मे और महाराज - ( अंत_२) 37 Veena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

मे और महाराज - ( अंत_२) 37

समायरा ने धीरे से आंखे खोली। उसने अपने आप को एक नर्म बिस्तर पर पाया। वो उठ कर बैठी, अपने आस पास देखा।

हर तरफ सिर्फ सफेद रंग के पर्दे लगे हुए थे। ‘ क्या मैं स्वर्ग में हूं ? ’ उसने सोचा और बिस्तर पर से उठी। जैसे ही उसने जमीन पर कदम रखा उसे पैर में दर्द महसूस हुवा। ‘ मरने के बाद भी दर्द होता है क्या ?’ उसने अपने नन्हें दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ सूझ नही रहा था। बड़ी कोशिश कर वो खड़ी तो रही, लेकिन जैसेही उसने कदम आगे बढ़ाया, उसका बैलेंस बिगड़ा और वो मुंह के बल गिरने ही वाली थी। लेकिन पर्दो को पार कर सिराज उसके पास आया और उसने उसे थाम लिया।

" तुम ? क्या तुम भी मेरे साथ मर गए ?" समायरा ने उसे पूछा। सिराज ने बस अपनी आंखे घुमाई, भला इस सवाल को वो राजकुमारी की मासूमियत समझे, या बेवकूफी। " खैर रहने दो। मत जवाब दो।" उसने झट से सिराज को गले लगा लिया। " मैं खुश हू की तुम मर कर भी मेरे साथ हो।"

सिराज ने भी उसे कस कर गले लगाया। सिराज की शक्ल देख कोई भी बता देता के वो इस नादान लड़की से बेइंतहा प्यार करता है। उसने समायरा को अपने गोद में उठाया और बिस्तर पर लेटा दिया और खुद उसके पास बैठ गया।

" अब बताओ हम कहा है ? जिंदा है या मर गए है ?" समायरा ।

सिराज ने उसका नाक खींचा। " अब तो आपकी मूर्खता पे भी हमे प्यार आता है। हम दोनो जिन्दा है।"

" पर हम तो पहाड़ी पर से गिरे थे। तो हम मरे क्यों नहीं ?" समायरा।

" आप को क्या लगता है। आपका पति बिना कुछ सोचे समझे पहाड़ से नीचे गिर जाएगा ? " सिराज ने पूछा।

" मतलब ?" समायरा।

" हमने कहा था ना, आपको अच्छी सी जगह घुमाने ले जा रहे हैं। यहीं है वो जगह। पहाड़ के अंदर बना हुवा, गर्म पानी का तालाब।" इतना कह सिराज ने बिस्तर से सामने का पर्दा हटाया। पर्दा हटते ही, सामने खूबसूरत सा साफ जल था।

" वाउ।।।।। समायरा उसे देख खुश हो गई।" फिर उसने एक नजर सिराज पर डाली, उसे पहाड़ पर से गिरने के पहले की सारी बातें याद आ गई और उसका चेहरा शर्म से लाल पड़ने लगा।

" लगता है, तालाब देख किसी की याद्दाश्त लौट आई हैं।" सिराज ने समायरा को बिस्तर से सीधा अपनी गोद में बिठा लिया।

सिराज की ऐसी बेशर्म हरकतों से वो अच्छी तरह वाकीब थी। उसने अपने आप को संभाला। " तो इसका मतलब तुम्हे सब पता था फिर भी नाटक कर रहे थे ?" उसने नकली गुस्सा दिखाते हुए पूछा।

" नही। हमारा ऐसा कोई इरादा तो नही था। लेकिन जब हमने आपकी शिद्दत देखी तो थोड़ा मज़ाक कर लिया।" सिराज ने उसकी आंखों में आंखे डालते हुए कहा।

" अच्छा। वहा मेरी जान निकली जा रही थी के तुम्हे कही कुछ हो ना जाएं और तुम्हे मज़ाक सूझ रहा था।" समायरा ने उसे धीरे से पिटना शुरू किया।

" आप एक राजकुमार पर हाथ उठा रही हैं याद रखिएगा।" सिराज ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।

" क्या करोगे ? मुझे मार डालोगे चलो मारो। अभी यही।।।।" उसने उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा और फिर से सिराज को पिटना शुरू किया।

सिराज ने उसके दोनो हाथ पकड़े और उसे बिस्तर पर लेटा दिया। अब हालत इस तरह थी, के समायरा बिस्तर पर सोई हुई थी और सिराज उसके ऊपर था। पर अभी भी उसकी आखें समायरा के चेहरे पर अटकी थी। अब समायरा को इस पर सच में गुस्सा आ रहा था। उसने सिराज पर से नजरे हटाते हुए चेहरा घुमाया। सिराज ने अपने एक हाथ से उसका चेहरा पकड़ उसकी नजरे फिर अपनी तरफ की।
" हम अब जो कहने जा रहे हैं, उसे अच्छी तरह सुन लीजिए आप। क्योंकि हमे अपने आप को दौहराने की आदत नहीं है। जब तक हम जिंदा है, तब तक आपको भगवान भी हमसे अलग नही कर सकते। और जब तक आप जिंदा हैं, हम भगवान को हमसे आप को छीनने की इजाजत नहीं देंगे।"

समायरा की आंखों में आसूं थे। उस डाल पर आए वक्त के बारे में सोच अब भी उसकी रूह काप जाती है। क्यों उसे अपनी और सिराज की जिंदगी में से एक को चुनना पड़ा ? वो दोनो हर वक्त साथ क्यों नही रह सकते ?

" और अगर कभी वक्त मुझे तुम से दूर ले गया तो क्या करोगे ?" उसने सिराज से पूछा।

" उस वक्त को रोक दूंगा। या तो आपको वापस ले आवुंगा या फिर आपके पास रह जावूंगा। जुदाई कोई पर्याय नहीं है। हम साथ रहने के लिए बने है और साथ रहेंगे। ये इस सलतनत के आठवें राजकुमार का वादा है आपसे।" सिराज की ऐसी बाते सुन समायरा के लबों पे मुस्कान फिर से खिल गई। सिराज ने उसके आसूं पोछे। " और रही बात आपकी बदतमीजी की, तो आपको उसकी सजा मिलेगी।"

" ह..... अब आप मुझे सजा देंगे मेरे महाराज।" समायरा ने अपनी शरारती मुस्कान दिखाते हुए अपने निचले होठ को काटा। उसकी ऐसी हरकतों देख, सिराज उसका इशारा समझ गया।

" हा। आपकी हर हरकत की सजा मिलेगी।" उसने अपने होठ समायरा के होठों से मिला लिए।


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