मेरी पगली...मेरी हमसफ़र - 7 Apoorva Singh द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

मेरी पगली...मेरी हमसफ़र - 7

अर्पिता ठोकर लगने के कारण गिर चुकी थी।वो गोली उसके सामने आ रही उसकी मासी बीना जी को लगी।ये देख मैं परेशान हो गया था।मैं जल्द से जल्द उनके पास पहुंचना चाहता था लेकिन पहुंच नही पाया क्योंकि वो दोनो हाइवे से थोड़ा दूर थी।बाइक के जरिये वहां तक पहुंचने में मुझे दिक्कत हो रही थी लेकिन फिर भी मैंने उनके पास पहुंचने की कोशिश की।

गोली की आवाज सुन अर्पिता ने अपने पीछे मुड़ कर देखा तो पाया वो चारो वही इकट्ठे होकर उस पर फिर से निशाना लगा रहे थे।लेकिन इस बार एक चमकीली रोशनी के कारण वो निशाना नही लगा पाये।वो रोशनी आ कहां से रही है ये जानने के लिए मैंने अपनी नजरे दौड़ायी।तो पाया कि वो रोशनी वहीं उनसे कुछ दूर खड़े एक लड़के के द्वारा उनके ऊपर फेंकी जा रही थी।उसे देख ख्याल आया 'शायद वो शिव है'कुछ देर पहले ही अर्पिता ने उसका नाम लिया था और सॉरी कहते हुए वहां से निकली थी।और उस पल वो अर्पिता की मदद कर रहा था।उससे दूर होने की वजह से मैं उसे साफ साफ देख नही पाया।लेकिन उसका हाथ से रोशनी आती देख मैंने अनुमान लगा लिया कि उसके हाथ में एक घड़ी थी जिसके शीशे की वजह से ज्यादा न सही लेकिन इतनी रोशनी तो निकल रही थी जिससे उस बंदे की आँखे इतनी तो चौंधिया जाये कि उसका निशाना चूक जाये।वही हो रहा था वहां।

अर्पिता धीरे धीरे उठी और दौड़ती हुई बीना जी के पास गयी जो धीरे धीरे नीचे बैठ रही थी।अर्पिता ने देखा तो उनके पास बैठ उन्हें पुकारने लगी।उसकी आवाज मे दर्द मुझे समझ आ रहा था।उसकी तकलीफ मुझे महसूस हो रही थी।वो और किरण उन्हें बेतहाशा पुकार रही थीं लेकिन वो जवाब देने की जगह खामोश होती जा रही थीं।बहते खून के कारण उनके वस्त्र खराब हो चुके थे।अर्पिता उन्हें हॉस्पिटल ले चलने के लिये कहने लगी।अचानक हुए इस हादसे से किरण कुछ समझ ही नही पा रही थी।क्या करे वो क्या कहे।
इतनी देर में मैं भी वहां पहुंच गया।मेरे पास बाइक थी।तुरन्त ही मैं उसे वहीं खड़ी कर आगे बढ़ा और उसकी मासी को उठा कर अपने साथ लाई बाइक पर बैठाया।अर्पिता उन्हें पकड़े हुए थी।उसने एक नजर उसने मेरी ओर देखा उस समय उसकी आँखे नम थी जो उम्मीदों से भरी हुई थी।उन्हें देख मैं उससे कुछ भी कह नही पाया बस अपनी पलके झपका उसे सब सही होने का आश्वासन ही दे सका।किरण की ओर देखा।और उसे बैठ कर बीना जी को सम्हालने के लिए कहा।उसके बैठते ही मैंने उन चारो की ओर देख अर्पिता की ओर देखा उससे कहने को हुआ अपना ध्यान रखना उससे पहले ही वो बोली, 'हम अपना ध्यान रख सकते है आप मासी को लेकर जाइये प्लीज!' उसकी बात सुन मैं उसकी मासी को लेकर वहां से निकल आया।अर्पिता वहां से दौडते हुए हाइवे पर पहुंची और ऑटो रुकवाने लगी।कुछ देर तक खड़े रहने पर जब ऑटो नही रुका तो बडबडाते हुए कहने लगी,'मतलब जब तक टेढा तरीका न् आजमाओ कोई काम नही आता।'जिसे सुन मैं समझ गया वो कुछ टेढ़ा तरीका आजमाने जा रही थी।उसके टेढ़े तरीके उसके ही अंदाज की तरह होंगे।बाइक चलाते हुए मैं उसकी हर बात पर ध्यान देने लगा।कुछ ही देर में मुझे ऑटो रुकने के साथ कुछ आवाज और सुनाई दी जो कुछ यूँ थी -

