आओ चलें परिवर्तन कि ओर... - 2 Anil Sainger द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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आओ चलें परिवर्तन कि ओर... - 2

लगभग तीन महीने बाद जब मेरी परीक्षा का परिणाम आया तो पिता जी ने बोला कि बेटा दिल्ली चले जाओ और आगे की पढ़ाई करो | मैंने उन्हें यह कह कर टाल दिया कि अभी मैं आगे नही पढ़ना चाहता हूँ | नौकरी या कहीं प्रशिक्षण प्राप्त करने की कोशिश करूँगा | यदि मुझे कहीं प्रशिक्षण या नौकरी नहीं मिली तो फिर आगे पढ़ने की सोचूंगा | इस पर पिता जी ने ‘हाँ’ की मुहर लगा दी |

असल में मैं, दिल्ली आना ही नहीं चाहता था | मुझे डर था कि यदि इस समय मैं दिल्ली जाता हूँ तो मुझे कॉलेज परिणाम लेने जाना पड़ेगा | वहाँ उसके दोस्त फिर से टकरा गए तो मैं क्या करूँगा | यह सोच कर मैं उधमपुर में ही रहा और परिणाम निकलने के तीन महीने बाद कॉलेज परिणाम लेने गया |

*

मैंने काफ़ी जगह नौकरी की परन्तु हर जगह मैंने आठ दस दिन के बाद ही छोड़ दी | कहीं भी मुझे आंतरिक संतुष्टि(internal satisfaction) नहीं मिल पा रही थी | हर बार की तरह मैं उस दिन भी एक नौकरी छोड़ कर घर लौटा था | घर पर कोई आया हुआ था | मैंने उस व्यक्ति को पहले कभी नहीं देखा था | मैं उस व्यक्ति को नमस्कार कर अपने कमरे में चला आया | अभी मैंने कपड़े बदले ही थे कि पिता जी की आवाज़ सुनाई दी, वह मुझे बैठक में आने को कह रहे थे | मैं अनमने मन से बैठक में गया तो पिता जी ने मेरा उस व्यक्ति से परिचय करवाया | पिता जी ने बताया कि वह एक कम्पनी में क़ानूनी सलाहकार है और जिस कम्पनी में यह काम करते हैं उसमें लेखा(accounts) विभाग में अभी-अभी एक अकाउंटेंट का पद खाली हुआ है | यदि तुम इच्छुक हो, तो यह तुम्हारे लिए कोशिश कर सकते हैं | मैं आज ही एक और नौकरी छोड़ कर आया था सो मैंने हाँ कर दी |

*

मुझे पहली बार ऐसा लगा कि मैं जिस नौकरी और जिस माहौल को तलाश रहा था, शायद वह यही था | मैं पहले दिन से ही सब से अलग-अलग रहता था और अपने काम के अलावा कभी किसी से बात नहीं करता था | यह बात स्वागत कक्ष में काम करने वाली दोनों लड़कियों जिनका कि नाम शशि व प्रोमिला था, बिल्कुल भी पसंद नहीं थी | दोनों ही बोलने में बहुत ही तेज़ थीं और हमेशा मौके की तलाश में रहती थीं कि कैसे मेरी खिंचाई की जाए | धीरे-धीरे प्रोमिला मेरे नज़दीक आने लगी, जबकि मेरा ध्यान सिर्फ़ अपने काम पर ही था|

वह जब भी कभी खाली होती थी या जब भी बॉस नहीं आते या देर से आ रहे होते थे तो मेरे पास आ कर बैठ जाती थी | मेरे दिलचस्पी ना लेने के बावजूद मुझसे बातें करती रहती थी | एक दिन जब वह बिना किसी काम के मेरे पास आकर बैठी तो मुझ से रहा नहीं गया | मैंने बोल ही दिया “तुम मेरे पास ज्यादा आ कर मत बैठा करो, लोग पता नहीं क्या बातें बना रहे होंगे?”

“तुम लोगों की बातें छोड़ो, अपनी बात करो | डरना मुझे चाहिए और डर तुम्हें लग रहा है | मेरा यहाँ आकर बात करना तुम्हें नहीं पसंद तो मैं आज से तुम से बात नहीं करुँगी |” कह कर वह वहाँ से चली गई |

उस दिन के बाद से वह भोजनावकाश(lunch) के समय भी देर से आती और सबके कहने के बावजूद जल्द ही भोजन कर चली जाती थी | जब काफी दिन ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन मैंने ही उसके पास जा कर माफ़ी मांगी और कहा “आप बेवज़ह मुझसे नाराज़ हैं जबकि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था | मैं तो आपके लिए ही कह रहा था......|”

