अनोखी दुल्हन - ( असलियत_४) 19 Veena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

अनोखी दुल्हन - ( असलियत_४) 19

जूही की आंटी और उसके कसिन को रिर्जव बैंक से सोना चुरा कर बेचने के जुर्म मे पुलिस ने पकड़ लिया। पुलिस स्टेशन मे जांच पड़ताल के दौरान उन लोगो को अपने नाम के अलावा और कुछ याद नहीं होने की वजह से चोरी और लूट के जुर्म की सजा मिली।

दूसरी तरफ यमदूत हॉस्पिटल मे अपनी ड्यूटी कर रहा था। तब उसे उसके और दोस्त मिले।

" आइए सर। कैसे है आप। बोहोत दिनो बाद।" उसके बैच के यमदूत ने पूछा।

" हम्म काम कैसा चल रहा है ? ये दोनो कौन है?" यमदूत।
" बैच २३ ग्रीम रीपर किम सर।
बैच २३ ग्रीम रीपर किम सर।" बाकी दो यमदूत ने खड़े होकर अपना परिचय दिया।

" बैठ जाओ। ये नए है अभी। सुनिए अगली फ्राइडे नाइट हमारा डिनर है। सभी इक्कठा हो रहे है। नए लड़को के स्वागत के लिए। आप भी जरूर आएगा। मैने सुना है, आपके पास कुछ गुमशुदा आत्माओकि यादि है। उसे भी इस फ्राइडे तक सबमिट करना है। तो में आपका इंतजार करूंगा।" यमदूत के दोस्त ने कहा।

" ठीक है। में अब काम पर चलता हु।" इतना कह वो अपनी जगह चला गया।


बस कुछ दिन ही हुए थे, उन्हे बिछड़े। अपनी जिंदगी मे ऐसी उदासी जूही ने कभी महसूस नहीं की। वो स्कूल की बेंच पर बेजान सी पड़ी थी। तो कही कोई अपने डाइनिंग टेबल पर पड़े पड़े घड़ी की और देख रहा था। उस दिन वो मुस्कुराया था, क्यो की तब वो उस के साथ जो था। वीर प्रताप को अब कुछ भी अच्छा नही लग रहा था।

जूही कुछ याद करते हुए स्कूल से सीधा बड़ी लाइब्रेरी भागी। उसने हर जगह, हर रैक को ढूंढा। पर वो किताब कही नही थी, जिसमे जूही ने उस पत्ती को रख दिया था। तभी उसने रिसेप्शन पर किसी को झगड़ा करते सुना।

" देखिए में किताब ले कर गया था। किसी की याद नही। ये लैमिनेट किया हुवा पत्ता उस किताब से निकला है। मुझे मेरे पैसे वापस दीजिए। किसी और की याद भला में क्यों लूं???"

" देखिए सर हम बिना बिल के रिफंड नही दे सकते।" रिसेप्शन पर खड़ी लड़की ने उस लड़के से कहा।

" एक्सक्यूज मि। वो मेरी किताब है।" जूही ने उस लड़के से कहा।

अपने डिजाइनर टी शर्ट और जीन्स में गॉगल्स लगाया हुवा वो लड़का जूही की तरफ मुड़ा।

" में कैसे मानलू ये तुम्हारी है??? बताओ ये पत्ती कहा से आई है बच्ची?" राज ने नाराजगी भरी नजरो से जूही से पूछा।

" में बता भी दू, तो आप यकीन नही करेंगे। क्यों ना ये किताब आप मुझे बेच दे ??" जूही ने कहा।

" बिल्कुल सही।" राज उसके साथ लाइब्रेरी के एक बेंच पर बैठा। जूही उस किताब को देख रही थी, उसने उस पत्ती को हर तरफ से देखा। और एक प्यारी सी मुस्कान जूही के चेहरे पर बिखर गई।

" तुम्हे ये सब छोड़ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। उम्र क्या होगी तुम्हारी?? ये किताब क्यो पढ़ रही थी???" राज ने पूछा।

