दहलीज़ के पार - 19

दहलीज़ के पार

डॉ. कविता त्यागी

(19)

अथर्व के मोबाइल पर सम्पर्क करके श्रुति से बाते करने के पश्चात्‌ गरिमा ने अपनी सास को उसकी कुश्लता की जानकारी दी। चूँकि उसको श्रुति के द्वारा प्रभा की माँ के स्वर्गवास का पता चल चुका था, इसलिए अपनी सास को प्रभा की माँ के देहान्त की सूचना देते हुए गरिमा ने उनके समक्ष प्रभा और अथर्व के घर जाकर सवेदना प्रकट करने की अपनी इच्छा भी व्यक्त की। गरिमा का निवेदन उसकी सास ने सहज स्वीकार कर लिया और उसको प्रभा के घर जाने की आज्ञा प्रदान कर दी। गरिमा की सास भी चाहती थी कि जो परिवार उनकी बेटी को यथा—आवश्यक प्रेम और सहारा देता रहा है, उस परिवार को वे अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ सहारा दे सके। वे जानती थी कि ऐसे समय मे, जबकि प्रभा की माँ स्वर्ग सिधार गयी है, प्रभा को सात्वना और सहानभूति की अत्यधिक आवश्यकता है। सास से अनुमति पाकर गरिमा प्रभा के घर जाने की तैयारी करने लगी।

उसी दिन दैवयोग से पुष्पा भी गरिमा से भेट करने के लिए आ पहुँची, जिस दिन गरिमा प्रभा के परिवार से मिलने के लिए जा रही थी। गरिमा अभी घर से निकल नही पायी थी। वह दरवाजे की ओर बढ़ रही थी, तभी उसकी दृष्टि घर मे प्रवेश करती हुई पुष्पा पर पड़ी। वह मन ही मन दुविधा मे फँस गयी अब क्या करे ? घर पर आये हुए अतिथि का स्वागत—सत्कार करना उसका धर्म था। अतिथि भी ऐसा, जो विशेष रूप से उसी से भेट करने के लिए आया था। गरिमा जानती थी कि पुष्पा उसके विवाह से पूर्व उस घर मे जिस भावना से मिलने आया करती थी, अब उसकी वह भावना बदल चुकी है। अब वह अपनी प्रिय सखी से मिलने की उत्सुकता लेकर ही उस घर मे आती है। ऐसी स्थिति मे पुष्पा की उपेक्षा करना गरिमा के लिए सभव नही था। दूसरी ओर, उसके अभीप्सित कार्य मे कोई बाधा उत्पन्न हो जाए, इससे पहले ही गरिमा यथाशीघ्र प्रभा और श्रुति से भेट करने के लिए घर से निकल जाना चाहती थी। पुष्पा को देखकर वह किकर्तव्यविमूढ़—सी खड़ी हो गयी। आगे बढ़ते—बढ़ते उसके कदम वही पर रुक गये, जहाँ से उसकी दृष्टि पुष्पा पर पड़ी थी। अपनी पच्चीस वर्ष की आयु पार करते—करते पुष्पा को पर्याप्त अनुभव हो चुके थे। परिस्थितियो ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया था। वह गरिमा के अन्तःकरण की दुविधा को भी समझ सकती थी। उसने

गरिमा मनःस्थिति को समझते हुए आगे बढ़कर सस्नेह कहा — लगता है, कही बाहर जा रही थी ? मुझे ऐसे समय नही आना चाहिए था, पर मुझे नही पता था, तुम कही जा रही हो ! कोई बात नही है ! आओ, बैठो !

नही, अब नही बैठूँगी ! तुम्हारा टाइम खोटा नही करुँगी ! वैसे अकेली कहाँ जा रही हो ? कोई साथ जाने वाला दिखायी नही दे रहा है !

पुष्पा के प्रश्न के उत्तर मे गरिमा ने अथर्व के साथ श्रुति के शहर मे जाने की घटना से लेकर प्रभा के साथ दुर्घटना घटित होने, गाँव मे पुलिस—सुरक्षा बढ़ने, उसके बाद अथर्व, प्रभा और श्रुति के गाँव छोड़कर जाने और प्रभा का रिश्ता टूट जाने की सूचना, उसकी माँ के देहान्त हो जाने आदि घटनाओ का विस्तारपूर्वक यथातथ्य वर्णन कर दिया और बताया कि वह प्रभा के साथ भेट करके उसका मनोबल बढ़ाना चाहती है। सारी घटनाओ से अवगत होने के पश्चात्‌ पुष्पा ने गरिमा के मन की दुविधा को पूर्णरूपेण समाप्त करते हुए कहा—

मैने समाचार—पत्र मे पढ़कर अनुमान कर लिया था, पर विश्वास नही कर पा रही थी ! इसलिए मै यहाँ आयी थी ! तुम्हे कोई आपत्ति ना हो, तो मै भी तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ !

