उजाले की ओर - 25 Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

उजाले की ओर - 25

उजाले की ओर

------------------

" समीर ! सॉरी तुम्हें तकलीफ़ दे रही हूँ ,मुझे दूध लेना है ,कोई दुकान दिखाई दे --तो "
विभा ने झिझकते हुए समीर से कहा ,बेचारे एक तो ये युवा लड़के उसे ढोकर ले जाते हैं ऊपर से अपने घर के काम भी वह इस तरह रुककर करने लगे तो ---ठीक तो नहीं है न !
बिटिया बड़ी नाराज़ होती है उसकी इस तरह की बातों पर लेकिन उसको कहीं कुछ बुरा नहीं लगता | हाँ,वह यह ज़रूर समझने की कोशिश करती है कि अगले को कोई ऐसा काम तो नहीं कि उसके कारण वह बेचारा दुविधा में पड़ जाए | पाँव व कमर में दर्द बढ़ जाने के कारण बच्चे अधिकतर उसे अकेले नहीं भेजते | कोशिश यह रहती है उनकी जहाँ तक हों उसे अकेले न जाना पड़े लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं,बढ़ते बच्चे हैं ,घर-गृहस्थी है | उस सबमें से समय निकालना आसान थोड़े ही होता है फिर भी वे इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि जहाँ तक हो माँ को अकेले तो न ही भेजें | उसे तो हर दूसरे दिन कहीं न कहीं साहित्य सभाओं में जाना पड़ता ही है | पड़ता क्या है ,अपने मनमाफ़िक कार्यक्रमों में जाकर उसके चेहरे के साथ अंतर का बगीचा भी हरा-भरा हो जाता है | जब तक पति थे किसी न किसी तरह उन्हें मना ही लेती थी --अब थोड़ी मुश्किल हो गई है | ड्राईवर हो तो ठीक वर्ना जिन संस्थाओं से जुड़ी है ,उनमें से कोई न कोई उसे लेने आ ही जाता है | बच्चे भी रिलेक्स हो जाते हैं |
एक महत्वपूर्ण हिंदी पत्र का प्रधान संपादक समीर उसके बेटे से भी छोटा !जब शुरू में दूसरे शहर से आकर उसने फ़ोन किया तब तो आनाकानी ही की उसने ,बताया मन ठीक नहीं है| अचानक ही खिलते,मुस्कुराते पति का इस तरह चले जाना उसे डिप्रेशन की स्थिति तक ले आया था | उनके अभाव में वह टूटकर बिखरने सी लगी ,तुनक-फुनक करके कभी तैयार हो भी जाते थे उसके साथ चलने के लिए | हाँ,अधिकांश तो अकेले ही जाना होता था तब भी लेकिन एक अजीब सी फीलिंग थी जो उसको घेरकर चलती थी |अकेले ,वो भी इस उम्र में रह जाना शायद अधिक साल गया ,ज़िंदगी भर तो लड़ते-झगड़ते ही रहे थे न ! सुबह सुबह से शुरू होकर सोने तक बीसियों बार जब तक बहस न हो साँस ही तो नहीं ली जाती थी ,स्वाभाविक था उन बहसों का न होना अकेलेपन की चट्टान को खड़ा कर देता |हम जानते हैं ज़िंदगी के इस पहलू को किन्तु जब सहने की कगार पर आकर खड़े होते हैं तब कमज़ोर पड़ ही जाते हैं | शनैः शनैः मित्रों व बच्चों के सहारा देने से वह वापिस आने लगी | ज़िंदगी कहाँ किसी के बिना ख़त्म हो जाती है और फिर ये सब बातें व्यर्थ ही लगने लगती हैं कि हम भी मर जाएंगे | नहीं ,कोई नहीं मरता साहब !बरसों निकाल देते हैं और सब अपने अपने हिस्से के श्वाँस खींचकर ही जाते हैं | ज़िंदगी है ,जीनी भी पड़ती है ,रोकर जीओ तो ,मुस्कुराकर जीओ तो ! बेहतर नहीं है क्या मुस्कुराकर जीया जाय ,कोशिश की जाय किसीके चेहरे पर मुस्कान खिल सके , किसीकी आँखों की नमी से उभरे धुंधलके उजालों में बदल सकें !
