बिराज बहू - 9 Sarat Chandra Chattopadhyay द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बिराज बहू - 9

बिराज बहू

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

(9)

दोपहर को सन्नाटा होने पर छोटी बहू रोती हुई आई और बिराज के पैरों पर गिर पड़ी। वहो दो दिनों इसी अवसर की तलाश में थी। पति को जो गलतफहमी हुई थी, उसी के भय से वह घबरा गई थी। रोती हुई बोली- “दीदी! उन्हें तुम शाप मत देना। उन्हें यदी कुछ हो गया तो मैं जी नहीं सकूंगी।”

बिराज ने उसका हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा- “बहन! मैं शाप नहीं दूंगी। उनमें इतनी शक्ति नहीं है कि मेरा कोई अहित कर सकें किन्तु तुम जैसी सती-लक्ष्मी पर निरपराध हाथ उठाना, उसे तो माँ दुर्गा भी सहन नहीं करेगी।”

मोहिनी कांपती हुई आँसू पोंछकर बोली- “दीदी! मैं क्या करूं? उनका स्वभाव ही ऐसा है। जिस ईश्वर ने उन्हें क्रोधी बनाया, वे ही उन्हें क्षमा करेंगे। तो भी मैंने समस्त देवी-देवताओं की प्रार्थनाऐ की हैं। किन्तु मैं पापिन हँू, किसी ने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी। दीदी! एक दिन भी ऐसा नहीं जाता...।” कहते-कहते वह सहसा रुक गई।

अभी तक बिराज का ध्यान छोटी बहू की कनपटी के काले दाग पर नहीं गया था। उसने आश्चर्य से पूछा- “तेरे यह मार का निशान है?”

छोटी बहू ने शरमाकर अपना सिर झुका लिया और गरदन हिला दी।

बिराज ने पूछा- “किससे मारा?”

मोहिनी वैसे ही सर झुकाए बोली- “अपने पांव की चट्‌टी से। क्रोध में वे पागल हो जाते हैं।”

“यह मुझे मालूम है, मगर...।” बिराज स्तब्ध-सी खड़ी रही उसकी आँखें जलने लगीं। थोड़ी देर बाद बोली- “यह सब तुमने कैसे सहन कर लिया?”

छोटी बहू ने विगलित स्वर में कहा- “मुझे आदत पड़ गई है।”

बिराज ने विषाक्त स्वर में कहा- “और उसी पशु को क्षमा करने के लिए तुम आई हो!”

बिराज की ओर देखकर छोटी बहू ने कहा- “हाँ दीदी! यदि तुम प्रसन्न नहीं होगी तो उनका अनिष्ट हो जाएगा। जहाँ तक सहने का सवाल है, यह सब मैंने तुम से ही सीखा है। मेरा संबंध तो तुम्हारे चरणों से...।”

बिराज ने अधीर होकर कहा- “ना... ना... छोटी बहू, ना मिथ्या मत बोलो यह अपमान मैं सहन नहीं कर सकती।”

मोहिनी ने किंचित मुस्कराकर कहा- “दीदी! क्या अपना अपमान सहन करना ही पर्याप्त है? तुम्हारे सरीखा पति हर स्त्री के भाग्य में नहीं होता। फिर भी तुम जितना सहन करती हो, उतने में तो हमारा कचूमर निकल जाता है। उनके मुंह से हंसी गायब हो गई।हृदय प्रफुल्लित नहीं है। यह सब तुम्हें स्वयं को देखना पड़ता है। पति का इतना कष्ट संसार में सिवाय तुम्हारे कोई नहीं सहन कर सकता।”

बिराज चुप रही।

छोटी बहू ने उसके दोनों पांव पकड़कर कहा- “दीदी! बताओ, उन्हें क्षमा कर दिया न? इसे सुने बिना में तुम्हारे पांव नहीं छोड़ सकती। यदि तुम प्रसन्न नहीं हुई तो कोई नहीं बच पाएगा।”

बिराज ने छोटी बहू के उठाकर कहा- “जाओ क्षमा किया।”