मुझे आपत्ति क्यो होगी ? मुझे तो तेरा सहारा ही होगा, यदि तू मेरे साथ चलेगी !

गरिमा का सकारात्मक उत्तर पाकर पुष्पा उल्टे पाँव लौट गयी और अपना सामान लेकर शीघ्र ही गरिमा के साथ चलने के लिए तैयार होकर आ गयी। अपने घर से निकलने के पश्चात्‌ अक्षय के घर पहुँचने तक अपनी पूरी यात्रा के दौरान गरिमा और पुष्पा समाज की आपराधिक स्थिति, नैतिक मूल्यो के पतन और प्रभा के भाग्य पर ही चर्चा करती रही। इस चर्चा मे वे दोनो इतनी तल्लीन हो गयी थी कि यात्रा कितनी लम्बी थी, उन्हे इसका पता ही नही चला।

अक्षय के घर पहुचकर उन्हे ज्ञात हुआ कि उन दोनो के पहुँचने से एक घटा पहले ही प्रभा, अथर्व और श्रुति एक किराये का मकान लेकर अलग रहने के लिए चले गये थे। अक्षय ने गरिमा का परिचय प्राप्त करने के पश्चात्‌ भी उनका स्वागत—सत्कार यथोचित ढग से नही किया। किन्तु अजू ने अक्षय को दो—चार खरी—खोटी बात सुनाकर उनसे दूरी बना ली। यह जानने के पश्चात्‌ कि गरिमा प्रशान्त की भाभी है, अजू ने एक ही वाक्य मे विषवमन कर दिया —

बहन क्या कम पड़ गयी थी हमारे परिवार की मुसीबत बढ़ाने के लिए, जो अब भाभी भी यहाँ तक दौड़ी आयी है ! इन शब्दो के अतिरिक्त कुछ बोलने की आवश्यकता अजू ने नही समझी थी।

अक्षय ने अजू को समझाने का पर्याप्त प्रयास किया कि गरिमा अपने देवर का पक्ष लेने नही आयी है, बल्कि प्रभा के प्रति सवेदना प्रकट करने के लिए और यथा सभव उसको सहयोग देने के लिए आयी है। परन्तु समझाने के बाद भी अजू मे आतिथ्य—सत्कार का भाव जाग्रत नही हो सका। अपनी पत्नी के अनपेक्षित व्यवहार के लिए अक्षय ने गरिमा से क्षमायाचना करके गरिमा को उसके गतव्य स्थान तक पहुँचा दिया, जहाँ पर प्रभा, अथर्व और श्रुति थे।

गरिमा को अपने निकट देखकर प्रभा की आँखो से आँसू बहने लगे। श्रुति उनके पास मौन खड़ी थी। उनके चेहरे पर हृदय की प्रसन्नता स्पष्ट झलक रही थी, किन्तु प्रभा के आँसू उसकी प्रसन्नता को बाहर आने से रोक रहे थे। कुछ ही क्षणो मे वहाँ वातावरण सामान्य हो गया और औपचारिक बातचीत होने लगी। औपचारिक वार्तालाप का उपकरण पूरा होने के पश्चात्‌ प्रभा, श्रुति, गरिमा और अथर्व तथा पुष्पा के बीच अनौपचारिक और सार्थक बातो का दौर शुरु हो गया। उनकी बातो का विषय वर्तमान—जीवन के कष्टो से मुक्ति पाने का उपाय तथा भविष्य के लिए सुनियोजित रूपरेखा तैयार करने से सम्बन्धित था। उसी चर्चा मे श्रुति ने गरिमा कहा —

भाभी, आपको पढ़ते हुए देखकर जब मुझे दहलीज को पार करने की प्रेरणा मिली थी, तब दहलीज के पार इस दुनिया की कल्पना कर पाना भी मेरे लिए दुष्कर था। आज मै प्रतिबन्धो की उस दहलीज को पार करके जिस अभूतपूर्व सुख का अनुभव कर रही हूँ,

