मानस के राम (रामकथा) - 2 Ashish Kumar Trivedi द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मानस के राम (रामकथा) - 2








मानस के राम
भाग 2



महर्षि विश्वमित्र का आगमन

राजा दशरथ अपने पुत्रों के गुणों को देख कर बहुत प्रसन्न हुए। सबसे अधिक राम ने उन्हें प्रभावित किया। वह राम से सबसे अधिक प्रेम करते थे। अक्सर वो राम से धर्म नीति आदि विषयों पर चर्चा करते थे। उन्हें राम के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता था। एक दिन जब महाराज दशरथ अपने दरबार में बैठे राज काज के विषय में अपने मंत्रियों से विमर्श कर रहे थे। तभी उन्हें ब्रह्मर्षि विश्वमित्र के आगमन का समाचार मिला।
ब्रह्मर्षि विश्वमित्र के आने का समाचार सुनते ही राजा दशरथ सिंहासन छोड़ कर स्वयं उनके स्वागत को गए। उन्हें आदर पूर्वक बिठाया और हाथ जोड़ कर उनके आने का कारण पूंछा।
विश्वमित्र ने बताया कि राक्षसों का आतंक बहुत बढ़ गया है। वह आए दिन उत्पात मचाते हैं तथा ध्यान और यज्ञ आदि में विघ्न डालते हैं। अतः वो उनके पुत्र राम और लक्ष्मण को साथ ले जाने आए हैं। ताकि दोनों राजकुमार राक्षसों का नाश कर उनके उत्पात से रक्षा कर सकें।
ब्रह्मर्षि की बात सुन कर महाराज दशरथ चिंता में पड़ गए। किंतु वो विश्वमित्र को क्रोधित नहीं करना चाहते थे। अतः हाथ जोड़ कर विनय करने लगे।
"ब्रह्मर्षि अभी तो दोनों कुमार बालक हैं। उन्हें युद्ध का अनुभव नहीं है। दोनों कैसे उन भयानक राक्षसों सामना कर सकेंगे। आप आज्ञा दें तो मैं स्वयं सेना के साथ चल कर उन दुष्टों का विनाश करूँ।"
राजा दशरथ की बात सुन कर विश्वमित्र बोले,
"नहीं राजन मैं तो आपके पराक्रमी पुत्रों राम और लक्ष्मण को ही लेने आया था यदि आप न चाहें तो मैं वापस चला जाता हूँ।"
राजा दशरथ दुविधा में पड़ गए। तब महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया,
"महाराज आप विश्वमित्र की बात मान लें। आप पिता होने के नाते अपने पुत्रों के विषय में चिंतित हैं। किंतु दोनों राजकुमार वीर हैं और स्वयं की रक्षा करने में सक्षम हैं। उन्हें अपना पराक्रम दिखाने के लिए जाने दें।"
महर्षि वशिष्ठ की बात से संतुष्ट होकर महाराज दशरथ दोनों राजकुमारों को भेजने के लिए तैयार हो गए। माता पिता तथा गुरु वशिष्ठ के चरण छूकर दोनों राजकुमार विश्वमित्र के साथ चले गए।