वह गुस्से से बोली “तुम मेरी चिंता क्या करोगे, यदि करते होते तो तुम्हें सब कुछ दिखता | तुम तो न सिर्फ़ आँखों से अंधे हो, बल्कि दिमाग़ से भी पैदल हो | तुम्हारे बारे में लोग जो कहते हैं, शायद वह सही है | तुम बहुत ही डरपोक और बेवकूफ किस्म के हो | तुम्हें तो आज से सौ साल पहले पैदा होना चाहिए था |”

उसकी यह बात सुन कर मुझे हंसी आ गयी और मेरे साथ वह भी हँसने लगी |

वह हँसते हुए बोली “तुम अपने आप को लोगों से अलग क्यों समझते हो?”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है |”

“हो ही नहीं सकता, तुम जान बूझकर चार-पांच लोगो के बीच में से उठकर चले जाते हो |”

“नहीं, तुम्हें ऐसा गलत लग रहा है |” मैं हैरान हो कर, कुछ अटकते हुए बोला और शायद वह इसको समझ गई थी |

“चलो छोड़ो, अगर तुम नहीं बताना चाहते हो तो कोई बात नहीं |”

“जब ऐसी कोई बात है ही नहीं, तो मैं तुम्हें क्या बताऊँ |”

“मैं कह तो रही हूँ, छोड़ो इस बात को, कोई और बात करो |”

मैं अन्दर ही अन्दर यह फैसला कर नहीं पा रहा था कि इससे कुछ बात करूँ या न करूँ |

मेरे आंतरिक संघर्ष(inner conflict) को समझते हुए, वह बात को टालते हुए बोली “तुम्हारे कॉलेज का समय कैसा गुज़रा? शायद उसके बाद यह तुम्हारी पहली ही नौकरी है|”

“हाँ |”

“तो फिर तुम्हारा यह बर्ताव ठीक ही है |”

“वह कैसे ?”

“कॉलेज और नौकरी में फर्क तो होता ही है | वहाँ सिर्फ़ मस्ती होती है, तुमने भी जरूर की होगी |”

“हाँ, सो तो है |”

“तो फिर वहाँ का कोई मज़ेदार किस्सा ही सुनाओ | मैं तो कॉलेज जा ही नहीं पायी | मेरे घरवालों को पसंद ही नहीं था | इसलिए मैं नौकरी के साथ-साथ पत्राचार से ही ग्रेजुएशन कर रही हूँ |”

“ओह-हो ! यह तो तुम्हारे घरवालों की बहुत ही ज्यादती है |”

“हाँ, आज भी हम लोग लड़कियों के मामले में वहीं के वहीं खड़े हैं|”

“पता नहीं, क्योंकि मेरी तो कोई बहन है नहीं |”

“तुम अकेले हो |”

“हाँ”

“अच्छा है, तुमने कुछ तो बताया अपने बारे में | भोजनावकाश में तो बस मज़ाक ही चलता है | यहाँ शुरू से ही यह माहौल है | शशि को ऐसा माहौल बहुत पसंद है |”

“तुम्हें क्यों नहीं पसंद?”

“बस वैसे ही, अच्छा मैं चलती हूँ | वहाँ वह अकेली होगी |” कह वह चली गई |

*

प्रोमिला कुछ दिन जब ऑफिस नहीं आई तो मैंने शशि से पूछ ही लिया “क्या बात है बहुत दिन से प्रोमिला नहीं आ रही है|”

शशि कुछ कहती इससे पहले ही फ़ोन की घंटी बज उठी | शशि फ़ोन उठा कर ‘हैलो’ बोलती है | वह खुश होकर मेरी तरफ देखते हुए बोली “हाँ, यहीं खड़ा है और अभी तेरे बारे में ही पूछ रहा था | ले उससे ही बात कर ले |” और फ़ोन मुझे देते हुए बोली “प्रोमिला है|”

“हेलो”

“मैं प्रोमिला बोल रही हूँ, मेरी याद कैसे आई |”

“वैसे ही |”

“मुझे कुछ दिन से बुखार आ रहा था, इसलिए नहीं आ पाई |”

“ओह! अब तबियत कैसी है ?”

“ठीक है, शशि से कहकर, फ़ोन अपने कमरे में ट्रान्सफर करवा लो|”

“क्यों?”

वह गुस्से से बोली “जो मैं कह रही हूँ, वह करो |” मैंने शशि से कह कर कॉल अपने कमरे में ट्रान्सफर करवा ली |

“ऐसी क्या बात है?जो वहाँ नहीं हो सकती थी|शशि क्या सोच रही होगी |”

“सोचने दो, मुझे उसका क्या करना है |”

“छोड़िये इस बात को, यह बताइए कि ऐसी क्या बात है जो सिर्फ़ आज ही हो सकती है और कल नहीं हो सकती |”

“हाँ, आज ही हो सकती है कल नहीं हो सकती |”

“आख़िर क्यों ?”

