दस दरवाज़े - 16

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर - सोलह)

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छठा दरवाज़ा (कड़ी -1)

ऊषा : कौन हरामजादा नॉक करता है...

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

***

हमारे घर में पहला बच्चा होने वाला है। अंजू हर समय भयभीत-सी रहती है। उसको वहम है कि कोई अनहोनी ही न हो जाए। छोटी-सी तकलीफ़ को बड़ी बनाकर बताती है। एक दिन हम शॉपिंग से लौटते हुए टैंटलो एवेन्यू से गुज़र रहे हैं। वह अचानक कहने लगती है -

“मुझे टॉयलेट जाना है।”

“यहाँ तुझे टॉयलेट कहाँ ले जाऊँ? अब घर तक वेट कर, थोड़ी सी ओर।”

“जी नहीं, जल्दी!”

“यहाँ न खेत, न ईंख।”

कहता हुआ मैं हँसता हूँ, परंतु वह रुआंसी हुई पड़ी है।

“जल्दी करो कुछ, मुझे बहुत प्रैशर पड़ रहा है। मैं मर जाऊँगी... हाय! मेरे से घर तक नहीं पहुँचा जाएगा।”

वह याचना-सी करती कहती है। मुझे एकदम ख़याल आता है कि यहाँ तो ऊषा रहती है। किसी समय रही मेरी गर्ल-फ्रेंड। इसी रोड पर उसका फ्लैट है। मैं अंजू से कहता हूँ -

“ज़रा होल्ड कर, देखते हैं अगर ऊषा घर हुई तो।”

“कौन ऊषा?”

“तूने आम चूसने हैं कि पेड़ गिनने हैं?”

“फिर भी।”

“यह कभी करमजीत की सहेली हुआ करती थी, बहुत अच्छी औरत है।”

कहता हुआ मैं कार खड़ी करता हूँ और उसका हाथ पकड़कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगता हूँ। पहली मंज़िल पर उसका फ्लैट है। मैं जाकर उसका दरवाज़ा खटखटाता हूँ। कोई आवाज़ नहीं आती। ज़रा ज़ोर से खटखटाता हूँ। अन्दर से कड़कदार आवाज़ गूँजती है -

“कौन हरामज़ादा नॉक करता है?”

“ऊषा, मैं!”

“दफा हो जा यहाँ से!”

“ऊषा, दरवाज़ा खोल, मेरी वाइफ मेरे साथ है।”

कुछ देर बाद आहिस्ता से डेढ़ेक इंच दरवाज़ा खुलता है। दरवाज़े में अन्दर से जंजीर वाला लॉक लगा हुआ है। दो मोटी-मोटी आँखें तिरछी होकर मेरी ओर देखती हैं, हँसती हैं और दरवाज़ा खुल जाता है। मैं कहता हूँ -

“मेरी वाइफ ने टॉयलेट जाना है, जल्दी से इसे ले जा।”

वह मेरी पत्नी की तरफ ग़ौर से देखती है और उसको सहारा देकर टॉयलेट में छोड़ आती है। फिर अपना ठिगना कसा हुआ शरीर मेरे बिल्कुल करीब लाकर धीमे स्वर में कहती है -

“तो ये है तेरी माँ!”

“हाँ, यही है।”

“मुझे तो छोड़ा था, सो छोड़ा था, पर माँ तो अच्छी ढूँढ़ता!”

कहती हुई वह हँसती है और फिर कहती है -

“बड़ा उछला फिरता था कि हम विवाह इंडिया में कराएँगे!... और ब्याह लाया इस मरियल-सी को।”

फिर, अपनी छाती में अंगूठा गाड़ती बोलती है -

“ऊषा से खरी औरत तुझे कहीं नहीं मिलने वाली। लाख लालटेनें लेकर खोज ले।”

मैं उसको बांहों से पकड़कर अपनी ओर खींचने की कोशिश करता हूँ, पर वह मुझे धक्का-सा देकर दूर जा खड़ी होती है और कहती है -

“वो माँ मर गई जो दही के साथ रोटी दिया करती थी!”

