डॉमनिक की वापसी - 3 Vivek Mishra द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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डॉमनिक की वापसी - 3

डॉमनिक की वापसी

(3)

डॉक्टरों के राउन्ड के बाद हम कमरे में दाखिल हुए तो आँखों को विश्वास नहीं हुआ। न डॉमनिक की भूमिका निभाने वाले दीपांश जैसा गोरा रंग, न वे चमकदार दूर से ही बोलती आँखें। ये तो जैसे उससे मिलता-जुलता कोई और आदमी था। सिर पर पट्टी बंधी थी। गहरी चोट थी। बहुत खून बह गया था। अभी भी बड़ी हुई दाड़ी के कुछ बालों में खून लगा था। लोगों ने बताया था कि चोट से दिमाग के अन्दरूनी हिस्सों में कितना नुकसान हुआ है, वह कल सुबह सी.टी. स्कैन की रिपोर्ट आने पर ही पता चलेगा।

दीपांश के चेहरे पर शान्ति थी। वह इस एक साल में बहुत बदल गया था। हमें देखते ही हल्के से मुस्करा दिया, वही पुरानी परिचित मुस्कान.

अजीत ने उड़िया लहज़े में गुनगुनाते हुए कहा, ‘ए क्या जगेह हैं दोस्तो…?’

‘पहुँचने में तक़लीफ़ हुई होगी, ये देश की पीठ का तिल है’ दीपांश ने दर्द को दबाते हुए कहा।

मैं सुनकर चौंका। कई बार हम चीजों को कितने निरापद भाव से देखते हैं। लगता है वे हमारे सामने होकर भी नहीं हैं, जो किताब मैं रास्ते में पढ़ता हुआ आया था। वह किताब दीपांश की थी! हाँ, कुछ तिरछे से फोन्ट में, डॉमनिक ही तो लिखा था, उसपे।

हम बेड के पास पड़े वर्गाकार, लोहे के स्टूलों पर बैठ गए। बैठने के बाद हमने ध्यान दिया बेड की दूसरी तरफ़ रमाकान्त बैठे थे, अभिनेता रमाकन्त। दिल्ली के रंगमंच के एक मंझे हुए कलाकार। रमाकान्त और दीपांश को एक साथ हमने कई बार मंच पर देखा था। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह सिर झुकाए बैठे थे। वह हमें पहचान गए थे, पर बोले कुछ नहीं। हमने अंदाज़ा लगाया कि वह यहाँ विश्वमोहन और शिमोर्ग के साथ ही आए होंगे पर उनके साथ गेस्ट हाउस नहीं गए। दिल्ली में शुरुराती संघर्ष के दिनों में दीपांश की सबसे ज्यादा मदद रमाकान्त ने ही की थी।

हमें समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बात कहाँ से शुरु करें। तभी दीपांश ने ही धीरे से पूछा ‘तुम्हारी फिल्म का क्या हुआ?’ मैंने जबरदस्ती हँसने की कोशिश करते हुए कहा, ‘बिना हीरो के फिल्म कैसे बनती भाई?’

जवाब में मुस्कराने की कोशिश में दीपांश के चेहरे पर दर्द की एक गहरी लकीर खिंच गई। कमरे से बाहर अंधेरा गहराने लगा। मैंने और दीपांश दोनों ने एक साथ अजीत की ओर देखा। उसकी पलकें भीग गई थीं। हम लोग कुछ देर बिना कुछ बोले बैठे रहे। फिर कुछ देर में नर्स के कमरे में आने पर उठ खड़े हुए। दीपांश ने हाथ उठाकर हिलाना चाहा पर वह हल्की सी हरक़त के साथ कांप कर रह गया। हाथ पर नीली नसें उभर आई थीं। दूसरा हाथ जिसमें लगी नली से खून धीरे-धीरे भीतर सरक रहा था, थोड़ा सूजा हुआ था। दीपांश के मुँह से बड़ी मुश्किल से दो शब्द निकले, ‘अभी हो ना?’

हम दोनो ने एक साथ जवाब दिया, ‘हाँ, हम अभी हैं’

दीपांश नज़र घुमाकर बोतल से रुक-रुककर नली में टपकती खून की बूँदों को देखने लगा।

थोड़ी देर बाद हम उठकर बाहर आ गए। रमाकान्त कमरे में दीपांश के पास ही बैठे रहे। कॉरीडोर में अभी भी चार-पाँच लड़के खड़े थे। वे हमें बाहर तक छोड़ने के लिए हमारे साथ हो लिए। अंधेरे में कॉरीडोर एक लम्बी सुरंग जान पड़ती थी। अभी बहुत रात नहीं हुई थी। हमें लगा बाहर कुछ उजाला होगा पर बाहर भीतर से ज्यादा अंधेरा था। गेट पर भी कोई लाइट नहीं जल रही थी। दूर चौराहे पर लगे खम्बे पर लटकती मरक्युरी की हल्की-सी रोशनी वहाँ तक आते-आते अंधेरे में मिलकर मलिन हो गई थी। शहर की गति और धीमी होकर रुक गई थी। इक्का-दुक्का लोगों की आवाजाही से दूर सड़क पर कुछ परछाइयाँ खिसकती दिखाई दे रही थीं। लोग घरों को लौट चुके थे। सुबह की भीड़-भाड़ और शोर-शराबे वाला शहर अपने पाँव सिकोड़ कर किसी भारी-बोझिल गठरी में बदल गया था, ...ऐसी गठरी जिसके पेट में कई गाँठें थीं।

