डॉमनिक की वापसी - 2 Vivek Mishra द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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डॉमनिक की वापसी - 2

डॉमनिक की वापसी

(2)

उस दिन खंजड़ी बजाते हुए, छाती चीर के दिल में धंस जाने वाली आवाज़ में गा रहे थे, डॉमनिक दादा। उनके पीछे थे रूपल, उत्कर्ष, निशा, हरि और निशांत। साथ में उत्तेजना में और भी कुछ गिनी-चुनी मुट्ठियाँ गीत के बोलों के साथ आसमान में उठ रही थीं। यहाँ सवाल गरीबी, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार का नहीं था। सवाल जाति, धर्म, या देश में बदलती राजनीति का भी नहीं था। यहाँ सवाल था प्रेम का, प्रेम के अधिकार का, पर यहाँ जैसे उसका हर सोता सूख गया था। उसके बारे में सोच के भी सिहर जाते थे, लोग। महीने भर के भीतर यह तीसरी हत्या थी।

कसूर था- प्रेम। मरने वाले थे, प्रेमी।

एक लड़का, दो लड़कियाँ। कोई कार्यवाही नहीं, कोई रिपोर्ट नहीं। दिगदिगन्त तक सन्नाटा। डॉमनिक दादा अपनी खंजड़ी और गीतों से, तीन दिन से लगातार इसी सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे पर अपनी आँखों में आक्रोश की लालिमा और भविष्य के अंधेरे की छाया समेटे कुछ स्कूल-कॉलेज के लड़के-लड़कियों के अलावा उनके साथ कोई नहीं आया था। कुछ दिनों में ही हवा बदल गई थी। यूँ तो यहाँ किसी को किसी से कोई समस्या नहीं थी। पर अगर कभी किन्हीं दो प्रेम करने वालों के बीच उनकी जाति आ जाती, तो वह प्रेम से ही नहीं, उनके जीवन से भी बड़ी हो जाती।

नरवर में तमाम चेहरे, जो डॉमनिक दादा के नुक्कड़ नाटक देखने के लिए सारे काम छोड़कर, शनिवार-इतवार की शाम रंगशाला में इक्ट्ठे हो जाते थे और बाकी दिनों में कभी अस्पताल, कभी कचहरी, कभी डिग्री कॉलेज, कभी गल्ला मण्डी, डाकखाने या फिर बस अड्डे के सामने वाली सड़क के किनारे उनकी खंजड़ी की आवाज़ सुनते ही मिनटों में मजमा लगा लेते थे, वे अब जाति प्रमाण पत्रों में बदल गए थे।

जहाँ भी प्रेम की कोंपल फूटना चाहतीं, ज़मीन चिर जाती, पक्ष-विपक्ष खड़े हो जाते, हथियार तन जाते, सारा भाईचारा भूलकर लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते, पर सब जिस बात पर एक होते, वह होती प्रेम का विरोध। प्रेम नष्ट कर रहा है, संस्कृति को। उछृंखल बना रहा है, पीढ़ियों को। तबाह कर देगा, कौम। मिटा देगा, नस्ल की शुद्धता। नहीं रहेगा धरती पर, रक्त की शुद्धता का गौरव। मिट जाएगा, जाति का अभिमान। अभी नहीं जागे, तो वर्ण संकरों से बजबजा उठेगी, धरती। एक ही उपाय है, मिटा दो प्रेम को,…और न कर सको तो मिटा दो प्रेमी को।

अब किराए पर मकान ढूँढ़ते लोगों से स्थानीय लोग, केवल उनका नाम, जाति, धर्म या उनका पेशा नहीं पूछते, बल्कि सीधे एक ही सवाल पूछते कि कहीं उन्होंने प्रेम विवाह तो नहीं किया? प्रेम सबके दिल-दिमाग़ मे था, पर शायद एक बीमारी- एक ख़ौफ़ की तरह।

