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निर्वाण - 2

निर्वाण

(2)

गौरांग-सा दिव्य रूप था नकूल बोधिसत्व का! उनके चेहरे पर हमेशा बनी रहने वाली स्मित मुस्कान से लगा था, वह जीवन के अनंत दुखों के पार कहीं स्थायी ठिकाना पा गये हैं। कितनी अद्भुत, कितनी विरल होगी वह अवस्था... अपने अबुझ दुखों, अनचीन्ही कामनाओं की गठरी उठाए मैं उनके पीछे-पीछे अनायास चल पड़ा था, जाने किस प्रत्याशा में! उन्होंने भी मना नहीं किया था, आने दिया था मुझे अपने साथ, एक रूहानी सफर पर! मगर उस वक्त मुझे पता नहीं था, शरीर का दाय अभी पूरी तरह चुका नहीं है! देह की मिट्टी उर्बर भी है और प्यासी भी! उसके बाद कितने स्तूप, कितनी मोनस्ट्रीज, कितने मंदिरों की यात्राएं...

टालिंग चांग, था खा, डामनोएन सादुआक फ्लोटिंग मार्केट के बाद बांग कु वीयांग मार्केट पहली बार उन्हीं के साथ गया था एक दिन, अल्लसुबह! थायलैंड में पानी पर तैरते बाज़ारों की एक अनोखी दुनिया है ये। बहती नदी, कनालों पर ठहरी हुई रंग-बिरंगी दुनिया! देश-विदेश से आए सैलानी यहाँ हर समय मधु मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहते हैं।

इस बाजार में युवा और समर्थ भिक्षुओं को सहज ‘टाक बात’ यानी भीख मांगते हुये देख कुछ अजीब-सा लगा था। मेरे प्रश्न पर नकुल बोधिसत्व आसपास से गुजरती हुई औरतों के स्पर्श से बच कर चलते हुये हमेशा की तरह मुस्कराइए थे- हमें हर मोह-माया से दूर रहना होता है, न कुछ जोड़ना न साथ ले जाना! हर अर्थ में अकिंचन!

‘वाट फ्रा केव’ मंदिर में बुद्ध के छयासठ सेंटी मीटर लंबी पन्ने की मूर्ति को देखते हुये मैं सुन नहीं पाया था नकूल बोधिसत्व की बातें, मेरी आँखें उस ठंडी हरीतिमा में शांति ढूंढती फिर रही थी।

भीतर एक आग थी और साथ ही शांति की चाह! इसी में दूर तक भटकता रहा था। 178 म्युरल पेंटिंग के जरिये दो किलोमीटर लंबी गैलरी में रामायण कथा का विस्तृत विवरण देख लगा था, खुद से दूर नहीं गया हूँ। अजीब-सी अनुभूति थी वह। चन्दन के लेप-सी! प्राचीन संस्कृति की जड़ें जाने कहाँ-कहाँ से निकलती है और कहाँ तक जा कर फैलती है! एक अजनबी धरती पर गरुड़, इंद्र, विष्णु, हनुमान, उर्वसी जैसे भारतीय धार्मिक चरित्रों को मंदिरों के भित्ति चित्रों में, मूर्तियों में देख कर अपनी जमीन के करीब होने का अहसास होता रहा था। 400 बहत का टिकट काट कर मंदिर में प्रबेश करना तो जरूर अखरा था, मगर नंगे पाँव जाना नहीं। कहीं-कहीं हमारे देश की तरह ही यहाँ के मंदिरों में बांह कटे कपड़े या हाफ पैंटस में जाना निषिद्ध है। हर जगह दूसरी संस्कृतियों के साथ हिन्दू संस्कृति की झलक दिखाई देती है। इन अनुभवों से गुजरते हुये हर पल लगता रहा था, एक प्राचीन और भव्य सभ्यता का अभिभाज्य अंग हूँ मैं।

‘वाट फो’ मंदिर में लेटे हुये बुद्ध की सोने के पत्तों से ढँकी प्रतिमा के मोतियों से जड़े पैरों को देख कर अद्भुत प्रतीत हुआ था। इस दुनिया के इंसान चाहे कितने भी गरीब हों, वह अपने भगवान को कभी गरीबी में रहने नहीं देते! साधारण ग्वाले के घर पलते कन्हैया, गरीब मरियम, साई- आज सभी सोने-जवाहरात से लदे दिखते हैं। भूखे-नंगों के अमीर भगवान! हर जगह, हर देश में! मेरी बात सुन कर नकुल बोधिसत्व सहज मुस्कराए थे- यहाँ के भगवान ही नहीं, कई भिक्षु भी बहुत अमीर हैं! अब मत पूछना कैसे। जहां मनुष्य है, वहाँ मलीनता है!

