ब्लैकहोल Manisha Kulshreshtha द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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ब्लैकहोल

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मनीषा कुलश्रेष्ठ

आखिरकार मैं पिता हूँ. मेरी हथेलियों को ग्लानि नम कर गई है, जिसे मैं बार – बार पौंछ रहा हूं, अपनी पतलून से। वह लाल पोल्का डॉट वाली स्कर्ट में जो खड़ी है, अपने कॉलेज के गेट पर मुड़ कर मुझे देखती हुई, मेरी बेटी है। आज पहली बार मैं आहत हूं अपने आप से, वह मुझसे होगी ही और उससे जो आहत होकर .....जाने दें घबराहट होती है सोच कर।

मैं आपको बताता हूँ अपनी ग्लानि की सारी वजह, बुरा न मानें तो शुरु से बताऊँ, थोड़ा विस्तार हो जाए तो.... मेरी बेटी का जब जन्म हुआ था, मिलिट्री हॉस्पिटल की सारी नर्सें मेरी बीवी के वॉर्ड में इकट्ठी हो गई थीं। मैं उसे देखने के लिए सच में कतार में खड़ा था। उन सबके चेहरे पर एक ही इबारत थी, "इतना खूबसूरत बच्चा!" अपनी बारी आने पर मैं उस नन्हें बंडल को अपनी हथेलियों में थाम कर रो पड़ा था। उसने तुरंत ही मेरी उंगली पकड़ कर पलकें खोलीं थीं, नन्हें चैरी जैसे लाल होंठ कंपकंपाए थे। मैं उसी दिन समझा कितना अलग होता है पापा होना। उसने अपने सुंदर चेहरे से ही नहीं अपनी बुद्धिमत्ता से मुझे हमेशा गौरवान्वित किया। हम सब ने मिल कर उसे मूल्य, संवेदनाएं दीं उपहार में दिए। सबसे स्नेह करने की सीख दी, सौजन्यता उसके हर अंदाज़ में भर दी। सिखाया एक छोटे कैटरपिलर तक से प्रेम करना ! वह सब थमा दिया जो आदर्शों पर खरा उतरता। हम दोनों पढ़ने के शौकीन उसकी उम्र के हिसाब से तरह तरह की किताबों से हम दोनों ने उसकी अलमारियां भर दीं, किताबों के प्रेम में वह अपनी उम्र से भी गंभीर चीजें पढ़ने लगी। किसी भी विषय पर जब वह बोलती लोग हतप्रभ रह जाते।

सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। वह दसवीं क्लास में थी कि उसे हर किशोरी की तरह लड़कों में रुचि जगी। एक दो लड़कों से सहज दोस्ती हुई। एक से वह कब और निकट हुई हमें पता ही नहीं चला, क्योंकि उसके अंदाज़ में कोई बदलाव नहीं आया, सिवाय इसके कि वह स्पोर्ट्स मैगज़ीन पढ़ने में रुचि लेने लगी। मुझे याद है उसके जीवन का पहला थप्पड़ मेरे ही हाथों उसके चंपई, कोमल गालों पर पड़ा।

एक शाम किसी मीटिंग से लौटते हुए मैंने शाम के झुटपुटे में जब उसे एक मलिन कपड़ों वाले, लंबे मगर दुबले, साधारण से लड़के के साथ उसकी सायकिल हाथ में लिए ट्यूशन से पैदल घर लौटते देखा। बीच - बीच में इधर – उधर ताक कर दोनों हाथ थाम लेते। ढलती सांझ में उसके गालों पर गुलाब खिलते हुए मैंने देखे थे। लड़का मुझे देख सामने से आकर गाड़ी रोकते सहम गया। सहमी यह भी पर छुपा गई। नमस्ते कर वह लड़का उलटा मुड़ गया अपनी सायकिल लेकर, यह मेरे साथ गाड़ी में बैठ गई। मेरी चुप्पी की गंभीरता उसे पता है। घर आकर पूछा गया कि कौन था वह लड़का?

"क्लासमेट!"

"कपड़ों से वह अफसर का बेटा तो नहीं लग रहा था।"

"है भी नहीं। उसके पापा लश्कर है।"

थप्पड़ जोर का था, उंगलियां छप गईं और उसे बुखार आगया। मैं रात भर उसे गोद में लिए रहा, मेरी पत्नी समझाती रही कि समाज में वर्ग होते हैं, हर वर्ग का अलग जीवन होता है।

"जब हम कोई ड्रेस खरीदते हैं, जूते तक बेमेल नहीं पहनते।"

"मम्मी, ज़िंदगी ड्रेस नहीं होती, इंसान जूते नहीं होते

"व्यवहारिकता कुछ होती है, यह तो मानोगी!"

"वह पढ़ने में ब्रिलिएंट है, फुटबॉल टीम का कैप्टन है। वह आगे कुछ अच्छा जरूर कर लेगा."