एक बार फिर बिराज की चरण-धूलि लेकर माथे लगाई और छोटी बहू खुशी-खुशी घर चली गई।

किन्तु बिराज बड़ी देर तक ठगी-सी खड़ी रही उसी जगह पर। उसके अन्तकरण से कोई पुकार-पुकारकर कह रहा था- “बिराज... यह सब सीख... सीख...।”

उसके बाद छोटी बहू कई दिनों तक घर में नहीं आई, मगर उसके आँख-कान उस ओर लगे रहते थे। आज लगभग एक बजे बड़ी सावधानी से वह बिराज के पास आई।

बिराज रसोईघर के बरामदे में गाल पर हाथ धरे बैठी थी। उसे देखकर वह पूर्ववत ही रही।

छोटी बहू बिराज के चरण छूकर बोली- “दीदी! क्या तुम पागल हुई जा रही हो?”

बिराज ने मुंह घुमाकर कहा- “क्या तुम नहीं होती?”

छोटी बहू ने कहा- “दीदी! अपने साथ बराबरी करके मुझ पर पाप मत चढ़ाओ। मैं तुम्हारे पांवों की धूल के बराबर भी नहीं हूँ। मगर तुम ऐसा क्यों करती हो? आज तुमने जेठ जी को खाना भी नहीं दिया।”

बिराज ने कहा- “मैंने तो खाने के लिए मना नहीं किया था।”

छोटी बहू बोली- “यह तो ठीक है, पर एक बार निकट तो जाती। उन्होंने खाने के लिए बैठतक तुम्हें कितनी बार पुकारा और तुमने एक बार भी उत्तर नहीं दया। तुम्हीं कहो, इससे पीड़ा होती है या नहीं? एक बार तुम समीप चली जाती तो वे खाना खा लेते।”

बिराज चुप रही।

छोटी बहू फिर बोली- “दीदी! तुमने सदा सामने बैठकर उन्हें भोजन कराया है। तुम मझसे व्यस्तता का बहाना नहीं कर सकती। सदा सारे कार्य छोड़कर तुमने उन्हें खिलाया है। कभी भी इससे बढ़कर तुम्हारा काम नहीं रहा। और आज...।”

बीच में ही बिराज ने भावावेश में उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और कहा- “फिर चलकर देख लो।” वह उसे रसोई की ओर ले गई और थाली की ओर संकेत करके कहा- “यह देख...।”

छोटी बहू ने ध्यान से देखा। एक काले रंक की पथरी में बिना साफ किए मोटो भात और उसी के समीप करेमू की थोड़ी-सी भाजी... और कोई साधन न होने के कारण बिराज उन्हें नदी के किनारे से तोड़ लाई थी।

छोटी बहू की आँखें भर आई, पर बिराज के नयन-कोर जरा भी नम नहीं हुए। दोनों देवरानी व जेठानी एक-दूसरे को अपलक देखती रहीं।

बिराज ने सहज स्वर में कहा- “तुम भी एक पत्नी हो, तुम्हों भी थाली में परोसकर पति को खिलाना पड़ता है, मगर क्या कोई पत्नी ऐसा खाना परेसकर पति के सामने संसार में बैठ सकती है? पहले बता, फिर मुझे भरपूर गाली दें। मैं एक शब्द भी नहीं कहूँगी।”

बिराज कहने लगी- “छाटी बहू, तुम नहीं जानती देवयोग से कभी रसोई अशुद्ध हो जाने से उन्होंने नहीं खाया तो मैं ही जानती हूँ मुझ पर क्या गुजरी है। और अब भूख के वक्त उनके सामने यह सब रखना पड़ता है तो महसूस होता है, अब यह भी नहीं मिलेगा।” कहकर बिराज एकदम खामोश हो गई। वह छोटी बहू की छाती पर पछाड़ खाकर गिर पड़ी और उससे लिपट-लिपट कर जोर-जोर से विलाप करने लगी। बड़ी देर तक दोनों सगी बहनों की तरह लिपटी पड़ी रहीं। काफी देर तक दोनों का अटूट नारी-हृदय खोमोशी से आँसूओं से भीगता रहा।

इसके बाद बिराज ने सिर उठाकर कहा- “ना, मैं तुमसे कुछ भी नहीं छुपाऊंगी, क्योंकि तुम्हारे सिवाय मेरा द:ख समझनेवाला कोई नहीं है। मैंने काफी सोच-विचारकर समझ लिया है कि जब तक मैं यहां से दूर नहीं चली जाऊंगी, उनका कष्ट व दु:ख नहीं होगा। यहाँ रहने पर मैं उनका मुख देखे बिना नहीं रह सकती। मैं चली जाऊंगी, बता, मेरे जाने के बाद तुम उनकी देखभाल कर लोगी?”