तभी टॉयलेट का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आती है। ऊषा अंजू की ओर दौड़ते हुए कहती है -

“भैण जी, ज़रा आराम से, आओ यहाँ कुर्सी पर बैठो।”

अंजू पेट को संभालती कुर्सी पर बैठ जाती है। ऊषा कहने लगती है -

“इस धरती का सबसे खराब जीव मर्द है। हमारे पेट फुलाकर खुद हँसता घूमता है। मैं तो कहती हूँ कि ईश्वर करे, ये सारी तकलीफ़ मर्द को झेलनी पड़े!... मैं चाय रखती हूँ।” कहते हुए वह रसोई में जा घुसती है।

करमजीत मेरा ख़ास दोस्त है। हम एकसाथ इंग्लैंड में आए हैं। इकट्ठे ही काम भी किया। इकट्ठे ही लंदन की गलियों में घूमे-फिरे हैं। हमारी पत्नियाँ भी लगभग एकसाथ ही हमें छोड़कर गईं। हम अपनी दोस्तीवाली अंतरंग बातें करके अक्सर हँसा करते हैं। उसने अपने घर में किरायेदार रखे हुए हैं और इसी किराये से उसके घर की मोर्टगेज़ और अन्य खर्चे चलते हैं। वह तो आजकल और घर लेकर किराये पर चढ़ाने की योजनाएँ बना रहा है। मुझे भी परामर्श देता रहता है कि घर खाली पड़ा है, दो-एक किरायेदार रख लूँ, पर मुझे यह पसंद नहीं। मैं अकेला रह कर प्रसन्न हूँ।

एक दिन वह फोन करता है -

“तेरी ऐनिया का क्या हाल हे?”

“ठीक है।”

“गोरी से दिल भर गया हो तो किसी देसी गुड़िया का इंतज़ाम कर दूँ?”

“नहीं मुझमें इतना सामर्थ्य नहीं, मैं अपनी जगह ठीक हूँ।”

“यहाँ रंग का स्वाद इतनी देर नहीं निभा करता, तू उसके साथ कैसे अब तक फंसा बैठा है?”

“अब तो जब इंडिया जाना होगा, विवाह करवाना होगा तभी उसको छोड़ूँगा।”

“कोई अपनी तरफ की लड़की भेजूँ?”

“नहीं यार, मेरे लिए ऐनिया ही सही है।”

“ओ मूर्ख! अपनी लड़की फिर भी अपनी ही होती है।”

कहकर वह ज़ोर से हँसता है। फिर गंभीर होते हुए कहता है -

“एक लड़की है मेरे पास आई हुई। मेरे पास तो कमरा खाली है नहीं, उस बेचारी को रहने के लिए जगह चाहिए। अगर तू उसको कुछ दिन रख ले तो बेचारी तुझे दुआएँ देगी।”

“मैं दुआओं के बग़ैर ही ठीक हूँ।”

“तू शाम को घर ही है?”

“हाँ।”

“मैं चार-पाँच बजे तुझसे मिलता हूँ।” वह कहता है और मेरा उत्तर सुने बिना ही फोन रख देता है।

शाम को करमजीत आता है। उसके संग करीब पच्चीस साल की ठिगने कद की पंजाबी लड़की है और लड़की ने गोद में दो साल का बच्चा उठा रखा है। करमजीत कहता है -

“ये ऊषा है। बहुत दुखी है। हमें इसकी हैल्प करनी है। यह तेरे पास रहेगी, जब तक कहीं ओर इंतज़ाम नहीं होता।”

“यार मैं...मैं... ”

“मैं...मैं क्या यार! जब तुझे कह दिया कि शरीफ लड़की है। इतना बड़ा तेरा घर है, किसी भी कोने में दो दिन काट लेगी।”

वह मित्रता के रौब में कहता है। हमारी मित्रता ऐसी ही है। मैं उसकी बात को टाल नहीं सकता। ऊषा की गोदी वाला बच्चा मेरी ओर देख रहा है। जब मैं उसकी ओर ध्यान देता हूँ तो वह मेरी ओर बांहें फैलाकर आगे की ओर झुकता है। मैं बच्चे को उठा लेता हूँ और पूछता हूँ -

“क्या नाम है भई तेरा?”

“कह रॉकी।” ऊषा कहती है। करमजीत सैटी पर से उठते हुए कहता है -

“ले भाई, अब मुझे जाना है, मैं शाम को फोन करूँगा।”

मेरे कुछ कहने से पहले ही वह चला जाता है। मैं ऊषा की ओर देखता हूँ। उसकी बड़ी बड़ी आँखों में एक दुःख-सा तैर रहा है। मुझे उस पर दया आने लगती है। मैं कहता हूँ -

“चाय पियेगी?”

“हाँ, पी लूँगी।”

“रॉकी के लिए क्या लाऊँ, दूध या कुछ और?”