“मैं तुम सब से झूठ बोल रही थी कि मेरी तबियत खराब है | असल में पापा ने मेरे लिए कोई और नौकरी ढूंढ़ दी है | मुझे कल से वहाँ जाना है, इसलिए मैं तुमसे बात करना चाह रही थी |”

“क्या?”

“हाँ, क्या करूँ, पापा का कहना है वहाँ पैसे भी ज्यादा हैं और आगे बढ़ने के मौके भी बहुत मिलेंगे | लेकिन आप चिंता न करें, मैं आपसे फ़ोन पर बात कर लिया करूंगी | कभी मौका मिलेगा तो मिलने की कोशिश करुँगी |”

मैं चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाया |

“हेलो, सुन भी रहे हो या फ़ोन काट दिया |”

“नहीं-नहीं, सुन रहा हूँ बोलो |”

“इतना हताश होने की जरूरत नहीं है | ईश्वर ने चाहा तो यह सम्बन्ध बना रहेगा |

यह सुनकर मैं बोला, “हाँ ! ठीक है |”

“देखो, अक्षित, मुझे अपना दोस्त मानो और मेरी कही बातों पर गौर करो | अपने को लोगों से अलग मत समझो | इस दुनिया में जितना लोगों से घुलोगे-मिलोगे तभी दुनिया की चालों को समझ पाओगे | सारे फैसले दिल से मत लो, कुछ दिमाग़ का भी इस्तेमाल करो | इस दुनिया से लड़ो, इसे दिखाओ कि तुम भी कुछ हो और तुम भी कुछ कर सकते हो | तुम इस दुनिया से लड़ सकते हो तुम में वह सब है जो लड़ने के लिये चाहिए | बस एक बार ठानना है | एक लक्ष्य बनाना है | जीत तुम्हारी होगी क्योंकि कछुए की जीती हुई बाजी हमेशा साथ रहती है और जल्दी से पाई जीत, जितनी जल्दी आती है उतनी जल्दी चली जाती है |”

“हाँ, कह तो आप ठीक रही हैं |”

“ठीक है, फिर मिलते हैं ब्रेक के बाद---”, उसने फ़ोन काट दिया |

उस दिन के बाद से उसके साथ मेरा फ़ोन पर सम्पर्क बना रहा और हर बार वह मुझे नसीहत देकर फ़ोन रख दिया करती थी | ऐसा लगता था कि उसे शायद नसीहत (edification) देने का शौक है | उसकी और मेरी बात हमेशा, मेरी रोज़मर्रा की बातों से शुरू होती थी और उसकी नसीहतों पर खत्म हो जाती | मेरा और प्रोमिला का सम्बन्ध बहुत ज्यादा दिन तक टिक नहीं सका और आख़िर एक दिन टूट ही गया | मेरी काफी कोशिश के बाद भी जब मैं प्रोमिला से नहीं मिल पाया तो मैंने वह कंपनी ही छोड़ दी | उसके बाद मैंने कई जगह और नौकरी की लेकिन वह माहौल न मिलने के कारण मैंने यह फैसला लिया कि मैं फिर से आगे पढ़ाई शुरू करता हूँ | प्रोमिला की भी यही इच्छा थी |

*

प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर(post graduation) परीक्षा उत्तीर्ण करने के तुरंत बाद ही मेरी नौकरी एक अच्छी कंपनी में लग गई | यह कंपनी काफी बड़ी थी और हर कोई अपने कार्य में इतना व्यस्त रहता था कि एक दूसरे से बात करने और हाल-चाल पूछने तक का मौका चायपान या भोजनावकाश के समय ही मिल पाता था | यहाँ नौकरी करते हुए मुझे महसूस होने लगा कि मैं जिस पद की तरफ बढ़ रहा हूँ, वहाँ मानसिक दबाव के रहते पहुँचना मुश्किल है | इसलिए अब मुझे हर हालात में अपने आपको सुधारना ही होगा |

मेरे विभाग में एक सहकर्मी(colleague) जिसका नाम सतिंदर पाल सिंह भट्टी था, बहुत ही हरफ़नमौला व्यक्तित्व का मालिक था | कंपनी में वह हर किसी के साथ किसी भी तरह का मज़ाक या बात कर लेता था | कोई भी न तो उसकी बात का और न वह किसी की बात का बुरा मानता था | वह अपने काम के अलावा दूसरों के काम भी कर दिया करता था | वह अपने महिला और पुरुष सहकर्मियों के अलावा, अधिकारी वर्ग में भी प्रसिद्ध था | कभी भी कोई भी चाहे पुरुष हो या महिला, निम्न स्तर का कर्मचारी हो या उच्च स्तर का अधिकारी, सब परेशानी या मुसीबत के समय उसको जरूर याद करते थे | वह भी हर किसी की सहायता करने के लिये हमेशा तत्पर रहता था |मैं उसकी इस निष्पक्ष भावना से प्रभावित था और वह मेरे शांत स्वभाव से |