" वो ये रिसर्च के लिए थी। आपने इसे क्यों खरीदा???" जूही।

" में एक पिशाच को जानता हू। उसी के लिए ली थी।" राज।

जूही उसे अजीब नजरो से घूरने लगी। " क्या हुवा, सहि तो कहा ना मैने। हर इंसान अपनी पूरी जिंदगी मे एक बार तो किसी भूत से मिलता ही है।" राज

" हा सही।" जूही।

" तुम ना हर किसी पर भरोसा मत कर लेना। कोई तुमसे लोन मांगे तो मना कर देना। साथ चलने को कहे तो भाग जाना। कुछ खाने को दे, तो चिल्लाना। समझी। अब लाओ मेरे १०० रूपये।" राज ने हाथ आगे किया।

" अब तो ये किताब पुरानी हो गई ना। ८० रुपए।" जूही ने उस से मोलभाव करने की कोशिश की।

" नही । पूरे १००। अभी।" राज उस से वो पैसे लेकर जाने के लिए खड़ा हुवा। " सुनो, हर कोई इस दुनिया मे किसी मकसद के साथ आया है। तुम्हारे हाथो मे जरूरी काम है। उसे जल्द से जल्द पूरा करो ताकी तुम्हे सजा ना मिले।" इतना कह वो लाइब्रेरी से बाहर निकल गया। लाल ड्रेस पहने वो खूबसूरत लड़की जो अक्सर जूही को मिलती रहती है, कार मे बैठ राज का इंतजार कर रही थी।

" बोहोत देर लगा दी तुमने।" उसने राज से पूछा।

" ये इंसान , इनके जितना पास जाओ। उतने पसंद आने लगते है। पता नही तुम कैसे इतने सालो से इनके साथ हो रोजी।" राज ने कहा।

" जल्दी चलो कोई और भी बेसब्री से तुम्हारी राह देख रहा है।" रोजी ने मुस्कुराते हुए कहा।

" अंकल । अंकल। कहा है आप???" लाइब्रेरी से राज सीधा घर आया। पर घर मे खड़े अनचाहे मेहमान को देख डर गया। दूसरी तरह यमदूत पहले ही सर झुकाएं वहा खड़ा था।

" अरे दादाजी। आप कब आए?? कुछ काम था, तो मुझे बता देते। आप ने तकलीफ क्यो उठाई।" राज ने उनके पास जाने की कोशिश की।

मिस्टर कपूर पहले ही गुस्से मे थे, राज को देख आगे की सारी बात समझ गए। " में बस महाराज के कपड़े देने आया था। तब इनसे मुलाकात हुई। बताओगे ये कौन है और यहां क्या कर रहे हैं???"

" ये अंकल के करीबी दोस्त है। वो अंकल कैनेडा वापस जा रहे हैं ना इसलिए मिलने आए है। हैं ना??" राज के कहने पर यमदूत ने बस अपनी गर्दन हिलाई। तभी वीर प्रताप अपने कमरे से बाहर आया। " अंकल आपके दोस्त आए है। आपसे मिलने।"

" ये मेरा कोई दोस्त नहीं है। हमारी बिल्कुल नही जमती। घर से जा सकते हो। और तुम। तुम भी अपना सामान बांधो और मेरे घर से निकलो।" वीर प्रताप ने राज से कहा।

राज और यमदूत दोनो, घर के बाहर सीडियो पर राज के दादाजी के जाने का इंतजार कर रहे थे।

" वो मुझे घर से बाहर कैसे निकाल सकते है? में इकलौता वारिस हु उनका। अगर मेरे असली अंकल होंगे तो कभी ऐसा नहीं करेंगे।" राज ने कहा।

" ऐसा ना हो तो ही अच्छा है। वरना तुम्हे में अपने साथ ले जावूंगा। याद रखना।" यमदूत ने गुस्से में सारी सीढ़िया बर्फ मे जमा दी। तभी घर का दरवाजा खुला।

" अंदर आओ।" वीर प्रताप ने यमदूत को देखते हुए कहा।

" बिल्कुल नही। आप को क्या लगता है? आप जब चाहे हमे निकाल देंगे, जब चाहे वापस बुला लेंगे। हम कौन है?" राज ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा।