'अरे ! अरे! मैडम ये क्या बदतमीजी है।ये ऑटो मैं अभी सवारियों के लिए नही ले कर जा रहा हूँ।मुझे सामान का ऑर्डर मिला है वही लेने जा रहा हूँ आप नीचे उतरिये अभी के अभी उतरिये।ऑटो वाले ने उससे चिल्ला कर कहा।उसकी आवाज में झल्लाहट थी। तो वहीं मेरे मन मे हैरानी।अर्पिता ने कहा -आपका ऑर्डर किसी की जान से ज्यादा कीमती तो नही है ना।आप वो उधर देखिये वो जो कुछ दूर चार पांच लोग आपस में लड़ झगड़ रहे है वो सभी किडनैपर है।हम इनसे ही पीछा छुड़ा कर भाग रहे है।अब आप ठहरे लखनऊ वासी इसिलिये हमने आपका ऑटो इस तरह रुकवा लिया।काहे कि हमने सुना है लखनऊ वासी दिल से बहुत अमीर है।"अतिथि देवो भवः" हर लखनऊ वासी की रगो में लहू के साथ साथ बहता है।प्लीज प्लीज हमारी मदद कर दीजिये।' अर्पिता ने ऐसी पट्टी पढ़ाई कि उसकी बाते सुन ऑटो ड्राइवर भी भावुक हो बोला 'ये तो आपने बिल्कुल सही कहा।हमारा लखनऊ जाना ही इसीलिये जाता है।मैं जरूर आपकी मदद करूँगा' कह ऑटो ड्राइवर ने अपनी ऑटो सड़क पर दौड़ा दी।उसकी बातो को सुन मैं मन ही मन बोला !ये है क्या अपनी बातों में तो ये ऐसे उलझाती है कि बिन इसकी बात माने कोई रह ही न पाये।क्या पट्टी पढ़ा दी दो मिनट में इसने।मान गया मैं सही नाम दिया उन लड़को ने इसे 'तीखी छुरी'।

उसकी मासी को साथ ले मैं कुछ ही देर में नजदीकी हॉस्पिटल पहुंचा।वो हॉस्पिटल वहां का सबसे नजदीकी था।वहां जाकर मैंने डॉक्टर को आवाज लगाई।आवाज सुन रिसेप्शन पर मौजूद डॉक्टर नर्स सबने मेरी ओर देखा और तुरंत दौड़ते चले आये।उसकी मासी की कंडीशन देख उन्हें तुरंत ही ओटी में भेज दिया।मैं और किरण वहीं सब सही होगा इसी उम्मीद के साथ ओटी से बाहर खड़े हो गये।किरण बहुत परेशान थी उसके आंसू ही नही रुक रहे थे, वो उसकी मां थी उसकी और एक मां के बिन जिंदगी,जिंदगी कहां होती है वो तो बोझ लगने लगती है।वो लगातार रोये जा रही थी। उसका रोना मुझसे देखा नही जा रहा था।लेकिन मैं कुछ कर नही सकता था।कुछ देर में मुझे इयरफोन से ऑटो के रुकने का स्वर सुनाई दिया।' शायद अर्पिता बाहर आ चुकी है'सुनकर मैंने मन ही मन कहा!फोन कट चुका था।वो हॉस्पिटल के अंदर चली आयी।उसकी आँखे भरी थी जिन्हें देख लग रहा था वो बस किसी तरह खुद को रोके हुए थी।उसका चेहरा पूरी तरह निस्तेज!वो आकर किरण के पास खड़ी हो गयी।उसने बिन दिर किये उसे गले लगा लिया।उसकी आंखों मे भरे मोती झरने लगे।वो किरण को हिम्मत देते हुए बोली 'किरण सब ठीक होगा,मासी भी जल्द ठीक हो जाएंगी तुम परेशान मत होना।'कहते कहते वो और ज्यादा भावुक हो गयी थी।उसे परेशान देख मैं खुद ही और ज्यादा परेशान हो गया।मैं उस समय खुद को बहुत असहाय महसूस कर रहा था।मुझे समझ नही आ रहा था कि मैं किन शब्दो में दोनो को सांत्वना दूँ।क्या कहूँ उनसे कि दोनो शांत हो जाये और हिम्मत रख सब सही होने का इंतजार करे।मैं धीरे धीरे अर्पिता और किरण के पास आ गया और उनसे कुछ बोलने की कोशिश करते हुए बोला, समय कठिन है किरण! हिम्मत से काम लेना होगा।सब ठीक होगा।मेरी बात सुन बात अर्पिता ने मेरी ओर देखा और हल्की सी गर्दन हिलाते हुए बोली हां।किरण से कहा- किरण सब सही होगा हमे बस मासी के स्वस्थ होकर घर लौटने का इंतजार करना है।उसकी बात सुन किरण ने सरसरी नजरो से अर्पिता की ओर देखा और वहां से ओटी के सामने जाकर खड़ी हो गयी।हम दोनो ही उसकी मन स्थिति समझ रहे थे मन भारी हो रखा था और नजरे बस ओटी के दरवाजे पर बिछी बैठी थी।लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।कुछ ही सेकण्ड बाद अपना उदास चेहरा लिए डॉक्टर ओटी से बाहर निकले।उनके चेहरे को देख अर्पिता और किरण दोनो के साथ साथ मेरी भी लधड़कने बढ़ गयी।डॉक्टर मेरे पास चले आये और न में गरदन हिला कर वहां से चले गये।मैं अवाक रह गया!एक पल में क्या से क्या हो चुका था।उस हादसे ने उसकी मासी को छीन लिया। किरण ने ये देखा तो एक दम से चीख पड़ी।अर्पिता उसे सम्हालने की कोशिश करने लगी लेकिन नही कर पाई।दर्द तो उसे भी मिला दर्द में वो भी थी लेकि कोशिश कर रही थी।किरण वो तो बचपन से उनके साथ ही तो थी उसकी पूरी दुनिया वही थी।

