कोट - १७ महेश रौतेला द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

कोट - १७

कोट-१७
नैनीताल:
तल्लीताल,नैनीताल से नैना चोटी को ज्यों ही देखा, तो बहुत दूर लगी। जबकि दो बार पढ़ाई करते समय उस पर चढ़ा हूँ। उम्र की सीमा को अनुभव कर रहा हूँ। मैं बैठे-बैठे नैनीताल का बदलता स्वभाव देख रहा हूँ।धुंध का घिरना, साफ होना। झील के ऊपर तक आना, फिर साफ होना।पर्यटन अपनी धुन में।नाव वाले अपनी जीविका की तलाश में। फोटो लेने वालों की घूमती दृष्टि। थोड़ी देर में घना कोहरा। मैं वहीं खड़ा हूँ जहाँ प्यार को समझने जानने का प्रयास किया था। जूते पालिस करने के लिए मोची के सामने हूँ। वह बीस रुपये में पालिस करने की बात करता है। मछलियों का झुंड झील के किनारे खुश लग रहा है।मुझे भगवान के मत्स्य अवतार का ध्यान आता है। जब डरावने सपने आते हैं तो भगवान को पानी में अन्तर्धान होते देखा है।लेकिन इसबार जब झपकी लगी, तो भगवान पानी के ऊपर तक आये और लौट गये। उन्हें पानी गंदा लगा और उन्होंने पानी में प्रवेश करने का मन बदल लिया है। झील में पिछले साल से पानी अधिक है, लेकिन छलछलाता हुआ नहीं।
अल्मोड़ा:
अल्मोड़ा मुख्य बाजार की एक विशेषता यह है कि इसकी सड़क पत्थरों से बनी है।मैंने अन्य स्थानों में ऐसी सड़क नहीं देखी है प्रायः सभी पक्की सड़कें डामर की होती हैं। अल्मोड़ा चन्द राजाओं की राजधानी रही है।
अल्मोड़ा में रघुनाथ मंदिर और अशोक होटल के सामने भीख मांगने वाले दो दो भिखारी बैठे थे। मैंने जेब से पाँच रुपये का सिक्का निकाल कर उन्हें दिया। उसी समय एक व्यक्ति ने दस रुपये का नोट उनके कटोरे में डाल दिया। रघुनाथ मंदिर में डालने वाला व्यक्ति पुलिस ड्रेस में था तो मन में थोड़ी शंका हुई। क्योंकि पुलिस के बारे में हम सकारात्मक कम ही होते हैं। फिर मुझे विश्व के सबसे अमीर आदमी का किस्सा याद आ गया। जब वह पाँच डालर टिप में देता है और उसकी बेटी पाँच सौ डालर। और वह उसे उचित ठहराता है। आगे बढ़ता हूँ तो अल्मोड़ा थाना देख कर मन खुश हो जाता है। बहुत ही साफ-सुथरा है। आमतौर पर ऐसे थाने देखने में नहीं आते हैं। बना पुराने डिजाइन का है। आगे गया तो पुराने पिक्चर हाँल " मुरली मनोहर" की बिल्डिंग पर कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागृह,थाना बाजार लिखा है। वहाँ पर एक बुजुर्ग मिलते हैं। उनसे पूछा तो वे कहते हैं यही मुरली मनोहर पिक्चर हाँल था। उन्होंने राजकीय इण्टर कालेज से १९५९ में इण्टर किया था। अभी अपनी उम्र अस्सी साल बता रहे हैं।बच्चे बंगलुरू, जयपुर और अल्मोड़ा में हैं। सबसे गरीब जो है वह अल्मोड़ा में है, कहते हैं। जयपुर वाला प्रोफेसर है। बंगलुरू वाला इसरो में है। हालांकि उन्होंने कहा," जो बंगलुरू में है वह उस विभाग में है जो मंगलयान आदि बनाते हैं।" दोनों अपने अपने शहरों में बस गये हैं। काफी बातें करते करते हम पलट बाजार पहुंच गये हैं।