ऐसे में डॉमनिक दादा खंजड़ी बजाते प्रेम के गीत गाते उसके पक्ष में खड़े थे।

इलाक़े में और कितनी समस्याएं थीं जिनके बारे में सोचना था पर अपनी जाति की सुरक्षा यहाँ सबसे बड़ी बात हो गई थी। जो लोग प्रेम के बारे में इससे इतर राय रखते थे, वे डरे-सहमे इधर-उधर खुसुर-फुसुर तो करते थे पर खुलके कोई नहीं बोलता था।

लोगों का कहना था पिछले दो-एक वर्षों में ऐसी घटनाएं बड़ी थीं पर असली तनाव तब शुरु हुआ जब एक ब्राह्मण की बेटी, एक ढीमर के लड़के के साथ भाग गई। तीन हफ़्ते तक दोनो का कुछ पता नहीं चला। उसके बाद एक दिन शाम के समय कस्बे में घुसते हुए एक बस कन्डक्टर ने नहर के किनारे लड़के की लाश देखी थी। पुलिस इसे आत्महत्या बता रही थी इलाके के ढीमरों का कहना था कि यह हत्या का मामला है। किसी ने लड़के को पेड़ से लटका कर मार दिया और बाद में उतार कर नहर के किनारे फेंक दिया। लड़की का कहीं कुछ पता नहीं चला। कुछ लोगों का कहना था कि लड़की को भी मार कर कहीं फेंक दिया होगा। कुछ कहते थे कि पंडितों ने जब उन दोनो को पकड़ा तो लड़की को जबरन, इंदौर, अपनी रिश्तेदारी में भेज दिया और लड़के को मार डाला। लगभग तभी से हवा में एक अदृश्य-सा तनाव था पर न तो इस बीच प्रेम ही रुका था और न उसके विरोध में होने वाली हत्याएं। जैसे प्रेम और रुढ़ियों के बीच एक अघोषित युद्ध चल रहा था।

डॉमनिक दादा की खंजड़ी की आवाज़ और तेज़ हो गई थी।

उनका दल बाज़ार के कोलाहल में इज़ाफ़ा करता चौराहे तक आ गया था। उनके आसपास भीड़ इक्ट्ठी होने लगी थी। दुकानदार किसी अनिष्ठ की आशंका मे गल्ला-गद्दी छोड़कर, उचक-उचककर बाहर देख रहे थे। ठेलेवालों ने अपने ठेलों पर सजी जिन्स-फल-सब्जी को बचाने के लिए उन्हें किनारे धकेल दिया था, खोमचे-दासे और फेरीवालों ने अपने सामान को घेरकर उसकी ओली भर ली थी।

कुछ औरतें सिर पर कलश रखे मंदिर जा रही थीं। वे बीच में ही ठिठक गईं, किसी ने घूँघट के भीतर से ही पूछा था ‘कौन चीज कौ जुलूस है-कक्की’

‘प्रेम कौ जुलूस है, ज्वान-जवान लड़कन खों प्रेम कौ पाठ पड़ा रओ है, जौ बाबा’ एक धूप में तपके तामें के रंग में बदल चुकी, झुर्रियों से भरे चेहरे वाली औरत ने लम्बे घूँघट में, बंद बोरियों जैसी लगती औरतों, के झुंड को आगे धकेलते हुए कहा, ‘चलौ इन जुलूस तमाशन में मंदिर के लाने देर भई जा रई.’

एक जवान औरत ने घूँघट के भीतर से चिरौरी की, ‘हे कक्की देख लैन देओ’

‘तोय बड़ौ मजा आ रओ है जलूस में, जे कैसो जुलूस है, हैंया जुलूस तौ गाँधी बाबा के जमाने में सुराज की लड़ाई के लाने निकलो तो, कै फिर अजोध्या जी में राम मन्दिर बनवाबे के लाने.’

