गवाक्ष - 23 Pranava Bharti द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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गवाक्ष - 23

गवाक्ष

23==

कॉस्मॉस पीड़ा से भर उठा था किन्तु अब उसे अपना सफ़र आगे बढ़ाना था। सत्यनिधि भीतर से भीग उठी, उसने आगे बढ़कर कॉस्मॉस को आलिंगन में ले लिया, उसके नेत्रों में अश्रुकण टिमटिमा रहे थे।

कॉस्मॉस के लिए यह एक और नवीन, संवेदनपूर्ण अनुभव था। कई पलों तक वह एक कोमल सी संवेदना से ओत -प्रोत निधि से चिपका रहा । यमराज के मानस-पुत्रों में इस प्रकार की संवेदना ! कुछ पल पश्चात वह निधि से अलग हुआ और हाथ हिलाते हुए पीछे मुड़ -मुड़कर देखते हुए उसकी दृष्टि से ओझल हो गया ।

कॉस्मॉस के मन में एक अजीब प्रकार का आलोड़न चल रहा था। मन में कहीं कुछ था जो उसे कोमल पुष्प की भाँति सहला रहा था, कभी मानो कोई कठोर दंड देकर उसे यंत्रणा देने का प्रयास करता । संसार के सत्य को समझना उसके लिए बहुत कठिन था । न तो वह पूर्ण रूप से संवेदनाओं को अपने भीतर उतार सका था, न ही अपने अर्ध-चेतन मन को वश में कर पा रहा था ।

' सच ही कठिन है पृथ्वी का जीवन' उसने सोचा और एक दिशा-हीन यात्री की भाँति अपने सामने आई राहों पर रुक-रूककर चलता रहा । अपने सामने आए दृश्यों को देखता रहा, चलता रहा और सोचता रहा 'वास्तव में जीवन चलने का ही नाम है, ठहरे और जीवन समाप्त !'

सब बातें उसके अधकचरे मन में आ-जा रही थीं थी, कैसी संवेदना है जो त्रिशंकु सी उसके मन में कभी पृथ्वी पर तो कभी ऊपर आकाश में न जाने कहाँ चहलकदमी कर रही है, संभवत:यही त्रिशंकु की स्थिति है । ऐसे ही दुनिया का तमाशा देखते हुए वह कभी कोई रूप बनाकर चलता रहता, जब लगता कि किसी विशेष स्थान पर वह घुसपैठ नहीं कर सकता, वहाँ अपनी अदृश्य होने वाली शक्ति का लाभ उठाता ।

अपनी पत्नी स्वाति की स्मृति में डूबकर उन्होंने कहा था ;

" अच्छे विचार ही अच्छा मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं। "वे बारंबार अपनी पत्नी के सुविचारों की स्मृति में खो जाते थे ।

सत्यनिधि की स्मृति भी उसे पीछे खींच ले जाती । अपने उच्च विचारों व साधना के सहारे उसने अपने जीवन को एक सुन्दर उपहार बना लिया था । उसके मन में प्रेम, उत्साह, प्रफुल्लता का ऐसा मिश्रण था जिससे कॉस्मॉस के मन में भी पृथ्वी पर रहने की लालसा जागृत हो रही थी।

"यदि हम किसी भी कारण के लिए कुछ करना है तब हमें एक वृक्ष की भाँति अडिग रहने की आवश्यकता होती है । जिससे यदि पृथ्वी पर बीज बनकर गिरें तब कम से कम पौधे बनकर तो उग सकें । ये ही पौधे अगली पीढ़ी को वृक्ष बनकर शीतल छाया प्रदान कर सकेंगे । "

यह कॉस्मॉस तो इन बातों में इतना खोता जा रहा था कि भी भुला बैठता था कि धरती का है ही नहीं ।

क्रमश..