"जो भी हो, तुम उससे एक दूरी बरतोगी।"

वह कातर असमंजस से अपनी मां को देख कर निढाल होगई। बुखार उतरा, स्कूल शुरू हुआ, उसने उस लड़के से दूरी बना ली। पता नहीं कब उसने एक सुंदर आवरण ओढ़ लिया हंसता - मुस्काता और होंठों पर सेंसर लगा लिया। वही बोलती जो हम सुनना चाहते। रहस्यों की कितनी गांठे उसने मन के रेशम में बांध लीं। किताबें कुछ कहतीं, हम अलग - अलग अवसरों पर पोज़ ले लेकर अलग - अलग बातें करते। वह एक निगाह असमंजस की हम पर डालती और मन के रेशम में एक गांठ लगा लेती। ऐसा लगता था वह एक बेटी के तौर पर प्रकाश और आदर्श की दुनिया मे रहती, लेकिन जब नज़र उठाती कुछ और देखती। लेकिन आधी दुनिया के प्रकाशवान होने के बरक्स आधी दुनिया कर्कश, हिंसक और बीमारियों और वर्ग भेदों से भरी दुनिया भी थी। सारे आदर्शों की बात करते बड़े लोगों की अपनी कमज़ोरियाँ और भ्रम थे। कुलीनता की रोशनी के अपने साए थे जो गिरते ज़मीन ही पर थे विश्वासों की एड़ियों में दरारें थीं।

मैं परेशान हो रहा था कि उसकी मित्रता हमेशा व्यथित, टूटे, दरार पड़े बच्चों से क्यों होती है? लड़कियां भी अकसर थोड़े कमतर वर्ग की या फिर अलमस्त बिना आवरण वाली लड़कियां। जिन्हें लोग बिगड़ैल कह सकते हैं. देखिए मैं आपको पहले ही बता चुका कि मैं पिता हूँ, मेरी ये चिंताएं स्वाभाविक हैं. हो सकता है आप मुझे सामंती या वर्ग – विभेद का पैरोकार समझ लें. लेकिन मैंने दुनिया देखी है. फिर मसला किसी और सामाजिक संदर्भ का नहीं मेरी अपनी बेटी का है.

किसी से बिना उनका वर्ग जाने उसकी दोस्ती को हर कोई सराह सकता था पर मुझे भय लगता था कि इन वंचितों के मनोवैज्ञानिक ग्रंथियां मेरी मासूम बच्ची को आहत न कर दे। आखिर पिता हूं। मुझे उसका बचपन याद आता जब वह दो साल की थी, हमारे आउट हाउस में रहने वाली बांग्लादेशी आया नाजमा के बच्चों में ठुमुक चल कर घुस जाती। उनकी सूखी रोटी छीन कर खाती उन्हें अपना सेब, खिलौने दे आती। ऐसे में नाजमा माफ़ी मांगती हुई खिलौने लौटाती तो हम उदारता को ओढ़े रहते पर भीतर इन्फेक्शन के भय को पाले वे खिलौन उसी को दे देते।

हम उसे अपनी सुरक्षाओं के घेरे में समेटते रहे, वह भीतर से फिसल कर दूर जाती रही। इस तरह कुछ बरस बीत गए वह एक दुनिया में बसीं दो दुनियाओं से सामंजस्य करने लगी। पर ये दो दुनियाएं भी द्विगुणित होनें लगीं। वह अब कॉलेज में आ गई। महानगर की विराटता में हर रोज़ न जाने कितने करोड़ लोग घरों से निकल कर किस सुरसा के मुख में समाते हैं, फिर निकल कर घरों में बंद। हम तीनों घर से निकलते बिछड़ते, फिर शाम ही को मिलते।

एक शाम की बात है, मैं घर लौटा। कार पार्क की,अपने सरकारी कैंपस में बने अपार्टमेंट में और ब्रीफकेस उठाकर चलने लगा।

"अंकल।" एक बेहद दुबला, औसत कद, औसत चेहरा, नज़र का मोटा चश्मा लगाए एक लड़का एक बंडल लिए खड़ा था।

"ये अनिंद्या के लैटर्स और फोटोग्राफ़! उसे कहिएगा। परसों संडे को मैं अपने वाले लैटर्स वापस लेने आऊंगा।" पकड़ा कर वह तीर सा निकल गया। मैं हड़बड़ाहट में उसे रोक भी नहीं सका। मैं बेल बजा कर सीधे अपने कमरे में चला गया, अपने कमरे में गिटार बजाती अनिंद्या को उपेक्षित करता हुआ। रोज़ की तरह लंबा लाड़ - दुलार का सैशन टल गया। मैं समझ नहीं पा रहा था, वह लड़का यह क्या देकर चला गया है। अनि, दो बार परदे से झांक कर चली गई, मुझे युनिफॉर्म में, बिना जूते उतारे बिस्तर पर ढहा देखकर घबरा कर लौट गई। उसकी मम्मी अभी लौटी नहीं थी।