इस मंदिर में बुद्ध की हज़ार तस्वीर, 91 स्तूप देखते हुये दिन ढल गया था। लौटते हुये नकूल बोधिसत्व ने कहा था, फिलहाल तुम लौट जाओ, जीवन से तुम्हारा मोह नहीं टूटा अभी! जब तक दुख-सुख नहीं जानोगे, उनसे मुक्ति की कामना कैसे जगेगी! जवाब में मैं कुछ कह नहीं पाया था, बस रोया था उनके पैरों से लिपट कर! जाने मेरी कौन-सी चोरी पकड़ी गई थी। उन्होंने भी आगे कुछ और नहीं कहा था, मुझे रोने दिया था चुपचाप।

उनसे विदा ले एक महीने बाद मैं दुबारा माया के गाँव फुयांग लौट आया था। मगर माया से मुलाक़ात नहीं हो पाई थी। उसके परिवार वालों ने बताया था, माया बैंकॉक लौट गई है। अपनी जिस बूढ़ी नानी की बीमारी में उनकी देखभाल करने के लिए वह अपनी नौकरी छोड़ कर बैंकॉक से आई थी, दो हफ्ते पहले उनकी मृत्यु हो जाने से वह फिर बैंकॉक लौट गई थी। उसका नया पता मुझे नहीं मिल पाया था। फोन भी लगातार बंद आ रहा था। निराश हो कर मैं भी दूसरे ही दिन बैंकॉक चला आया था। माया की अनुपस्थिति में अब फुयांग में मेरे लिए कुछ रह भी नहीं गया था।

बैंकॉक में मैं अपने उपन्यास के काम में एक बार फिर बेमन से जुट गया था। खुद को अपने इस अनाम-से अवसाद से उबारना जरूरी महसूस हो रहा था। लगता था, चलते हुये एकदम से दुनिया के आखिरी सिरे पर पहुँच गया हूँ। इसके बाद कहीं कोई जमीन नहीं, बस शून्य है- हरहराता हुआ नीला, धूसर... जितनी दूर नजर जाय! माया में अचानक से आई तब्दीलियाँ, उदासीनता मुझे यातना से भरे हुये थी। उससे दूर जा कर भी जा नहीं पाया था, परास्त-सा लौटा था उसके गाँव मगर उसका इस तरह वहाँ से भी चला जाना मुझे भीतर तक मथ गया था। ऐसा क्या किया था मैंने, आखिर किस बात से नाराज थी वह मुझसे! मैं अक्सर सोचता रहता था।

मन की अबुझ और यंत्रनादायक संवेदनाओं से छुट जाने की कोशिश में मैं इस जमीन की आस्था और किस्से-कहानियों में जीवित आत्माओं और भूत-प्रेतों की दुनिया में अपने अजाने ही ना जाने कब जा बसा था। मनुष्यों की दुनिया के समानान्तर चलती अशरीरी शक्तियों की एक और अद्भुत, लोमहर्षक दुनिया! थाई संस्कृति में गृह देवता, पूर्वज और प्राकृतिक आत्माओं के साथ-साथ भूत-प्रेतों की भी खूब महत्ता है। चारों तरफ इन आत्माओं और भूतों के छोटे-छोटे लकड़ी के बने मंदिर देखे जा सकते हैं- घरों के बाहर, गलियों में, पेड़ों के नीचे। सभी इन आत्माओ और भूतों को प्रसन्न रखने की कोशिश में इनकी पूजा-अर्चना करते रहते हैं। थायलैंड के अलावा यहाँ के पड़ोसी देशों- कंबोडिया, लाओ और मलेशिया में भी इनमें से कुछ भूत समान रूप से प्रसिद्ध हैं। इन से जुड़ी एक से एक कहानियाँ सुन कर दंग रह जाना पड़ता है।

युवासाक, एक टुरिस्ट गाइड जो वर्षों किसी मोनास्ट्री में रह कर एक दिन वहाँ से भाग आया था, उसके पास इन तरह-तरह के भूतों की अनगिनत कहानियाँ थीं। कहता था, भूतों के साथ उसका रोज का उठना –बैठना है। जिस कब्रिस्तान के पास एक छोटे-से लकड़ी के केबिन में वह रहता था उसके चौकीदार मैत्रैय का कहना था कि उसे पूरा शक है कि युवसाक खुद एक चलता-फिरता प्रेत यानी ‘फी का ताइहोंग’ है और उसे इस बात का इल्म नहीं है। दरअसल थायलैंड में ‘फी का ताइहोंग’ एक ऐसे भूत को कहते हैं जो कब मर गया है, उसे खुद पता नहीं होता। युवासाक के जर्द चेहरे, पीली रंगत और लंबे-सूखे डील-डौल को देख कर मुझे भी कई बार इस बात का अंदेशा होने लगता था। फिर दूसरे ही क्षण अपनी ही सोच पर हंसी भी आती थी- क्या मुझे सचमुच थायलैंड के प्राचीन भूतों ने अपने गिरफ्त में ले लिया है!

