अनोखी दुल्हन ( शुरुवात ) 1 Veena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अनोखी दुल्हन ( शुरुवात ) 1

कौन होगा जिसने अपनी पूरी जिंदगी में भूत पिशाच के बारे मे सुना ही नहीं होगा??? बोहोत कम लोग! नहीं उंगलीयो पर गिने इतने भी मुश्किल से मिलेंगे। पर क्या हो अगर किसी का वजूद ही एक पिशाच के लिए तैयार किया गया हो?????? क्या आप ऐसे किसी को जानते है?????? जानना चाहेंगे ???? तो चलिए उसकी कहानी शुरू करते है जिसका जन्म उसे मारने के लिए हुआ था जिसने उसे जीवनदान दिया।



वो अपने राज्य की सीमा पर खड़ा था। उसके आने की खबर से हर जगह खुशी सी छाई हुई थी, क्यो ना हो अब पूरी दुनिया में उनका राज जो था वो भी सिर्फ उस अकेले कि वजह से। सेनापति वीर प्रताप सिंग उर्फ उसके राज्य का स्कंद।
"दरवाजे खोल दो राजाजी को संदेश भेजिए सेनापति अपनी सेना लेकर आए है।" उसके सिपाही दीपराज ने द्वरपालो को आदेश दिया।

उसके आने का संदेश पहले से ही राजा तक पोहुच चुका था। राजा इस्तार मलिक, पिता अचानक आई मौत की वजह से अपनी छह साल की उम्र में ही महाराज बना दिए गए थे। उनके वजीर जहांगीर पाल उनके सबसे करीबी थे। उन्हे हमेशा से राज्य चाहिए था, इसीलिए अनगिनत साजिशे रच उन्होंने राजा की हत्या कर दी और उनके ६ साल के बेटे को नया महाराज बनाया गया। जिस के जरिए जहांगीर पाल पुरे राज्य पर राज कर सके।
पर बिस्तर मरहूम पड़े पहले महाराज ने भी अपने मरने से पहले वीर प्रताप सिंग से वचन लिया था, की वो अपनी छोटी बहन की शादी उनके बेटे इस्तार से कराएंगे और वो उनके राज्य की महारानी बनेगी। वीर प्रताप हमेशा उन दोनों की रक्षा करेंगे। अपने वचन मे बंधे वीर प्रताप ये जानने के बावजूद की अगर आज वो राज्य मे आए तो मार दिए जाएंगे, वहीं सीमा पर खड़े अगले आदेश का इंतेज़ार कर रहे थे।

तभी एक सिपाही आया, " वीर प्रताप तुम्हे अपना कवच और तलवार यही रख कर निरस्त्र अंदर आना है"

" मूर्ख। पता भी है तुम किस से बात कर रहे हो।" दीपराज उस सिपाही पर गुस्साए " एक सैनिक के लिए उसकी तलवार उस की इज्जत होती है। तुम्हारी इतनी हिम्मत ?"

"ये राज आदेश है, इसका पालन करने के बाद ही आप महल में अंदर जा सकते है। " सैनिक ने वीर प्रताप सिंग की ओर देख कर कहा।
दीपराज उसे मारने के लिए आगे बढ़े उस से पहले वीर प्रताप ने उसे रोक लिया और अपने हथयार उतारे फिर अपना कवच उतारा। उस के पीछे पीछे दीपराज उसके निष्ठा वान हर सैनिक ने अपना कवच और तलवार उतार दी। हर कोई अपने घुटनो पर था। जैसे ही वो लोग निरस्त्र हुए दरवाज़े के ऊपर से तिर पानी के बूंदों को तरह बरसे।
जंग लड़कर आया हर एक सैनिक मारा गया। वीर प्रताप मौन खड़े ये सब होते हुए देख रहे थे।

" मुझे आज्ञा कीजिए सेनापति अपनी तलवार से हर वो हाथ काट दूंगा जिसने हमारी सेना पर तिर चलाएं। यही वक्त है, राजा अपने घमंड में पागल हो चुका है। अब आपको विद्रोह पुकार राज्य को अपनी छाया मे लेना होगा। इस सेवक को आज्ञा दीजिए स्कंद। मुझे आपके आदेश का इंतेज़ार है।" दीपराज की आंखो मे आंसू थे जो किसी भी जलती आग से कम नहीं थे उन आंसू वोकी आग वहा डर की तरह हर किसी के चेहरे पर दिख रही थी।

वीर प्रताप ने अपनी तलवार उठाई लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी कोई भाव नहीं था। उसे पता था, अब आगे क्या होगा या यू कह लीजिए वो अभी भी अपने अंदर एक युद्ध लड़ रहा था अपने वचन और कर्तव्य के बीच। अगर वो वचन निभाएगा तो राज्य की जनता मुसीबत मे पड़ जाएगी और अगर वो कर्तव्य चुनता है, तो उसे खुद अपने हाथों से अपने बहनोई की मारना होगा। बचपन से जिस बहन को उसने आंसू वोसे बचाया एक तलवार के वार से उसे जिंदगी भर का गम कैसे दे सकता था वो??? और मरहूम राजा के जिस बेटे की रक्षा का वचन दिया था, जिस के जरिए राजा ने बेफिक्र हो अपने प्राण त्याग दिए थे, मरने के बाद वो उन्हे क्या मुंह दिखाता।

" गद्दार वीर प्रताप सिंग अभी अपनी तलवार....."
सा...... प उसने एक वार मे सामने खड़े राजा के सिपाही का सर उसके धड़ से अलग कर दिया।

उसके पीछे पीछे दीपराज ने तलवार उठाई और द्वारपाल के गले पर रखी, एक नजर वीर प्रताप को देखा और सा........ प फिर वही आवाज और एक ओर सर धड़ से अलग था।



स्कंद हिंदू पुराणों मे युद्ध के देवता को इस नाम से पुकारते है। वीर प्रताप की एक नजर ही काफी थी राज्य का दरवाज़ा खुला।