"पापा, चाय बना दूं।" तीसरी बार उससे रहा नहीं गया। चाय बनते ही उसकी मम्मी लौट आई। सबने खामोशी से चाय पी। मेरी पत्नी मेरा मूड भांपने की कोशिश में थी। उसने अनि को जाकर पढ़ने को कहा। मैंने मरी हुई ख़ामोशी में कपड़े बदले। पत्नी को पर्दा डालने को कह कर वह बंडल खोला। जाने - पहचाने, हू - बहू मेरे जैसे, उसे विरासत में मिले सुघड़ मोती जैसे शब्द, तरह तरह के रंगीन पेनों से लिखे। मैं सिहर गया। पचास से ज्यादा पत्र। तरह तरह के रूमानी संबोधन, कविताएं। आजीवन निभाने का वादा। होने वाले बच्चों के सपने। नन्हीं अनिंद्या और बच्चे? अभी तो गोदी से उतर कर चलना सीखी है! नहीं, हम भूल गए थे वह अठारह की हो चुकी थी देखने में लगती तो पंद्रह की है। बल्कि मुझे तो वह टोडलर ही लगती है .

हमने देर रात तक वह बंडल उलटा – पुलटा कुछ ख़त अजीब थे, बीमारी से लड़ने की सलाह देते। या ऐसे आशय के कि - काश, इस पल तुम्हारे पास आ जाऊं और तुम्हारी बीमारी ले लूं। हम साथ लड़ेंगे इस बीमारी से। हम लंबी मैरिड लाइफ़ जिएंगे। सब ठीक होगा।

पत्र बता रहे थे, इंटरनेट पर भी वे लगातार संवादरत हैं। एक एक पल की खबर दोनों बांटते हैं। मुलाक़ातें कॉलेज बंक करके हो रही हैं। कुछ यहीं नाक के नीचे कैंपस के सेंट्रल गार्डन में, कॉलेज के पास सीसीडी में, कुछ मिलिटरी अस्पताल के वार्ड में???

वे खत अंग्रेजी में थे. उनमें से एक उन सब ख़तों को समेटता सा थ वही दिखाए देता हूँ कि लड़की किस हद तक....

“मैं कब तुम्हारे बारे में नहीं सोचती यह तुम शिकायत कर नहीं सकते कि मैं तुम्हारे बारे में नहीं सोचती हूँ. तुम मेरे हर पत्र को और हर मुलाकात को गुडबाय लैटर या गुडबाय मीटिंग क्यों समझने लगते हो. तुम मेरे प्यार को तमाम बड़े और दुनियादार लोगों की तरह “पैशन” नहीं “कम्पैशन” मानते हो तो बुरा लगता है. तुम तो एसा मत कहो और समझो. मैं सच ही तुम्हारे साथ जिंदगी बिताना चाहूंगी. तुम जीनियस हो.

तुम दर्द शब्द को अनि से रिप्लेस कर के देखो न, मुझे पसलियों में अनि हो रही है. मेरी आँखे अनि से भरी हैं. मैं अनि के साथ रहना कब सीखूंगा? हा हा हा.

मैंने सपनों में एक क्यूट बेबी देखा. जामुन के पेड़ के नीचे खाली डायपर पहने, झुक कर कुछ उठा रहा था. तुम पेड़ पर चढ़े थे, कालो जामुनों की डाल हिलाते. ह्मारा बच्चा! मैंने तुमसे पूछा था “ चलो नाम सोचें.” तुम सड़ू मुँह बना कर उठ गए थे बैंच से. क्या तुम्हें “टाईनी टोडलर्स” नहीं पसंद?”

“रोहन”

मेरे तकिए तुमने देखे होते तो हमेशा उन पर मस्कारा और आई लाईनर के गीले दगा होते हैं. हाँ मैं पत्थर नहीं हूँ. मेरी कोशिश थी कि मैं तुम्हारे भीतर एक चिंगारी छोड़ दूं, तुम उठो और जोश में भर जाओ. मेरे सारि कोशिशें कुछ हालात, कुछ तुम बेकार कर देते हो.

तुम जो कर रहे हो उसमें गहरे डूबो जाओ, प्रेम और प्रोग्रामिंग. तुमने मेरे लिए जो सॉफ्टवेयर बनाया,वह बहुत काम का है. मैं कितने ग्राफिक्स चुट्कियों में बना लेती हूँ. सुनो जब मैं अपनी पहली एनीमेशन फिल्म बनाऊंगी उसका अंत परियों की कहानियों या फिल्मों जैसा नहीं होगा.... दे लिव्ड हैप्पीली या दे डाईड इन इच अदर आर्म्स

नो नो! मैं उनको बच्चों को पालते, लड़ते – झगड़ते, कुकिंग करते, प्यार करते दिखाऊंगी. जिंदगी यही है, रोजमर्रा जिसे रूटीन कहते हैं हम, रोहन वही असल जीना है. तुम्हें न्यू इयर बॉल में आना होगा. हमें अच्छे से तैयार होना. थीम है – पायरेट्स एंड मर्मेड्स ( समुद्री डाकू और जलपरियाँ) कल हम शॉपिंग चलें?