उसका मे वर्णन भी नही कर सकती ! आज मुझमे अपने उस अतीत के प्रति घृणा और कल्पना का मिलाजुला रूप उत्पन्न हो रहा है, जो मैने अनगिनत प्रतिबन्धो मे बिताया था ! इसलिए मै चाहती हूँ ... ! क्या चाहती हो तुम ? बोलो, चुप क्यो हो गयी ? गरिमा ने पूछा।

मै चाहती हूँ, हमारे समाज की हर स्त्री इसी सुख को अनुभव कर सके, जिसको आज मै कर रही हूँ ! मै चाहती हूँ स्त्रियाँ भी पुरुषो के समान प्रतिबध—मुक्त जीवन जिये। यदि कोई स्त्री चाहे तो गृहिणी बनकर रहे, चाहे तो दहलीज पार करके किसी अन्य व्यवसाय मे अपनी शक्तियो का सदुपयोग करे ! मै चाहती हूँ, हमारे समाज, विशेषकर ग्रामीण समाज मे सदियो से पोषित विकृत मानसिकता को निर्मूल सिद्ध कर दूँ, जिसके अनुसार स्त्री—मात्र पुरुषो की सम्पत्ति है और उनके सुखोपभोग की वस्तु है !

श्रुति तुम्हारा विचार अच्छा ही नही, बल्कि बहुत अच्छा है, पर यह सब कुछ होगा कैसे ? विचारना जितना सरल है, विचारो को कार्य—रूप मे परिणत करना अपेक्षाकृत उतना ही अधिक कठिन है ! गरिमा ने कहा।

श्रुति, आजादी के लिए जिस सुख की तू बात कर रही है और जिसे तू आज खुद भोग रही है, तूने कभी सोचा है, तेरे इस सुख की किसने कितनी कीमत चुकायी है ? पुष्पा ने पीड़ा मे डूबे हुए स्वर मे कहा।

मै जानती हूँ, मेरे कारण प्रभा को दुर्दान्त कष्ट भोगना पड़ा है और आज भी भोग रही है। प्रभा की माँ आज इस दुनिया मे नही है, इसका कारण भी मै ही हूँ। यदि मै उस दहलीज को पार करने का दुस्साहस न करती, तो न प्रशान्त मे प्रतिशोध की आग दहकती, न वह प्रभा के साथ दुष्कर्म करता, न प्रभा का विनय से रिश्ता टूटता और न ही प्रभा की माँ के प्राण जाते ! पर भाभी, मै जिस रास्ते पर चल रही हूँ, क्या वह रास्ता ठीक नही है ? ग्राह्‌य नही है ? जिस सघर्ष—पथ पर मैने कदम बढ़ाये है, मै उस राह पर उठते हुए अपने कदमाे को रोक दूँ ?

पुष्पा, हम स्त्रियो की सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम अपने कष्टो और समस्याओ से मुक्त होने के बजाय श्रुति जैसी साहसी और लगनशील स्त्रियो मे छिद्रान्वेषण करके उन्हे हतोत्सहित करने लगते है ! इस समय हमे यह सोचना चाहिए कि श्रुति के विचारो की कार्य रूप मे परिणति कैसे सम्भव हो सकती है ? गरिमा ने कहा।

यह तभी सम्भव होगा जब स्त्रियाँ अपने कर्तव्य और अधिकारो के प्रति समान रूप से जागरूक होगी ; जब स्त्रियाँ स्वय उस रूढ़—विकृत मानसिकता से मुक्त होने का प्रयास करेगी, जो उनके लिए लक्ष्मण—रेखा बनी हुई है। इतना ही नही, जब स्त्रियाँ अपने अधिकारो—कर्तव्यो के प्रति जागरूक होगी, तब दुष्कर्म जैसी दुर्घटनाओ पर भी विराम लग जाएगा, क्योकि माँ के रूप मे प्रत्येक स्त्री के पास अद्वितीय शक्ति होती है। यह मातृ—शक्ति बेटा—बेटी मे भेदभाव का विषवृक्ष समूल उखाड़कर जब समानता का पौधारोपण करते हुए अपनी सतान को सस्कारित करेगी, तब एक ऐसे समाज की नीव रखी जाएगी, जहाँ दुराचार और भ्रष्टाचार के लिए जगह नही होगी, बल्कि सभी धर्म के वास्तविक रूप को ग्रहण करके अपने कर्तव्य—पथ पर अग्रसर होगे ! श्रुति ने कहा।

