होने से न होने तक - 45 Sumati Saxena Lal द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

होने से न होने तक - 45

होने से न होने तक

45.

हम लोग समय को लेकर बेहद अधीर हो रहे हैं पर किसी को धक्का दे कर तो जल्दी करने को कहा नहीं जा सकता है फिर भी एक बार पुनः अपना अनुरोध दोहरा कर हम लोग उठ खड़े हुए थे। वहॉ से हम तीनो सीधे आई.सी.पी.आर. की लाइब्रेरी पहुंच थे और वहॉ के डायरैक्टर से मिले थे और एक बार पूरी कहानी फिर से दोहरायी थी। वे भी हॅसे थे जैसे विद्यालय का मज़ाक उड़ा रहे हों। वे तुरंत उठे थे और एक फाइल निकाल लाए थे। पुस्तकालय को लेकर हरियाणा और पंजाब हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का जजमैंण्ट था जिसमें प्रति वर्ष कुछ प्रतिशत पुस्तको को ‘राईट आफ’ करने का निदेश दिया गया था और उसमें से एक जजमैंण्ट में यहॉ तक कहा गया था कि यदि किसी लाइब्रेरी में काल क्रम में कोई पुस्तक फटती व खोती नहीं है तो इसका अर्थ यह है कि वह पुस्कालय उपयोग में नही है।’’

हम तीनो ही उस जजमैंण्ट को पढ़ कर ख़ुश हो गए थे। वहीं के आफिस से उन कागज़ो की फोटो कापी करायी थी और सीधे नीता के घर पहुंचे थे। नीता आज ही वकील से मिल कर आई हैं। तय यह किया गया था कि जजमैंण्ट के साथ इन्हे वकील से नोटिस दिलाया जाए। पर जिन और लोगो से हम लोग मिल रहे थे उन सभी ने यह राय दी थी कि अभी इस मामले को कोर्ट में मत ले जाओ। पहले इन्हें इसे दिखा कर बात करो फिर देखो क्या होता है। क्योंकि यदि एक बार कोर्ट कचहरी का मामला बन गया तो वर्षां लग जायेंगे तय होने मे। फिर इन लोगो का तो कुछ नही जाएगा। एक वकील लगा देंगे। कौन इन लोगों की जेब से कुछ ख़र्च होना है। पर रोज़ कोर्ट कचहरी करने में मिस वर्मा परेशान हो जाऐंगी और सालों तक तन्ख़ा अटकी रहेगी सो अलग।

अगले दिन हम चारों प्रबंधक और अध्यक्षा से मिले थे। उन्हें जजमैंण्ट की कापी दिखायी थी। लगा था क्षण भर को उन दोनो के चेहरों पर सन्नाटा छा गया था पर मिसेज़ चौधरी ने तुरंत ही पैतरा बदल लिया था,‘‘यह सब हम लोगो को पहले से पता था पर प्रशासन में कभी कभी थोड़े समय के लिए कड़ा रुख अपनाना पड़ता है। हम तो स्वयं ही उनकी सैलरी रिलीज़ करने वाले थे। हमे तो दुख इस बात का है कि इस सिलसिले में इतनी बार आ कर आप लोग मिले पर दीपा जी एक बार भी नहीं आयीं। भई जो भी डायॅलाग है वह तो हमारे और उनके बीच में होना चाहिए था। वह तो एकदम ग़ैरों और दुश्मनों की तरह पेश आने लगी हैं।’’और वे हॅसने लगी थीं। मीठा स्वर मीठी मुद्रा।

हम लोग उठ कर खड़े हो गए थे। चलते समय नीता के मुह से स्वभावतः थैंक्यू निकला था। बाहर आ कर केतकी और मानसी ख़ूब गुस्सा हुए थे,‘‘थैंक्यू क्यों बोला। उस लायक है वह औरत कि उसे थैक्यू बोला जाए?’’

रामनाथ ने आ कर बताया था कि प्रिंसिपल मैडम ने याद किया है। हम लोग दीपा दी के पास उनके आफिस पहुॅचे थे। वे बहुत थकी लग रही थीं। हम सब को देख कर भी उनके चेहरे पर वह थकान वैसी ही बनी रही थी। वे विद्यालय छोड़ने का मन बना चुकी थीं और उस समय बैठी हुयी अपने स्वैच्छिक रिटायरमैंण्ट के कागज़ तैयार कर रही थीं।