अनि

रोहन

मैंने तुम्हारे चाहने से खुद को कई चीजों से दूर कर लिया. मैं ने मानने की कोशिश की कि मैं तुम्हारे लिए बनी हूँ. तुम अकेले नहीं हो. तुम मुझे मजबूर करते हो कि मैं यह सोचूँ कि मैंने तुम्हारी तरफ बढ़ कर गलता फैसला किया. मुझे बहुत बुरा लगा तुमने मेरे कॉलेज के दोस्तों के सामने मेरे साथ ऊँची आवाज में बात की. मुझे आदत नहीं है रोहन, हमारे यहाँ कोई इतना तेज और कड़वा नहीं बोलता.

मैं बहुत क्लासेज बंक नहीं कर सकती. मेरा सैमेस्टर खराब होते – होते बचा. पापा ने बहुत जुगाड़ करके मेरे लिए मेडिकल सर्टिफिकेट निकलवाया. मैं उन्हें बता भी नहीं सकी.

कई बार मुझे भी लगने लगा है कि तुम्हारा दर्द नकली है. तुम ठीक होना ही नहीं चाहते. परसों जब तुम्हारे वॉर्ड में हम कार्ड्स खोल रहे थे, और तुम्हारी मम्मी का अचानक आकर मुझे जाने को कहना बहुत अजीब था. तुम तो कहते थे वे खुश हैं, कि मैं खुश हूँ. अब अचानक क्या बदल गया? मुझे नहीं पता भविष्य में क्या है? पर मैंने हर हाल में तुम्हारे साथ जीना चाहा था. जीना चाहूंगी. पर शर्तें जो तुम लगा रहे हो वो मुझे तिल तिल गला रही हैं. मैं अपने कॉलेज के ग्रुप को नहीं छोड़ सकती. और मुझे स्कर्ट्स पहनना पसंद ही नहीं बहुत आरामदेह लगता है. तुम मुझे थोड़ा सा समझने की कोशिश तो करो कि मैं क्या चाहती हूँ. तुम्हें मुस्कुराता बिना दर्द के देखने की मेरी चाह मुझसे मेरी हँसी छीन रही है रोहन. मम्मी मेरी उदासी से घबरा कर दस सवाल करती हैं. मेरे पास कमरा बंद कर लेने के सिवा कोई उपाय नहीं होता.

मैं आगे नहीं पढ़ सका. कितना कुछ समानांतर गुजरता रहा और मैं पिता होकर बेख़बर, मुझे अपनी पत्नी पर भी गुस्सा आया. मैंने सारे खत, हाथ के बने कार्ड और कोलाज समेट कर अपनी वार्डरोब में रख दिए. पानी सर से ऊपर था, उस दिन कुक खाना बना कर रख कर चला गया। अनि को रात ग्यारह बजे टेबल पर बुलाया गया। वह अनजानी आशंका से सहमी थी। डाँटने की उम्र नहीं थी, पर हम सवालों के साथ दोनों उस पर बरस गए। मेरी पत्नी का अंदाज़ तल्ख़ होने लगा। मैं भी हताश था। पहले वह देर तक मुंह की ज़िप खोलने को तैयार नहीं हुई। ठंडा - गरम भाव - प्रभाव देकर जब उससे उगलवाया गया तो लब्बोलुआब पता चला कि लड़का, इस बार किसी सीनियर नेवल अफ़सर का बेटा है। पर उसे कोई अजीब बीमारी है। लंबे समय से बीमार है, अचानक बेहोश हो जाता है। उसने किसी तरह बारहवीं की है, अब घर रह कर आगे की पढ़ाई कर रहा है। महीने में पंद्रह दिन अस्पताल में बीतते हैं। नयी प्रणाली का इलाज असर करता रहा तो वह उबर आएगा।

“यह सब क्या है? किस, शादी, बच्चे?”

"पापा हमने ऐसी वैसी कोई ग़लती नहीं की, क्योंकि डॉक्टर्स ने उसे किसी भी एक्साइटमेंट से दूर रहने को कहा है।"

हम दोनों हतप्रभ थे। लगभग हिल चुके थे भीतर गहरे। मैं सर पकड़ कर बैठा था।

मेरी पत्नी उसे समझाए जा रही थी, "तुम दिमाग़ से सोचती भी हो या.......क्या तुम्हें जीवन भर किसी ऐसे बीमार लड़के की नर्स बनना मंजूर है? ऐसी दया में शादियां की जाती हैं ? "

"मैं प्यार करती हूं!"

"प्यार? तुमसे समझदार वह है लड़का जो तुम्हारे ख़त लौटा गया, अपने लेने आएगा परसों।"

"वह यह सब इसलिए लौटा रहा है, क्योंकि नाराज़ है, मेरे छोटी और स्वीवलैस ड्रेस पहनने से।"

"वाह! कमाल ! इतनी हिम्मत और इतना अधिकार! जबकि तुम उसे इस हाल में भी.......तुम जैसी लड़कियाँ होती हैं इस जमाने में?”