यहाँ सब लोग उसे या तो एसपीएस या भट्टी पुकारते थे | मैं ही उसे टीटू नाम से पुकारता था, जोकि उसके घर का नाम था | एक बार ऑफिस के एक सहयोगी की शादी में टीटू ने काफी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और खूब शराब पी | उसे जरा-सा भी नशा नहीं हुआ, तो मैंने हैरान होते हुए उससे पूछा लेकिन ज़वाब हमारे एक आधिकारी ने दिया | वह बोले “हमने इसका नाम बोतल रखा हुआ है क्योंकि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल”| वहाँ शादी में भी वह हर किसी का ध्यान रख रहा था | मैंने महसूस किया कि वह हर किसी को बहुत जल्दी अपना बना लेता है |

*

उम्र का बढ़ना, समय का फेर या फिर दोस्ती का असर, चाहे कुछ भी हो, मैं अपने अंदर कुछ-कुछ बदलाव महसूस करने लगा था | अब मैं अपने आस-पास के लोगों को समझने की कोशिश करने लगा था | धीरे-धीरे मेरी और टीटू की दोस्ती काफी अच्छी हो गयी थी | एक दिन टीटू अपनी माँ के साथ हमारे घर आया तो मेरी माँ ने उसका व उसकी माँ का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया | मुझे देख कर बहुत हैरानी हुई लेकिन कुछ ही समय में यह पता लग गया कि वह पहले हमारे पड़ोसी रह चुके हैं | एक समय में मेरी माँ और उसकी माँ की काफी अच्छी दोस्ती थी |

उसके बाद तो उसका मेरे घर आना और मेरा उसके घर जाना काफी लगा रहता था | माँ ने कभी कोई शिकायत नहीं की, बल्कि जब भी वह हमारे घर आता था तो माँ उसे मेरी शिकायतें ही लगाया करती थी |

“टीटू बेटा, थोड़ा इसे भी अपनी तरह बना |”

“हाँ, हाँ, जरूर |”

“देख ये किसी को नमस्ते नहीं करता, पैर छूने की बात तो दूर | सुबह उठने के बाद अपना बिस्तर भी ठीक नहीं करता है | लेट्रिन जाने पर फ्लश नहीं चलाता है | गीले कपड़े बाथरूम में ही छोड़ देता है | बहुत जल्दी इसे गुस्सा चढ़ जाता है आदि आदि.......|”

वह बहुत तन्मयता से सुन कर बोलता “आंटी आप चिंता मत करें इसे मैं सुधार दूंगा|”

घर से बाहर निकल कर मुझसे कहता “यार अपनी माँ को मेरी माँ से दोबारा मत मिलवा देना, नहीं तो तेरी माँ को पता चल जाएगा कि यह सब गन्दी हरकतें मेरे में भी हैं |” और फिर ज़ोर से हँसता हुआ कहता “यार, मैं तो अपनी माँ को ही समझता था कि वह सनकी है | लेकिन मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की सारी माएं एक सी ही हैं | पहले बचपन में कुछ करने नहीं देती हैं और जब आदत बन जाए तो शिकायत करती फिरती हैं |”

*

एक दिन जब हम ऑफिस से घर आ रहे थे तो टीटू ने मुझे रास्ते में मुड़ने का इशारा किया | मैं समझ गया कि बहुत दिन हो गये हैं हमें रिज रोड गए, इसलिए टीटू आज वहाँ जाना चाह रहा है | मैंने जैसे ही अपना स्कूटर टीटू की मोटरसाइकिल के पीछे कर किया तो मेरे स्कूटर के पीछे बैठे हमारे ऑफिस के नए सहकर्मी देवा ने कहा “स्कूटर इधर क्यों मोड़ लिया|”

मैं बोला “हम जब भी ऑफिस से जल्दी निकलते हैं तो कभी-कभी यहाँ रिज रोड पर बने ओपन रेस्टोरेंट में कुछ देर जरूर बैठते हैं | यहाँ बैठ कर खाने-पीने और गपशप मारने का एक अपना ही मज़ा है |”

कुछ ही देर बाद हम रिज रोड पार्क में पहुँच जाते हैं | टीटू की मोटरसाइकिल के पास ही, मेरे स्कूटर खड़ा करते ही देवा स्कूटर से उतरते हुए बोला “यहाँ जंगल में क्या करोगे|”

टीटू हँसते हुए बोला “डफर भाई, वो सामने देख पेड़ के नीचे रेस्टोरेंट है |” कह कर टीटू रेस्टोरेंट की तरफ चल देता है |