“इसके लिए कुछ नहीं, इसका खाना मेरे पास है।”

मैं चाय बनाने लगता हूँ। वह अपने बैग में से बोतल निकालकर लड़के को दूध पिलाने लगती है। मैं चाय और बिस्कुट लाकर मेज़ पर रखते हुए कहता हूँ -

“देख ऊषा, मैं तुझे जानता नहीं, पर करमजीत को ना भी नहीं कर सकता। मैंने कभी कमरा किराये पर नहीं दिया। करमजीत की खातिर तू एक-दो दिन रह ले।”

“शायद जल्दी ही करमजीत भाजी के घर कमरा खाली हो जाए।”

वह रॉकी को दूध मिलाकर एक बिस्कुट उसके हाथ में पकड़ा देती है और खुद चाय पीने लगती है। कभी कभी वह मेरी तरफ देख लेती है। मैं सोचने लगता हूँ कि अपरिचित, अनजान औरत से कौन-सी बात करूँ। मैं पूछता हूँ -

“ऊषा, क्या कहानी है तेरी?”

“करमजीत भाजी ने नहीं बताई?”

“नहीं, वह तो तेरे सामने वैसे ही भाग गया।”

“मैंने सोचा कि फोन पर बता दी होगी... मेरी बहन ने लड़का खोजकर मेरा विवाह किया था। लड़का हरामी निकला और मुझे छोड़ गया। बहन के घर आई तो जीजा भी हरामी निकला। बस, यही कहानी है मेरी।”

“तुझे बताया कि मैं तुझे अधिक दिन नहीं रख सकता।”

“ठीक है, मैं जल्दी ही कोई कमरा ढूँढ़ लूँगी। मुझे तो इस वक़्त सिर-छिपाई चाहिए।”

“फिर क्या करना है?”

“फिर क्या, सोशियल सिक्युरिटी तो मुझे मिलती ही है। अगर हो सका तो मैं कोई काम खोज लूँगी। बेटे को पालूँगी, और क्या।”

“करमजीत के पास कितने दिन रही है?”

“दो दिन, वो मेरी बहन का परिचित है, उसने ही मुझे इसके पास भेजा था।”

रॉकी खेलने में मस्त हो जाता है। ऊषा भी सहज होकर बैठ जाती है। मैं पूछने लगता हूँ-

“दुबारा अपने हसबैंड के साथ सुलह करने की कोशित नहीं की?”

“वो कहते हैं न कि चल रे मन... बेगाने धन, बेगाने पुत्त पर कैसा रोषा(रूठना), जिन धैं मारा सोटा !... मैंने बहुत मार खाई है, पर और नहीं खा सकती। वहाँ हरामजादा वही नहीं, मेरी सास भी हरामजादी थी। क्या बताऊ! मेरी सास तो कुआँरी लड़कियों को बच्चे गोद में खिलाने वाली औरत है, मिनट में बात बना लेती है।”

कहते हुए उसकी बड़ी-बड़ी आँखें नम हो जाती हैं। मैं और कुछ नहीं पूछता और उठकर देखने लगता हूँ कि रात के लिए रसोई में क्या-क्या है। मेरा फ्रिज तो हमेशा की तरह खाली पड़ा है। मैं ज्यादातर ऐनिया के यहाँ ही खा आया करता हूँ। मैं उससे पूछता हूँ -

“ऊषा, रात में रोटी बनाने के लिए राटा वगैरह तो हैं नहीं, कल तो सब कुछ खरीद लाऊँगा। फिश एंड चिप्स ही चलेंगे?”

“ठीक है, जो भी हो। मैं तो सब खा लेती हूँ।”

वह बेपरवाही से बोलती है। मैं फिर कहता हूँ -

“मैं अकेला ही हूँ, इसलिए सोचता रहता हूँ कि बर्तन क्या जूठे करने हैं। कल मसाले, आटा और सब्जियाँ वगैरह की शॉपिंग कर दूँगा।”

वह कुछ नहीं बोलती। मैं उठकर समीप की दुकान से घर का आवश्यक-सा सामान ले आता हूँ - कुछ फ्रूट, सीरियल, जूस, दूध, बिस्कुट आदि। वह अपने बारे में और बातें बताने लगती है। वह नूरमहल की रहने वाली है। उसके पिता की नूरमहल के अड्डे पर जूतों की दुकान है। उसके दो भाई चमड़े का काम करते हैं। अच्छा गुज़ारा चल रहा है। उसकी बड़ी बहन हंसले में रहती है। मैं उसको रसोई दिखा देता हूँ ताकि वह अपने आप जो चाहे ले सके। बाथरूम और ऊपर वाले शयन कमरे भी दिखा देता हूँ ताकि वह घर में खुलकर विचर सके। वह हर चीज़ को बड़े ध्यान से देख रही है।

मैं टेलीविज़न लगाते हुए पूछता हूँ -

“क्या देखना पसंद करेगी?”