"कुछ नहीं मम्मा, वह थोड़ा – सा पज़ेसिव है।"

"रबिश।"

बीच में शनिवार था, सारा दिन अनि को समझायी गई दुनियादारी। इतनी कि उसे समझ आगया कि वह नर्स बन कर किस लिए किसी बीमार लड़के के लिए जीवन तबाह करे?

गर्मी के दिन थे अमलताश बौरा रहा था। जामुनों पर फल लदे थे।

संडे को सुबह वह लड़का मुझे हमारे दुमंजिला अपार्टमेंट के नीचे अमलताश के पेड़ के नीचे मंडराता दिख गया, उसके साथ एक लड़का और था । मुझे क्रोध आया। इसी बेवकूफ़ ने मेरी भावुक बेटी को फुसलाया है, अपनी बीमारी और अनाम दर्द को हथियार बना कर, करते हैं मिडियोकर किस्म मे लड़के ऐसा भी, हमारे जमाने में भी किया करते थे । उस लड़के ने नीचे से अनि को कॉल किया, मैंने उसे ईशारे से कहा ऊपर बुला लो। सहमी हुई अनि ने यही किया। लड़का पूरे आत्मविश्वास से भीतर आगया।

"अंकल अनिंद्या को बुला दें।"

"वह नहीं आएगी। मुझसे बात करो।"

" ब्रेकअप करना है तो मेरे लैटर्स और गिफ्ट्स वापस कर दे वह।"

"उसके पास तुम्हारी ऐसी कोई चीज़ नहीं है।"

"मैंने उसे मंहगे गिफ्ट्स दिए हैं।"

"वह तुम्हारे मंहगे गिफ्ट्स की लालची नहीं।"

भीतर से अनिंद्या की मम्मी एक रिस्टवॉच, एक नन्हां सोने के हार्ट वाला पेंडेंट और रेबेन के ग्लासेज़ लाकर उसे पकड़ा गईं।

"लो और चलते बनो।"

"मेरे लैटर्स!"

"अनिंद्या कह रही है उसके पास कोई लैटर नहीं।" मेरी पत्नी ने कहा।

" हैं! उसे देने होंगे। ब्रेकअप ऐसे नहीं होता।" कह कर जिस तरह वह अनि के कमरे की ओर लपका। मैं हैरानी और गुस्से में भर गया कि इसे अनि का बेडरूम भी पता है! मैंने उसकी बांह थामी और झन्नाटेदार थप्पड़ लगा दिया। तभी अंदर से अनिंद्या बाहर आगई।

"पापा इसे मारिए मत... क्यूं कर रहे हैं वॉयलेंस? आपको पता है न यह बीमार है।"

वह फर्श पर बैठ गया, " मार लीजिए अंकल, आप भी मार लीजिए। वैसे भी ज़िंदा कहां हूं। डॉक्टर कहते हैं...."

"बहुत हो गया इसका ड्रामा इसे ले जा!" मैंने उसके दोस्त को रौब भरे इशारे से उठाया उसके भी पीठ पर धौल जमाई और बाहर का दरवाजा दिखा दिया।

बहुत रोने धोने के बाद जब अनि ट्यूशन पढ़ने गई तो लड़के के ख़तों की खोज हुई। वे सुंदर सुदर पेंटिंग्स थीं। उदास कविताएं थीं, जिनके तल में मृत्यु बह रही थी। मैं इस तल में अपनी बेटी को नहीं डुबोना चाहता था। मैंने उसे समझाने के अलावा उसे बहुत सारे क्रियाकलापों में व्यस्त कर दिया। कॉलेज, कोचिंग फिर डांस क्लास और रात को मैं और वह पॉलिटिक्स,एनवायरमेंट पर बहस करते। मैं समय से दफ्तर से लौटता, उसकी मां ने लंबी छुट्टी ले ली थी। उसे कहीं अकेले नहीं निकलने दिया जाता. सिवाय कॉलेज के ग्रुप के.

वह अपने ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर में आ गई थी और एनीमेशन फिल्मों की दुनिया में एक अमरीका बेस्ड एनीमेशन कंपनी में इंटर्नशिप भी कर रही थी।

एक दिन वह बहुत खुश थी, उसे भारतीय मायथॉलॉजी पर एक छोटी एनीमेशन फिल्म – प्रोजेक्ट के लिए चुना था. वह बातें कर रही थी, “पापा मुझे अमर-चित्र कथाओं को पर्दे पर लाना है एक दिन, आम्रपालि, कच – देवयानी, वासवदत्ता....”

मैंने उसे उसके कॉलेज के गेट के बाहर उतारा, उसने पोल्का डॉट वाली बहुत सुंदर लाल मिडी ड्रेस पहनी तो मुझे वह बीमार, उसकी छोटी फैशनेबल ड्रेसेज़ पर आपत्ति करने वाला अपनी बीमारी और मृत्यु की आशंका से भावनात्मक रूप से कमजोर करने वाला लड़का याद आ गया!

