मदन टेम्पो चलाता है वरूणा से सरायरंजन । हार्न के अलावा एक अलग से रबर के गुब्बारे वाला पों पों बांध रखा है ।
मजे की बात ये गुब्बारे वाला हार्न सिर्फ मोहल्ले में घुसने पर ही बजाता है ।
गली के मोड़ पर रहनेवाले अब्दुल मियां के यहाँ नई पतोहू आई है । थोड़े खुले मिजाज की है । बेटा रज्जाक तो निकाह के महीने भर बाद ही अमदाबाद चला गया । जरी गोटे का काम है उसका ।
हुआ यूं कि जैसे ही पों पों की आवाज हुई पतोहिया काम छोड़कर छत की तरफ भागी ।
अब्दुल तो खुद घाट घाट का पानी पीये हैं समझते देर नहीं लगी अब जनानी जात से क्या मुंह लगायें । मदन को ही समझाना पड़ेगा । आननफानन में लुंगी संभालते हुए रास्ता छेक लिए मदना का ।
पों पों बजाना छोड़ मदन ब्रेक पर चढ़ता हुआ चिल्लाया "अरे बुढ़ऊ मरना है का । "
अब्दुल गिरेबान थाम लिए उसका और नरम शब्दों की कड़क भाषा में समझाए " अब से ये पोंपों बजाया तो मुझसे बुरा कोई न होगा । "
मदन समझ नहीं पाया गिरेबान छुड़ाते हुए बोला "तोहर बाप के राज है का । "
आसपास के लोग जमा हो गये का हुआ का हुआ । अब्दुल संयत होते हुए बोले "ये बहू बेटियों वाला मोहल्ला है और ये कमबख्त यहीं आकर पों पों बजाना शुरू कर देता है । "
भीड़ में ज्यादातर अब्दुल का ही कुनबा था तो वक्त की नजाकत देखते हुए मदन ठंढा गया " क्या हो गया पोंपों बजा दिए तो । "
जहीर मियाँ छठी बीबी को अंदर जाने का ईशारा देते हुए दखल दिये " हमें न पढ़ाओ बेटा जितने दरजे तुम पढ़े हो उससे ज्यादा तो हमने निकाह पढ़ा है। कह दिया पोंपों नहीं बजेगा तो नहीं बजेगा । "
दबाब बढ़ता देख मदन ने हथियार डाल दिए " चचा ऐसा है हमारे बच्चे ठहरे शैतान । उनकी माई दिनभर धमकाकर रखती है कि पापा आएंगे तो मारेंगे । बच्चे तो बच्चे कितना पीटें ससुर के नातियों को । ऐसा न हो एकदिन पिटने की आदत हो जाए और डरना ही बंद करदें । इसलिए हम गली में घुसते ही पोंपों बजा देते हैं ताकि बच्चे पढ़ने भी बैठ जाएं और हमारा भौकाल भी बना रहे । "
मामला समझते ही जहीर मियाँ खीखी करके हँसने लगे "अरे बच्चे शैतानी न करें तो का हम और अब्दुल करेंगे इस उम्र में । रही बात पढ़ने की तो भेजदिया करो हमारे यहाँ । बिटिया ट्यूशन करती है जहाँ दस पढ़ते हैं वहाँ दो और सही कौन सा उसमें खर्चा बढ़ता है । "
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मदन दोनों बच्चा को ट्यूशन छोड़ने आया है । टेम्पो जैसे ही मोड़कर अब्दुल मियाँ की तरफ से गुजरे तो उन्होंने हाँक लगाई " हो मदन सुनिहअ् । "
मदन टेम्पो धीरे कर दिये तो बोले " अस्पताल चलना है दलसिंहसराय दुलहिन को लेके । "
"कोई बात का चचा । "
" हाँ थोड़ी तबियत नासाज है ? "
"जी अच्छा " कहकर उसने टेम्पो बढ़ा दिया ।
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अभी मदन अस्पताल के जलालपुर तरफ वाले गेट पर जामुन के छांव में टेम्पो लगाकर आराम कर रहा है । दुलहिन धीरे धीरे चलकर टेम्पो में पहुंची तो मदन उठकर ड्राईविंग सीट पर चला गया।
दुलहिन आकर चुपचाप बैठ गई ।
मदन स्वभाविक संकोच से भर उठे " चचा कहाँ रह गये । "
दुलहिन मुस्कुरा उठी " मिठाई लेने गये हैं खुशखबरी है ।"
मदन कुछ सोचते हुए चुप हो गए फिर दुलहिन की तरफ मुड़ते हुए पूछे "एक बात बताइए साल भर हुआ जब से मोहल्ले में आये हैं आपलोग तबसे रज्जाक मियां तो सउदी ही हैं न ? "
दुलहिन ने साउंडलेस धमाका किया " कौन रज्जाक मियां "
मदन चक्कर खाकर गिरते गिरते बचे । फिर जब थोड़ा संयत हुए तब जाकर बोल फूटे "आपके शौहर । "
दुलहिन हँसी " हाहा हमारे शौहर तो आपके चचा हैं दर असल उम्र में इतना फासला है कि बताने में शर्माते है । "
मदन ने एकबार दुलहिन का रूप निहारा उसके सीने पर सांप लोट गया " कैसे मतलब ,क्या मजबूरी थी ?"