“देवा भाई यहाँ बन्दर बहुत हैं | पंगा मत लेना वरना.....”, मैं मुस्कुराकर बोलते हुए टीटू के पीछे-पीछे चल पड़ता हूँ | देवा के हाथ में थैला देखकर सात आठ बंदरों का झुण्ड पलक झपकते ही देवा के पास पहुँच जाता है | एक बन्दर देवा के हाथ में पकड़े थैले को खींचने की कोशिश करता है | देवा के डर से चिल्लाते ही टीटू भाग कर आता है और उन बंदरों को भगा देता है |

टीटू हँसते हुए देवा से बोला “तुझे मालूम है ये यहाँ पर ज्यादातर तभी आते हैं, जब इनका कोई सगा सम्बन्धी यहाँ आता है|”

“लेकिन यार ये तो यहाँ हमारे बीच आये थे |” मैंने हैरान होते हुए बोला |

टीटू हँसते हुए बोला “आज पहली बार देवा हमारे साथ आया है | देवा तो पहचान नहीं पाया अपने रिश्तेदारों को, लेकिन देखा नहीं रिश्तेदार तो पहचान कर इसे अपने साथ ले जाना चाहते थे | यह तो मै बीच में आ गया, वरना आज वो इसको साथ लेकर ही जाते |”

देवा को जब कोई ज़वाब नहीं सूझा तो वह अटकते हुए बोला “यार यहाँ तो काफी हरियाली है | हरियाली के बीच से झांकते पहाड़ी पत्थर, पहाड़ी इलाके सा एहसास करा रहे हैं ....|”

टीटू मुस्कुराते हुए बोला “साले, बात क्यों बदल रहा है |”

दूर से चार पांच लड़कियों का झुण्ड आते देख, देवा बोला “अबे, यहाँ तो कुछ ज्यादा ही हरियाली है | यार देख, वो मुझे ही देख रही हैं और फिर देखे भी क्यों न, तुम दोनों से मेरी लम्बाई भी ज्यादा है और सुंदरता भी.......|”

“उनको क्या मालूम कि ये सुंदर थैला अंदर से खाली है |” हँसते हुए टीटू कहता है|

देवा खीज़ कर बोला “अबे, सरदार मैं अपनी बात कर रहा हूँ और इस सब में थैला कहां से आ गया | बन्दर जो थैला खींच कर ले जा रहे थे, वह भी खाली नहीं था | उस में मेरा लंच बॉक्स था |”

टीटू मुस्कुराते हुए बोला “अबे, असल में तो तू सरदार है | मैं तेरे बारे में ही बात कर रहा था कि थैले की तरह तू भी बाहर से सुंदर दिख रहा है लेकिन दिमाग़ से खाली है लंच बॉक्स की तरह |”

देवा गुस्से से टीटू की तरफ उसे पकड़ने के लिये भागता है लेकिन बीच में बन्दर को आते देख रुक जाता है | असहाये-सा टीटू की तरफ देखता है और टीटू हँसता हुआ फिर से बंदरों को भागता है |

*

हम रेस्टोरेंट से खा-पी कर बाहर स्कूटर स्टैंड के पास पहुँचते हैं तो देवा रुकने का इशारा कर बोला “रुको यार, सिगरेट पीकर चलते हैं |”

यह कह कर वह अपनी जेब से सिगरेट निकाल कर जलाने लगता है | एक दो कश लेने के बाद वह टीटू की तरफ बढ़ा देता है | टीटू सिगरेट पकड़ कर उसी समय पास आए बन्दर के हाथ में दे देता है | बन्दर भी सिगरेट को उंगलियो के बीच फंसा कर मुँह के पास ले जाता है | वह बन्दर ऐसी एक्टिंग करता है जैसे सिगरेट पी रहा हो और फिर पास पड़े एक पत्थर को उठा लेता है | हम उसकी इस हरकत को देखकर डर कर भाग खड़े होते हैं | वह बन्दर हम से भी समझदार निकलता है | उस पत्थर से सिगरेट को बुझाकर वह टीटू को और फिर देवा को घूर कर देख कर ऐसे सिर हिलाकर वहाँ से चला जाता है जैसे हमको कह रहा हो कि मुझे क्या बेवकूफ समझते हो |

यह देख कर टीटू बोलता है “अबे, अब तो सुधर जाओ, देख बन्दर तक को नहीं पसंद |”

“अरे !, बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद | बन्दर को छोड़ यह बताओ कि तुम लोग सिगरेट क्यों नहीं पीते, कोई राज़ की बात है क्या ?”

