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मेरे उसूल, मेरी पहचान



रोशनी सरकारी विभाग में यूडीसी पद पर कार्यरत थी। सरल ,मृदुभाषी ,हंसमुख रोशनी के दो उसूल पक्के थे समय की पाबंदी और कार्य के प्रति ईमानदारी। चाहे मौसम की मार हो या बीमारी का वार, उसने कभी भी इन्हें हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया। ऑफिस में सीनियर व अन्य कर्मचारी खुले दिल से उसके इन गुणों की प्रशंसा करते थे। हां, कुछ लोग अपवाद भी थे, जो पीठ पीछे उसका मजाक उड़ाते थे। उन लोगों का मानना था कि वह अपने घरेलू कर्तव्यों से बचकर इतनी जल्दी ऑफिस आती है ।नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई महिला घर या ऑफिस की जिम्मेदारी इतनी सुघड़ता से संभाले व समय से आ जाए । वह सब की बातों को सुनकर हंसी में उड़ा देती और अपने काम में जुटी रहती।
रोशनी का बचपन बहुत संघर्ष में बीता था। उसके पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे और उनकी तनख्वाह इतनी ना थी कि जिस से 6 जनों का गुजर बसर हो सके। इसलिए उसकी मां भी घर पर सिलाई कढ़ाई ,लिफाफा आदि बना घर की गाड़ी खींचने में अपना पूरा सहयोग देती।
सरिता पढ़ने लिखने में शुरू से ही होशियार थी और घर के हालात ने समय से पहले से उसे समझदार बना दिया था।
9 वीं कक्षा तक आते-आते उसने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था जिससे उसकी पढ़ाई का बोझ परिवार पर ना पड़े ।अपने बहन भाइयों की पढ़ाई में भी वह पूरी मदद करती थी । संध्या की मां ने उसे सदा आगे बढ़ने के लिए के लिए प्रेरणा दी । अपने माता पिता के सहयोग और अपनी कड़ी मेहनत के बल पर ग्रेजुएशन के बाद उसकी नौकरी लग गई थी। किंतु वह अपने संघर्ष के दिन नहीं भूली थी ।इसलिए नौकरी के पहले दिन ही उसने अपने इन 2 नियमों का संकल्प ले लिया था।
शादी के बाद पति भी उसे सहयोगी मिले। इस कारण वह घर व ऑफिस के कर्तव्य को बखूबी निभा पा रही थी। कल उस की नौकरी के 15 साल हो जाएंगे ।अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण दिन को वह हर वर्ष अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ऑफिस में मनाती है और कभी छुट्टी नहीं करती ।
आज सुबह तबीयत ठीक न होने पर भी वह दवाई ले ऑफिस के लिए निकल गई लेकिन बीच में ही मेट्रो में खराबी आ गई ।रोशनी ने अपने सहयोगियों को फोन करने की कोशिश की लेकिन अंडरग्राउंड मेट्रो होने के कारण नेटवर्क नहीं मिल पा रहा था 10 मिनट बाद मेट्रो चली तो उसने राहत की सांस ली। मेट्रो से उतर कर उसने जल्दी जल्दी ऑफिस की ओर कदम बढ़ाएं। उसे बड़ी घबराहट हो रही थी क्योंकि वह आज तक लेट नहीं हुई थी और आज तो रास्ते में ही 9:00 बज गए थे । उसने मन में सोच लिया था कि आज वह ऑफिस में आधा घंटा ज्यादा काम करेगी।
9:15 बजे वहऑफिस पहुंची । आज लेट होने की वजह से वह खुद से ही नज़रें नहीं मिला पा रही थी । वह जैसे ही अटेंडेंस लगाने लगी तभी उसके सर जो कुछ ही महीने पहले यहां आए थे , वहां पहुंच गयेऔर घड़ी की ओर देखते हुए बोले "रोशनी जी अपना टाइम सही करिए । आज आप पूरे 15 मिनट लेट है।" उनकी यह बात सुनकर रोशनी पर मानो घड़ों पानी पड़ गया हो। वह थोड़ा भावुक हो गई। फिर थोड़ा संभलते हुए बोली " सर मैं इस ऑफिस में १५ सालों से काम कर रही हूं और कभी लेट नहीं हुई। वह तो आज मेट्रो की खराबी की वजह से लेट हो गई।"
"तो आप फोन कर देती ।"
" सर मैंने कोशिश की थी ।लेकिन अंडर ग्राउंड मेट्रो होने के कारण नेटवर्क नहीं आ रहा था ।"
"रहने दीजिए रोशनी जी ! लेट होने पर सब ऐसे ही बहाने बनाते हैं।" सर थोड़ा तल्ख लहजे में बोले ।
यह सुन रोशनी को गुस्सा तो बहुत आया किंतु उसने अपने आप को शांत रखते हुए कहा "सर मैं कोई बहाना नहीं बना रही हूं। मैं समय की कीमत जानती हूं।"
उससे ईर्ष्या करने वाले कर्मचारी आज उसके उसूलों की धज्जियां उड़ते देख मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे यह सब सुन दूसरे सीनियर कर्मचारी भी वहां आ गए। जब उन्हें सारी बातों का पता चला तो उन्होंने भी रोशनी की तरफदारी की और उसकी कर्तव्यनिष्ठा व समय पाबंदी के बारे में बताया। एक ऑफिसर अपनी गलती मान जाए तो उसे ऑफिसर कौन कहे और वह भी एक क्लर्क से। यही बातें तो उसके अहं को संतुष्ट करती है।
उन्होंने बड़े बाबू से कहा " ठीक है किंतु आज यह लेट है, यह तो मानती है ।"
"सर मुझे भी इस बात का अफसोस है कि आज मैं लेट हूं और मेरी इतने वर्षों की तपस्या पर धब्बा लग गया ।यह भी सच है मैंने कभी झूठे बहानों का सहारा नहीं लिया और आज लेट आने की वजह से काम का जो नुकसान हुआ है उसे मैं छुट्टी के बाद रूक कर पूरा करूंगी।"
सारा दिन रोशनी उदास व परेशान रही। एक सवाल उसे बार-बार परेशान कर रहा था कि ईमानदारी व कर्तव्य निष्ठा का उसे ये फल मिला !बिना सोचे समझे सर ने उसे सबके साथ एक कतार में ला खड़ा किया । तो क्या वह छोड़ दे यह उसूल और गुम हो जाए दुनिया की भीड़ में ! लेकिन वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाएगी क्योंकि यही तो उसकी ताकत और हौसला है ।शाम को उसने अपने पति को भी सारी बातें बताई। उन्होंने भी उसे यही समझाया कि तुमने अपना पक्ष रख दिया। तुम यूं ही मेहनत से अपना काम करती रहो और अपने हौसले को कभी टूटने मत देना क्योंकि यही तो तुम्हारी पहचान है।
रोशनी को उनकी बातों से फिर से हिम्मत मिली। मेट्रो में आए दिन आने वाली तकनीकी खामियों के कारण वह आधा घंटा और जल्दी से घर से निकलने लगी। उसने सोच लिया था कि ऐसी छोटी-छोटी बातों उसे अपने उसूलों से कभी नहीं भटका सकती। हां, कोई आपके कार्यों की प्रशंसा करें या ना करें किंतु आपको एक आत्मिक संतुष्टि सदैव रहेगी
सरोज
स्वरचित व मौलिक

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