" आप भी कमाल करती हैं दीदी ! पहले न ,माफ़ी मांग लिया करें फिर कोई काम की बात किया करें | सच्ची ! ये सॉरी कहकर आप अपने से दूर कर देती हैं | " समीर ने मुख पर बनावटी ग़ुस्सा ओढ़कर कार चलाते हुए उसकी तरफ़ देखा |
" ऐसा नहीं है समीर ,तुम जानते हो |"विभा ने समीर का कंधा स्नेह से सहला दिया ,उसके मुख पर फिर से एक सरल,सहज मुस्कान पसर गई | अच्छा लगा विभा को ! वह गाड़ी के काँच में से इधर-उधर आँखें घुमाकर दूध की किसी खुली दुकान की तलाश में अपनी आँखें भटकाने लगी|
" कोई दुकान दिखाई देगी तो दूध मुझे भी लेना है "पीछे बैठे हुए थोड़े से परिचित टोपी पहने हुए पुरुष ने कहा |
" दूध लौ छो ने तो ब्रेड पण लई लेजो " पुरुष के साथ बैठी स्त्री ने कहा था |
" हा हा ,चुप बैसो न तमे , लई लईस ---"एक अजीब प्रकार का खारापन आवाज़ में !
हाँ,थोड़े से ही परिचित थे वे दोनों ,जैसे जाने-पहचाने से चेहरे भर --बस ! पुरुष से तो विभा की कई गोष्ठियों में मुलाक़ात हुई थी ,वो अपने सिर पर टोपी पहनकर रहते थे ,फ़्लैप वाली टोपी !दो बार उन्होंने किसी सार्वजनिक स्थल पर गोष्ठी रखवाई थी ,उनमे भी विभा को जाने का अवसर मिला था | किन्तु पचास वर्ष पुरानी साहित्यिक संस्था में कवियों की बढ़ोत्तरी जिस रफ़्तार से हो रही थी और जिस प्रकार वे सम्मान प्राप्त करके आकर उसका राग अलापते थे ,उससे तो यही लगता था कि उस जैसे लोगों ने तो ताउम्र घास ही छीली है | उनके समय में तो न इतने मीडिया के प्रकार ही थे और न ही इतनी जल्दबाज़ी ! रातों रात साहित्यकार भी बना जा सकता है ,यह अभी दिखाई दे रहा था ,कुछ अजीब भी लग रहा था उस जैसे लोगों को जिन्होंने ताउम्र कमरतोड़ मेहनत की थी ,कलम घिसी थी और आज भी श्रम में ही विश्वास रखते थे |बिना श्रम किसी भी चीज़ को पाना या सम्मान पाना , लगता जैसे झोली में कोई भीख डाल रहा हो |
इस पचास वर्ष की पुरानी साहित्य की संस्था की शहर में बहुत ख्याति थी ,उत्कृष्ट काम कर भी रही थी संस्था ! कलम पकड़ना सीखने वालों को संस्था ने कवि बनाकर छोड़ा था और इसमें कोई शक नहीं कि वास्तव में संस्था के बहुत से नवोदित कवि खूब स्तरीय लेखन करने लगे थे | इसी संस्था के वार्षिक कार्यक्रम में उसे ले जाने के लिए समीर आया था और अब वह उसे वापिस छोड़ने जा रहा था | कार्यक्रम की समाप्ति हो चुकी थी , जब फ़ोटोग्राफ़र तस्वीरें ले रहा था विभा के साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए कुछ पुराने मित्र जमा हो गए थे यानि कि हर बार की तरह ही एक पुराने मित्रों का जमावड़ा जो पहले अपने अघिकांश सुख -दुःख सांझा करते किन्तु अब सब उम्रदराज़ हो चुके थे | उसके जैसे कई मित्र अपने एक साथी को खो भी चुके थे और अश्रुपूरित आँखों से मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवाने