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बस तुम खुद को पहचान लो

प्रिय मित्रों इस संसार में जो कुछ भी है वह सब हमारे अंदर निहित है सब कुछ हमारे अंदर है यह संसार तो मात्र प्रतिबिंब है जैसा हम देखते हैं जैसी हम दृष्टि रखते हैं यह संसार हमें वैसा ही दिखता है जैसा हम सोचते हैं हमारे साथ वैसा ही होता है जो हम मान लेते हैं वही वास्तविकता बन जाता है इसलिए कहा गया है की यह संसार हमारे आंतरिक संसार का प्रतिबिंब है इसलिए आवश्यकता है हम खुद को जाने हम खुद को पहचाने एक बार खुद को जान लेने के बाद संसार में किसी और को जानने की आवश्यकता नहीं रहती इसलिए हमें खुद को पहचान लेना चाहिए मित्रों यह कविता हमें बताती है कि खुद को पहचान लेना ही सबसे अच्छा ज्ञान है तो आइए मित्रों कविता शुरू करते हैं....


बस तुम खुद को पहचान लो
बस तुम खुद को पहचान लो
प्रतिबंध है दुनिया सारी बस इतना जान लो
बस तुम खुद को पहचान लो....

जैसी रखोगे दृष्टि वैसे ही दिखेगी सृष्टि
अज्ञान का पर्दा हटा कर सत्य ज्ञान को जान लो
बस तुम खुद को पहचान लो....

क्यों भटकते हो दुनिया में
बस खुद के अंदर झांक लो
परमेश्वर है अंदर तुम्हारे तुम उनकी शरण स्वीकार लो
बस तुम खुद को पहचान लो....

सारी मुश्किलें हट जाएंगी
सारी विपदा निकल जाएंगी
ना दुख तुम्हें छू पायेगा ना, सुख विचलित कर पाएगा
रहोगे स्थिर हर परिस्थिति में
बस इस भेद को जान लो
बस तुम खुद को पहचान लो....

बस कर्म करो फल की इच्छा त्याग दो
परिणाम तुम्हें अवश्य मिलेगा
केवल अपने कर्मों पर ध्यान दो
गीता के इस ज्ञान को अपनी आत्मा में स्थान दो
बस तुम खुद को पहचान लो....

जो सोचते हो वह कर सकते हो
जो चाहते हो वह पा सकते हो
अनंत शक्तियां है तुम्हारे अंदर
बस अपनी आत्मशक्ति को जान लो
बस तुम खुद को पहचान लो....

परमेश्वर है अंदर तुम्हारे
तुम उनमें विद्यमान हो
ईश्वर के अंश हो तुम इस बात से अनजान हो
अपने मन को शांत करके
बस खुद पर ध्यान दो

बस तुम खुद को पहचान लो
बस तुम खुद को पहचान लो...

प्रिय मित्रों इस कविता में बताया गया है कि ईश्वर हमारे अंदर हैं और हम सब ईश्वर में है हम सब भी जीव के अंदर ईश्वर हैं और ईश्वर में हम विद्वान हैं इसका अर्थ यह है कि वह सभी कुछ जो इस संसार में मौजूद है वह सब हमारे अंदर है हमारे अंदर अनंत शक्तियां हैं हम बस इससे अनजान हैं प्रकृति हमारे लिए सदैव देने के लिए तत्पर है हम वही हैं जो अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं और कहते हैं कि कितना अंधेरा है वास्तविकता में हमें खुद को पहचानने की आवश्यकता है खुद को पहचान लेने के बाद सारे अज्ञान के पर्दे स्वता ही खुल जाते हैं और सत्य ज्ञान का दर्शन होता है सत्य ज्ञान आत्म ज्ञान होता है और आत्मज्ञान ही परमात्मा होता है और परमात्मा को जान लेने के बाद और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता इसलिए मित्रों बस खुद को पहचानो बस खुद को पहचान लो
धन्यवाद

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