‘‘दीदी यह तो हार मान लेने जैसी बात हुयी।’’ केतकी ने कहा था।

‘‘हम लोग हैं तो आपके साथ। फिर क्यो जाना चाहती हैं आप?’’नीता ने पूछा था।

वे फींका सा हॅसी थीं,‘‘हॉ नीता मुझे पता है तुम कुछ लोग हो मेरे पास।’’उन्होंने एक बार हम चारों की तरफ बारी बारी से निगाह घुमाई थी फिर हमारे पीछे बने दरवाज़े के बाहर देखने लगी थीं। क्षण भर के मौन के बाद उन्होंने फिर से नीता की तरफ देखा था,‘‘पर ज़रा सोचो तो टुकड़ों में बंटे इस कालेज की प्रिंसिपली कर के भला मैं क्या करुंगी। अब मेरे लिए यहॉ कोई फन नही बचा है। मैं थक रही हूं। इतनी थकान ले कर मैं काम नही कर सकूॅगी। टीचर्स ही नहीं यहॉ तो आफिस के कई बाबू भी उनके एजेन्ट की तरह काम कर रहे हैं। मैं कागज़ मॉगती रहती हॅू और वह नही मिलते। यह रमेश बाबू उन्हे निकाल कर ही नहीं देते। तीन दिन बाद यूनिवर्सिटी से टीचर्स के टाइम बाउण्ड प्रमोशन के लिऐ एक्सपर्ट्स आ रहे हैं और रमेश बाबू कालेज से छुट्टी ले कर बैठ गये हैं। अल्मारी की चाभी उनके पास है और वह घर पर नहीं हैं। दो बार चपरासी उनके घर पर भेज चुकी हॅू। मैं क्या करुंगी, मुझे कुछ पता नहीं। दिन के दिन वह आ भी गये तो क्या। मुझे कुछ तैयारी भी तो करनी है। बिना किसी होम वर्क के मैं उन लोगों को कैसे फेस करूॅगी। इस मीटिंग को किसी तरह से पोस्टपोन कराने की बात भी मैं नही सोच सकती। सारे एक्सपर्ट्स की कन्सैन्ट आ चुकी है। वैसे भी उस से टीचर्स का नुकसान होगा। वे सब लोग दिन गिन रही हैं।’’

‘‘आप उनका एक्सप्लनेशन काल करिए दीदी। चाभी घर ले जाने का मतलब?’’मानसी जी ने गुस्से से कहा था।

दीपा दी ने थकी निगाह से देखा था,‘‘कितने फ्रन्ट एक साथ खोल लूं मानसी। मुझे लगने लगा है कि मैं काम नहीं कर रही,एक हाथ में ढाल और दूसरे हाथ में तलवार ले कर घूम रही हॅू।’’ उन्होने बारी बारी से हम सब की तरफ देखा था। उनकी निगाह सामने दिखते दमयन्ती के कमरे में आते जाते लोगों को देखती रही थी। बगल में मैनेजर का कमरा और उसके बाहर स्टूल पर बैठी नीरजा ‘‘मैं यहॉ न कुछ बेहतर कर सकती हॅू, और न अपनी सारी कोशिश के बाद बुराई को रोक सकती हॅू। फिर लगता है किस लिए बैठी हॅू इस कुर्सी पर? किस लिए इस पर बैठी रहॅू? किसी दिन नीरजा का मिस यूस भी होने लगे तब भी-तब भी मैं तो यहॉ बैठी तमाशा ही देखती रह जाऊॅगी-मैं तो’’ उन्होने अपना वाक्य आधा ही छोड़ दिया था। लगा था उनकी ऑखे पसीजने लगी हैं।

केतकी ने उन्हे ढाढस बंधाया था,‘‘दीदी हम लोग हैं न।’’

‘‘हम लोग भी तो हैं दीदी,’’ मानसी जी ने केतकी की बात को दोहराया था,‘‘किसी दिन नीरजा के साथ ऐसा वैसा कुछ हुआ तो क्या हम लोग चुप बैठे रहेंगे ?’’ उन के साथ हम लोग भी बोले थे।

दीदी खिसियाया सा मुस्कुरायी थीं,‘‘क्या कर लोगे तुम लोग?’’ उन्होने सीधा सवाल किया था। हममे से कोई कुछ कह पाता उससे पहले ही उन्होंने बहुत धीरे से कहा था जैसे अपने आप से बात कर रही हों,‘‘तुम लोग क्या सोचते हो कि कुछ हुआ भी तो क्या नीरजा कुछ बोल पाएगी?उसे नौकरी की बहुत ज़्यादा ज़रुरत है। अभी ही कुछ हो रहा हो तो हमें क्या पता।’’दीदी के स्वर में जैसे विलाप गूजने लगा था। हम सब सन्न रह गये थे। लगा था शायद वे एकदम सही कह रही हैं। हम सब ज़बरदस्ती सत्य की तरफ से ऑखे मूॅदने की कोशिश कर रहे हैं। पर उससे फायदा? ऑखें बंद कर लेने से सच अघटित तो नहीं हो जाता। अभी कुछ दिन पहले ही मानसी जी ने घुमा फिरा कर नीरजा से बहुत कुछ पूछना और जानना चाहा था। पर हर सवाल का हॉ न में जवाब दे कर वह बात करने से बचती रही थी।