के लिए दुरुस्त होने की कोशिश कर रहे थे |फ़ोटोग्राफ़र तस्वीरें खींच ही रहा था कि अचानक कोने से सितारों भरी एक चटख़ लाल साड़ी की झलक दिखाई दी | एक-एक करके सबने उस ओर मुड़कर देखना शुरू किया जैसे कोई अजूबा हो | लाल साड़ी को कोई भी पहचानता नहीं था ,हाँ विभा ने ज़रूर उसे एकाध बार देखा था ,उसके साथ वही टोपी वाला पुरुष होता था जिन्होंने उसे यह कहकर परिचित करवाया था कि वह उनकी स्टूडेंट है और वे उन्हें कविता लिखना सिखा रहे हैं | अजीब सा लगा उस स्त्री का इस प्रकार लगभग अनजान लोगों के बीच घुसपैंठ कर जाना जैसे दाल में कोई कंकर आ गया हो ,कैसा हो जाता है न स्वाद !
" म्हारे पण फोटा में आउ छे ----" लाल साड़ी ने बिना किसी झिझक के कहा और ग्रुप के बीच में घुसकर खड़ी हो गई | उसके कविता-गुरु भीड़ में न जाने कहाँ थे और वह अपना स्थान बनाने की कोशिश में लगी हुई थी |
दो-तीन तस्वीरें ली जा चुकीं थीं और जो कुछ लोग रह गए थे वे उस लाल साड़ी के साथ तस्वीर खिंचवाने के इच्छुक न थे,उनके मुखों पर एक अजीब सी असहजता का खिंचाव पसरने लगा ,एक अनचाही सी फुसफुसाहट वातावरण में पसरने लगी |सीधे शब्दों में किसीको कुछ कहना ,उसका अपमान किया जाना, तहज़ीब के विरूद्ध था सो मित्र एक-दूसरे से मिलकर डिस्पर्स होने लगे |समीर ने विभा से पूछा;
"चलें दीदी ?"
'बाय' में हाथ हिलाकर आँखों ही आँखों में सबने एक-दूसरे से बाद में मिलने के लिए फ़ोन करने का इशारा किया | सब अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर मुड़ चले थे,इतने पुराने मित्रों के साथ अपनी बातें शेयर करने का पूरा सुख न मिल सकने पर सबके मुखों पर असंतुष्टि पसरी हुई थी ,उन सबका बस चलता तो वे न जाने कितनी देर और तस्वीरें खिंचवाते रहते , खिलखिलाते रहते | डॉ.किशोर को भी समीर ही छोड़ने वाला था भी और उसको भी | वे दोनों समीर के साथ गाड़ी की ओर चल दिए |डॉ.किशोर को अपने साथ ले जाने के लिए समीर बहुत लालायित था , इतने प्रबुद्ध वरिष्ठ साहित्यकार का सारथी बनने के लिए वह बहुत संवेदनशील हो रहा था | उसने गाड़ी का आगे का दरवाज़ा खोला और बड़े सम्मान के साथ डॉ. किशोर को गाड़ी में बैठाकर विभा के लिए पीछे का दरवाज़ा खोल दिया | विभा ने अपना पैर गाड़ी में रखा ही था कि लाल साड़ी उसके सामने आ खड़ी हो गई ;
"आप कहाँ तक जाएंगे ? "
विभा का एक पैर गाड़ी में रखा जा चुका था ,आवाज़ सुनकर वह पैर फिर से बाहर निकल आया | उसने समीर का मुख देखा ,सीधे सरल स्वभाव के समीर ने अपना निर्दिष्ट बताया |
"आप हमें ऑटोरिक्शा तक छोड़ देंगे ?" टोपी वाले टीचर जी अचानक लाल साड़ी वाली महिला के पीछे से निकलकर नमूदार हो गए |
समीर और विभा दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा ,समीर ने सहजता से कहा ;