“कुछ भी, जो भी तुम देखना चाहो।”

बाहर अँधेरा होने लगता है। मैं घर की बत्तियाँ जगाकर पर्दे कर देता हूँ। अँधेरे के साथ ही मेरे पीने का संबंध है। मैं व्हिस्की की बोतल उठाता हूँ और उसे दिखाकर पूछता हूँ -

“इजाज़त है?”

वह हँसने लगती है और कहती है -

“हमारे तो सभी पीते हैं, बाप भी, भाई भी।”

“तेरा घरवाला भी पीता था?”

“वो हरामी सिगरेट में कुछ डालकर पीता था। बू मारा करता था।” कहती हुई वह अपना मुँह अजीब-सा बना लेती है। मैं अपना पैग बनाकर उससे पूछता हूँ -

“सॉरी ऊषा, मुझे पूछना तो नहीं चाहिए पर मेरा फर्ज़ बनता है कि तुझे एक बार पूछूँ कि तू पी लेती है कि नहीं।”

“ईश्वर का नाम लो जी...ऐसी हराम की चीज़ की तरफ मैं नहीं देखती।”

रॉकी सो जाता है। वह उसको साथ वाली सैटी पर लिटा देती है। मैं उसको अपने करीब बैठने के लिए कहता हूँ। वह मेरी वाली सैटी पर आ बैठती है। मैं उसकी ओर देखते हुए कहता हूँ-

“ऊषा, तू सुन्दर बहुत है। मुझे अफसोस है कि तुझे यह दुख देखना पड़ रहा है।”

“रब की मरज़ी, मैं क्या कर सकती हूँ। किस्मत हरामी उंगली दिए फिरती है।”

वह दोनों हाथ घुमाती हुई कहती है। मैं उसकी गालों पर हाथ फेरता हूँ। वह मेरी तरफ देखने लगती है। मैं उसके मोटे अधरों पर उंगलियाँ घुमाता हूँ। वह आँखें बंद कर लेती है।

दूसरे दिन मैं काम पर से करमजीत को फोन करके पूछता हूँ -

“अब इसका क्या करना है?”

“करना क्या है इसका?... रख ले जब तक रखनी है। वैसे एक बात बताऊँ, तू आदमी नाशुक्रा ही है।”

“क्या बात हो गई?”

“तुझे कोई सुन्दर-सी चीज़ दी है, छोटी-सी डोल, जैसे चाहे खेलो। पर तूने एक बार भी थैंक्स नहीं कहा।”

“थैंक्स क्या कहूँ, तू मेरे गले में बला डालकर खुद भाग गया।”

“नहीं ओए, यह तो बहुत बढ़िया चीज़ है। बहुत भली है, कभी ना नहीं करती, इतना ज़रूर है कि मिट्टी की तरह पड़ी रहती है।”

वह अपना अनुभव बताते हुए कहता हूँ, परंतु मेरा अनुभव कुछ भिन्न है। मैं कहता हूँ -

“नहीं भई, मिट्टी की तरह नहीं, पूरा साथ देती है।”

“फिर तो गुड लक।”

“पर मैं अपने भाई का क्या करूँ। अगर उसको पता चल गया तो मेरी शामत आ जाएगी।”

“ले, यह कौन-सी बड़ी बात है। तेरे भाई को मैं जानता ही हूँ, उसे काबू में करना तो बहुत ही सरल है।”

“वह कैसे?”

“उसको काणा कर दे।”

“कोई अक्ल की बात कर।”

“यह अक्ल की बात ही है... ऊषा भली लड़की है, कभी ना नहीं करेगी और तेरा भाई उम्रभर चूँ नहीं करेगा, यह मेरी गारंटी।” कहते हुए वह ज़ोर से हँसता है।

(जारी…)

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Balkrishna patel 1 महीना पहले

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Sunhera Noorani 1 महीना पहले

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Manish Kuwadiya 1 महीना पहले

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Ram Das 1 महीना पहले

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Manjula Makvana 1 महीना पहले