वे कुछ देर चुप रही थीं जैसे कहीं दूर देख रही हों। उनका स्वर आत्मालाप जैसा अकेला लगने लगा था,‘‘शायद मेरा कुछ गुनाह होगा जिसकी सजा मुझे भगवान दे रहा है। किया ही होगा कोई गुनाह मैंने।’’वह धीरे से बुदबुदायी थीं और जैसे किसी लंबी व्यथा में डूब गयी थीं।

न जाने क्यों मुझे अचानक शशि अंकल वाला प्रकरण याद आया था। दीपा दी के कहने पर कौशल्या दी का उन्हें यहॉ से हटवाने का प्रयास करना। क्या दीपा दी उसी प्रसंग को याद कर रही हैं? मैं जानती हूं कि वह इस क्षण वही सोच रही हैं। वही एक गुनाह तो किया है उन्होने। पर वह गुनाह कहॉ था।

‘‘मुझसे रुकने के लिए मत कहो तुम लोग। पस्त हो गयी हॅू मैं। अब बचे हुए थोड़े से दिन मैं जूझने और लड़ने में नही निकाल सकती।’’उन्होंने केतकी की तरफ देखा था,‘‘रही केतकी तुम्हारी हार मान लेने वाली बात तो जय पराजय का हिसाब लगा कर क्या करुंगी। वैसी कोई इच्छा भी नही होती। मैंने कालेज से प्यार किया था। वैसे भी नौकरी करने के लिए निकले हैं हम लोग। किसी युद्ध में अपनी विजय पताका नहीं फहरानी मुझे।’’हम सब के ऊपर से फिसलती हुयी उन की निगाहें एक बार फिर से केतकी पर ठहर गयी थीं,‘‘बहुत हुआ अब। इनफ। मैं अब अपने बचे हुए दिन निगेटिव सोच में ख़र्च नही करना चाहती। वैसे भी दो ही साल तो बचा है मेरे रिटायर होने में। उतना पहले ही सही। घर में चैन से तो रहूंगी।’’

सब लोग परेशान से दिखने लगे थे।

थोड़ी देर के लिये सब चुप हो गये थे। उस सन्नाटे को मानसी जी ने तोड़ा था, ‘‘दीदी ठीक कह रही हैं। यह माहौल अब दीदी के रहने लायक नही रहा।’’ मानसी ने कहा था। हम सब ने मानसी की तरफ चौंक कर देखा था। दीपा दी उनकी तरफ देख कर मुस्कुरायी थीं।

‘‘हम लोग तो दीदी चली जाऐंगी तब भी उनके पास रहेंगे। उनसे मिलते जुलते रहेंगे।’’मानसी जी ने अपनी बात पूरी की थी।

उसके बाद जैसे बातचीत की दिशा ही बदल गयी थी। दीपा दी बहुत देर तक बीते दिनों की बात करती रही थीं और उनका स्वर भीगने लगा था,‘‘यह नौकरी ज़िदगी का कितना प्यारा सा सच थी। जब भी कालेज में बीत गये समय को याद करते थे तो एक मीठी सा अहसास होता था। पर इस प्रबंधतंत्र और इस पूरे प्रकरण ने केवल ज़िदगी का आज ही नही बिगाड़ा, सारा का सारा एहसास ही मीलिंगलैस कर दिया। अचानक लगने लगा है कि अब कालेज को याद भी नहीं कर पाऐंगे कभी।’’ मैं मेज़ के इस पार उनके ठीक सामने की कुर्सी पर बैठी हूं। वह कुछ क्षण तक मेरी तरफ देखती रही थीं-पर ऐसे जैसे कुछ और सोच रही हों और मुझ से पार कहीं और देख रही हों, ‘‘बोलो तो भला अब कैसे इस कालेज को याद कर पाऐंगे। चोटें ही तो याद आऐंगी।’’वे कुछ देर के लिए एकदम चुप हो गयी थीं और हाथ में पकड़े पैन से खेलती रही थीं। धीमे से मुस्कुरायीं थीं और उनकी ऑखें भरने लगी थीं, ‘‘यह लोग कभी समझ सकते हैं क्या कि इन्होंने हम से क्या छीना, कितना छीना।’’

