दानी की कहानी - 8 Pranava Bharti द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दानी की कहानी - 8

बंदर पढ़ लेंगे (दानी की कहानी )

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दानी के दो बच्चे हैं ,दानी अपने बच्चों के बालपन की कहानी भी अपनी तीसरी पीढ़ी से साँझा करती रहती हैं |

बच्चों को बड़ा मज़ा आता ,सोचते ---जब हमारे मम्मी-पापा इतने शैतान थे तो अगर हम शैतानी करें तो क्या बात है |

दानी बच्चों को समझातीं--"बच्चों को शैतान होना चाहिए ,बल्कि हम बड़े भी बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं ,यह कितनी अच्छी बात है |"

"तो फिर आप हमारी शैतानी पर हमें क्यों डाँटतीहैं ?"

"डाँटती नहीं बच्चों ,मैं तुम्हें समझाना चाहती हूँ कि हमें अपने बड़ों की शैतानी से भी तो शिक्षा लेनी चाहिए ---"

"ये तो ठीक कहती हैं दानी ----" सबसे बड़ा समझदार था ,माना जाता |

बड़े भैया समझदारी की बात सुनकर सब बड़ी समझदारी से अपनी गर्दनें हिलाने लगते |

दानी के बच्चे पढ़ने के बड़े चोर थे| दानी बार-बार उन्हें किताब लेकर बैठने को कहतीं |

वो किताब लेकर बैठ जाते |

"किताब लेकर बैठे हो ,पढ़ो तो सही ---" दानी को घर के काम भी करने होते थे |

"आपने ही तो कहा ,किताब लेकर बैठो ----"

दानी खीज जातीं ,वो घर के काम करें कि बच्चों के पास बैठी रहें ?

एक दिन जब दानी के कहने पर भी बच्चे गंभीरता से पढ़ने नहीं बैठे दानी गुस्से से लाल-पीली हो गईं |

रसोईघर से काम करते हुए वो बच्चों के कमरे में आईं और उनकी किताबें उठाकर ले आईं |

"मम्मा ! किताबें दीजिए न -----" दोनों बच्चे उनके पीछे-पीछे आए |

"नहीं ,तुम लोग पढ़-लिखकर क्या करोगे ? रहने दो ---"

दानी किताबें लेकर बॉलकनी में आ गईं ,उनके सामने एक ख़ाली घर था |

पता नहीं उन्हें क्या हुआ ,उन्होंने बच्चों की किताबें जल्दी से एक गमले के पीछे छिपा दीं |

"किताबें दो न मम्मी !" किताबें तो दानी के हाथ में थी ही नहीं |

"किताबें कहाँ गईं मम्मी ?" बच्चे उस खाली घर की छत पर देखने लगे |

दानी हमेशा बताती थीं कि उस छत पर दो बंदर आते हैं ,वो पढ़ना चाहते हैं पर उनके पास किताबें ही नहीं हैं |

किसी दिन मैं तुम्हारी किताबें उन बंदरों को दे दूंगी ,बेचारे पढ़ तो लेंगे |

बच्चे इस बात को मज़ाक समझते थे लेकिन लगता था आज उनका मज़ाक सच्चाई में बदल गया था |

दोनों बच्चे बॉलकनी में बैठकर रोने लगे | पापा के आने का समय हो रहा था ,अब तो पिटाई होने के पूरे आसार थे |

"लेकिन मम्मा ! सामने वाली छत पर तो कोई बंदर नहीं है ---" छुटकी को अचानक ध्यान आया कि छत तो ख़ाली थी |

दानी ने उनसे झूठ तो बोला नहीं था ,वो तो जल्दी से किताबें लेकर आईं और जितनी देर में बच्चे पीछे आते ,उन्होंने एक बड़े के गमले के पीछे छिपा दीं |

"मैंने कब कहा कि सामने वाली छत पर बंदर हैं ?" दानी झूठ भी नहीं बोलना चाहती थीं और बच्चों के मन में पढ़ाई के प्रति रूचि भी पैदा करना चाहती थीं |

"आप ही तो कहती थीं ,बंदर पढ़ना चाहते हैं ,अगर वो हैं ही नहीं तो हमारी किताबें कहाँ गईं ?"

दानी कुछ नहीं बोलीं ,बच्चों को असमंजस में रखकर वो अपने रसोईघर में चली गईं ,उनके कुकर की सीटी बुला रही थी |

कुछ देर तक जब कोई आवाज़ नहीं आई ,वो बाहर गईं जहाँ बच्चों ने किताबें खोज लीं थीं | उनके चेहरे मुस्कुरा रहे थे |

"मम्मा ! देखो ,वो बंदर आ गए ---"

दानी ने देखा ,वास्तव में बंदर छत पर थे,न जाने कब आ गए थे |

"उन्हें किताबें दे दें मम्मा ---? आपने गमले के पीछे उनके लिए ही किताबें छिपाकर रखी थीं न ?"छुटकी ने अपने गालों पर फैले आँसू पोंछ डाले थे |

अब दानी के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था ,वो बच्चों को लेकर अंदर आ गईं |

"चलो अंदर ,बंदर झपट्टा मार लेंगे ----" दानी ने अपनी मुस्कान छिपाते हुए कहा |

अब उन्हें सोचना था कि उन्हें क्या करना चाहिए जो बच्चे पढ़ाई में रूचि ले सकें |

डॉ.प्रणव भारती