गवाक्ष - 8 Pranava Bharti द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

गवाक्ष - 8

गवाक्ष

8=

एक दिन सैवी ने अपने कॉलेज की ज़हीन छात्रा स्वाति को अपनी ' फ़ैक्ट्री ' के द्वार पर ऑटोरिक्शा से उतरते देखा और वह बैचैन हो उठा । अपने कॉलेज के दिनों से वह उसे पसंद करने लगा था । वह एक मध्यवर्गीय स्वाभिमानी छात्रा थी । उसने पैसे वाले उस बिगड़ैल रईस की ओर कभी ध्यान नहीं दिया था । कई बार प्रयास करने पर भी वह उसके हाथ न लगी । उस लड़की में अवश्य ही ऐसा कुछ था जिसे वह कई वर्ष पश्चात भी भुला नहीं पाया था। वह अपने कार्यालय में किसी से उसके बारे में कुछ पूछ नहीं सकता था, यह उस जैसे अकड़ू रईस के लिए असम्मानजनक व अशोभनीय था । अपने अहं में वह उसके बारे में अपनी मित्र-मंडली से भी बात नहीं कर सकता था, उसे अपनी मखौल बनने का भय था । फिर भी उस युवती के बारे में जानने के लिए वह इधर-उधर हाथ -पैर मारता रहा। कुछ दिनों में उसे ज्ञात हुआ लड़की उसकी ही फ़ैक्ट्री के कर्मचारी की बेटी थी जो अपने पिता की अस्वस्थता के कारण उन्हें कुछ दिनों से दवाई व भोजन देने आती थी। अब उसका साहस बढ़ गया, उसने चुपचाप स्वाति का पीछा करना शुरू किया और एक दिन उसके सामने जाकर अपनी गाड़ी रोक दी, स्वाति आश्चर्य में भर उठी । उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके पिता सैवी के यहाँ साधारण से कर्मचारी हैं ।

"स्वाति ! तुम मुझसे इतना क्यों भागती हो ?"उसने स्वाति से पूछा ।

" हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, एक-दूसरे से भली-प्रकार से परिचित हैं। तुम इतनी अकेली क्यों रहती हो? आखिर मैं एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ, तुम्हारे साथ कोई ---। " उसके प्रत्येक शब्द से 'अहं' रिस रहा था।

"अपनी प्रतिष्ठा से अधिक अपने चरित्र पर ध्यान देना बेहतर है क्योंकि चरित्र वह है जो वास्तव में आप हैं और प्रतिष्ठा वह है जो आपके बाहरी आचरण से लोग आपके बारे में बनाते हैं । " उस चुप रहने वाली लड़की ने उसकी बात बीच में ही काट दी थी और उस अकड़ू के समक्ष वह इतनी बड़ी बात कह गई थी। अपने एक साधारण से कर्मचारी की अदनी सी बेटी से इस प्रकार के तीक्ष्ण प्रहार की बात तो वह स्वप्न में भी सोच नहीं सकता था, वह बगलें झाँकने लगा था ।

"जहाँ तक अकेले होने की बात है, मैं कभी अकेली नहीं हूँ । मेरा वास्तविक मित्र मेरा ज़मीर, मेरा परमात्मा हर पल मेरे भीतर रहता है, मेरे पास रहता है। आपके मित्र तब तक आपके साथ हैं जब तक आपकी जेबें भारी हैं। कभी आवश्यकता पड़ने पर इन मित्रों को आज़मा लीजिएगा --और हाँ, किसीको जीतने के लिए केवल विनम्रता, स्नेह व प्रेम की ज़रुरत होती है न कि दिखावे, धन अथवा घमंड की ----"

वह स्वाति की बात सुनकर भन्ना गया था परन्तु इस घटना के पश्चात वह उसकी ओर अधिक झुकाव महसूस करने लगा। जो उसके जीवन से तिरोहित हो चुकी थी अचानक ही उसके मस्तिष्क के अँधियारे को चीरकर ध्रुव तारे की भाँति जगमग करने लगी। वह अपने इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था। उसके मन के भीतर से मानो कोई बरबस स्वाति के शब्दों की पुनरावृत्ति कर रहा था। उसने अपने मित्रों से इस विषय पर बात करने की चेष्टा की तो स्वयं ही उपहास का पात्र बनने लगा। उसे लगा स्वाति उसकी लपेट में कभी नहीं आ सकेगी ।