डॉक्टर्स जवाब दे चुके थे किसी न किसी को आगे कार्यवाही करनी ही थी अर्पिता और किरण दोनो इस हालत में नही थी किसी और चीज पर ध्यान देती।मैं वहां से रिसेप्शन पर चला आया और सारी औपचारिकता पूरी करने लगा।हॉस्पिटल में कार्य करने वाले कर्मचारीयों ने उसकी मासी के पार्थिव शरीर को ले जाकर एम्बुलेंस में रख दिया।अर्पिता जैसे तैसे किरण को बुलाकर अपने साथ ले आई। एम्बुलेंस बीना जी के शरीर को लेकर लखनऊ में स्थित उनके घर पहुंचा आई।मैं भी उनके साथ ही उनके घर जाने के लिए निकल गया था।वहां पहुंच मैंने बड़ी मां को कॉल किया और इन्हें इस घटना के बारे में बताया।

उसकी दादी ये दृश्य देख चीख पड़ी थी।पूरे घर में रोने चीखने की अवाजे सुनाई देने लगी।हेमंत जी आरव घर में नही थे उन्हें भी फोन करके घर आने को कह दिया गया।मेरी आँखे भीग रही थी सो मैं वहां से बाहर आकर खड़ा हो गया।धीरे धीरे सुबह हो गयी घर से बड़ी मां और बड़े पापा भी आ गये।बीना जी का अंतिम संस्कार कर सभी एक एक कर वहां से वापस चले गये।मैं भी न चाहते हुए बड़ी माँ और ताऊजी के साथ वहां से चला आया।बड़ी मां और ताऊजी दोनो वहां से घर के लिए निकल गये और मैं परिवर्तन चौक पर जाकर बैठ गया।मन भरा होने के कारण ऑफिस जाने का मन नही कर रहा था सो वहीं चुपचाप बैठा रहा।मन में कई ख्याल उत्पात मचा रहे थे।रह रह कर अर्पिता की वो भीगी आँखे मुझे बैचेन कर रही थी।किरण का जार जार रोना मेरे कानो में गूंज रहा था।न जाने अप्पू कैसे सब सम्हाल रही होगी।किरण आरव दोनो कैसे खुद को सांत्वना दे रहे होंगे।सोच सोच कर ही जी हलकान हुआ जा रहा था मेरा।लेकिन जीवन सोचने से कहां कटता है उसके लिए तो अनवरत संघर्ष करना ही पड़ता है।

