केसरिया बालम - 1 Hansa Deep द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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केसरिया बालम - 1

केसरिया बालम

डॉ. हंसा दीप

1

“केसरिया बालम पधारो म्हारे देस” बचपन से ही गाते हुए, अंदर ही अंदर, गहरे तक यह गीत रच-बस गया था। इसके तार दिल से जुड़े थे, मीठा लगता था, कानों में शहद घोलता हुआ। उस मिठास से सराबोर मन हिलोरें लेता रहता, सावन के झूलों जैसी ऊँची-ऊँची पेंग लेकर। इस छोर से इस छोर तक।

माँसा कहती थीं – “किसी की नज़र न लगे तुम दोनों की जोड़ी पर।”

बाबासा मुस्कुराते, अपनी बेटी-कँवरसा पर निगाह डालते, संतोष की साँस लेकर कहते – “थारी माँसा ने बता दे कि धानी तो अमेरिका जा रही है, वहाँ तो मशीनें हैं हर ओर, मशीनों की नज़र ना लगे कभी।”

माँसा मुस्कुरा देतीं। एक ऐसी मुस्कान होती उनके चेहरे पर जो गर्व से अपनी लाड़ली के सुनहरे कल को समा लेती अपने अंदर तक। घर का हर कोना अपने हिस्से की खुशियों की बरसात करता नज़र आता। इसी बरसात में भीगती उनकी बिटिया धानी खो जाती, धानी चुनरी ओढ़ती, अपनी नयी जिंदगी के ताने-बाने बुनती, सखियों के बीच इतराती फिरती। दूर तक फैले उस आकाश में समाती उसकी कल्पनाएँ, कहीं दूर की उड़ान भर लेतीं। इतनी लम्बी उड़ान जहाँ से वापस लौटने में समय लग जाता।

सलोनी, कजरी और धानी तीनों सहेलियों की एक दाँत से रोटी कटती थी। धानी प्यार से सलोनी और कजरी को “मेरी मिट्ठी” कहकर बुलाती थी। आपस में हँसी-ठिठौली होती तो छेड़ती युवतियाँ – “धानी तो ये उड़ कर गयी... फुर्र।”

और ऊपर से गुजरते किसी हवाईजहाज की आवाज उस चुहलबाजी की साक्षी बन जाती।

“हमारी भेंट भी ले जाना साथ में, यह रेत की पोटली।”

“हाँ भई, वहाँ तो धरती पर पैर पड़ेंगे ही नहीं, नरम और गद्देदार कालीनों पर चलेगी धानी।”

“अरे सुन धानी, वहाँ से ऐसे जोर से आवाज लगाना, सच्ची हमें सुनाई दे जाएगी।”

“ऐसे धानी...”

“मेरी मिट्ठी... कजरी... सलोनी...”

“बालम...बलमा...” और सब हँस पड़तीं। अपने-अपने बालम के सपनों में खोतीं, आकाश में गूँजती आवाज सखियों को एक दूसरे का संदेश दे जाती। कितनी मस्ती भरी छेड़खानियाँ थीं! कितनी चुहलबाजियाँ, कितनी कल्पनाएँ व उमंगें थीं। अपने भावी घर-आँगन को छूने की लालसा थी। कुँवारे मन की उड़ान की कोई हद नहीं थी, कोई सरहद रोक नहीं पाती, बस उड़ते ही जाते वहाँ तक, जहाँ तक मन करता, दिन के हर पल, हर क्षण।

उधर धानी उस रेत को हाथ में ले जोर से ऊपर उछालती, गगन में पहुँचाते हुए, सोचती कि अपने नये घर में इस रेत को मिलाऊँगी जो सीमेंट और पानी के साथ मिलकर परदेस में देस की खुशबू देगी। दिल की देहरी बाट जोहती उसकी जो आकर उसे ब्याहेगा, साथ ले जाएगा, सात समंदर पार उस धरती पर जहाँ रेतीले मंजर, बर्फीले मंजर में तब्दील होकर उसकी सारी प्यास बुझा देंगे।

“कभी तुम दोनों को बुलाऊँगी मैं, देखना फिर हम सब उड़ेंगे साथ में।”

“विदेश में!”

“हाँ तो, जहाँ मैं रहूँगी, वहीं तो बुलाऊँगी न!”

“सच्ची!”

