुम कभी उधर गए हो? उधर...नदी पार! क्या है दूसरी तरफ?” मनमोहन ने अचानक ठुनठुनिया से पूछा।

“मैं तो कभी गया नहीं।” ठुनठुनिया बोला, “वैसे यहाँ से देखो तो एकदम सन्नाटा-सा लग रहा है। बिल्कुल सूना-सूना...! दूर-दूर तक खेत भी नहीं हैं!”

बहरहाल चारों दोस्तों की नौका-यात्रा बड़े आनंद और उत्साह के साथ चल रही थी। ठुनठुनिया बहुत अच्छा मल्लाह है, यह जल्दी ही सब दोस्तों का पता चल गया। इसलिए शुरू में तो सबको डर लग रहा था, फिर डर काफूर हो गया, मजा आने लगा।

“यार मनमोहन, लगता है, यह नौका चलती रहे, चलती रहे!” सुबोध तरंग में आकर बोला। शरारती हवा बार-बार उसके बालों से खेल रही थी और बाल माथे पर आ जाते। सुबोध झटके से उन्हें पीछे करता और हँसता।

“अ-हा-हा, कितनी शीतल हवा! हम धरती पर हैं कि स्वर्ग में...?” मीतू ने कहा तो सारे दोस्त फिर एक साथ खिलखिलाकर हँस पड़े। सचमुच पानी की छुवन से मन में कितना जीवन, कितना उल्लास भर जाता है, सभी महसूस कर रहे थे।

मीतू को एक पुराना गाना याद आ गया और उसने सुर छेड़ दिया, “ए हो...रेs, ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में...सागर मिले कौन-से जल में...कोई जाने ना, ओ हो रेss, ताल मिले नदी के जल में...!”

गाना इतना सुरीला था कि चारों का मन उसी में अटक गया। लग रहा था, धरती हो, नदी का पानी या आकाश, सब ओर खुशी की तरंगें बिखरी हुई हैं। छप-छपाछप-छप करती अनगिनत तरंगें। सब ओर एक ही सुर—“ए हो रेs...ओ हो रेs...ए हो रेss...!”