मेज़ पर रखी दीदी की हथेली के बगल में नीता ने अपना हाथ रख दिया था,‘‘दीदी यह हमारा दुख क्या समझेंगे, उससे इन लोगों को फर्क भी क्या पड़ेगा भला। इन मूर्खो के पास तो इतनी भी अकल नहीं है कि यही समझ सकें कि इन्होने स्वयं क्या खोया? इतना डैडीकेटेड स्टाफ था इस कालेज में, पर इनके पास बचा क्या है। स्पाइनलैस मूर्ख चापलूसों की भीड़। बिना रीढ़ के लोग या इनसे नफरत करने वाले लोग। साथ में काम करने वाला एक भी साथी नहीं। इतने लंबे चौड़े स्टाफ में वर्कर साथियों की कोई टीम नहीं।’’

‘‘उन्हें रीढ़ की हड्डी के साथ लोग चाहिए भी नहीं थे। उन्हें पैरों पर लोटते कीड़े मकोड़े ही चाहिए थे-दैट दे हैव इन अबैन्डैन्स।’’ केतकी ने कहा तो मुझे लगा था कि शायद सच कह रही है वह। यह भी लगा था कि शायद आज पहली बार वह बिल्कुल भिन्न ढंग से रिएक्ट कर रही है। हम लोगों की तरह ही।

बाहर से घण्टी बजने की तेज़ आवाज़ आयी थी। मेरी नींद एकदम खुल गयी थी। लगा था जैसे कोई बहुत हड़बड़ी में हो और घण्टी के ऊपर उंगली दबा कर खड़ा हो गया हो। मैंने सोचा था कि मानसी जी होंगी। हॅसते हुए दरवाज़ा खोला था तो सामने सहगल आण्टी खड़ी थीं। दाहिने हाथ में दबा हुआ क्लैस्प पर्स और उसके साथ कार्ड्स का एक छोटा सा बण्डल। मैं उन्हे प्रणाम कर के दरवाज़े के किनारे हो कर खड़ी हो गयी थी। आण्ठी ने बहुत प्यार से मेरे कंधे पर हाथ रखा था फिर मेरी पीठ को थपथपाया था और वे कमरे के अंदर आ गयी थीं। वे बहुत ख़ुश और थकी हुयी लग रही हैं। बण्डल में सब से ऊपर रखा कार्ड उन्होने मेरे सामने रख दिया था,‘‘सोलह जून को यश की शादी है अम्बिका। सिंगापुर से कर रहे हैं। हम लोग तो काफी पहले से चले जाऐंगे। तुम अपना प्रोग्राम तय कर लो तो तुम्हारा भी टिकट बुक करा दें। आना ज़रूर।’’ अब तक वे बड़े वाले सोफे के ठीक बीच में बैठ चुकी थीं और उन के सामने वाले छोटे सोफे पर मैं बैठ गयी हूं।

‘‘जी आण्टी।’’ मेरे समझ नही आया था कि इस के अलावा मैं क्या बोलूं। कुछ क्षणों के असमंजस के बाद मैं उठ कर खड़ी हो गयी थी,‘‘आण्टी आप के लिये चाय या काफी या ठंडा कुछ बनाऐं। आप क्या पसंद करेंगी।’’

‘‘कुछ नही बेटा। अब चलूंगी। अभी बहुत काम करने हैं। कार्ड बॉटने हैं। कम से कम अपने ख़ास लोगों को तो ख़ुद ही जा कर देने हैं। कुछ सहगल साहब बॉट रहे हैं और कुछ मैं। गौरी के लिये चौक के एक कारीगर को चिकन का लहंगा बनाने के लिये दिया है। आज वहॉ भी जा कर देखना है।’’आण्टी हॅसी थीं,‘‘चलो ख़ुशी के काम मे थकान भी अच्छी लगती है।’’ वे फिर हॅसी थीं,‘‘आय एम वेरी हैप्पी फॉर यश। बहुत ख़ुश हूं मैं।’’

मन आया था कि पूछू,‘‘और यश?’’ पर मैं चुप रही थी।

वह उठ कर खड़ी हो गयी थीं। उन के साथ मैं भी। डाइनिंग टेबल से सौंफं और मिस्री की चॉदी की डिब्बियॉ आण्टी ने स्वयं उठा कर उन में से दोनो चीज़े निकाल कर अपनी खुली हथेली पर रख ली थीं। दोनो चीज़े मुॅह में डाल कर वे हॅसी थीं,‘‘अपना मुह मैंने ख़ुद ही मीठा कर लिया है। अब चलूं। अपना प्रोग्राम बताना अम्बिका।’’उन्होंने अपना आग्रह दोहराया था।

Sumati Saxena Lal.

sumati1944@gmail.com

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Rajiv 7 महीना पहले

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Jaya Dubey 1 साल पहले

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Arun 1 साल पहले

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Ranjan Rathod 1 साल पहले

Deepak kandya

Deepak kandya 1 साल पहले