उजाले की ओर----संस्मरण Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

उजाले की ओर----संस्मरण

उजाले की ओर ----संस्मरण

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स्नेही मित्रों

नमस्कार

'जीवन एक पहेली सजनी,जितना सुलझाओ वह उलझे ,है रहस्यमय कितनी !!'

इन पंक्तियों की रचयिता हैं --

'स्व. श्रीमती दयावती शास्त्री'

मेरी माँ का नाम है | जब छोटी थी तब उनकी लिखी हुई बातें या तो समझ नहीं आती थीं अथवा ध्यान भी नहीं देती हूंगी |

दरअसल ,जब तक हमारे पास कोई होता है तब तक उसका मूल्य हमें पता ही नहीं चलता |

हाँ,जब वह नहीं रहता तब उसकी बातें स्मृति खंगालती भी हैं और हमें याद भी आती हैं |

हम उनकी कही गई बातों को समझने का प्रयत्न भी करते हैं और जब समझने लगते हैं तब अफ़सोस भी करते हैं कि आख़िर हम क्यों उन बातों को समझ नहीं पाए ?

रक्त,मज्जा से परे जो संवेदना है ,वह कितनी महत्वपूर्ण है ,इसको बड़ी देर मेन समझते हैं हम |

जब मन के किसी कोने में से रुदन आँखों के सहारे बहने लगता है तब हमें अपने से बिछुड़े हुओं की याद दिलाता है |

तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है | हम हवा में हाथ पसारते रह जाते हैं और इच्छित वस्तु हमारे से कहीं बहुत दूर चली जाती है |

जीवन चलने का नाम है ,रुका हुआ जीवन थमे हुए पानी की भाँति दुर्गंध फैलाकर हमें नाख़ुश करता रहता है |

इसीलिए चरेवेति चरेवेति --चलते रहें ,उन लोगों को ,उनकी बातों को समझकर चलते रहें जो जीवन में हमें कुछ न कुछ समझाती हैं |

वास्तव में समय तथा समझ दोनों एकसाथ बहुत कम लोगों को ही मिल पाते हैं | जब समय होता है तब हमें वे बातें समझ नहीं आतीं जो जीवन के बहुत करीब व महत्वपूर्ण हों|

और जब समझ आती है तब वह समय हमारे हाथ से छिटक गया होता है ,बेशक हम अपनी स्मृतियों के घोड़े कितने भी पीछे दौड़ा लें

लेकिन वह बात नहीं आ पाती जो उस समय आती जब हमारे सामने हमें समझने -समझाने वाला हो |

समय हमें फूल भी देता है,काँटे भी ! हमें समझ भी देता है ,नासमझी भी --हम कहीं न कहीं नासमझी कर ही बैठते हैं |

और इस प्रकार हमारा बहुमूल्य समय हमसे छिटककर दूर चला जाता है |

बेहतर है कि समय रहते हम उन बातों को समझने की चेष्टा तो करें और न समझ में आए तो हमारे पास समझने वाले होते हैं ,

उनसे समझने का प्रयास कर सकते हैं किन्तु समय के निकल जाने पर हम हाथ मलते रह जाते हैं |

पिछले वर्षों में बहुत कुछ पीड़ादायक हो गया | सच में ,पहेली सा ही है जीवन ! इसे सुलझाने की चेष्टा करे बिना इसे समय रहते समझ लें,

इसके साथ बह लें।इसके लिए नियमों का पालन कर तो जीना आसान हो जाए |

चलिए मित्रों ! इस नए वर्ष में समय व समझ की दूरी नापें और केवल आशा ही नहीं विश्वास करें कि इस वर्ष जीवन एक नवीन परिधान से सुसज्जित होकर

पूरे विश्व में शांति -स्वास्थ्य,स्मृद्धि बरसाएगा | हम सब मनोव्यथा से मुक्त होंगे और ज़िंदगी एक नए सिरे से ,नव-प्रकाश लेकर आएगी |

सभी मित्रों को नव-वर्ष की शुभेच्छाएँ

मिलते हैं नई भोर में ,

कुछ न मिलेगा

गुज़रते शोर में !!

सस्नेह

डॉ. प्रणव भारती

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Pranava Bharti

Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 5 महीना पहले