अनोखी दुल्हन - ( इतिहास ) 40 Veena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

अनोखी दुल्हन - ( इतिहास ) 40

" तो आखिर में मैंने यही तय किया। तुम्हारे लिए मैंने वह फैसला लिया।" यह वह लब्ज़ थे जो वीर प्रताप के मुंह से निकले। जब वह जूही को डिनर के लिए बाहर ले गया था।

उस दिन से लेकर अगले दिन शाम तक वीर प्रताप अपने कमरे से बाहर नहीं निकला ‌‌। वीर प्रताप ने जो कहा उसके बारे में सोच जूही बेचैन सी हो रही थी। अपनी बेचैनी को दूर करने के लिए। आखिरकार शाम के वक्त उसने वीर प्रताप के कमरे का दरवाजा खटखटाया। वीर प्रताप को पता था कि जूही दरवाजे के बाहर खड़ी है। फिर भी तब उसे दरवाजा खोलना जरूरी नहीं लगा। कुछ देर बाहर खड़ी रहने के बाद जूही वहां से चली गई। जैसे ही उसके कदमों की आहट बंद हूई, वीर प्रताप को एक अजीब सी बेचैनी सताने लगी। उसने आखिरकार अपने कमरे का दरवाजा खोला। लिविंग रूम के बाहर बने छोटे से गार्डन में जूही अकेली खड़ी थी। वीर प्रताप उसके सामने जाकर खड़ा रह गया।

" मैंने तय कर लिया है। इस तलवार को निकालो। अभी।" उसने जूही से कहा।

" तो क्या यह वह फैसला है। जिसके बारे में तुम कल बात कर रहे थे ?" जूही ने पूछा।

" देखो। तुम्हे कल भी इस तलवार को तो निकालना ही है। तो क्यों ना तुम आज ही है ए काम कर दो ?" वीर प्रताप ने जूही से कहा।

" तुम्हें इतनी जल्दी क्यों हैं ? सवालो से भरे अपने दिल की तसल्ली के लिए अभी कुछ देर पहले मैंने तुम्हारा दरवाजा खटखटाया था। तब तो तुम ने दरवाजा नहीं खोला तो अब क्यों ? " जूही ने वीर प्रताप से पूछा।

" अब मैं सामने खड़ा हूं। लो अब कर लो तसल्ली। सवालों को छोड़ो। और जिस काम के लिए तुम्हें चुना गया है उसे पूरा करो।" वह दोनों पलक झपकाए बिना एक दूसरे को देखे जा रहे थे।

" जब तक मेरी रिसर्च पूरी नहीं हो जाती। मैं तुम्हारी तलवार निकालने वाली नहीं हूं।" जूही ने वीर प्रताप से एक कदम दूर होते हुए कहा।

" किस तरह की रिसर्च ? और उस से मेरा क्या संबंध है ? " वीर प्रताप ने एक कदम जूही की तरफ आगे बढ़ाते हुए पूछा।

" मैंने तुम्हारे बारे में सर्च किया। लेकिन पूरी हिस्ट्री में तुम्हारे नाम और काम के अलावा। तुम्हारे बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसा लग रहा है। मानो किसी ने जानबूझकर उसे मिटाया हो। मुझे कुछ और वक्त चाहिए तुम्हारे बारे में जानने-समझने के लिए।" जूही ने कहा। " सोचो अगर भगवान ने तुम्हारे सीने में यह तलवार एक सजा के रूप में दी हो तो ? मेरा इसे निकालना गलत होगा। इसीलिए जब तक तुम्हारे बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल जाती। मैं इस काम को नहीं करूंगी।"

" सही कहा। एक सजा।" वीर प्रताप को लड़ाइयों में उसने किया हुआ नरसंहार याद आ गया।" हमारे इतिहास में मेरे लिए कोई जगह नहीं है। क्या जानना है तुम्हें मेरे बारे में ? मुझसे पूछो मैं बताऊंगा।" वीर प्रताप ने जूही से कहा।

" गूगल के मुताबिक तुम तुम्हारी सद्दी के सेनापति थे। तुमने कहा था तुम्हारे किसी अपने ने इस तलवार को तुम्हारे सीने में मारा। एक सेनापति के लिए उसके राजा से कीमती और जरूरी कोई नहीं होता। तो बताओ तुम से ऐसी क्या गलती हुई जो तुम्हारे राजा को यह कदम उठाना पड़ा ? क्या तुमने लालच के चलते अपने राजा से बगावत की ?" जूही अपने हर सवाल के साथ वीर प्रताप पर के चेहरे पर बदलती हुई भावनाओं को देख रही थी।