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हां पापा!जीवन कभी नही रुकता!प्रीत ने अपनी बरसती हुई आँखे पोंछते हुए कहा।मम्मा!आपका दर्द आपकी तकलीफ अब मैं बहुत अच्छे से समझ सकता हूँ क्योंकि अब आप भी तो मेरे पास होकर भी नही हो न।लव यू मम्मा!अब मैं इसे कुछ देर बाद पढूंगा मन बहुत भावुक हो गया है।कहते हुए प्रीत ने वो डायरी उठा कर वहीं पिलो के नीचे रख दी और खिड़की पर खड़े हो उस मीठी आवाज को सुनने लगा जो अर्पिता के लगाये हुए हवा के जोर से बजने वाली एक सुन्दर सी लड़ियों से आ रही थी।वो वहां खड़े हुए दूर तलक नभ में फैले शून्य की ओर ताकने लगा।तानी की पुकार से उसकी सोच टूटी और वो तुरंत वहां से बाथरूम में भागा।इस डर से कही तानी उसकी आँखे न पढ़ ले। 'भाई, कहां है आप!'तानी ने कमरे के अंदर आते हुए प्रीत को आवाज दी।उसने अंदर आते हुए एक नजर पूरे कमरे पर डाली।बाथरूम से पानी बहने की आवाज आ रही थी जिसे सुन वो बड़बड़ाई, 'तो आप अंदर है भाई!हम आपके आने का यहीं वेट करते हैं।' सोचते हुए वो वहीं शान के पोस्टर के पास जाकर खड़ी हो उन्हें देखने लगी।आँखे और चेहरा पूरी तरह धुल कर प्रीत भी टॉवल ले बाहर चला आया।उसकी नजर शान के पास खड़ी तानी पर पड़ी तो वो मुस्कुराते हुए उसके पीछे आकर खड़े होकर बोला,"पापा की परी आज पापा को मिस कर रही है"!तानी मुस्कुराई और पीछे मुड़ते हुए बोली 'हम्म भाई।पूरे दो दिन हो गये मम्मा पापा हमसे मिलने नही आये हैं।न ही उन्होंने हमसे बात की तो बस आकर शिकायते करने लगे।'

प्रीत हाथ मे पकड़ी तौलिया हैंगर पर टांगते हुए बोला , 'तानी बच्चा,अब तुम बड़ी हो गयी हो न और समझदार भी।जानती हो न हमारे मम्मा पापा को अपनी अच्छाई की वजह से उस दुनिया में भी सैकड़ो काम रहते हैं।उन्हें जब भी समय मिलेगा वो हमसे मिलने जरूर आएंगे तुम उदास मत हो। चलो मुस्कुराओ अब' प्रीत ने तानी से बड़े प्यार से कहा जिसे देख तानी मुस्कुरा दी।'ये हुई न बात' चलो बताओ क्या चाहिए वही बना कर लाता हूँ अपनी गुड़िया के लिए बोलो।बस प्रिंसेस आदेश दे उसका भाई उसके लिये वही लेकर आयेगा'! बोलो बोलो।प्रीत ने चहकते हुए कहा और जाकर अपने बाल सेट करने लगा।ये देख तानी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और बाल बिखेरते हुए बोली,'कितनी बार मना किया है भाई ये मत संवारा करो,ऐसे ज्यादा हैंडसम लगता है हमारा भाई।दुनिया का सबसे!!सबसे हैंडसम है हमारा भाई और हमे हमारे भाई के सवरे नही बिखरे बाल पसंद है ऐसे वाले'।तानी ने मिरर की ओर इशारा करते हुए कहा।जिसे देख प्रीत मुस्कुराते हुए बोले,भूल जाता हूँ प्रिंसेस मम्मा अक्सर डांट देती है न इसिलए'!

'हम्म पता है पता है मम्मा की तो आदत है। बहुत चिंता करती है वो आपकी।हमसे भी ज्यादा सबसे ज्यादा।लेकिन हमे शिकायत नही है उनसे क्योंकि मम्मा आपकी परवाह करती है तो पापा हमारी, पापा के साथ साथ दादी,दोनो मासी बड़ी मां बड़े पापा सब आपसे ज्यादा हमसे प्यार करते है तो हुए न हम सबसे प्यारे' बोलो।

'हम्म जानता हूँ लेकिन उन सबसे ज्यादा तू मेरी लाडली है।चल अब बाहर चलते है नही तो अभी सबके सब यही आकर खड़े हो जाएंगे।'प्रीत बोला तो तानी 'हम्म' कहते हुए बाहर चली आई।प्रीत बाहर आकर अपनी प्यारी तानी के लिए कुछ मीठा बनाने चला गया तो तानी वहीं चित्रा के पास आ बैठ गयी जहां चित्रांश पहले से ही बैठा था।प्रियांक और प्रेरणा दोनो तानी को देख बोले, 'तानी आप नदिया के पार घूमने चलोगी हम सब वहीं जा रहे हैं।मम्मा पापा ने परमिशन दे दी है।आप चलना चाहो तो बताओ।'