लेकिन जैसे मैने अभी—अभी कहा, यह सरल नही है। जिस प्रकार सोये हुए व्यक्ति को जगाना सरल है, परन्तु जागते हुए व्यक्ति को जगाना कठिन है, उसी प्रकार यह कार्य भी अत्यधिक कठिन है। गरिमा ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर प्रश्नचिह्‌न लगाते हुए कहा। तभी अथर्व ने उत्साहपूर्वक कहा—

कठिन ही तो है, असम्भव तो नही ! मै समझता हूँ, उसी कार्य को करने मे अधिक आनद मिलता है, जो चुनौतीपूर्ण होता है। मुझे विश्वास है, जब हम अपनी पूर्ण सामर्थ्य और लगन से महिला जागरूकता अभियान' चलाएँगे, तब हमे सफलता अवश्य मिलेगी ! तो ठीक है ! अब हम ‘महिला जागरूकता अभियान' चलाएँगे। अनजाने मे ही अथर्व ने हमे इस अभियान के रूप मे हमारे सभी प्रश्नो के उत्तर दे दिये। श्रुति ने कहा।

परन्तु अभी भी एक समस्या है। हमारे पास अभी अर्थ—बल का अभाव है और धन के अभाव मे हम किसी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लम्बी यात्रा का कार्यक्रम नही बना सकते ! अथर्व ने पुनः कहा।

पर यह मत भूलो, किसी लम्बी यात्रा के लिए पहला कदम सबसे महत्वपूर्ण होता है। जब हम पहला कदम उठाते है, तभी आगे बढ़ पाते है और मजिल निकट आती रहती है। यदि हम अपनी यात्रा को आरम्भ करते हुए डरते रहेगे, तो न कभी पहला कदम उठा पायेगे, न कभी मजिल मिल पायेगी ! श्रुति ने अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए प्रेरणादायी मुद्रा मे कहा।

श्रुति को अपने कथन की प्रतिक्रिया प्राप्त हो पाती, इससे पहले ही उसके मोबाइल पर घटी बज उठी। कॉल रिसीव करने पर ज्ञात हुआ कि श्रुति के लिए एक पब्लिशिग हाउस से नौकरी का बुलावा आया है, जहाँ पर उसने दो दिन पूर्व साक्षात्कार दिया था। अपनी नौकरी का समाचार सुनते ही श्रुति प्रसन्नता से उछल पड़ी और यह शुभ सूचना वहाँ पर उपस्थित अन्य लोगो को दी। श्रुति की सूचना सूनते ही अथर्व का चेहरा खिल उठा—

मिल गया आइडिया !

क्या ? सभी ने एक—साथ प्रश्नसूचक दृष्टि से अथर्व की ओर देखते हुए कहा। प्रत्युत्तर मे अथर्व ने कहना आरम्भ किया—

यही कि श्रुति उस प्रकाशन मे काम नही करेगी। हम अपना पत्र छापेगे और उसके माध्यम से ही लोगो को जागरूक करने के लिए अभियान भी चलायेगे।

यह मत भूलो, अथर्व ! इसके लिए पैसा भी चाहिए ,जोकि हमारे पास नही है ! प्रभा ने कहा।

पत्र छापने के लिए सबसे पहले हिम्मत और लगन से परिश्रम करने की आवश्यकता है, उसके बाद धन की ! जब हम धैर्य के साथ पूरी लगन और मेहनत से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगे, तब हमे धन की कमी नही रहेगी। हमारा पत्र सफलतापूर्वक प्रकाशित होगा, तो हमे विज्ञापन मिलने आरम्भ हो जाएँगे, जिससे हमे पर्याप्त आय हो सकती है। बस, अपने पत्र का प्रकाशन आरम्भ करने के लिए हमे धन का प्रबध करना पड़ेगा ! अथर्व ने अपनी योजना और समस्या प्रकट की, तो प्रत्युत्तर मे गरिमा ने उत्साहपूर्वक कहा—

पैसे की चिन्ता तुम मुझ पर छोड़ दो ! अपना पत्र प्रकाशित करने के लिए जितने धन की आवश्यकता होगी, उसका प्रबध मै करूँगी ! तुम सब इस अभियान को आगे बढ़ाओ ! हमारा यह अभियान पूर्णरूपेण से सफल हो, इस दिशा मे प्रयत्न करना आरम्भ कर दो !

