राम रचि राखा - 6 - 5 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 6 - 5

राम रचि राखा

(5)

पंद्रह दिनों बाद जब मुन्नर जेल से छूटे तो उनकी हालत किसी मानसिक रोगी जैसी थी। मन में अनिश्चितता ने घर कर लिया था। कुछ भी निर्णय कर पाने की शक्ति खो चुके थे। कहाँ जाऊँ ? क्या करुँ ? कुछ भी नहीं तय कर पा रहे थे। पैदल चलकर स्टेशन तक पहुँचे और प्लेटफोर्म की एक बेंच पर बैठ गए। आने जाने वाली गाड़ियों को निर्विकार रूप से देखने लगे।

बदन पर वही पंद्रह दिन पुरानी लुंगी और कुर्ता था, जो बहुत ही मैला हो चुका था। गाड़ियों के आवागमन की उद्घोषणा और लोगों का शोर उन्हें थोड़ी देर में ही खलने लगा। तभी प्लेटफोर्म पर आकर एक गाड़ी खड़ी हुयी। उठकर अनायास ही उसमे चढ़ गए। कुछ देर बाद गाड़ी चल दी। उन्हे स्वयं नही पता था कि वे कहा जा रहे थे। बस गाड़ी मे बैठे चले जा रहे थे।

सूरज डूब रहा था। पश्चिम का आसमान लाल रंग से पुता हुआ लगा रहा था। गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। मुन्नर खिड़की से बाहर देख रहे थे। कोई छोटा सा स्टेशन था। स्टेशन के दूसरी तरफ कुछ झोपडियाँ बनी हुयी थीं। एक सरकारी कुआँ था, जहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। थोड़ी दूर पर कोई नदी बह रही थी।

गाड़ी बहुत देर तक रुकी रही। मुन्नर उबने लगे। बिना किसी उद्देश्य के गाड़ी से उतर गए और पटरी पार कर के कुएँ के चबूतरे पर जा बैठे। वहीं से टकटकी लगाकर गाड़ी को देखते रहे। वास्तव में वे गाड़ी को नहीं अपितु शून्य में घूर रहे थे। थोड़ी देर बाद गाड़ी चल दी, परन्तु वे वहीं बैठे रहे। उठकर गाड़ी में सवार होने का कोई उपक्रम नहीं किये।

थोड़ी ही देर में धुँधलका होने लगा। उन्हें कुछ प्यास लग आई। सामने नदी का किनारा दीख रहा था। वे विक्षिप्तों की तरह नदी की ओर चल दिए। नदी पर पहुँच कर हाथ मुँह धोया, पानी पिया। नदी के किनारे से ऊपर आये तो देखा थोड़ी दूर पर कोई गाँव दिख रहा था। जो नदी के किनारे पर ही बसा था। सामने जो पगडंडी थी वह गाँव की ओर जा रही थी। कुछ सोचकर वे गाँव की ओर चल दिए।

रात घिरने लगी थी। गाँव जीतनी दूर दिख रहा था, उससे अधिक दूरी पर था। चलते चलते थकान होने लगी। गाँव से थोड़ा पहले ही कनेर के पेड़ों का एक झुरमुट था। चालीस पचास पेड़ बेतरतीब उगे हुए थे। उनके बीच में एक छोटा सा मंदिर दिखा। वे मंदिर की ओर बढ़ गए। मंदिर में मूर्ति किसकी थी, यह न पहचान सके। परन्तु मंदिर की दशा से यह प्रदर्शित हो रहा था कि उनकी तरह ही मन्दिर भी उपेक्षित है। बाहर, मंदिर से लगा हुआ एक छोटा सा चबूतरा था। वे चबूतरे पर बैठ गए ।

गाँव के घरों में लालटेन और दीये की बहुत ही मद्धिम सी रोशनी दिखाई दे रही थी। रात का खाना पकाने का समय था। घरों से चूल्हे का धुआँ उठ कर थोड़ा ऊपर अँधेरे में विलीन हो जा रहा था। भूख लगने लगी थी। मुन्नर ने इधर-उधर निगाह दौडाई। आधे चाँद की हलकी सी रोशनी में देखा पास में ही झरबेरी का एक पेड़ था। उठकर कुछ बेर तोड़ लाये और चबूतरे पर बैठकर खाने लगे। थोड़ी देर बाद वहीं चबूतरे पर लेट गए।

"घर पर क्या हो रहा होगा? अब तक तो शोक भी ख़त्म हो गया होगा। लोग अपने अपने काम में लग गए होगें। जीवन भर तो कोई किसी के लिए नहीं रो सकता...।" न जाने कितनी देर तक सोचते रहे। मन और शरीर दोनों ही बुरी तरह से थके हुये थे। नींद आ गयी।

रात भर बेखबर सोते रहे। नींद खुली तो सवेरा होना वाला था। उठकर नदी के किनारे जाकर नित्य क्रिया कर्म करके जब लौटे तो धीरे-धीरे प्रकाश होने लगा था। नहाकर कुरते को नदी के पानी में धो दिया और पास में ही एक झाड़ पर सूखने को डाल दिया। वापस आकर नंगे बदन ही चबूतरे पर बैठ गए ।