" हाँ जी आइए,गाड़ी खाली ही है | "
समीर ने गाड़ी के पीछे का दरवाज़ा खोल दिया था जिसमें विभा को उन दोनों के साथ बैठना विभा को एक असहजता की अनुभूति दे गया | उन दोनों के अंदर बैठ जाने के विभा सबसे बाद में बैठी ,बाद में समीर स्वयं ड्राईवर-सीट पर जा बैठा | गाड़ी चल दी थी और पीछे उसके पास बैठे व्यक्तियों की कचर-कचर भी शुरू हो गई थी |
दोनों इतनी सहजता से बातें करने लगे थे मानो कितने दिनों के परिचित हों | वैसे इतनी शीघ्रता से घुल मिल जाने में कहीं कोई बुराई नहीं थी, ये खुशनुमा पल भी हो सकते थे किंतु जिस तरह से वे दोनों बातें कर रहे थे ,विभा का सिर घूमने लगा,वह असहज होने लगी ,चुप बैठना ही उसे बेहतर लगा | समीर अपनी रौ में बोले जा रहा था ,कुछ यूँ ही सामान्य से प्रश्न जो आम आदमी एक-दूसरे से मिलने पर जिज्ञासावश पूछ ही लेता है | पहले तो वह डॉ.किशोर से बात करता रहा और बात करते हुए विभा की इच्छा पर मुहर लगाते हुए उसने पहले डॉ.किशोर के आश्रम जैसे निवास पर चलने का निश्चय किया जहाँ विभा का मन कुछ देर उनके सानिध्य में मेडिडेट करने का था लेकिन उसके साथ बैठे सहयात्री उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थे ;
"अमे पण आवीश " लाल साड़ी ने फिर से अपना मंतव्य ज़ाहिर किया |
"हाँ,अपन को घर में भी क्या काम है ,हम भी चलते हैं |"
डॉ.किशोर ठहरे संत पुरुष ,उनके आश्रम से निवास पर सबका स्वागत ! उन्होंने खुले मन से लाल साड़ी और टोपी का स्वागत किया | डॉ. किशोर के साथ विभा कई बार मेडिटेशन कर चुकी थी ,एक आंतरिक सुकून से उसका मन भर उठता ,वह उनके प्रति बहुत कृतज्ञ थी |डॉ.किशोर से उसका व उसके पति का लंबा चालीसियों साल का परिचय ! बहुत वर्षों से विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में उनके साथ भाग लेती रही थी विभा ! बड़े भाई समान डॉ. किशोर का उस पर छोटी बहन सा स्नेह ! हर बात सांझा करते रहे वो उससे ! अपने दुःख,सुख साँझा करके मन को हल्का करने के लिए मेडिटेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता |
काफ़ी लंबा समय हो गया था उनके साथ मेडिटेशन किए,कई वर्ष पूर्व एक बार कलकत्ता की फ़्लाइट में किए गए मेडिटेशन का सुकून विभा को एक सुखद आध्यात्मिक अनुभूति से भर देता | आज अवसर मिला था ,विभा उस अवसर को खोना नहीं चाहती थी अत:समीर से पहले ही बात कर रखी थी उसने लेकिन अब---? अपने पास बैठे व्यक्तियों को देखकर उसे कुछ खुंदक सी होने लगी | वह जानती है उसे ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए लेकिन क्या किया जाय मानव-मन का ! ऊपर से आश्रम के स्वामी डॉ. किशोर की सहृदयता लाजवाब ! अब एक और आ मिला उनके जैसा --यह समीर ! सारे कर्ण ही इक्क्ठे हो रहे थे उसके आसपास !