युवासाक हफ्ते के दो-चार दिन गाइड के काम पर निकलता, बाकि के समय शराब पी कर अपनी खाट पर पसरा-पसरा पॉर्न फिल्में देखता रहता। कहता था, इन सुंदरियों को देख कर ही भूतों के आतंक को भुलाये रहता हूँ वर्ना तो ये जिन्न, चुड़ैले रात भर सोने ना दे। शोर मचाते रहते हैं। कुछ ही दिनों में मेरी उससे अच्छी दोस्ती हो गई थी। दोस्ती का कारण यही भूत-प्रेतों की कहानियाँ और उसकी टुरिस्ट गाइड की हैसियत से थायलैंड की विभिन्न जगहों के विषय में अच्छी जानकारी था।

एक दिन सप्ताहंत में मैं उसके पास एक अच्छी शराब की बोतल ले कर गया था। उसने मुझसे कहानी सुनाने का वादा किया था। उस दिन सुबह से मौसम बदलाया हुआ था। शाम होते-होते बिजली की कडक और तेज गरज के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी। शहर के उस बाहरी ईलाके में तूफान के साथ बिजली भी गुल हो गई थी। ऊपर से कड़ाके की ठंड! देर रात तक हम मोमबत्ती जला कर बैठे रहे थे। युवासाक ने उस रात गरम ‘टॉम याम’ सूप पीते हुये लोक कथाओं में प्रचलित भूतों की ढेर सारी कहानियाँ सुनाई थी।

यहाँ के लोग मानते हैं, भूतों के डेरे कुछ खास जगहों में होते हैं जैसे कुछ विशेष तरह के पेड़, बौद्ध मंदिरों से लगे कब्रिस्तान, पुराने खाली मकान... युवासाक ये बातें इतनी संजीदगी से कर रहा था कि मैं खुल कर मुस्करा भी नहीं पा रहा था। ठीक हमारे देश की कहानियों की तरह जिन्हें हमारी नानी-दादियाँ आज भी बच्चों को सुनाया करती हैं। वही मंदिर के पास पीपल पर रहने वाले भूत, खाली मकानों और पुराने कुओं में बसने वाली प्रेतात्माएँ...

भूतों के उपद्रव से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं, कहीं पूजा-अर्चना तो कहीं पशुओं की बलि! कई बार मैंने खुद लोगों को सूअर की बलि दे कर उसके सर को पका कर बतौर प्रसाद खाते देखा है।

भोर होने से कुछ पहले ‘नोक्खाओफीका’ भूत की कहानी सुनाते-सुनाते युवासाक शराब के नशे में आखिर एक तरफ ढुलक कर खर्राटे भरने लगा था। ठीक उसी समय केबिन में जलती आखिरी मोमबत्ती बुझ गई थी और उसके साथ ही कब्रिस्तान के बीचोबीच खड़े विशाल जटाओं वाले प्राचीन पेड़ पर एक साथ कई उल्लू बोल उठे थे। सुन कर मेरे शरीर पर कांटे उग आए थे। अभी-अभी युवासाक ने बताया था, ‘नोक्खाओफीका’ भूत के आसपास होने से कई उल्लू एक साथ बोलने लगते हैं! कुछ इसी तरह...

थायलैंड के देह व्यापार के विषय में जाने बगैर थायलैंड की कहानी अधूरी ही रहेगी- युवासक ने ही कहा था मुझसे। मोनास्ट्री से भाग आने के बाद कई साल उसके इन्हीं बदनाम गलियों में बीते थे। वैसे भी टुरिस्ट गाइडों से इनका साबका पड़ता ही रहता है। तो अशरीरियों की दुनिया से निकल कर देह की मशहूर मंडियों में पहुंचा था उसके साथ- औरत, मर्द, बच्चों से सजे ‘गोगो’ बार, ब्रोथेल्स, होटेल्स, मसाज पार्लर, रेस्तरां, सौना, होसटेस बार, बीयर बार... हर तरफ देह, देह के उन्मुक्त निमंत्रण! एक कराओके बार में बैठ कर गीत सुनते हुये एक सुंदर कॉल गर्ल से बात हुई थी। उसके उठ कर जाने के बाद युवासाक ने मुझे बताया था कि वह एक ‘लेडी बॉय’ अर्थात स्त्री के भेष में पुरुष था। सुन कर मैं दंग रह गया था। इनके बारे में मैंने सुना तो था, मगर कभी इस तरह मिला नहीं था।