हाथ जोड़कर विदा लेते हैं तो वे कहते हैं हम दोनों के बीच इतनी बातें ऊपर वाले ने सुनिश्चित की होंगी।उनकी बात से लग रहा है, फिर हम कभी नहीं मिल पायेंगे। लेकिन यह वीतराग भाव से कही गयी बात है। लौटते समय कारखाना बाजार होते हुए आ रहा हूँ। ताँबे के गागर दुकानों में दिख रहे हैं। पुरानी संस्कृति पूरी मरी नहीं है अभी।कुमाँऊनी भाषा में कोई बोल रहा है," अरे कथां मरि रै छै तु।" मैं सोच रहा हूँ यदि मर गया तो बोलेगा कैसे? लेकिन दूर से आवाज आती है ," यहीं पर हूँ।"
ग्वेल देवता (ग्वेल्ज्यू) मंदिर चितई (अल्मोड़ा,उत्तराखंड) और घोड़ाखाल(नैनीताल) में हजारों की संख्या में घंटियां और चिट्ठियां देखी।मंनत पूरी होने पर घंटियां चढ़ाई गयी हैं और मंनत चिट्ठियों द्वारा मांगी गयी है।या कहें एक पन्ने में अपनी मंनत लिखकर टांकी गयी है।जो भी पत्र देखा वह हिन्दी में लिखा था।कुछ पत्र वर्षा में धुल चुके हैं।संभवतः कुछ हवा में उड़ गये होंगे। किसी में घर की कामना की गयी है, किसी में नौकरी की ,किसी में स्वास्थ्य की और किसी में इन तीनों की।मन्नतें आसमान छूती नहीं दिखी।सभी अच्छी भावनाओं से लबालब हैं।मन्नत पूरी होने पर सेवा करने,घंटी चढ़ाने और चढ़ावा देने की बात लिखी है। पता नहीं धुले या उड़ गये आवेदनों में क्या होगा! लेकिन अंग्रेजी में कोई मन्नत नहीं देखी। आश्चर्य हुआ, जहाँ देश की सर्वोच्च न्यायपालिका अंग्रेजी में चलती हो वहाँ ग्वेल देवता हिन्दी में आवेदन ले रहे हैं और न्याय कर रहे हैं।लगता है, लोग मान बैठे हैं कि ग्वेल देवता अंग्रेजी नहीं जानते हैं। इन मन्दिरों में ग्वेल देवता को साक्षी मान कर शादियां भी की जाती हैं। आस्था में परम शक्ति होती है, यहाँ पर आकर सजीव लग रहा था।
मैंने कोट की जेब से चिट्ठी निकाली और मन्दिर में टांक दी उन हजारों-लाखों चिट्ठियों के बीच। मुझे अपनी चिट्ठी कुछ अलग लग रही थी प्यार से लबालब। मैं वृक्ष की छाया में बैठकर उसे देख रहा था। हवा के झोंके उसे हिला रहे थे। लेकिन वह एक संकल्प बन चुकी थी। मैं इच्छा पूरी होने पर घंटी बाँधने का संकल्प कर रहा था। बहुत देर बाद मैं उठा और चारों ओर देखकर नीचे सीढ़ियां उतरने लगा।
जागेश्वर:
जागेश्वर अल्मोड़ा से लगभग ३५ किलोमीटर दूर है। शिवजी की आस्था के बहुत से मन्दिरों से सुशोभित स्थान( एक स्थान पर लगभग २२४ छोटे,बड़े मन्दिर हैं)। ये कत्यूरी और चन्द राजाओं द्वारा निर्मित और संरक्षित हुआ करते थे। मान्यता है कि यहाँ जो माँगा जाता था, वह घटित हो जाया करता था। कुछ लोगों द्वारा इसका दुरुपयोग करने पर इस शक्ति को परोपकारी बना दिया गया,शायद जगदगुरु शंकराचार्य द्वारा। विशिष्ट सौन्दर्य से घिरे ये मन्दिर और स्थल मन को मोह लेते हैं।

रेट व् टिपण्णी करें

सबसे पहले टिपण्णी लिखें