हाँ, संभवत: विवाह का बंधन उसे उसके समीप ला सके। न जाने क्यों इस बार उसे उस माँ का ध्यान आया जिसे उसने पिता के दिवंगत होने के पश्चात केवल 'माँ'के 'शो-पीस' के रूप में जैसे घर में एकाकी रहने के लिए बाध्य कर दिया था । और उसने इस विषय पर 'माँ' से चर्चा करना उचित समझा। माँ एक सुलझी हुई स्त्री थीं जो बेटे से भली-भाँति परिचित थीं। उन्हें एक साधारण वर्ग की लड़की के प्रति अपने बेटे का झुकाव उसके व परिवार के लिए हितकर लगा । वे अपने पति की मृत्यु के पश्चात अपनी तथा घर की स्थिति व परिस्थिति सब-कुछ समझती थीं । यहाँ प्रश्न केवल उनके बेटे व परिवार का नहीं था किसी की लाड़ली, बुद्धिमति, स्नेहमयी युवा लड़की के भविष्य का भी था । बेटे पर उन्हें रत्ती भर भी विश्वास नहीं था किन्तु उन्होंने स्पष्ट रूप से बेटे से पूछा था ;

" सत्य ! तुम उस लड़की से विवाह करोगे? विवाह-संस्था पवित्र संस्था है, इसका तुम्हें ध्यान रखना होगा और उस लड़की को परिवार में पूरा सम्मान देना होगा । "

'हाँ, कहने में कितनी देर लगती है? ज़रा सी गर्दन ही तो हिलानी पड़ती है', उसने सोचा । वह स्वाति की ओर आकर्षित था परन्तु  उसको नीचा भी दिखाना चाहता था । विवाह के अतिरिक्त उसके निकट जाने का उसके पास कोई और उपाय नहीं था ।

हमारे समाज में विवाह जीवन का लक्ष्य माना जाता है । सत्यव्रत की माँ उसका विवाह करके अपना कर्तव्य पूरा करना चाहती थीं, वे उसके 'हाँ' की प्रतीक्षा कर रहीं थीं। उन्होंने तुरंत ही स्वाति के पिता को बुलवाकर उनके सम्मुख सत्यव्रत उर्फ़ सैवी के विवाह का प्रस्ताव रख दिया । स्वाति के पिता हतप्रभ थे किन्तु वे इस तथ्य से परिचित थे कि उनका मालिक उनकी बेटी का सहपाठी रह चुका है।

"बेटा, क्या तुम इस रिश्ते को स्वीकार करोगी ?" स्वाति की माँ ने उसके पिता से चर्चा करने के पश्चात अपनी योग्य बिटिया से पूछा ।

पहले उसने अपनी असहमति दिखाई बाद में संभवत: अपने पिता की आर्थिक स्थिति व चार अन्य बहनों के बारे में सोचकर सहमति दे दी। उसे आभास था संभवत:विवाह के पश्चात उसकी स्थिति 'जल बिन मीन' सी हो सकती थी परन्तु बहुत से तथ्यों को जानते हुए भी कई कारणों से उसने स्वीकार कर ही लिया । जीवन में मनुष्य कई बार ऐसे चौराहों पर आकर अटक जाता है कि वह सचेतावस्था में भी गलत मार्ग चुनने के लिए बाध्य होता है, फिर उसे सही मार्ग तलाशने के लिए जूझना पड़ता है, कमर कसकर समस्याओं के लिए जीवन-संग्राम में उतरना पड़ता है। यही स्वाति के साथ घटित हुआ ।

स्वाति की सभी बहनें योग्य थीं, तीन अपने पैरों पर भी खडी हो चुकी थीं परन्तु उसके माता-पिता को बेटियों के विवाह की चिंता में घुन लग रहा था । स्वाति ने कुछ अधिक नहीं सोचा, वह सबसे बड़ी थी, उसके विवाह के पश्चात उसकी अन्य बहनों के विवाह का मार्ग खुलने की संभावना थी।

शर्त रखी गई परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उसे नौकरी छोड़नी होगी और आनन-फानन में विवाह हो गया। बेमेल परिवारों के इस मेल से पूरा समाज आश्चर्यचकित था। सैवी का बदला पूरा हो चुका था।

क्रमश..

रेट व् टिपण्णी करें

Bhart sadhu

Bhart sadhu 1 साल पहले

neelam kulshreshtha

neelam kulshreshtha 1 साल पहले

सैवी का अनोखा बदला चौंका गया।बधाई प्रणव जी!

Pragati Gupta

Pragati Gupta मातृभारती सत्यापित 1 साल पहले

किसी को जीतने के लिए प्रेम और विनम्रता की जरूरत होती है..बहुत सही ..गवाक्ष मेरा पूरा पढ़ा हुआ है। वापस शुरू किया तो रोचक ही लग रहा है

Archana Anupriya

Archana Anupriya 1 साल पहले

Pratap Narayan Singh

Pratap Narayan Singh मातृभारती सत्यापित 1 साल पहले