हाथ से साइकिल ढड़काते हुए, एक स्कूल से लौटती लड़की ने कहा ‘अरे यह वैसा जुलूस नहीं है, अम्मा। ये डॉमनिक दादा हैं, नाटक वाले। एक दिन हमारे स्कूल में भी आए थे।’

‘बेई डॉमनिक दादा जिनें मंदिर में महाराज जी ने भगवान के भजन गावे बुलाव तौ और इन्नें साफ़ मना कर दई ती, हम तो तबईं समझ गए ते के विधर्मी नहीं- अधर्मी है, अब बात खुल कें आ गई सामने- गैर बिरादरी में शादी-ब्याओ की वकालत कर रौ है.’ बुढ़िया लगभग गाली देनेवाले अंदाज़ में बोली।

‘जिन बच्चों की हत्या हुई है, उनके क़ातिलों को पकड़ने की मांग कर रहे हैं, कह रहे हैं उन्हें न्याय मिलना चाहिए.’ लड़की ने किसी से सुनी-सुनाई बात दोहराई।

‘लेओ उनैं नियाय मिलै, उन्नै नैन-मटक्का करकें बड़ो अच्छो काम करौ, बिरादरी से बाहर के लड़का के संगै चली गई, तो का करते मताई-बाप, घर-परिवार, जात-बिरादरी की इज्जत कौनौउ चीज नईं है?, चलौ आगें बढ़ौ.’

चौराहे पर पहुँचते ही दो पुलिसवालों ने नारे लगाते लड़के-लड़कियों को किनारे करके एक दूसरी दिशा से आती लम्बी काली गाड़ी के लिए जगह बना दी। गाड़ी के बोनट के दाईं ओर पीतल की डंडी लगी थी जिसपर प्रदेश की सत्तारुढ़ पार्टी का झंडा लगा था। गाड़ी देखके नारों का स्वर ऊँचा हो गया था। तभी गाड़ी में सवार व्यक्ति ने शीशा नीचा करके, सिर निकालकर पान की पीक थूकी और भीड़ की तरफ़ देखते हुए एक गाली हवा में उछाली। गाली सीधी किसी गरम खून से भवकते सीने में गड़ गई और प्रतिरोध में एक पत्थर काली गाड़ी के शीशे से जा टकराया। व्यवस्था बनाते पुलिस वालों की लाठियाँ भीड़ पर तन गईं पर जब लगा कि तनी लाठियों से भीड़ पर काबू नहीं पाया जा सकेगा तो वे तेज़ी से घूमने लगीं।

देखते-देखते चौराहे पर घमासान मच गया।

डॉमनिक दादा सभी से शान्त रहने की अपील करते हुए खजड़ी बजाकर वहीं बैठ जाने का इशारा करने लगे। कुछ लोग उनकी बात मान कर बैठ भी गए। तभी हवा में सरसराती एक लाठी उनके सिर से टकराई। खंजड़ी कई पैरों के बीच से जगह बनाती सड़क पर ढड़कती चली गई।

जहाँ रुकी, वहीं अनगिनत पैरों से कुचली जाने लगी। कुछ देर बाद वह दिखनी बंद हो गई। उसके बाद वह किसी को नहीं मिली। खंजड़ी और उसकी आवाज़ भीड़ में कहीं खो गई…,

‘उस दिन आनन-फानन में डॉमनिक दादा को नरवर से यहाँ शिवपुरी के जिला अस्पताल में लाना पड़ा। उन्होंने कभी नहीं बताया कि वह दिल्ली में इतने बड़े थिएटर ग्रुप में काम कर चुके हैं। यह भी नहीं बताया कि उनका नाम दीपांश है। वो तो एक दिल्ली से ट्रान्सफ़र होकर शिवपुरी आए पत्रकार ने उन्हें पहचान लिया। और अख़बारों को ख़बर कर दी।’ उत्कर्ष ने बातों के सिरे जोड़ते हुए कहा।

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