“सच्ची।”

साथ रहने की वे कसमें, कसमें ही रह गयीं। वे सब तो साथ नहीं उड़े पर जो उड़ा, वह था मन का भरोसा। मशीनों की दुनिया में सबके मन भी मशीनी हो गए थे। सच कहा था बाबासा ने कि मशीनों की नज़र नहीं लगती। वे तो इंसानों की बनायी हुई हैं, इंसानों का ही दिमाग फिट है उनमें। उन बेजान मशीनों पर बस जंग ही लग सकती थी। वक्त के थपेड़ों को सहते-सहते वे भी आउट ऑफ डेट हो जाया करती थीं। ठीक धानी की तरह, वह तो कुछ ही दिनों में ‘एक्सपायर’ हो गयी थी। देखा जाए तो उसमें और एक मशीन में कोई खास अंतर रहा नहीं कभी। वह मशीन की तरह अपने बालम के प्यार में डूबी, प्यार के इशारों पर चलती रही थी। जब जो बटन दबा दिया जाए, काम शुरू। बिल्कुल कम्प्यूटर की तरह, बाय डिफॉल्ट, हर कमांड में “हाँ” ही होती थी, कोई ‘एरर’ संदेश भी नहीं आता था, न ही कभी बैटरी खत्म होती थी।

बहुत प्यार करती थी धानी उससे, जी-जान से अधिक। इतना अधिक प्यार कि उसकी गलतियों में भी अपने लिये प्यार ही ढूँढती थी। केसरिया बालम की ही छवि तो थी जब शादी हुई थी पर वह केसरिया रंग तो राजस्थान में ही रह गया था। न्यूजर्सी के एडीसन शहर तक आते-आते केसरिया से एक भाग धीरे-धीरे, टूट-टूट कर, वक्त के थपेड़ों से बिखरते-बिखरते सिर्फ ‘केस’ रह गया, एक कोर्ट केस। ऐसा केस जो गाहे-बगाहे उलझाता रहता अपने ही बुने जाल में।

सलोनी कहा करती थी – “धानी, सीधी-सादी मत बनी रहना। ‘हाँ’ ‘हाँ’ करती रहेगी तो सिर पर चढ़ जाएगा तेरा बालम।”

“हाँ ही नहीं, धानी तो बस ‘जी हाँ, जी हाँ’ करती रहेगी।” कजरी-सलोनी की बात का समर्थन करती नज़र आती पर धानी कहाँ मानती थी।

“जी हाँ, जी हाँ, तो चढ़ा लूँगी न बालम को अपने सिर पर, मैं उसके सिर पर और वह मेरे सिर पर।” वह अपने माथे पर मुकुट जैसा आकार बना कर कहती तो सलोनी-कजरी दोनों मुस्कुरा देतीं।

“हाँ, यह दर्शन पसंद आया। इस बात पर तो ताली हो जाए।”

“ओहो, मेरी मिट्ठी, दर्शनशास्त्र और प्यारशास्त्र, दोनों मिलकर दोस्तीशास्त्र में बदलेंगे।”

कजरी उन दोनों को उकसाती नज़र आती, हाथों को माइक बनाकर कहती – “बहनों और भाइयों, ध्यान दीजिए। आज ये दो नवयौवनाएँ अपने शास्त्रों के ज्ञान से आप सबको परिचित करवाएँगी। आइए देखते हैं, जीत किसकी होती है।”

बहनों और भाइयों के नाम पर कुछ उड़ते पक्षी होते तो कुछ सायकिलें और स्कूटर दौड़ रहे होते। सलोनी अपनी बात जारी रखती - “जीत-हार किसी की नहीं होती बस वक्त की होती है।”

“और वक्त को हम अपनी मुट्ठी में रखेंगे।”

तीनों की छह मुट्ठियाँ मिलकर एक नया आकार देतीं अपनी कल्पनाओं को कैद करते हुए। सलोनी का स्वभाव कजरी और धानी से कुछ अलग था। शुरू से ही बड़ी-बड़ी बातें करती थी। उसे उन दोनों की मासूमियत का अंदाजा था। लोग उनका कैसे फायदा उठा सकते हैं, यह भी जानती थी वह। वही बात निकल कर दूर तक चली गयी थी। तब की दी हुई ताकीद कुछ इस तरह सामने आयी कि धानी की समर्पित सोच कुछ नहीं कर सकी। वह रिश्तों के जंजाल में फँस कर रह गयी।

अब तो बात बाहर आ चुकी थी। मन के घाव बाहरी पीड़ा से कहीं अधिक बड़े और अधिक व्यथित करने लगे थे। किसी तरह छुपा लिए जाते अपनी संस्कारी बुद्धि से। लोग सुनते-देखते-पूछते तो बात तो बढ़ती ही, कलह भी बढ़ती। पानी में रहकर मगर से दोस्ती करना ही बेहतर था, अपने ही मगर से बैर करके मछली कब तक पानी में रह सकती थी। अंदर-बाहर की जख़्मी हालत को कौन देख पाता भला? छुपी रही बरसों तक, इसी आस में कि कभी तो ऐसा कुछ होगा जो उसे वही खुशी देगा जिसकी चाह में वह यहाँ तक उड़ आयी थी। इतने सालों में तो परिंदे भी अपने घोंसले सुरक्षित रखना सीख लेते हैं, वह तो फिर भी एक इंसान थी। अपने पंखों को उड़ने से रोकती रही कि इतने नाजुक पंख दर्द का बोझ नहीं झेल पाएँगे और चोटिल होकर कहीं बीच में ही खाई में गिरा देंगे।