" तेरे उस ड्रामा कंपनी के क्या हाल हैं? ठीक हो गया न वह! मैंने कहा था न कुछ नहीं होता ऐसों को। वह बस सहानुभूति जीतना सुंदर और लायक लड़कियों की..." मैं एफ एम पर चलते गाने की धुन गुनगुनाते हुए पूछ बैठा।

" पापा, वह अब जिंदा नहीं है. फ्यू मंथ्स बैक, ही लैफ्ट...दिस वर्ल्ड। " वह तटस्थ थी। उसके चेहरे पर जमा हुआ दुख दिख रहा था। उसके होंठ कांप रहे थे, आंसू पी लिए थे उसने, लेकिन मैं उसका रुदन सुन सकता था। उसने उसकी समाधि अपने ही भीतर बना कर, पीड़ाओं का बिना नाम का समाधिलेख लिखकर दरवाज़े बंद कर दिए थे खुद के। क्योंकि पापा - मम्मी की प्रेक्टिकलिटी कुछ और कहती थी, उन किताबों के विपरीत।

मुझे एक साथ वो दोनों थप्पड़ याद आगए जो मैंने पहली बार अनि के मुख पर लगाया था, दूसरी बार उस लड़के के। मन किया तीन चार थप्पड़ अपने गाल पर लगा लूं। मैं बुरी तरह बिखरने वाला खा कि अनि ने मेरे स्टियरिंग व्हील पर कांपते हाथ पर हाथ रखा।

"पापा आपकी कोई गलती नहीं। उसके पापा मम्मी, डॉक्टर और वह खुद जानते थे कि वह मरने वाला है। मैं ही सोचती थी कि .....

मेरे हाथ स्टियरिंग पर कांप रहे थे. मैं अब तक खुद को समझा रहा हूँ कि “ मैं पिता हूँ. मुझे नहीं पता कि मैंने सही किया या ग़लत….. ”

मैंने उस रोज नहीं सोचा था कि उस थप्पड़ के बदले मेरे आत्मा में अदृश्य घाव हो जाएंगे और मैं बार - बार उन्हें अपने हाथों से सहलाऊंगा । उसकी मृत्यु से मुझे क्यों फर्क पड़ना था? लेकिन मैं हताश रहा पूरे दिन अपनी हथेलियाँ देखता, उन्हें अपने गाल पर रख पश्चाताप में झुलस रहा था। उसकी उंकड़ू बैठी अवस्था याद आती - दोनों हाथ मोड़े कोहनियों से चेहरा ढके - 'मार लीजिए - मार लीजिए. '

***

“ माना मैं आपकी बेटी हूं। आप पापा थे इससे मैंने कब इनकार किया था. आप बेहतरीन पापा होते – होते कहीं चूक गए. मैं आपको आईडियल समझती रही हूँ. क्योंकि आपने मेरे स्कूल के जिस दोस्त के कारण पहला थप्पड़ मारा था, कि वह एक फोर्थ क्लास लश्कर का बेटा था. पापा आपने ठीक वैसी ही कहानी अपने बारे में सुनाई थी कि आप एक लैब असिस्टेंट के बेटे थे, बहुत मुश्किलों के साथ आप पढ़े . आपके पास भी तीन जोड़ी कपड़े होते थे और आप भी बहुत ब्रिलिएंट थे, आप में अफ़सर बनने की योग्यता थी. मैंने आपसे कभी बहस नहीं की. आपको मेरी बहस से चोट पहुंचती थी. मैं यह जानती हूँ आपकी आँखें पढ़ती हैं कि मेरा मन बहुत जिरह करता है. उन इंसानियत और वैल्यूज वाली किताबों को लेकर, जो आपने बेबी – बाथटब में भी पकड़ाईं थीं. प्लास्टिक कोटेड रफस भालू की किताब, फिर स्कूल जाने पर अमर – चित्र कथाएँ, पंचतंत्र, कितनी सारे महान लोगों की ऑटोबायोग्राफीज.... आप मुझे कहते थे मेरे दोस्तों और सहेलियों ने मुझे बिगाड़ा! नहीं पापा! उनमें तो मुझे किताबों जैसे लीक से हटकर चले ‘फ्रीक करेक्टर्स’ मिले. मुझे जो भी बनाया – बिगाड़ा कुछ किताबों ने, कुछ मेरे अपने दिमाग़ ने जो तर्क करता था.

मैंने छोटे गेट से झाँक कर देखा बहुत देर तक आप अपने हाथ मसोसते कार स्टार्ट कर धीरे से चले गए थे. मैं आपको “गिल्ट” में नहीं देख सकती. आप हमारे लैटर्स पढ़ कर जाने क्या – क्या सोच गए, ‘अनएडल्ड किसेज और फ्रेंडली हग्स’ आपकी बेटी इससे ज्यादा क्या दे सकती थी? जानते हो वह क्या कह कर मरा? सॉरी पापा! हाँ मैं उससे मिली कुछ दिन पहले उसके जाने के.