" तुम्हे कौन बुला रहा है। तुम घर जाओ और डाट खाओ। तुम यमदूत । तुम अंदर आओ। यमदूत जीरो पिशाच का हुवा १ पॉइंट।" वीर प्रताप ने उसे चिढ़ाते हुए कहा।

" डाट खाओ। मतलब आपने दादाजी को सब बता दिया। किस तरह के अंकल है आप?" राज।

" घर किराए पर देने से पहले पूछा था। अब भुगतो अपने कर्मो की सजा।" वीर प्रताप ने दरवाजा बंद कर दिया।

यमदूत भी गायब हो कर सीधा अपने कमरे मे पोहचा। अपना स्कोर बराबर करने के लिए यमदूत ने शुभ रात्रि का मैसेज और अंक १:१ एक कपड़े पर लिख वीर प्रताप के बाथरूम के बाहर छोड़ दिया जब वो अंदर था। ये मैसेज उसने घोड़े के खून से लिखा था जिस के वजह से वीर प्रताप पूरी रात उस बाथरूम मे तड़पता रहा।

दिन बीत रहे थे। दोस्तो की शरारतों मे, और किसी के बुलावे के इंतेजार मे। १५ दिन हो चुके थे, अब तक उसका बुलावा नही आया था, दिल मे कुछ खाली खाली लग रहा था। वीर प्रताप अपनी लाइब्रेरी मे किताबो के बीच अपनी मायूसी दूर करने की कोशिश कर रहा था। तभी अचानक उसके हाथ से धुआं उठा। इतने दिनो बाद आखिरकार उस प्यारी सी मुस्कान ने फिर से उसके चेहरे पर जगह ली। बस १ मिनिट के भीतर वो जूही के पीछे खड़ा था।

जूही ने उलझन से उसे देखा। " क्या तुम किताब पढ़ रहे हो???"
" हा । पढ़ रहा था। बताओ क्यो बुलाया मुझे???" वीर प्रताप ने पूछा।

" मैने नही बुलाया। में मछली सेक रही थी, तब उसमे आग लग गई। उसे बुझाने के लिए फुक मारी और..." जूही की बाते सुन वीर प्रताप जाने के लिए पिछे मुड़ा।

" अरे सुनो..." जूही।

" देखा। हर बार ऐसा ही करती हो। पहले भेज देती हो, जब चला जाता हूं तो रोकने आती हो। अब बताओ, क्या हुआ?" वीर प्रताप।

" नही। तुम हमेशा ऐसा करते हो। कभी इंतेजार नही करते, मुझे छोड़ कर चले जाते हो।" जूही।

" में सामने खड़ा हु। अब बताओ। क्या हुवा???" वीर प्रताप।

" अब तक गए क्यो नही??" जूही।

इसे मुझे भेजने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है। वीर प्रताप ने सोचा, " जा ही रहा हूं। अभी मेरी किताबो की पैकिंग चल रही है। ये बोहोत जरूरी होती है।"

" अच्छा। तो मुझे बताओ? तुम मे मुझे क्या देखना चाहिए जिस से में तुम्हारे काम आ सकू। चलो कोई हिंट तो दो।" जूही।

" ठीक है। ध्यान से देखो, कुछ ऐसा जिस से दर्द हो । बोहोत दर्द। कुछ दिखा।" वीर प्रताप।

" अच्छा। वो।" जूही ने उसे देखा फिर यहां वहा देखते हुए कहा।

" कुछ दिखा क्या तुम्हे?? बताओ क्या दिखा???" वीर प्रताप।

" कुछ नही। वो मुझे ना बोहोत काम है। में चलती हू।" जूही।

" अरे रुको। पहले बताओ क्या दिखा।" वीर प्रताप ने उसे रोकते हुए कहा।

" वो मुझे बोहोत भूख लगी है। पाच हजार मिल जाते तो में कुछ खा पीकर बात करने लायक हो जाती।" जूही।

" बोहोत काम था ना तुम्हे??? जाओ निकलो यहां से।" वीर प्रताप ने उसे धक्का देते हुए कहा।

" अच्छा अच्छा। सिर्फ लंच भी चलेगा। बताने के लिए।" जूही दौड़ते हुए वीर प्रताप के पीछे चलने लगी।

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