हम लगभग साढ़े नौ बजे सरकारी गेस्ट हॉउस पहुँचे। विश्वमोहन लॉन में ही बैठे थे। सामने टेबल पर स्कॉच रखी थी। उनका गिलास आधा खाली हो चुका था और वह किसी गहरी सोच में डूबे सिगरेट का कश खींच रहे थे। हमें देखते ही सिगरेट बुझा दी और इशारे से दो गिलास और मंगवा लिए।

विश्वमोहन गेस्ट हॉउस के बाहर फैले गहरे अंधेरे की ओर देखते हुए कुछ इस तरह बोले जैसे आसपास के माहौल के सन्नाटे और उससे पैदा होने वाली मनहूसियत को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों, ‘क्या हाल बना लिया, इस लड़के ने!…कुछ लोग लाइफ़ में ज़रा भी प्रेक्टीकल नहीं होते। कितनी प्रतिभा है इसमें, पर सब कुछ इम्पल्स में, त्वरित आवेग में करता है। इसे पता ही नहीं है कि नाटक में क्या जगह है इसकी।’

अब जैसे वह बोलते-बोलते झुंझला उठे थे, ‘तुम लोग तो दोस्त हो इसके, समझाओ इसे। यहाँ इसका जीवन बर्बाद हो रहा है। सही इलाज नहीं मिला, तो मर जाएगा।’ उनकी आवाज़ में झींगुरों की झन्न-झन्न मिलकर हवा में फैल रही थी। उनकी बात खत्म होते-होते ऐसा लगा जैसे लॉन से बाहर सड़क पर पसरा अंधेरा उनके चेहरे पर आकर बैठ गया है।

कुछ देर बाद शिमोर्ग भी अपने कमरे से निकल कर लॉन में आकर हमारे पास बैठ गई। विश्वमोहन ने उससे हमारा परिचय कराया। फिर कुछ देर हम सभी अपने आप में सिमटे हुए चुपचाप बैठे रहे। हम लॉन की घास पर पसरी रोशनी के एक गोले पर बैठे थे। वह रोशनी गेस्ट हॉउस के बाहर के अंधेरे से काटकर हमें किसी छोटे से जहाज पर बैठे होने का आभास करा रही थी। बाहर जाने का मतलब अंधेरे में डूब जाना था।

मैं, अजीत, विश्वमोहन और शिमोर्ग तथा अस्पताल में दीपांश के साथ रह गए रमाकान्त, सभी दीपांश को जानते थे पर हम सबके पास उसकी ज़िन्दगी का एक-एक ही सिरा था और हम सब उस रात वही सिरा थामे उसके बारे में अपनी-अपनी तरह से सोच रहे थे।

विश्वमोहन रोशनी के घेरे से बाहर अंधेरे में कुछ देखने की कोशिश करते हुए बोले, ‘मुझे अभी तक याद है जब पहली बार मैंने इसे देखा था। कैसे पूरी शाम दूर पेड़ के तने से टिका, रिहर्शल देखता रहा। एकटक! जैसे चुपचाप खुली आँखों से कोई सपना देख रहा हो, रिहर्शल खत्म हुई, तो जैसे सपना टूट गया, कुछ देर वहीं, वैसे ही खड़ा रहा। मैंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया था। औसत से थोड़ा लम्बा क़द, काले-घुंघराले, उलझे हुए बाल, पहाड़ी नदी-सा साफ़ रंग, बड़ी-बड़ी, गहरी, स्थिर आँखें, देखते ही पता चलता था कि पहाड़ों का रहने वाला है। शायद घर से भाग कर दिल्ली आया था। मैं नहीं जानता, वह अभिनेता बनने आया था या नहीं। मैंने पूछा, ‘मेरे साथ थिएटर में काम करोगे?’ सुनकर अपने पैरों पर खड़ा नहीं रह सका, वहीं घास के मैदान में घुटनों पर बैठ गया’।

विश्वमोहन ने ज़ोर से सिर झटका फिर जैसे अपने आप से ही बोले, ‘बीते सालों में, वक़्त के साथ एक सफ़ेद क़ाग़ज़ पर कितने रंग चढ़ गए।’ कहते-कहते वह दीपांश से जुड़ा अपनी स्मृति का एक सिरा थामे वहाँ से बहुत दूर चले गए थे…, विश्वमोहन सिगरेट सुलगाते हुए जैसे अपने आप से ही बोल रहे थे, ‘क्या सोचा था, किस ऊँचाई तक ले जाऊँगा, इस प्ले को- ‘डॉमनिक की वापसी’…! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा, इसे यहाँ से वापस लौटना ही होगा हमारे साथ’।

हम सब उनकी ओर देख रहे थे। उन्होंने सिगरेट का कश लेते हुए फिर गेस्टहॉउस से बाहर पसरे अंधेरे में कुछ देखने की कोशिश की। बाहर सन्नाटा गहरा हो गया था। अब झींगुर भी नहीं बोल रहे थे। आधी रात बीत चुकी थी, सुबह हॉस्पिटल पहुँचना था। इसलिए हम भी वहाँ से निकलने के लिए उठ खड़े हुए। अपना सामान हम लोग पहले ही बस अड्डे के पास एक लॉज में रख आए थे। अब सवाल था इतनी रात में वहाँ तक पहुँचने का सो हमारी मुश्किल भाँपते हुए, विश्वमोहन ने हमें अपने ड्राइवर से कहकर वहाँ तक छुड़वा दिया।

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