गरिमा की ओर से धन का प्रबध करने सबन्धी आश्वासन पाकर प्रभा, श्रुति और अथर्व का मन—मयूर नृत्य कर उठा। गरिमा के निर्देशानुसार अब उन्होने अपने अभियान को आगे बढाने के लिए योजना बनाना का आरम्भ कर दिया। उनकी योजना का पहला चरण था — अपने अभियान को नाम देना तथा अपने अभियान की सफलता के साधन—रूप मे अपने पत्र को नाम देना। पर्याप्त समय तक वे सब इस विषय पर विचार—विमर्श करते रहे। अन्त मे सर्वसम्मति से यह निश्चिय हुआ कि चूँकि उनके अभियान का उद्‌देश्य महिलाओ को सशक्त बनाना है ; उनके मन मे वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त करने की इच्छा जगाना है, ताकि वे अपने विषय मे अपनी रुचि के अनुसार स्वय निर्णय ले सके ; सदियो से दबी—कुचली जाती रही स्त्रियो को उनकी शक्ति का आभास कराना है, ताकि उन्हे स्वय के अस्तित्व का अनुभव हो सके और वे समाज मे अधिकार और सम्मान के साथ जीना सीख जाएँ ; रूढ़ियो मे जकड़ी हुई उनकी मानसिकता को नयी उड़ान के लिए तैयार करना है, ताकि देश की उन्नति और देश—सम्बन्धी महत्वपूर्ण निर्णयो मे वे भी अपनी भागीदारी दर्ज करा सके, इसलिए अपने उद्‌देश्यानुसार इस अभियान का नाम ‘महिला जागरूकता अभियान' होगा।

अपने अभियान को नाम देने के उपरान्त पत्र को नाम देने की बारी थी। श्रुति ने अपना प्रस्ताव रखते हुए कहा— चूँकि अपने अभियान को सफल बनाने के लिए इस पत्र को साधन—रूप मे प्रकाशित किया जा रहा है, ताकि अपने गूढ़—गम्भीर विचारो को हम पत्र द्वारा अधिकाधिक लोगो तक पहुँचा सके। यह भी निश्चित है कि हमारे पत्र मे उन्ही आर्टिकल्स को स्थान प्राप्त होगा, जो समाज की महिलाओ को रूढ़—प्रतिबन्धो से मुक्ति का सदेश और प्रेरणा प्रेषित करे ! इसलिए मेरा सुझाव है, हम अपने पत्र को ‘दहलीज के पार' नाम दे, क्योकि सदियो पहले समाज मे अनेकानेक प्रतिबन्धो रूप मे स्त्रियो के लिए जो लक्ष्मण—रेखा बनायी गयी थी, उसका नाम ‘दहलीज' है। इस लक्ष्मण—रेखा को पार किये बिना स्वतन्त्रता का कोई अर्थ नही है। हमारे पत्र का नाम भी ऐसा होना चाहिए, जो स्वय मे एक सन्देश का कार्य करे।

श्रुति के प्रस्ताव से सभी सहमत हो गये और समर्थन के रूप मे सभी ने अपने—अपने ढग से टिप्पणी की, जिसका साराश यही था कि ‘दहलीज के पार' पत्र सभी पाठको को उनकी रूढ़ मानसिकता से मुक्त करने के लिए अवश्य ही प्रेरणा का स्रोत बन सकेगा, अपने नाम से भी और काम से भी।

अपने अभियान और पत्र को नाम देने के पश्चात्‌ योजना के अगले चरण पर कार्य करना आरम्भ किया गया। योजना का अगला चरण था— कार्यकारिणी समिति का गठन करना और अपने पत्र का पजीकरण कराना। इस विषय पर निर्णय लिया गया कि कुछ समय तक पत्र का प्रकाशन पजीकरण कराये बिना किया जाए और साथ ही अपनी टीम का विस्तार किया जाए। टीम का विस्तार करने के लिए तथा पत्र मे प्रकाशित करने के लिए सूक्ष्म तथा स्थूल सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रभा ने परामर्श दिया कि सर्वप्रथम समाज की दबी—कुचली, पीड़ित महिलाओ से सम्पर्क स्थापित किया जाना श्रेयस्कर होगा। ऐसा करने पर उनका सगठन सुदृढ़ भी होगा और विस्तार भी पा सकेगा ,साथ ही अपने अभियान और पत्र के लिए जीवन्त विचार भी प्राप्त होगे।

प्रभा के मत का सभी ने एकमत से स्वागत किया। पुष्पा, जो अभी तक मौन रहकर सबके मत सुन रही थी, सहसा बोल उठी— गरिमा, तुम्हे चिकी याद है ? वही, जो तुम्हारे पड़ोस मे रहती थी और स्कूल मे तुम्हारी सहपाठी थी ! अब वह यही पर एक गाँव मे रह रही है ! उससे मिलने के लिए चले ?