मेडिटेशन में कुछ लंबा ही था उसका बैठने का मन ,शायद नए लोगों को देखते हुए डॉ. किशोर ने कुछ जल्दी ही समाप्त करवा दिया मेडिटेशन ! उसका मन त्रिशंकु सा हो गया, अधर में लटकता हुआ सा ! उसने शिकायत भी कर डाली ,वह कुछ अधिक देर बैठना चाहती थी किन्तु व्यवधान पड़ गया था ,उसका मन अतृप्त ही रहा अन्यथा मेडिटेशन के बाद वह भाव-विभोर हो उठती थी ,भूल जाती थी आगे-पीछे का और एक आंतरिक सुख की दुनिया में विचरण करने लगती थी |
अब समीर की बारी थी विभा को उसके घर छोड़ने की ;
"आप कहाँ रहते हैं ?"
"तमे बेन ने मुकवा जाओ छो न ,त्यांज अमे रइये छिए ---"
"तब तो मैं आपको वहीं छोड़ दूँगा ---" समीर अपने स्वभाव से बाज़ कहाँ आने वाला था | वैसे ठीक भी था ,उधर से ही तो गुज़ारना था |
अब रास्ते भर दूध की दुकानों की खोज हो रही थी | रात के दस बज चुके थे और इक्की-दुक्की दुकानें खुली रह गईं थीं |
"समीर ! वो --देखना वो कोने वाली दुकान पर मिल जाएगा दूध ,ज़रा प्लीज़ वहाँ रोक देना गाड़ी|"
"अरे ! हूँ बतावीश ने,तमे आगड़ चलो न भाई ---" टोपी वाला अपने स्वभाव पर उतर आया था | समीर का तो पता नहीं ,विभा उसके ऐसा बोलने से चमक सी गई थी | समीर कोई सबका ड्राईवर नहीं था ,वह अपनी भलमनसाहत में सबके प्रति विनम्र रहता ,यह उसका गुण था ---लेकिन ---
" आप चुप रहिए न प्लीज़,आपको जहाँ से लेना हो लीजिए ---समीर यहाँ रोको तुम --"विभा की आवाज़ खुश्क हो ही गई | समीर विभा के साथ उतर गया था | दुकान पर केवल पंद्रह थैली दूध था ,विभा ने ले लिया | अब दुकान पर किसी भी वैराइटी का दूध नहीं था | गाड़ी में बैठते ही पता चला उन्हें केवल दूध की एक थैली चाहिए थी |
"लीजिए ---" विभा ने एक थैली दूध निकालकर टोपी वाले सर को दी |
" पण,एटली बधी ---सू करशो ---" अच्छा नहीं लगा विभा को | समीर शायद समझ गया |
"परिवार है ,ज़रुरत होगी ---" कहकर उसने लाल साड़ी का मुख बंद करने की चेष्टा की |
" तौ पण ---केटला माणस छे ?" टोपी वाले ने पूछा पर कोई उत्तर न मिला |
" आप साथ ही में रहते हैं ?" अब समीर ने शायद उनको उत्तर देने से बचने के लिए प्रश्न दाग दिया |
" ना रे ---अमे तो जुदा रहिए छिए पण -----"
"तमे चुप बैसो ने-----" टोपी ने लाल साड़ी को झिड़क दिया ,वैसे भी सारे रास्ते वह उसे झिड़कता ही आ रहा था |
डॉ. किशोर के पूछने पर भी कि बहन कोई काम करती हैं क्या? लाल साड़ी ने कहा था ;
"न ---"
"तो सब कैसे चलता है ?" उन्होंने सरल जिज्ञासावश पूछ लिया था |
"मारे पास बैंक में बहूज पैसा हे ---" उसने हिंदी में बोलने का प्रयास किया था |
" तमे चुप बेसो ने ---" टोपी ने उसे फिर झिड़क दिया |
समीर पहले भी दो-एक बार टोपी वाले से कह चुका था कि वह उनको क्यों बोलने नहीं दे रहे हैं ? उन्हें भी अपनी बात कहने दें ,उन्हें भी तो अधिकार है किन्तु टोपी वाले सज्जन अधिकार व कर्तव्य की परिभाषा से परे थे शायद ,दुःख-सुख से परे एक संत की भांति !