सखियों के साथ बिताए वे लम्हे समय के वे पल थे जिन्होंने उड़ना ही सिखाया। गिरने की बात आते ही वे रुक जाते थे। कजरी चुप रहती थी, सलोनी में चंचलता के साथ ही दार्शनिकता भी थी और धानी में सबको अच्छा समझने वाली मासूमियत थी। कोई उम्मीद नहीं, कोई आशा नहीं, प्यार का एक ऐसा रूप जो कभी किसी शब्द, किसी आशा, किसी शिकायत से नहीं बंधा। उन्मुक्त होकर लुटाता रहा अपने आप को, मिटाता रहा अपने स्व को जो पूरी तरह समर्पित था। बरसों तक यही क्रम चलता, शायद मरते दम तक भी अगर बेटी ने माँ को उस अवस्था में न देखा होता। उस एक दृष्टिपात ने वह किया जो धानी ने कभी करना नहीं चाहा था। वह तो पहली नज़र में बसे उस मोहक आकर्षण से ऐसी बंधी थी कि आज भी अपने बालम के उस चेहरे को देखकर प्यार ही उमड़ता, बेइंतहा प्यार।

लेकिन अब उसके बस में कुछ नहीं रहा था। बात बहुत बढ़ चुकी थी। वह दया दिखाकर अपनी गलती दोहराना नहीं चाहती थी। नहीं चाहती थी कि किसी और के साथ फिर कभी ऐसा हो। उसकी तरह सहन करने की शक्ति हर किसी में तो हो नहीं सकती। अब प्रतिकार करना जरूरी हो गया था। अपराधी को नहीं बल्कि अपराध को सजा दिलाने के लिये, उसकी मानसिकता को सजा दिलाने के लिये, उसके अपने केसरिया बालम का केस कोर्ट में था। अपनों से अपनी-अपनी लड़ाई लड़ते, कानून का हवाला देते, अपने-अपने केस को मजबूत करते दोनों पक्ष अड़े रहते।

केसरिया भात और तिरंगे का केसरिया रंग उसके अपने भीतर तक केसर की खुशबू की तरह बसा हुआ था। जीवन के कई मोड़ों पर केसरिया रंग से दोस्ती-सी हो गयी थी। अपनी रंगीली दुनिया में खोयी वह रंगों की सुंदरता में ही डूबी रहती अगर किसी भी रंग को बेरंग करने के कढ़ाव में उसकी डुबकी न लगवायी गयी होती। रंगों की असली पहचान तो अब हुई है जब बीते हुए सालों के वे पल सामने आते, पल-पल की अनुभूतियों के साथ। अपनी धरती से दूर, अपनों से दूर जिसके साथ आयी थी वह भी उसका अपना ही था। धानी के स्व में सिमटा वह एकमेक हो गया था उसके व्यक्तित्व से। सपनों, कल्पनाओं की दुनिया जैसे उसके कदमों में थी।

नयी जमीन ने दिल खोलकर स्वागत किया था उसका। उसने भी उमंगों से उस धरती पर कदम रखा था, उसमें स्वयं को रोपित करने के लिये पूरी तरह से तैयार थी। यहाँ वह सब कुछ पाया जो उसने कभी चाहा था। कब दिन उगता कब रात होती, पता ही नहीं चलता। दोनों एक दूसरे में समाए रहते। ‘मैं’ और ‘तुम’ से ‘हम’ बनने की महज एक रस्म भर थी वह, एक तो वे उसी दिन हो गए थे जिस दिन एक दूसरे को देखा था। नज़रों का वह पहला आदान-प्रदान अपने भीतर प्रेम की अनगिनत किताबें छुपाए था। वह पल जब शरीर अपने वश में नहीं रहा था। न कुछ सुनना, न देखना, न बोलना। बस जीवन के कोरे पन्नों पर छुपे हुए अक्षरों को उकेरते रहना, एक मुस्कान के साथ। अनुभूति को आयाम नहीं देना था। भावों को आवाज नहीं। बस महसूस करना था, दिल के हर कोने तक।

सब कुछ आशाओं के अनुकूल था पर प्रतिकूलता ने जगह बनानी शुरू कर दी थी। विदेशी भात में कंकड़ आते तो करेला और नीम चढ़ा की तरह कड़ुवाहट भरे स्वाद जबान को ही नहीं, तन-मन को भी कड़वा कर देते।

क्रमश..