तानी थोड़ा सकुचाते हुए बोली, 'अगर भाई जाएंगे तो ही हम जाएंगे नही तो नही।भाई के बिन हमे कहीं नही जाना।'

'हमे पता था भाई की छोटी गुड़िया!प्रीत के बिन आप कहीं नही जाने वाली और वो महाशय घर आकर कहीं घूमने जाये ये तो असम्भव सा है।'इस बार समर्पिता बोली।जिसे सुन तानी चिढ़ गयी और मुंह बनाते हुए बोली,क्यों न कहे हम ऐसा 'वो हमारे भाई ही नही है मम्मा पापा सब वही तो है और हमे उनके बिना कहीं नही जाना है इत्तू सा भी नही कही भी नही।' कहते हुए उसने चित्रा के कंधे पर सर रख लिया और आँखे बन्द कर चुपचाप बैठ गयी।

कुछ ही देर बैठ पाई होती है कि तभी उसके हाथ में पकड़ा हुआ प्रीत का फोन बजा 'अब कौन टपक गया जिसने हमारी शांति भंग कर दी' कहते हुए तानी ने प्रीत का फोन देखा जिसमे एक नंबर शो हो रहा था नम्बर देख उसने मुंह बनाया और बड़बड़ाई आ गयी आफत की पुड़िया,जिसके जैसी कोई नही है सच में कोई होगी भी नही नौटंकी सी और फोन अटैंड कर बोली हां बोलो मिस आगे नाम जानबूझकर खाली छोड़ दिया

'अपने भाई को फोन दो।हमे उनसे बात करनी है सुन लिया' फोन के दूसरी ओर से एक लड़की की आवाज आई।अजीब दादागिरी है 'हम न देने वाले जो करना है कर लो'!तानी उसी के टोन में बोली।

'ऐ लड़की,तुम जानती हो न हम क्या क्या कर सकते हैं।आपके भाई की जॉब हमारे ही रहम से चल रही है नही तो तुम और तुम्हारा भाई दोनो सड़क पर आ जाओगे।आज के दौर में बेरोजगार रहने का मतलब न समझो तुम ये तो हो नही सकता।पूरे दून में हमारा कितना बोलबाला है ये तुम बहुत अच्छे से जानती हो।तो अब मेरा टाइम वेस्ट न करो और चुपचाप प्रीत को फोन दो!बहुत टाइम वेस्ट करा दिया तुमने।तो अब और नही चलो फोन दो उसे।'

उसकी बात सुन तानी का पारा चढ़ गया लेकिन सब पास ही है सो वो अपने गुस्से को शांत करते हुए बोली 'ऐसा है आप हमे धमकाओ नही।दून में राज है आपका पूरे भारत पर नही।ज्यादा चूँ चपड़ करी तो हम भाई से बोल देंगे हमे वहां रहना ही नही है फिर न हम वहां होंगे और न होगी हमारे भाई की तुम्हे झेलने की मजबूरी।समझ में आई बात,या और समझाये।हमारे भाई शांत रहते है हम नही सो हमसे उलझना तो बिल्कुल नही...!रखो फोन अब और महीने भर तक हमारे भाई को परेशान नही करना नही तो फोन में घुस कर चिल्ला चिल्ला कर कान के पर्दे खराब कर देंगे हम।बड़ी आई हमारे भाई को धमकाने वाली।' कहते हुए तानी चुप हो गयी।'तुमसे तो हम बाद में निपटेंगे जब तुम यहां आओगी बदतमीज लड़की।' 'हां दिख रहा है कितनी तमीज वाली हो।' तानी ने धीमे से अपनी बात सरका दी।जिसे सुन फोन के दूसरी तरफ वाली लड़की और तमक गयी और उसने फोन रख दिया।'आखिर कट कर ही दिया उसने' तानी ने इस अंदाज में कहा जैसे उसने कोई बड़ी जंग जीत ली हो।