छोटी बहू ने आँख उठाकर कहा- “कहाँ जाओगी?”

बिराज के अधरों पर एक म्लान हंसी की रेखा खींच गई। कुछ हिचकिचाहट के बाद बोली- “यह नहीं जानती कि कहाँ जाऊंगी, कहाँ जाया जाता है? सुना है इससे बड़ा पाप कोई नहीं है। फिर भी दिन-रात की कुढ़न व घुटन तो मीट जाएगी!”

बात का मर्म समझकर मोहिनी सिहर उठी। उसके मुख पर हाथ रखकर उसने कहा- “छि:-छि: ऐसी बात जबान पर नहीं लानी चाहिए। दीदी! जो आत्महत्या की बात करता है, उसे पाप लगता है, और जो सुनता है उसे भी। छि:-छि: दीदी, यह तुम्हें क्या हो गया है?”

बिराज ने कहा- “यह भी नहीं जानती कि मुझे क्या हो गया है। बस, इतना ही जानकी हूँ कि मैं अब उन्हें खाना नहीं दे सकती। मुझे छूकर कहो कि जैसे भी होगा तुम भाईयौं में मेल करवा दोगी।”

“प्रतिज्ञा करती हूँ।” मोहिनी बैठ गई। फिर पूरी शक्ति से उसके दोनों पांवों को जोर से पकड़कर कहा- “कहो, आज मुझे भी एक भीख दोगी?”

बिराज ने पूछा- “क्या?”

“ठहरो, मैं आती हूँ।”

उसने जाने के लिए कदम उठाया ही था कि बिराज ने छोटी बहू का आंचल पकड़ लिया, कहा- “ना, मत जाओ। मैं तिल भी किसी से नहीं लूंगी।”

छोटी बहू ने कहा- “क्यों नही लोगी?”

बिराज ने तेजी से सिर हिलाते हुए कहा- “यह नहीं हो सकता। मैं किसी का कुछ भी नहीं ले सकती।”

छोटी बहू ने बिराज की आकृति की उत्तेजना को पलभर देखा। वह धम् से बैठ गई अपने पास खीचकर बिठाते हुए कहा- “तो सुनो दीदी, पता नहीं क्यों, तुम मुझे पहले प्यार नहीं करती थीं और न ही ठीक से वार्तालाप। इसके लिए मैं न जाने कितनी बार छिपकर रोई हूँ ओर कितने ही देवी-देवताओ की मनौती मानी है। उन्होंने भी आज सिर उठाकर देखा और तुमने भी बहन कहकर पुकारा। अब मझे इस स्थिति में देखकर तुम मुझे सुखी नहीं कर पाओगी तो कितनी आकुल-व्याकुल होओगी!”

बिराज सिर झुकाए निरुत्तर रहीं।

छोटी बहू ने शीघ्रता से एक टोकरी में खाने-पीने का सामान लाकर दे दिया।

बिराज स्थिर होकर देख रही थी। जब छोटी बहू समीप आकर उसके आंचल में एक सोने की मोहर बांधने लगी तो वह आतंकित होकर चीख पड़ी- “ना-ना... यह नहीं हो सकता... मर जाने पर भी नहीं हो सकता।”

मोहिनी संभल गई। वह भी दृढ़ स्वर में बोली- “होगा और जरूर होगा... क्यों नहीं होगा? मेरे जेठजी ने ही विवाह के समय इसे मुझे दिया था।”

उसने वह बिराज के आंचल में बांध दी। फिर चरण-धूलि लेकर तल पड़ी।

***