पुष्पा का प्रस्ताव सुनकर वे सभी एक साथ ऐसी मुद्रा मे उसकी ओर देखने लगे, मानो वे कह रहे थे कि वह विषय की गम्भीरता को समझे और अपनी निरर्थक बातो से उनकी चर्चा मे व्यवधान न डाले। गरिामा को भी कुछ समझ नही आ रहा था कि पुष्पा ने गम्भीर विषय पर चल रही वार्ता के दौरान अप्रिासगिक बात क्यो कही। गरिमा को पुष्पा से ऐसी आशा नही थी, इसलिए वह कुछ असहज—सी हो गई। पुष्पा की ओर उठी हुई उन सबकी कठोर दृष्टि गरिमा को और भी अधिक कष्ट दे रही थी। कुछ क्षणो तक वह चुप रहकर अपनी मनोदशा को उन सबसे छिपाने का प्रयत्न करती रही, किन्तु असफल रही। पुष्पा ने उसकी मनःस्थिति को भाँप लिया और क्षमायाचना के स्वर मे बताया कि पुष्पा की भेट यदा—कदा चिकी से हो जाती है, लेकिन उसने कभी भी चिकी के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नही देखे। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह प्रतिक्षण अनिर्वाचनीय पीड़ा का भारी बोझ अपने हृदय पर लेकर घूमती रहती है। उसके अन्तःकरण मे पीड़ा का ऐसा लावा है, जो अवसर पाते ही ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ेगा।

पुष्पा का विचार सुनकर सभी की शका का समाधान हो गया और सभी उसकी प्रशसा करने लगे। अथर्व ने पुष्पा का समर्थन करते हुए कहा— अवश्य ही हमारा अभियान चिकी के लिए नयी प्रेरणा का स्रोत बनेगा और उसमे नयी चेतना का उन्मेष करेगा ! मुझे विश्वास है कि चिकी से भेट करना, जो हमारे अभियान को आगे बढ़ाने की दिशा मे पहला कदम है, सफलता का पहला कदम बनेगा !

पुष्पा के परामर्शानुसार चिकी के घर जाकर उससे भेट करने का कार्यक्रम तैयार कर लिया गया, किन्तु श्रुति ने सुझाव दिया कि ‘महिला जागरूकता अभियान' के सन्दर्भ मे किसी के साथ भेट करने से पूर्व अपनी कार्य—योजना की एक स्पष्ट और सरल रूपरेखा तैयार कर लेनी चाहिए, ताकि किसी के साथ भेट करने के लिए जाएँ, तो अपनी बाते भली—भाँति उसको समझायी जा सके और अपने विचारो से उसको प्रेरित किया जा सके। श्रुति ने यह भी सुझाव दिया कि कार्यकारिणी समिति का गठन और उसके महत्वपूर्ण पदाधिकारियो के नाम भी किसी के साथ भेट करने से पूर्व ही निश्चित किये जाने चाहिएँ, ताकि अपने सगठन का परिचय प्रभावशाली शैली मे दिया जा सके।

श्रुति का सुझाव सबको अच्छा लगा। उसी समय उपलब्धता के अनुरूप प्रभा को समिति की अध्यक्षा तथा श्रुति को उपाध्यक्षा बनाया गया। पत्र की सम्पादिका के लिए गरिमा का नाम प्रस्तावित किया गया, किन्तु गरिमा ने पद का दायित्व—निर्वाह करने मे असमर्थता प्रकट की। अन्त मे यह निश्चय किया गया कि पत्र का सम्पादक अथर्व होगा औरा उपसम्पादक के रूप मे गरिमा का नाम होगा। गरिमा ने उपसम्पादक की भूमिका को स्वीकार करने मे भी असमर्थता प्रकट की, किन्तु इस बार उनमे से किसी ने भी उसकी नही सुनी और ‘दहलीज के पार' पत्र की उपसम्पादिका के लिए उसका नाम निश्चित हो गया। इसके बाद पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार सभी ने चिकी के घर के लिए प्रस्थान किया।

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