निपुणनिका--भाग(४) Saroj Verma द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

निपुणनिका--भाग(४)

मौसी के बड़े-बड़े नाखून वाले गंदे हाथ देखकर मैं बहुत डर गया,वो अचानक बढ़ने लगी,उसका सर कोठरी की छत से छूने लगा, उसने जैसे ही मुझे हाथ लगाया, उसके हाथ से धुआं निकलने लगा,शायद फकीर बाबा के ताबीज की वज़ह से,वो जोर से चीखी, उसकी चीख इतनी तेज थी कि सब चीख सुनकर नीचे आ गए, मैं डर के मारे कोठरी से आंगन की तरफ भागा,सब आंगन में आए और मनोज भी,वो सर्र से बाहर आंगन में आ गई और मनोज की गरदन पर अगल-बगल दोनों टांगें लटकाकर बैठ गई।
और बोली तू ही है ना,जो उस रोज मेरे चंगुल से इसे छुड़ाकर लाया था,अब मैं तुझे भी नहीं छोडूंगी।
तभी मौसी को कुछ सूझा और वो भागकर पूजा वाले कमरे में गई और हवन कुंड की पूरी विभूति मनोज के ऊपर उड़ेल दी और वो अचानक गायब हो गई।
फिर हमने सारी बातें घरवालों को बताई कि शुरू से लेकर अब तक क्या हुआ, तभी मामा जी बोले कि बगल में एक बहुत बूढ़ी आजी मां रहती है,उस पुराने महल की कहानी वो ही बता सकतीं हैं,सुबह उनके पास चलते हैं।
हम सुबह उनके पास गए, वो बोली, पुराना महल! वहां तो एक चुड़ैल बसती है, वहां तो सालों से कोई नहीं जाता।
फिर उन्होंने उस पुराने महल की कहानी कहनी शुरू की।
बहुत समय पहले एक राजा वहां रहते थे,उनका नाम अमर्त्यसेन था, उनकी पीढ़ी में वर्षो से कन्या का जन्म नहीं हुआ था, लेकिन उनके पुत्र राजकुमार रूद्रसेन के पैदा होने के बाद उनके यहां एक पुत्री ने जन्म लिया,राजा जी ने बड़े प्यार से उसका नाम निपुणनिका रखा वो बहुत ही खूबसूरत थी।
जब वो बड़ी हुई तो उसकी खूबसूरती के किस्से चारों तरफ फैल गए,कई राज्य के राजाओं ने राजकुमारी के लिए रिश्ते भेजें, लेकिन राजा ने यह कहकर मना कर दिया कि, राजकुमारी निपुणनिका का विवाह उनकी पसंद और मरजी से होगा।
लेकिन राजकुमार रूद्रसेन का एक मित्र था जिसका नाम अपारशक्ति था वो राजकुमारी को मन ही मन चाहता था, उसने कई बार कहने की कोशिश भी लेकिन कह नहीं पाया, क्योंकि वो एक साधारण परिवार से था इसलिए उसकी हिम्मत नहीं हुई,निपुणनिका से कुछ भी कहने की।
बसंत ऋतु का मौसम था, चारों तरफ फूल ही फूल खिले थे,निपुणनिका अपनी सहेलियों के साथ वन-विहार करने गई,वो जंगल के फूलों की ख़ूबसूरती में इतना खो गई कि चलते-चलते बहुत दूर निकल गई और रास्ता भटक गई, कुछ देर बाद उसे ध्यान आया कि वो तो ना जाने कहां आ गई है,वो बहुत देर तक रास्ता खोजती रही लेकिन उसे कोई भी रास्ता नहीं दिखा, घूमते-घूमते प्यास और भूख दोनों लग आए थे,वो थककर एक पेड़ की छाया में बैठ गई और थकावट के कारण उसकी आंख लग गई, तभी थोड़ी देर में कुछ ठक-ठक की आवाज ने उसे जगा दिया, उसे लगा कि कोई है ,तो उसने आवाज की दिशा की ओर जाकर देखा, वहां एक नवयुवक लकड़ियां काट रहा था,शायद कोई लकड़हारा था,निपुणनिका उसके पास आई तो वो उसे देखकर आश्चर्यचकित हुआ, उसने कहा कि आप तो कोई राजकुमारी लगती हैं, यहां कहां से आ गई।
निपुणनिका बोली, हां मैं राजकुमारी निपुणनिका हूं, अपनी सहेलियों के साथ वन-विहार के लिए आई थी,वन की सुंदरता में खोकर, आगे बढ़ गई,रास्ता भटक गई और सहेलियों से भी बिछड़ गई, मुझे बहुत प्यास और भूख भी लगी है।
उस नवयुवक के पास कुछ खाना था, उसने राजकुमारी को बड़े संकोच के साथ दिया और बोला ये आपके लायक़ तो नहीं है लेकिन आपको भूख लगी है तो खा लीजिए।
निपुणनिका बोली,तुम नहीं खाओगे!
वो बोला पहले आप खा लीजिए, फिर मैं खा लूंगा।
निपुणनिका जल्दी-जल्दी खाना खा रही थी तो खाना गले में अटक गया, नवयुवक ने तुरंत सुराही से पानी निकाल कर दिया, नवयुवक,निपुणनिका को खाना खाते हुए बड़े प्यार से देख रहा था और निपुणनिका उसकी तरफ देखती तो वो आंखें दूसरी ओर फेर लेता, निपुणनिका ने खाना खा लिया तो बोली लो अब तुम खा लो।
नवयुवक खाना खाने लगा।
निपुणनिका बोली, खाना बहुत अच्छा, तुम्हारी मां ने बनाया है!
नवयुवक बोला,मेरा कोई नहीं है
निपुणनिका बोली, तो क्या तुमने बनाया है?
वो बोला, हां!
अच्छा चलो,अब चलते हैं, बहुत देर हो गई है, पिता महाराज परेशान हो रहे होंगे,निपुणनिका बोली।
तुम्हारा नाम क्या है? राजकुमारी ने पूछा।
मेरा नाम श्रवन है, नवयुवक बोला।
श्रवन, निपुणनिका को लेकर महल गया, और बाहर से ही लौटने लगा, राजकुमारी बोली, अंदर आओ, तुम्हें पिता जी से मिलवाती हूं।
श्रवन ने महल के अंदर गया,महल की शान-शौकत देखकर उसके मन में लालच आ गया और उसने ठान लिया कि वो निपुणनिका को अपने प्रेम में फंसाकर,इस महल का राजा बनेगा।
फिर क्या था, उसने निपुणनिका से अपनापन बढ़ाना शुरू कर दिया और भोली निपुणनिका भी उसके जाल में फंसती गई, फिर एक दिन उसने महाराज से कहा कि मैं श्रवन से विवाह करना चाहती हूं, महाराज मान गये लेकिन राजकुमार रूद्रसेन को श्रवन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं था, वो नहीं चाहता था कि निपुणनिका की शादी श्रवन से हो।
लेकिन महाराज ने उन दोनों का विवाह कर दिया और आधे राज्य का महाराज भी बना दिया,ये सब रूद्रसेन को मंजूर नहीं था।अब रूद्र और श्रवन दोनों सोच रहे थे कि वो ही पूरे राज्य के राजा बन जाते।

क्रमशः___

सरोज वर्मा__🐾


रेट व् टिपण्णी करें

Sarvesh Vishwakarma

Sarvesh Vishwakarma 2 साल पहले

Kamini

Kamini 2 साल पहले

Nathabhai Fadadu

Nathabhai Fadadu 2 साल पहले

suman

suman 2 साल पहले

geeta

geeta 2 साल पहले