वीर प्रताप की आंखें पूरी तरीके से लाल थी। मानो वह कितने दिनों से सोया ना हो। " हां बगावत। बगावत तो हुई थी। शायद मैं उसे रोक सकता था। पर मैंने रोका नहीं। मेरे आगे बढ़ते हुए हर कदम पर कई मासूमों की जानें गई।" वीर प्रताप की आंखों के सामने वह मंजर घूमने लगा‌। जब उसने राज्य में कदम रखा था और उसकी पूरी सेना को राजा के सिपाहियों ने मार डाला। जब उसने राजा की तरह कदम आगे बढ़ाया। उसे उसकी बहन के खून से होते हुए जाना पड़ा। उसने पहले ही अपनी तलवार छोड़ दी थी। लेकिन फिर भी उसके निर्दोष नौकरों की हत्या उसकी आंखों के सामने की गई और वह देखता रहा। सिर्फ देखता रहा। " मेरे किए हुए गुनाहों की सजा। मेरे अपनों को मिली। अगर किसी मरते हुए इंसान को वादा करना गुनाह है । तो हूं मैं गुनहगार। सेनापति के लिए उसके राजा से बढ़कर कोई नहीं होता और एक राजा के लिए उसकी प्रजा ही सर्वस्व होती है। सोचो अगर राजा ही उसकी प्रजा का दुश्मन बन जाए तो ऐसे वक्त सेनापति को क्या करना चाहिए ? मुझे जो सही लगा मैंने किया। मेरे एक निर्णय ने कई मासूमो की बली ले ली। और मुझे मिला तलवार का श्राप। माना मेरे सीने में तलवार एक सजा है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि 900 साल मेरी सजा पूरी होने के लिए काफी है ?" वीर प्रताप ने उम्मीद भरी नजरों से जूही को देखा।

जूही की आंखों में आंसू थे। उसने वीर प्रताप का हाथ पकड़ा। " नहीं। सोचो अगर तुम्हारे सीने में तलवार एक सजा होती। तो भगवान भला उस सज़का अंत क्यों बनाते ? भगवान किसी गुनहगार को शक्तियों का वरदान नहीं देंगे। जब मैंने तुमसे राजा को दगा देने के बारे में पूछा था। तब मैं बस इतना जानना चाहती थी, कि कहीं तुम राजा की किसी बीवी के प्यार में पागल तो नहीं हो गए थे। मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी बुरी यादों को तुम्हारे सामने रख दिया। मैं नहीं जानती तुम पहले क्या थे ? लेकिन आज जो इंसान मेरे सामने खड़ा है। वह कोई गुनहगार नहीं है। उसने कभी किसी मासूम का कत्ल नहीं किया। और मैं यह तुम्हें यकीन से कह सकती हूं कि, आज कोई है जो तुम्हारी परवाह करता है।" जूही की बातें सुन वीर प्रताप की आंखों में आंसू आ गए। जूही ने वीर प्रताप के आंसू अपने हाथों से पोछें।

मौके की गंभीरता को देखते हुए उसने फिर से बात छेड़ी। " मतलब तुम इस तलवार को निकाल कर। मुझे सुंदर बनाओगी ना ?"

" उसके लिए तुम्हें और सब्र करना पड़ेगा। याद है मैंने तुमसे कहा था इसके बदले में मुझे कुछ चाहिए। मैं चाहूंगी तुम उस पर गौर करो। फिलहाल मेरे काम पर जाने का वक्त हो गया है। मेरे वापस आने तक तुम सोच कर रखना कि तुम्हें क्या करना है ?" जूही वापस अपने कमरे की तरफ जाने लगी।

" अच्छा मुझे फिर से बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए ? पैसे जेवर या घर ?" वीर प्रताप ने सदमे से बाहर आते हुए कहा। " या फिर वह चीज जो तुमने होटल में मुझसे मांगी थी और मैंने कहा था कि मैं कर सकता हूं अगर तुम चाहो ?"

" क्या तुम प्यार की बात कर रहे हो ?" सिडियो पर खड़े होते हुए जूही ने वीर प्रताप से पूछा। जिसमें वीर प्रताप ने हां में सर हिलाया। " तुम एक बड़े से घर में, मुझे पैसे और जेवरों से सजाकर, प्यार करने के बारे में क्यों नहीं सोचते ?"

" अभी जाओ। अपने कमरे में। निकलो यहां से।" वीर प्रताप ने गुस्सा होते हुए कहा। वह कभी इस लड़की से बातों में जीत नहीं सकता।

दूसरी तरफ, राज और यमदूत एक शानदार गाड़ी में सनि के बताए होटल पहुंचे।

" वाओ यार। सामने तो देख। कितने खूबसूरत है। पता नहीं इन जैसे लड़कों को किस तरह की लड़कियां पसंद आती होगी ?" सनी की दोस्त ने राज और यमदूत को देखते हुए कहा।
सनी ने एक नजर दोनों पर डाली। उसे अपनी पसंद पर घमंड महसूस हो रहा था।


रेट व् टिपण्णी करें

Asha Saini

Asha Saini 7 महीना पहले

अगला भाग कब आएगा

Veena

Veena मातृभारती सत्यापित 7 महीना पहले

I have exams this entire month so the next part will be published next month. Sorry for inconvenience.

Sanker Saini

Sanker Saini 7 महीना पहले