विश्वामित्र की कथा

विश्वमित्र का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। वह कौशिक नाम के महापराक्रमी में और प्रजावत्सल राजा थे। एक बार वह अपनी विशाल सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में गए। महर्षि वशिष्ठ ने उनका और उनकी सेना का समुचित आदर सत्कार किया। उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन और अन्य सामग्रियां प्रस्तुत कीं।
राजा कौशिक यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए कि मन में रहने वाली एक ऋषि के पास इतने संसाधन कहाँ से आए कि वह उनका और उनकी सेना का सत्कार कर सके। उन्होंने इस विषय में महर्षि वशिष्ठ से प्रश्न किया। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें बताया कि उनके पास सभी इच्छाएं पूरी करने वाली नंदिनी गाय है। उसी की कृपा से यह सारी सामग्रियां प्राप्त हुईं। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें नंदिनी गाय के दर्शन कराए।
नंदिनी गाय और उसके चमत्कारों को देखकर राजा कौशिक के मन में लालच आ गया। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से कहा कि नंदिनी गाय उन्हें दे दें। महर्षि वशिष्ठ ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस बात से क्रोधित होकर राजा कौशिक ने बलपूर्वक नंदिनी गाय का हरण करने का प्रयास किया। राजा कौशिक के सैनिक नंदिनी गाय को जबरदस्ती घसीट कर ले जाने लगे। इस बात से नंदिनी बहुत दुखी हुई। उसने महर्षि वशिष्ठ से अपनी रक्षा करने के लिए कहा। महर्षि वशिष्ठ ने उससे कहा,
"राजा कौशिक मेरे अतिथि हैं। मैं इनसे युद्ध नहीं कर सकता। परंतु आत्मरक्षा के लिए सबल हो। तुम अपनी रक्षा कर सकती हो।"
महर्षि वशिष्ठ की आज्ञा से नंदिनी ने अपनी शक्ति से एक सेना उत्पन्न की। राजा कौशिक और नंदिनी गाय की सेना के बीच युद्ध होने लगा। नंदिनी गाय की सेना ने राजा कौशिक कि सेना को बहुत क्षति पहुंँचाई। इससे क्षुब्ध होकर राजा कौशिक के पुत्रों ने वशिष्ठ पर आक्रमण किया। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें भस्म कर दिया।
अपने हार से लज्जित राजा कौशिक ने अपने बचे हुए पुत्र को राज पाठ सौंपा और हिमालय में तपस्या करनी चले गए। अपनी कठिन तपस्या से उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न ने कर लिया। उन्होंने राजा कौशिक से वरदान मांगने को कहा। राजा कौशिक ने कहा,
"प्रभु यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे विभिन्न दिव्यास्त्र प्रदान कीजिए।"
भगवान शंकर ने उसे अनेक प्रकार के दिव्यास्त्र प्रदान किए जो केवल देवताओं, गंधर्वों और दानवों के पास ही थे। भगवान शंकर से मिले दिव्यास्त्रों को लेकर राजा कौशिक वशिष्ठ के पास गए और उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। अपने पुत्रों की हत्या का बदला लेने के लिए उन्होंने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम को तहस नहस कर दिया। आश्रम में रहने वाले लोग और पशु इधर उधर भागने लगे।
राजा कौशिक की इस उद्दंडता का जवाब देने के लिए महर्षि वशिष्ठ अपने ब्रह्मदंड के साथ उनका सामना करने आए। उन्होंने अपने योगबल से राजा कौशिक के सारे दिव्य अस्त्रों को शांत कर दिया। इससे क्रोधित होकर राजा कौशिक में सबसे अचूक ब्रह्मास्त्र चलाया। उस अस्त्र की ऊष्मा से सभी प्राणी विकल हो गए। महर्षि वशिष्ठ ने अपने योगबल से उसे भी शांत कर दिया।
इतने सारे दिव्यास्त्रों के बाद भी महर्षि वशिष्ठ अपने योगबल से बच गए। राजा कौशिक को समझ में आ गया कि ब्राह्मण के योगबल के आगे क्षत्रिय की शक्ति कहीं नहीं टिकती। अतः सब कुछ छोड़कर वह अपने तप के बल पर शक्ति हासिल करने के लिए दक्षिण दिशा में जाकर तप करने लगे। उन्होंने अपनी कठिन तब से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया‌। ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर कहा,
"मैं तुम्हारे तप से बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें राजर्षि उपाधि प्रदान करता हूँ।"
राजर्षि पाकर भी राजा कौशिक संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने और भी अधिक तप करने की ठानी। जिससे वह ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर सकें। राजा कौशिक पहले से भी अधिक अधिक कठिन तप करने लगे।