“अबे तुझे इतनी सी बात नहीं पता कि सरदार सिगरेट क्यों नहीं पीते...|”

इससे पहले कि टीटू कुछ बोल पाता, देवा सिर पर हाथ फेरते हुए कहता है “अबे यार समझ आ गया…..|”

“साले, सरदार ही सबसे समझदार होते हैं | वह सिगरेट के खोखले नशे में विश्वास नहीं रखते | वही है जो अपने पर, अपने परिवार पर और अपने धर्म पर विश्वास रखते हैं | धुएं में सब कुछ बर्बाद करने की कोशिश नहीं करते और तुम सालो.........|”

इससे पहले कि बात कुछ और आगे बढ़ जाए मैं बीच में ही बोल पड़ता हूँ “तुम लोग भी किस बात पर बहस कर रहे हो.....|”

टीटू बीच में ही बात काटते हुए बोलता है “देख हम दोनों की बात सुन कर इसकी फट गई कि कहीं हमारी आपस में लड़ाई ही ना हो जाए | अबे गधे, दोस्ती और प्यार से बड़ा धर्म, मजहब या समाज नहीं होता | हमसे है यह समाज या धर्म, हम समाज या धर्म से नहीं | यदि यह बात धर्म और समाज के ठेकेदार भी समझ जाएं तो कोई धर्म या देश की सीमा ना हो|”

देवा मुस्कुराते हुए बोला “यार बात तो सौ टके की बोली है |”

टीटू एक लम्बी सांस लेकर मुस्कुराते हुए बोलता है ‘पंजाबी बंदे की आन, बान और शान का तुम क्या मुकाबला करोगे | हम अपने फेफड़े धुएं से नहीं जलाते | हाँ, साडी इक कमज़ोरी शराब हैगी | ओवी अस्सी वडी शान दे नाल बैठ के पीने आं....|”

“सब लोगों को एक नाम की औरत कैसे मिल जाती है |” बड़ी हैरानी से देवा बोला|

मैं बड़ी हैरानी से देवा और टीटू की ओर देखता हूँ |मैं कुछ कहना ही चाहता हूँ कि टीटू हँसते हुए मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोलता है “फिर तुम कहते हो कि हमारा दिमाग़ नहीं चलता और इस साले को इतनी सी बात समझ नहीं आई | यह शान किसी औरत को समझ रहा है |”

टीटू की बात जब मुझे समझ आई तो मेरी भी हंसी निकल गई | हम दोनों को हँसते देख कर देवा बोला “इसमें हँसने वाली कौन सी बात है, तूने बोला ही ऐसे था | जैसे शान कोई औरत है जिसके साथ बैठ कर पीते हो और क्या मतलब हो सकता है?”

मैं और टीटू दोनों एक दूसरे को देखते है और मैं इससे पहले कुछ बोलता, टीटू देवा की तरफ देखते हुए बोला “तू जान कर ऐसी बातें बोलता है या फिर तेरे दिमाग़ में भूसा भरा है|”

देवा ज़ोर से हँसते हुए हुए बोलता है “अबे सरदार! दिमाग़ में भूसा नहीं होता, सिर में होता है |”

“हाँ, मेरे बाप तू जो कह रहा है, वो ही सही है |”

“आज यहीं सारी बातें करनी हैं या घर भी चलना है |” मैं स्कूटर को किक मारते हुए कहता हूँ | मेरी बात सुन, देवा मेरे पीछे आ कर बैठ जाता है और हम वहाँ से निकल कर घर की तरफ़ चल पड़ते हैं |

*

मैं आज ऑफिस कुछ जल्दी ही पहुँच गया था | उस समय ऑफिस लगभग खाली ही था | अभी मैं अपनी कुर्सी पर बैठा काम शुरू करने का सोच ही रहा था कि दूर सामने के बड़े दरवाज़े से आती हुई लड़की को देख कर मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धक्-धक् करने लगा | सामने से पूनम आ रही थी | उसे देख मेरे पूरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए | अंदर से कहीं डर भी लग रहा था और ख़ुशी का अनुभव भी हो रहा था | आज भी उसकी वही चाल और वही कपड़े पहनने का वही अंदाज़ था | जैसे ही उसने मुझे देखा तो मुस्कुराते हुए, मुझे हेलो किया और मेरी कुर्सी के पास से निकल कर जब आगे चली गई तो मुझे एहसास हुआ कि वह पूनम जैसी दिखने वाली हमारे ऑफिस की एकाउंट्स क्लर्क प्रीति है |

मैं अपनी पुरानी यादों से बाहर निकल कर फिर से काम में व्यस्त होने की कोशिश करने लगा | आजकल मुझे फिर से पूनम की याद सताने लगी थी | अब वह वजह प्रीति थी या फिर कुछ और?

आज टीटू ने ऑफिस नहीं आना था और देवा भी अभी तक लंच करने के लिए नहीं आया था | मैं लंच का समय होने के बावजूद भी काम कर रहा था | अचानक मुझे प्रीति की ज़ोर-ज़ोर से “shut-up, shut-up” कहने की आवाज़ सुनाई दी और फिर देवा की आवाज़ सुनाई दी, “sorry mam am realy very sorry.”