अब आगे क्या करें? हे भगवान तुम्ही कोई ठिकाना दो ! मंदिर की तरफ मुँह करके आँख बंद कर लिए और सुन्दर काण्ड का सस्वर पाठ करने लगे।

गाँव के बहुत से लोग नित्य क्रिया कर्म के लिए नदी के किनारे इस तरफ आते थे। देखा कि एक व्यक्ति नंगे बदन चबूतरे पर बैठकर रामायण का पाठ कर रहा है। बाल बेतरतीब बिखरे हुए , दाढ़ी बढ़ी हुयी। कुछ लोग कौतूहल वश खड़े हो गए।

जब लगभग दस-पंद्रह मिनट बाद मुन्नर ने आँखे खोली तो देखा कि चार पाँच लोग उनके पास खड़े थे। सबकी आँखों में यही कौतूहल था कि वह कौन है?

"कौन हो महाराज, कहाँ से आये हो…?" बच्चन ने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा। मन में भय था कि कहीं कोई सिद्ध महात्मा न हों और गुस्सा न कर बैठें।

मुन्नर ने कुछ कहा नहीं बस बच्चन की तरफ निगाह उठाकर देखा। खुद को इस हालत में पाकर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें। उन्हें चुप देखकर बच्चन थोड़ा सकपका गये कि कहीं कोई गुस्ताखी तो नहीं हो गयी।

"तुम भी बौड़म की तरह सवाल करते हो बच्चन, अरे देख नहीं रहे हो बाल ब्रह्मचारी हैं। कितना तेज फूट रहा है माथे से…।” ललिता पंडित ने बात को सँभालते हुए कहा, "कितना ओज है वाणी में…! महराज यहीं रुकना है अभी या आगे की यात्रा है?” ललिता पंडित मुन्नर के रामायण पाठ से बहुत प्रभावित लग रहे थे।

"कहाँ जाना है यह तो उपरवाला ही तय करेगा।" मुन्नर ने एक गहरी साँस छोड़ते हुये बिलकुल शांत स्वर में आध्यात्मिक ढंग से कहा।

"बहुत ऊँची बात कही आपने महाराज…।" ललिता पंडित ने कहा। तभी उन्हें काशी के साधु बाबा की कही बात याद आ गयी।

ललिता पंडित धार्मिक प्रवृत्ति के एक सरल व्यक्ति थे। जजमानी के अलावा तीन चार बीघे जमीन की खेती भी थी। किसी तरह से गुजर-बसर हो जाती थी। जब कोई जुगाड़ बैठता तो तीर्थ भी कर आते थे। साधु-महात्मा से बहुत शीघ्रता से प्रभावित हो जाते थे। अधिक धन पाने के लिए कभी कोई गलत काम तो नहीं करते, परन्तु दूसरे आम लोगों की तरह ही धनवान होने की इच्छा मन में कभी-कभी जोर मारने लगती। कभी सोने से पहले आँखे बंद करके सोचते कि काश! घर में या किसी खेत में से कभी सोने-चाँदी से भरा एक घड़ा निकल आता। लक्ष्मी माता की पूजा नित्य करते थे।

पिछले सावन में जब संकठा सिंह के साथ काशी गए थे, बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने। तब गंगाघाट पर एक साधु मिले थे। पूरे दो रुपये दक्षिणा देकर अपना भविष्य बँचवाया था। बाबा ने कहा था- "बहुत जल्दी ही तुम्हारा भाग्योदय होने वाला है। कोई अनजान व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आएगा और तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।" सोचे तो थे कि साधु बाबा बताएँगे कि धन की प्राप्ति कैसे होगी परन्तु यह तो...चलो जो भी है भाग्योदय होगा तो अच्छा ही है, भले ही किसी और के कारण हो।

अचानक उनके मन में विचार उठा कि हो न हो यह सन्यासी उनका भाग्य परिवर्तित करने के लिए ही आया हो। इस बीच में दूसरे लोग भी कुछ बातें करने लगे। बातों का कुल मिलाकर उद्देश्य यह जानना था कि मुन्नर कौन हैं, कहाँ से आये हैं और कहाँ जायेंगे। यदि कोई सिद्ध महात्मा हैं, तो गाँव के लोगों का दुख कैसे दूर कर सकते हैं। धीरे-धीरे और लोग भी जमा होने लगे थे। जवान, बच्चे, बूढे सभी थे। एक छोटी सी भीड़ इकट्ठी हो गयी।

जून का दूसरा पखवाड़ा चल रहा था। दिन में धरती तवे की तरह जल रही थी। आसमान पर बादल कभी दिखाई भी देते तो घूम फिर कर लौट जाते। गर्मी से लोग बेहाल तो थे ही उसके अलावा असाढ़ की बुआई के लिए बरसात का ही भरोसा था। लोग आस लगाए बैठे थे कि कब बारिश हो और जुताई शुरू की जाय। बरसात होने में देरी गाँव वालों की चिंता दिन पर दिन बढ़ाये जा रही थी। इन्द्रदेव के मनुहार के लिए जगह-जगह कढ़ाइयाँ चढ़ाई जा रही थी। तीन-चार दिनों से बादल आते थे पर घूम फिर कर लौट जाते थे, बरसते नहीं थे।