वो हँसी " मजबूरी तो कोई नहीं इश्क कह लीजिए आप ।"
"इशश्श्श्क " मदन लगभग चीख पड़ा ।
" हाँ और कुछ कहना मुनासिब न होगा ।" वो अतीत में खो गई " तब ये शाहरूख से ज्यादा हैंडसम और सलमान से ज्यादा फिट हुआ करते थे । हम कुछ ही दिनों पहले यतीम हुए थे । माँ बाप कुछ जायदाद छोड़ गये थे इसलिए कोई समस्या नहीं थी । समस्या थी चौदह की उम्र । हमने घर से निकलना बंद कर दिया था । राशन पानी और गैस लाने जैसी छोटी मोटी इमदाद इनसे हासिल हो जाती थी । ऐसे ही एकदिन अब्बू के एक दोस्त ने हमारा हाथ पकड़ लिया और साथ रहने का दबाब देने लगा ।
इन्होंने उसका हाथ ही उखाड़ दिया और हमारा हाथ पकड़े पहुंच गये मौलवी के घर ।
पठान की बेटी ने खटिक खसम कर लिया, मोहल्ले में थू थू हो रही थी । आजिज होकर हम सब बेचबाच दूसरे गांव में रहने लगे । जब बात खुलती तो गांव बदल लेते।
ये चौथा गांव है ।
फिर मदन की तरफ देखते हुए बोली "अब इस गांव में रहें या छोड़ दें ये तुम्हारे रहम पर है। "
मदन मुस्कुराया " ये बात मेरे सीने में दफन हो गई समझो। "
उसने शंका भरी नजर से देखा तब मदन हँसा "कैसे यकीन दिलाऊं ?"
दुलहिन कुछ सोचकर बोली तुम घर के पास आकर पोंपों बजा दिया करना । जिस दिन नहीं बजाओगे समझ लेंगे बोरिया बिस्तर समेट लेने का टाइम आ गया है ।
इत्ते में अब्दुल आ गये फिर रास्ते भर खामोशी रही । दरवाजे पर उतर कर दुलहिन ज्योंहीं चौखट के पास पहुंची मदन ने अपना पोंपों बजा दिया ।
अब्दुल फोंफियाये " मसखरी करता है हमसे । "
दुलहिन खीखी कर हँसते हुए अंदर की तरफ भागी ।
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अब मदन मौहल्ले में बिना डरे पोंपों बजाता है उसे पोपों की आवाज में दुलहिन की खी खी सुनाई देती है।
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आज खूब लंबा तगड़ा नौजवान पठानी सूट पहने सूमो विक्टा में सवार अब्दुल मियां के घर पर पहुंचा है । खुद को रज्जाक बताता है ।
अब्दुल को उसकी मेहरारू के साथ मुँह काला करने के आरोप में उसने खूब मारा । दुलहिन को भी दो चार हाथ जमाया और फौरन से कपड़ा लत्ता गहना गुड़िया समेट सूमो में बैठने का आदेश देकर खुद सुस्ता रहा है ।
अब्दुल मोहल्ले भर का पैर पकड़ रहा है कि कोई रज्जाक नहीं है ये झूठ बोल रहा है ।
लोग उलटकर पूछ रहे हैं कि रज्जाक नहीं है तो ये किसकी बीबी है ।
अचानक से मदन का ऑटो भीड़ में घुसता है तो अब्दुल आटो की तरफ दौडता है बचा लो बेटा देखो वो जबरदस्ती कर रहा है । आश्चर्य इतनी भीड़ और हो हल्ले में भी मदन पोपों नहीं बजा रहा है ।
मदन की नजरें दुलहिन से मिलती है तो वो सर झुका लिए । दुलहिन घृणा से उसके मुंह पर थूक देती है । झपटकर उसके ऑटो से पोंपों खोलकर मदना के हाथ में पकड़ा देती है और हिकारत से कहती है "बजा इसको अब क्यों नहीं बजाता मेरी जिंदगी के राज तो भोंपा लगाकर सुना आया । "
मदन सिर झुकाये सफाई दे रहा है " वो पिछले हफ्ते दलसिंहसराय गया था ताड़ीखाने देखा तो तलब लग गई वहीं शायद । "
दुलहिन ने आँखों से अंगारे बरसाये " तू चाहता की गाँव में न रहें तो कह देता यूं फजीहत कराने की जरूरत क्या थी । "
उधर रज्जाक पूरे गाँव के सामने वोटर आईडी और आधार कार्ड लहरा रहा है सबूत के तौर पर ।
मदन पोंपों लेकर टेम्पो पर चढ़ गया और बजाकर सबका ध्यानाकर्षण करते हुए चिल्लाया "इस सबसे कुछ न होगा असल है तो निकाहनामा दिखाओ । "
रज्जाक एंड कंपनी ने ये बात शायद सोची न थी । वे धीरे धीरे खिसकने लगे । गाड़ी में बैठते हुए उसने दाँव चला " एकबार ये भी पूछ लो खसम नहीं है तो बच्चा किसका है ।"
"मेरा है क्या कर लेगा ? भाग भूतनी के ",मदन ने पोंपों फेंक कर मारा । गाड़ी आगे बढ़ गई थी । पोंपों गिरते हुए धीरे से बजा । लेकिन बहुत जोर का सुनाई दिया । मदन की बात से सब सन्नाटे में आ गए थे ।
जहीर मियाँ लाठी लेकर आ चुके और भी कुछ लोग जूता चप्पल झाड़ू डंडा टाइप के हथियारों के साथ मदन पर टूट पड़े ।
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उसको अधमरा कर भीड़ बदचलनी की सजा देने अब्दुल का दरवाजा तोड़ रही थी । लेकिन अब्दुल तो दुलहिन के साथ नये ठिकाने की तरफ बढ़ चले थे ।
बच्चों का झुंड लगातार पोंपों बजाए जा रहा था लेकिन मदन की आँखें धीरे धीरे बंद होती जा रही थी ।
कुमार गौरव