वियतनाम युद्ध के बाद थायलैंड में देह का व्यापार बढ़ा है। ‘को समुई’ आईलैंड, बैंकॉक का पाटपोंग, नाना प्लाज़ा, पट्टाया, फुकेट- ये सभी जगह देह व्यापार के बड़े केंद्र हैं। इसके साथ ‘हाट याई’ जैसे बार्डर इलाके के मलेशियन शहरों में भी देह की बड़ी मंडियाँ लगती हैं। लुंफिनि पार्क, सेंट्रल बैंकॉक के देह बाजार बहुत मशहूर हैं। ‘अब ऑब’ में जापान के ‘सोपलैंड’ की तरह मसाज, स्नान के साथ दूसरी तरह की सेवाएँ भी मुहैया कराई जाती है। ‘प्रीटी स्पा’ आदि जगहों में देह का धंधा खुल कर होता है।

कम्युनिस्म के खत्म होने के बाद दूसरे देशों की तरह यहाँ भी रशियन लड़कियों की भरमार लग गई है! यहाँ के बीयर बारों में तितली के रंगीन जत्थों की तरह इन्हें उड़ते-फिरते देख मुझे गोवा के समुद्र तट और मांडवी नदी पर तैरते कसीनोज की याद हो आती है। गोरे रंग के दीवाने भारतीय पुरुषों में ये गोरी मेमें बहुत लोकप्रिय है इन दिनों... भूख इंसान को कैसी-कैसी यात्राओं पर ले चलती है!... और इस सनातन यात्रा का कोई अंत भी नहीं!

ना जाने क्यों चमचमाते बाज़ारों में खिलौनों की तरह सजी इन औरतों को देख कर भीतर एक अंधेरा-सा घिर आता है। यहाँ औरत का बस एक ही रूप है, एक ही परिचय। घर से निकलते हुये ये अपने दूसरे सारे नाम, परिचय घर में ही छोड़ आती है और शायद रात के अंत में साँप के केंचुल की तरह अपना जूठा, रंगा-पूता शरीर बाज़ार में उतार जाती है।

सालों पहले मुंबई के कामाथिपुरा रेड लाइट इलाके में एक डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाने के सिलसिले में गया था। तब मैं असिस्टेंट डिरेक्टर हुआ करता था। मुर्गी के दड़बों की तरह छोटे-छोटे घरों से झाँकते असंख्य गोरे-काले चेहरे, हर तरफ खुली नालियाँ, बदबू के भभाके और मांस के लोभी ख़रीदारों की भीड़... लगा था, वहाँ कुछ देर और ठहरूँगा तो मेरा दम घुट जाएगा। वहाँ सिर्फ देह नहीं, भूख, बेबसी, इंसानियत भी बिकती है। बचपन, सपने और जाने क्या-क्या...। मेरे कानों में आज भी उस बच्चे की आवाज गूँजती है जो “साहब औरत चाहिए? मेरी माँ है...” कह कर मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था। उसकी आँखों को देख कर लगा था, उसे पता तक नहीं वह क्या बोल रहा है। वह तो बस रोटी की जुगाड़ में भूख की जुबान बोल रहा था।

मेरा अनुभव सुन कर हमारी फिल्म के स्क्रीप्ट राइटर डॉ॰ कबीर ने कहा था- “ये जुबान तो दुनिया के हर कोने में बोली-समझी जाती है। इस पर कोई झगड़ा नहीं है अरिंदम! धरती का प्राचीनतम व्यवसाय वेश्यावृत्ति ही है! हर बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज स्त्री की देह है। अपने देश में देवदासियाँ हैं तो विश्व के दूसरे प्राचीन देश- ग्रीस, रोम आदि में पवित्र सेक्स या धार्मिक कर्मकांड के नाम पर औरतों का दैहिक शोषण हमेशा से होता रहा है। उस दिन डॉ॰ कबीर से सुनी दुनिया भर में तरह-तरह के नामों से प्रचलित वेश्यावृत्ति की कहानियाँ किसी चलचित्र की तरह मेरे दिमाग में दिनों तक चलती रही थी-

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