"अनिंद्या, मैं तो वर्जिन ही मरने वाला हूं।“

तब मैंने उसे खुद को चूम लेने के लिए कहा था. वो चुंबन एकदम भोले थे. सादे और सीमित. उसने स्वीकार कर लिया था कि वह मर रहा है। उसने खुद को सबसे काट लिया । मैं उसे बताना चाहती थी कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन वह किसी से आश्वस्ति नहीं चाहता था। मैं नहीं कह सकूंगी कि मैं केवल यह चाहती थी उसे सुकून मिले, उसकी आँखों में सपने उगें। इसलिए प्यार का ढोंग करती थी. वह ‘यूनीक और ओरिजनल’ था, मेरे सारे अन्य अच्छे दोस्तों – सहेलियों की तरह जिनके लिये ‘मम्मा’ के पास एक शब्द है ‘वियर्ड’

मैंने बस कोशिश की थी कि उसके उस रहस्यमय दर्द समझ सकूं, जिसको समझने में उसके मॉम – डैड फेल हो गए. वे सोचते थे कि यह कुछ पैरानॉईक अहसास है.

दर्द के बदले का प्रेम के अलावा मैं क्या दे सकती थी? उसने मुझे जितना दिया...एक समझ फिल्मों के लिए, कहानियों के लिए...एनेमेशन के लिए दिन – रात लग कर एक सॉफ्टवेयर बनाया उसने। मेरे होने से, मेरे कारण व्यस्त होने से उसे उन दिनों बस बेहतरीन लगा होगा। एक सुंदर लड़की का बॉयफ्रेंड होना, जो हर रोज़ उससे चैट करती, हाथ से भी चिट्ठियां लिखती, जिनमें शादी और होने वाले बच्चों का ज़िक्र होता। उसकी डूबती हुई आत्मा में मासूम शरारती सपने फुदकते। बस यही पापा!

आपने एक दिन गुस्से में कहा था - देखना यह सब ड्रामा है, एक दिन वह ठीक हो जाएगा और तुम्हें भूल कर किसी और लड़की को डेट करेगा।

मैं बुदबुदाई थी - काश! वह ढेर सारी लड़कियों को डेट करे.

वह दिन आया ही नहीं।

उसके आखिरी दिन मोमबत्ती बुझने जैसे थे। बिजली आ जाने पर मोमबत्ती के बुझने के बाद की महक़.... जैसी उदासी दे जाती है न, ठीक वैसे ही. उसके ख़त आप मेरी आलमारियों में दिनों – दिन खोजते रहे. वो हाथ से नहीं लिखे थे, एक हार्ड डिस्क में थे. बहुत सारी वर्ल्ड क्लासिक फिल्मों, उसके मेरे लिए एनीमेशन फिल्म मेकिंग में काम आने वाले सॉफ्टवेयर्स और सैंकड़ों फिक्शन की डाउनलोडेड किताबों के साथ. हाँ, बिलकुल वह प्यार करने लायक था, वह विटी था. शरीर ट्यूंड होता तो वह पैशनेट भी होता. मैं और बड़ी हो जाऊं, आप भी अपनी बेटी से परे की दूसरी दुनिया के दर्द को समझने लायक हो जाओ तब शायद चुपचाप से उसके ख़त आपको पढा सकूंगी.

वह लिखता था -

“मेरी कहानी उस दिन से शुरू होती है, जब धरती कोहरे से ढकी थी, मेरे जैसे लोगों के जन्म का धुंधला संकेत। रात, मरती चाँदनी और उदासी। मुझे पैदा होते ही ओटी में ले जाया गया, ओटी की सड़ी हुई रोशनियां ईथर की गंध और खून की महक मेरे अवचेतन में स्थायी है। मेरे छोटी आँत और बड़ी आँत के बीच कोई संपर्क ही नहीं था। मेरा पेट फट पड़ने की हद तक फूला हुआ था। माँ बताती है, मेरा नन्हा शरीर कितनी नलियों के जाल में छुप चुका था। तुम यकीन करोगी? तब से अब तक मेरी बारह सर्जरी हो चुकी हैं।

मैंने अपने दोस्तों की मस्तियों, उनकी सेक्स से जुड़े अनुभवों और लड़कियों की को लेकर उनकी ग़लीज़ बातों को मैं अपने अकेलेपन के हाशिये से देखता था। मैं भावुक था इसलिए उनके रिश्तों में प्रेम नहीं पाकर मुझे दुख होता था। क्योंकि वे लड़कियाँ इसे प्रेम ही समझा करती थीं। अपनी बॉडी सौंपा करती थीं, जिसे लेकर वे फाहश डीटेलिंग करते खुले आम, किस लड़की ने कब और किसके साथ अपनी वर्जिनिटी खोई। मुझे बुरा लगता, मैं पहले बहस करता फिर चुप रहने लगा क्योंकि वे मेरा मज़ाक बना कर मुझे तोड़ते।