'किसका फोन था तानी किस पर बरस रही थी तुम आज' चित्रा ने पूछा तो तानी मासूमियत से बोली 'उसी चिपकू का जो हर एक घण्टे में फोन कर भाई की जान खाये रहती है।' आपका मतलब है 'आराध्या'। चित्रा ने पूछा तो तानी बोली 'हां नाम की ही आराध्या है वो काम तो सारे उल्टे ही है उसके।न जाने क्यों भाई उसे झेलते हैं।बस ये ही एक साल और रह गया है फिर भाई को उससे छुटकारा मिल ही जायेगा।चिपकू कहीं की।'

उसकी बात सुन आर्य बोला 'ये तो प्रीत ने मना कर रखा है नही तो हम आठ भाई बहनो की टोली है सब ऐसे सबक सिखाये कि वो प्रीत से तो दूर किसी से भी चिपकना छोड़ दे,कहता है जैसी भी है,है तो लड़की ही जब शांति से हैंडल कर पा रहा हूँ तो व्यर्थ का गुस्सा क्यों करूँ।'

'हम्म सही तो बोला मैंने भाई कौन सा गलत बात बोल दी जब पानी सर से निकलेगा तब दो मिनट नही लगेंगे मुझे उसे सबक सिखाने में तब तक जो चल रहा है चलने देते हैं।'प्रीत ने आते हुए कहा तो उसकी बात सुन सभी मुस्कुराते हुए बोले हम ये बात तो है।सबको मग्न और खुश देख आर्य खड़े होते हुए बोला ''चलो फिलहाल तुम लोग बात करो मैं कुछ देर में वापस आता हूँ' कहते हुए वो वहां से जाने लगा जिसे सुन सोफे पर बैठी प्रेरणा हंसते हुए बोली 'जानते है हम आपकी कुछ देर कब होनी है।जाइये जाइये वैसे भी अब आपके दिन ही कितने बचे है दो महीने..!' अच्छा 'अगला नंबर तुम्हारा ही है प्रीतू' आर्य ने हंसते हुए जवाब दिया जिसे सुन प्रेरणा राधु के पास छुप गयी!पागल लड़की राधु ने हंसते हुए कहा।आर्य वहां से चला जाता है।

**आर्य प्रेरणा दोनो की ही शादी फिक्स हो चुकी है।आर्य इस समय दून कैम्पस में प्रोफ़ेसर की पोस्ट पर है तो वहीं प्रेरणा दून के ही एक हॉस्पिटल में गायनोलोजिस्ट के अंडर कार्य करती है।प्रियांक अभी अपने एमबीए के लास्ट ईयर में है वही प्रीत फुल टाइम म्यूजिक टीचर के साथ साथ तानी के कैम्पस में ही रहता है।साथ ही परा स्नातक के अंतिम वर्ष की तैयारी भी कर रहा है।रक्षित और समर्पिता दोनो ही स्नातक में वहीं रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।चित्रांश वही के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहा है।त्रिशा इस समय दौसा में ही रहकर अपने पिता का बिजनिस सम्हाल रही है।**

'प्रीत आप आ ही गये हो तो बताइये हम सबके साथ नदी के उस पार घूमने चलोगे।क्योंकि तानी ने तो साफ साफ बोल दिया आपके बिन वो कहीं नही जाने वाली है' इस बार प्रियांक ने कहा।प्रीत ने हाथ में पकड़ा बाउल तानी की ओर बढ़ाया साथ ही प्यार से बोला, 'तुझे जाना है तो घूमने जा सकती हो मुझे आज कहीं नही जाना है गुड़िया बहुत काम है मुझे'

तानी ने बाउल पकड़ा और बोली 'नही भाई हमें नही जाना हम कल चलेंगे आपके साथ ठीक है।'

'हम्म ओके कल के लिए पक्का वाला वादा' चलो अब मेरा फोन दो मैं उससे बात कर लूं अभी तेरे लिये उससे टच में रहना जरूरी है'।प्रीत ने कहा तो तानी ने फोन उठा कर प्रीत को पकड़ा दिया।फोन लेकर प्रीत वहां से छत की ओर बढ़ गये।उनके जाते ही समा बोली 'आज तो आराध्या मैम गयी ..क्लास लगने वाली है उनकी चलो चल कर इस मंजर के मजे लेते है' कहते हुए वो उठी और प्रीत के पीछे पीछे छत की ओर चली गयी ....


क्रमशः...

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Suresh

Suresh 1 साल पहले

Debjani Das

Debjani Das 1 साल पहले

sonali

sonali 1 साल पहले

S Nagpal

S Nagpal 1 साल पहले

Suman Gourisaria

Suman Gourisaria 1 साल पहले