त्रिशंकु के लिए स्वर्ग की रचना

सूर्यवंश में त्रिशंकु नाम का एक राजा राज्य करता था। उसे अपनी देह से मोह था। वह चाहता था कि बिना देह का त्याग किए वह स्वर्ग पहुंँच जाए। इसलिए वह महर्षि वशिष्ठ के पास गया। ‌ उनसे प्रार्थना की कि वह उसे सदेह स्वर्ग भिजवा दें। महर्षि वशिष्ठ के द्वारा मना करने पर वह उनके पुत्रों के पास जाकर बोला कि महर्षि वशिष्ठ ने तो मना कर दिया है पर वह उसे सदेह स्वर्ग जाने में सहायता करें।
महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों ने भी ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर त्रिशंकु ने कहा कि यदि महर्षि वशिष्ठ और उनके पुत्रों में इतनी शक्ति नहीं है तो वह उस व्यक्ति के पास जाएगा जो ऐसा करने में समर्थ हो। इस बात से कुपित होकर महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों ने उसे चांडाल हो जाने का श्राप दिया।
चांडाल वेष में भटकता त्रिशंकु उस आश्रम में पहुँचा जहाँ राजर्षि कौशिक कठोर तप कर रहे थे। अपनी शक्तियों से उन्होंने स्टेशन को को पहचान लिया। उन्होंने उससे पूँछा उसकी यह दशा कैसे हुई। त्रिशंकु ने उन्हें सारी बात बता दी। सब जानकर राजर्षि कौशिक ने उसकी सहायता करने का वचन दिया।
राजर्षि कौशिक ने अपनी तपस्या से बहुत सी शक्तियां प्राप्त की थीं। उन्होंने त्रिशंकु की सहायता करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने इस यज्ञ के लिए कई ऋषियों को आमंत्रित किया। उन्होंने वशिष्ठ के पुत्रों को भी आमंत्रण भेजा किंतु उन्होंने आने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वह किसी ऐसे यज्ञ में भाग नहीं ले सकते जिसका पुरोहित एक क्षत्रिय हो और यजमान चांडाल। इस बात से कुपित होकर राजर्षि कौशिक ने उन्हें श्राप दिया कि सात जन्मो तक वह कुत्ते का मांस खाने वाली जाति में जन्म लें।
राजर्षि कौशिक ने अन्य ऋषियों की सहायता से त्रिशंकु को यज्ञ के माध्यम से उसकी देह सहित स्वर्गलोक भेजने के लिए यज्ञ में आहुतियां डालीं। पर कोई भी देवता यज्ञ के प्रसाद में अपना भाग लेने नहीं आया। अपनी हार होते देख राजर्षि कौशिक ने अपने समस्त तपोबल का उपयोग कर त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेज दिया।
परंतु जब त्रिशंकु स्वर्ग लोक पहुँचा तो इंद्र ने उसे सदेह प्रवेश देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि तुम्हें देह सहित स्वर्गलोक में नहीं रहने दिया जा सकता। उन्होंने त्रिशंकु को वापस भेज दिया। त्रिशंकु उल्टा लटकता हुआ नीचे की तरफ आने लगा। यह देखकर राजर्षि कौशिक ने अपने मंत्र के बल पर उसे बीच में ही रोक दिया। त्रिशंकु बीच में लटक गया। राजर्षि कौशिक ने उसी जगह पर उसके लिए एक नए स्वर्ग का निर्माण किया। वह एक नए इंद्र का निर्माण करने लगे। यह देखकर देवता भयभीत हो गए। उन्होंने कहा कि हमने तो त्रिशंकु को इसलिए वापस कर दिया क्योंकि वह श्रापित था। परंतु नए इंद्र का निर्माण करके सृष्टि के नियमों का उल्लंघन ना करो।
राजर्षि कौशिक शांत हो गए। उन्होंने देवताओं से कहा कि वह नए इंद्र का निर्माण नहीं करेंगे। पर उन्हें अपने वचन का पालन करना है। अतः त्रिशंकु उनके बनाए हुए स्वर्ग में ही रहेगा। देवता इस बात के लिए राजी हो गए।