"मैंने --मैंने सब करवा दिया इनका ---सब व्यवस्था करवा दी है | वैसे हम पास में रहते हैं ,मैं इन्हें कविता लिखना सिखा रहा हूँ -----"
" आपने पहले बताया था ,आप इनके काव्य-गुरु हैं ---" इतने गंभीर ,सरल डॉ. किशोर के मुख पर भी एक हल्की सी अनबूझी पहेली भर मुस्कान पसर गई थी | उसके बाद उन्होंने कुछ नहीं पूछा था | विभा वैसे ही बात करने के मूड में नहीं थी,उसका असली मक़सद ही अधूरा रह गया था |
दूध लेने के बाद कार में शून्य सा पसरने लगा ,विभा का घर समीप आता जा रहा था |
"दीदी ! देखेंगे ,सप्ताह में एक बार तो हम सर के पास मेडिटेशन के लिए चले ही जाया करेंगे|" समीर ने विभा से कहा जिसका विभा ने कोई उत्तर नहीं दिया | अब तक समीर उसके चुप रहने का कारण समझ चुका था |
" हम भी आएंगे साहब----" टोपी वाले ने वाणी में मिठास घोलकर कहा | अब फिर से चुप्पी महारानी की बारी थी ,गाड़ी में पसर गई थी वो बड़ी शान से !
" आइए दीदी ! आपको उतार देता हूँ ,बैग आप मत लीजिए | मैं छोड़ आता हूँ ---" विभा को उसकी शराफ़त पर खीज आने लगी ,उसने गेट पर बढ़कर घंटी बजा दी ,क्षण भर में बिटिया बाहर थी जिसने आगे बढ़कर समीर के हाथ से 'थैंकस' कहते हुए थैला पकड़ लिया था |
" आप भी न माँ ---" बिटिया ने शिकायती लहज़े में समीर को परेशान करने की बात कहनी चाहिए और गाड़ी में झाँका |
" बेन,हम पास-पास रहते हैं ,पर वैसे हमारा गुरु-शिष्य का संबंध है ,और कुछ नहीं ---"
" आपके पास ही रहते हैं हम ,बिलकुल पास ---आगे वाली सड़क पर "टोपी वाले काव्य-गुरु ने क्यों इसकी व्याख्या की होगी ? विचारणीय था |
किसीके आपसी रिश्तों से अन्य को कोई फ़र्क नहीं पड़ता ,सबकी अपनी-अपनी ज़िंदगी,अपनी-अपनी इच्छाएं,अपनी-अपनी आवश्यकताएं ---फिर ?
व्यर्थ के ऊहापोहों से भरे मन ने मेडिटेशन के सकून को खो दिया था | अंदर आते हुए एक बार फिर टोपी वाले ने अपनी बात दोहराकर उसे अपने संबंधों को समझाने की चेष्टा करनी चाहिए ,उसने जल्दी से नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़े और समीर को ' करते हुए गेट बंद कर लिया | बिटिया के मन में अपनी माँ के बदले हुए व्यवहार से कुछ प्रश्न उठने लगे थे ,इतनी बार पास रहने की बात सुनकर भी विभा ने एक भी बार उन्हें अपने यहाँ पधारने का निमंत्रण नहीं दिया था | ऎसी तो न थी उसकी माँ !

डॉ. प्रणव भारती

रेट व् टिपण्णी करें

Ranjan Rathod

Ranjan Rathod 1 साल पहले

Pranava Bharti

Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 1 साल पहले