मैं जल्दी से उठकर अपने पीछे वाले केबिन में जा कर बोला “क्या हुआ प्रीति, तुम तो इतनी शांत लड़की हो और आज तो....|”

“इसके साथ तो कोई भी बात करके पागल हो जाए | मैं तो इससे तुम्हारी वजह से बात करती हूँ | तुम्हारा दोस्त है इसलिए इसे अभी तक थप्पड़ नहीं जड़ा वरना.....|”

मैं उसका गुस्सा देख बीच में ही बोल पड़ता हूँ “अरे, प्रीति ये बहुत ही शरीफ और निहायत ही सीधा-सादा है | बस थोड़ा सा बेवकूफ है, समय और आदमी नहीं देखता | इसका बस चले तो किसी के मरने में भी जा कर चुटकुला सुना कर हँसने लग जाए | अच्छा अब गुस्सा थूको और बात बताओ कि हुआ क्या है ?”

वह अभी भी गुस्से में लग रही थी और चिल्ला कर बोली “अपने पागल दोस्त से ही पूछो | इस समय मेरे सामने से इसे ले जाओ, वरना......|”

प्रीति की गुस्से भरी आवाज़ सुनकर कुछ और सहकर्मी भी इकट्ठा हो गये थे | मैंने मौके की नज़ाकत समझते हुए उसे वहाँ से ले जाना ही उचित समझा | मैं उसे अपने केबिन में ले कर आया और गुस्से से लेकिन धीरे से बोला “क्या कह दिया उसे, जो वह चंडी बनी दहाड़ रही है |”

देवा, बड़ा मासूम-सा चेहरा बनाते हुए बोला “भाई, सच्ची मुझे ख़ुद समझ नहीं आ रहा है कि आख़िर मैंने ऐसा बोल क्या दिया? मेरे हिसाब से तो उसे खुश होना चाहिए था |”

मैं अपना सिर पकड़ कर कुर्सी पर बैठ गया |

मुझे ऐसे बैठे देख कर देवा बोला “भाई सच्ची मैंने कुछ नहीं बोला |”

पूरी बात सुने बिना पता नहीं लगेगा | यह सोच कर मैं कुर्सी से उठते हुए उसे बोला “चल मेरे साथ कैंटीन में और वहाँ मुझे पूरी बात बता |”

कैंटीन में पहुँच कर मैं कुर्सी पर बैठते हुए बोला “यहाँ बैठ और बोल, आख़िर हुआ क्या ?”

“यार मैं तेरे पास लंच करने के लिए आ रहा था | जैसे ही मैं प्रीति के केबिन के पास से निकला तो मैंने देखा कि प्रीति बहुत मूड में आँख बन्द किए धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रही थी | उसकी आवाज़ मैंने पहली बार सुनी थी | आवाज़ में बहुत मिठास थी और वह बहुत लय-ताल में गा रही थी | बस मैं उसके पास वाली कुर्सी पर जा कर बैठ गया | वह गाना गाने में इतनी मस्त थी कि उसे पता ही नहीं लगा | लेकिन अचानक मुझे छींक आ गई और वह छींक की आवाज़ सुन चौंकते हुए गाना छोड़ कर मुझे हैरानी से देखते हुए बोली “आप यहाँ कब आए मुझे तो पता ही नहीं चला |”

मैं बोला “आप तो बहुत ही अच्छा गाती हैं | मैं तो आपकी आवाज़ सुन खुद-ब-खुद ही खिंचा चला आया | आपने संगीत कहीं से सीखा है क्या?”

“नहीं, नहीं, मैं तो बाथरूम सिंगर हूँ |”

“बस इसके बाद ही वह चिल्लाने लग गई |” देवा मासूमियत से बोला |

“याद कर इसके बाद तूने ऐसा क्या कहा था, जो वह चिल्लाने लग गई |”

वह कुछ सोचते हुए बोला “मैंने उससे बोला, प्रीति मुझे कभी अपने घर लाइव परफॉरमेंस में बुलाओ.....|”

उसकी बात सुन कर मैं अपनी हँसी रोक ही नहीं पा रहा था और वह बार-बार कहे जा रहा था “अबे, मुझे तो बता कि तू इतना हँस क्यों रहा है |” मेरी हंसी थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी | बहुत मुश्किल से अपनी हंसी पर काबू पाते हुए बोला “साले, तू एक दिन बहुत बुरा फंसेगा |”

“मुझे बता तो सही, मैंने गलत क्या कहा |”

उसकी बात और मासूम चेहरा देख मुझे फिर से हँसी आ गई | ज्यादा हँसने से मेरी आँखों में आँसू आ गये थे | बहुत मुश्किल से अपनी हँसी रोकते हुए बोला “भाई, उसका कहना था कि वह गुसलखाने में नहाते हुए गाती है, और इस पर तूने कह दिया कि....|” और फिर मेरी हंसी छूट गई | मेरी बात सुन कर उसकी समझ में आया कि उसने क्या गलती की है|