गाँव वालों की मुन्नर से वार्तालाप चल ही रही थी कि बादल घिर आये और बरसात शुरू हो गयी। गाँव वाले तितर-बितर होने लगे। बरसात ने शीघ्र ही जोर पकड़ लिया था।

"महराज, मंदिर के अन्दर आड़ ले लो।" ललिता पंडित ने बरसात से बचने के लिए भागते हुए कहा। लोग भागकर भुक्खन की झोपड़ी में शरण ले लिए, जो वहाँ से लगभग एक-आधी फर्लांग की दूरी पर थी।

मुन्नर चबूतरे पर ही बैठे रहे। उन्हें अच्छा लग रहा था भींगना। लग रहा था जैसे वर्षा की शीतल बूँदों से मन का ताप धीरे-धीरे मिट रहा हो।

झोपड़ी में खड़े-खड़े लोग देख रहे थे कि मुन्नर अभी भी बरसात में बैठे भीग रहे हैं।

"अरे देखो! बाबा तो अन्दर मंदिर में गये ही नहीं, वहीं चबूतरे ही पर बैठे-बैठे बरसात का मज़ा ले रहे हैं " किसना ने चुटकी लेने के अंदाज़ में कहा।

"हमेशा चुहुल नहीं किया जाता किसन..!" ललिता पंडित ने गंभीर होते हुए कहा 'सिद्ध महात्मा हैं, उनके लिए क्या बारिश और क्या ठंडी-गर्मी।"

"लेकिन सन्यासी की तरह लग तो नहीं रहे हैं। मुझे लगता है कि पुलिस का कोई जासूस है। बिसंभर के यहाँ पड़ी डकैती का टोह लेने के लिए भेष बदल कर आया होगा" किसना के साथी झम्मन ने कहा।

"तुम लोग स्कूल, कालेज जा रहे हो लेकिन ज्ञान एक पैसे का भी नहीं है।" उनकी बात न मानने से ललिता पंडित के मन में थोड़ा रोष पैदा हो गया था, "... इस उमर में कोई पुलिस में भर्ती होता है क्या…हप्ता भर से कढ़इया चढ़ रहा था, एक बूँद भी पानी बरसा?" फिर सबको संबोधित करते हुए बोले, “आज देखो, उनके चरण पड़ते ही क्या हरहराकर पानी बरसने लगा है।" लोग चुप हो गये। किसी ने कुछ नहीं कहा। सबको उनकी बात में कुछ सत्यता दिखने लगी।

“बस यहाँ कुछ दिन रुक जाएँ तो गाँव का उद्धार हो जाएगा।" इस बार थोड़ा धीमी आवाज में बोले जैसे स्वयं से ही कह रहे हों, “लेकिन रमता जोगी, बहता पानी, देखो कब तक रुकते हैं…। गाँव की किस्मत!" अब उन्हें विश्वास होने लगा था कि यह वही व्यक्ति है जो उनका भाग्य परिवर्तन करेगा।

एक-डेढ़ घंटे लगातार बरसने के बाद बादल छँट गये। लोग झोपड़ी से निकल कर इधर-उधर अपने घर और काम पर जाने लगे।

गाँव में मुन्नर को लेकर तरह-तरह की बातें फैल गयीं। कोई कहता- धनेसरी माई के मंदिर पर एक सिद्ध महात्मा पधारे हैं। बहुत ही ज्ञानी, सारे वेद, पुराण, रामायण, गीता सब कंठस्थ है। देखने में तो अभी लड़के लगते हैं, लेकिन इतने प्रतापी हैं कि उनके गाँव में पैर रखते ही बरसात शुरू हो गयी। कुछ लोग आशंका भी व्यक्त करते- पता नहीं कहाँ से आया है, कौन है? कुछ नवयुवक उनके जासूस या बहुरूपिया होने की शंका भी जाहिर कर रहे थे। जितने मुँह उतनी बातें हो रही थीं।

जो कुछ भी हुआ उससे मुन्नर को इतना फायदा तो हुआ कि लगभग दो दिन से जल रही क्षुधा के लिए भरपेट भोजन मिल गया था। पिछले पंद्रह-सोलह दिनों से लगातार मानसिक यंत्रणा सहने के बाद, लोगों की आँखों में अपने लिए सम्मान देखना सुखद लगा। भ्रमवश ही सही। अब वे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते थे। कनेर के पीले फूल मोहक लग रहे थे। बहुत दिनों बाद उन्हें प्रकृति की किसी वस्तु में आकर्षण दिखा। मन की भावनाएँ वापस लौटती हुयी प्रतीत होने लगीं।

क्रमश..

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Pratap Narayan Singh मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

Pragati Gupta

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Minakshi Singh

Minakshi Singh 2 साल पहले