जैसे ही मेरी हंसी रुकी, तो मैंने देवा कि तरफ देखा वो मुझे बहुत मासूमियत से देख रहा था | मुझे लगा कि शायद वह मेरी हंसी रुकने का ही इन्तज़ार कर रहा था |

“क्या बात है? तू मुझे ऐसे क्यों देख रहा है जैसे कोई कुत्ता माँस खा रहे आदमी की तरफ टकटकी लगाए देखता है कि कब वह हड्डी उसकी तरफ फैंकेगा और.....|”

वह बीच में ही बात काटते हुए बोला “यार, तुझे तो पता ही है कि अगले हफ्ते नये साल की पार्टी है | पहली बार हम लोग ऑफिस से बाहर पार्टी कर रहे हैं |”

मैं बोला “हाँ, तो?”

वह कुछ अटकते और सकपकाते हुए बोला “यार सब कहते हैं कि टीटू हर तरह की सेटिंग बनाने में माहिर है | वह तेरी सुनता भी बहुत है, तो ..... भाई, टीटू से कह कर मेरी प्रीति से सेटिंग करवा दे |” फिर एक लम्बा सांस खींचते हुए बोला “यार, वह मुझे बहुत अच्छी लगती है | उसे देख कर पता नहीं मुझे....|”

मैं अपनी हंसी को काबू करते हुए बोलता हूँ “अच्छा जी, मेंढकी को भी बुखार हो गया है.. |”

“यार मैं अपनी बात कर रहा हूँ और तू पता नहीं किसकी बात कर रहा है |”

“अच्छा बता की ऐसा क्या है तुझ में कि तेरी सेटिंग प्रीति से करवाई जाए |”

“यार, बस वह मुझे बहुत अच्छी लगती है |”

“यहाँ और भी हैं, वही क्यों?”

“बस यार मैंने कह दिया न, तू बात तो कर |”

“मैं या टीटू ही क्यों करें | तू खुद क्यों नहीं करता ?”

“भाई एक बार एक लड़की से की थी | थप्पड़ पड़ गया था | उसके बाद से हिम्मत नहीं पड़ती |”

“एक थप्पड़ और सही |”

“मतलब तू मुझे थप्पड़ पड़वा कर खुश है |”

“तू बात ही ऐसी कर रहा है |”

वह हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया | मैं उससे अपना पीछा छुड़वाने के लिये कह देता हूँ कि “अच्छा भाई, मैं टीटू से कह दूंगा बाकी उसकी मर्जी |”

मेरी बात सुन कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था | उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मैंने नहीं, प्रीति ने ही हाँ कर दी हो|

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एक दिन डॉक्टर साहिबा को मेरे पुराने अटैची केस से कुछ पन्ने व दो-तीन छोटी-छोटी कापियाँ मिलीं | मैंने उन पर अलग-अलग समय में हुए अनुभव लिखे थे | डॉक्टर साहिबा उन्हें पढ़ कर बहुत ही प्रभावित हुईं | उनके अनुसार यह अनुभव और आपका आज का यह रूप देख कर लगता ही नहीं हैं कि आप इतनी तरक्की कर सकते थे |

यह अनुभव(experience) दूसरों के लिए प्रेरणा(inspiration) स्रोत्र(source) हो सकते हैं | अतः डॉक्टर साहिबा ने कई बार कहा कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग कापियों में लिखी अपनी आत्मकथा को एक ही जगह संजोने के साथ-साथ वक्त के अंतराल(break/interval) को भी पूरा करो |

हर बार मैं ‘हाँ’ कह कर टाल दिया करता था | डॉक्टर के धमकी देने के बाद आत्मकथा को पूरा करने के अलावा विकल्प ही नहीं बचा | आप सोचेंगे कि ऐसा कौन सा डॉक्टर है, जो ऐसा भी कह सकता है | स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ॰ सोनिया ने मुझे प्रेरित किया जोकि मेरी पत्नी हैं | उन्होंने न सिर्फ़ मुझे प्रेरित किया अपितु लेखन में मेरा साथ भी दिया |

उनके अनुसार मुझे अपनी आत्मकथा यहाँ से शुरू करनी चाहिए –

मेरा नाम अक्षित है | मैं दिल्ली के पास गुड़गाँव में रहता हूँ और यहीं की एक बहुत ही अच्छी अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में मानव संसाधन उप महाप्रबंधक ( Deputy General Manager HR) के पद पर कार्यरत हूँ |

इस समय मेरी उम्र लगभग 42 साल हो चुकी है | आज मैं अपनी अभी तक की ज़िंदगी के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों को संकलित कर कागज पर उतारने के अभियान को दोबारा से शुरू कर रहा हूँ |

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