तुम नहीं जानतीं कि तुम कितनी अलग थी उन लड़कियों से, जो अमीर लड़कों की तरफ़ भागती थीं। तुम दूर रहती थीं ऐसे लड़कों से दूर जो अपनी कारों और गर्लफ्रेंड्स में फर्क नहीं समझते थे। फोन पर तुम बोलती थी और मैं अपनी सारी इंद्रियों का जोर लगा कर उसे सुनता। हर रात दर्द को खुद को सौंपने के बाद केवल रात दस बजे फोन पर तुम्हारी आवाज़ मुझे विश्वास दिलाती थी मुझे जीना है।

मैं खुद से कहता - अच्छी तरह सुन ले, तेरी मुस्कान उसकी उम्मीद है। दर्द में भी मुस्कुरा।

पागल हो तुम, तुमने अपने शरीर के सुनहरे रोमों को मुझे छूने दिया, पूरी संवेदनशीलता से। यकीन मानना मैंने तुम्हें लड़का बन कर नहीं, लड़कियों की संवेदनशीलता के साथ थोड़ा छुआ बाकि बाद के लिए रख दिया सहेज कर। मैं ठीक होने के लिए तैयार था आगे होने वाली तीन और सर्जरियों के लिए।

मैं तुम्हारी परिकथाओं और सुखांत एनीमेशन फिल्मों में जीने लगा। उन सब नेमतों की कल्पनाएं मेरे भीतर घोंसले बनाने लगी थीं - जिनमें स्वस्थ होना सबसे पहले आता है। सम्पन्नता थी मेरे पास और बेहद सुंदर गर्लफ्रेंड।

तुम मेरी वेबडिज़ायनिंग और प्रोग्रामिंग में एक्सपर्ट और इनोवेटिव होने की तारीफ़ करती हो। उस लड़के की क्या योग्यता जिसके पास कोई डिग्री तक नहीं। यही मेरी आयरनी है। मेरे पापा मुझे घर में देख कर खीजते हैं। वे हताश होकर मुझे ही डाँटते हैं। मम्मी खाना रख कर चुपचाप अपने स्कूल चली जाती हैं, अब उनकी आँखें भी नहीं डबडबाती। मैं डर जाता हूं कि सब किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं, जो उनकी मुक्ति है। क्या मेरी बीमारी का.....मटमैलापन उन सबकी रोजमर्रा की जिंदगी में बस गया है।

मेरी मां के बारे में तुम जानना चाहती थीं। उनका कद बहुत कम था, शादी के समय। मेरे पिता ने तब ध्यान नहीं दिया। पर मेरे स्वास्थ्य की वजह वह उनके छोटे क़द को मानते हैं। उनके भीतर जहां मेरा विकास जन्म से पहले अवरुद्ध हो गया हो। वे कोसते हैं उन्हें मेरे कारण.

मेरा जन्म मेरी शुरुआत यानि दुख और दुख। मेरी मां का दुख। वह घर पर रहतीं हैं तो मुझे ज़रूरत भर ही देखती हैं। बाकि वे मेरे ही कामों में व्यस्त रहती हैं। मेरा खाना, कपड़े, दवाएं, कमरा जमाना, नई फिल्मों की डीवीडी लाना, डिजिट पत्रिका के अंक और दूसरी किताबें भर देना। मैं एक छोटे लड़के की तरह ठुनक कर उनको बुलाना चाहता हूं। उनके महकते सीने में घुसना चाहता हूं। पर उनकी आँख करती है डपट कर - बड़े हो चुके हो। जैसे कि मेरा बड़ा होना मृत्यु के भय से मुक्त होना है, दर्द से मुक्त होना है। मेरी असमय ही टीनएज फास्ट फॉरवर्ड कर दी मम्मी ने।

ऐसे में मैं वही करता हूं जो मां को पसंद है, समय से पहले वयस्क होने का दिखावा। रात भर अच्छी नींद सोने का दिखावा। ऐसे में मैं अपने गुनगुने, साफ़ बिस्तर में सरक जाता हूं। वहां लंबे समय, शांत - स्थिर पड़े रहना - सपाट। स्वस्थ और बिना दर्द के होने का दिखावा करते हुए जबकि आरी चीर रही होती थी मेरी आंतों को। दर्द को आदत बना लेता अगर ये मायावी दर्द रूप न बदलता, न फ्रीक्वेंसी, न स्टायल। यह दर्द कभी जलन की तरह होता, कभी गुदगुदाता, कभी सुईंयां चुभाता, कभी आरी से चीरता, कभी हथौड़े चलाता, कभी बिजली के झटके सा लगता। मेरे डॉक्टर न कभी समझे न आज समझ पा रहे थे।यह दर्द था कि हर बात पर पर हावी था। मैं यह बस तभी भूलता हू मेरी एंजल जब तुम साथ होती हो। मैं खुद को तुम पर ढीला छोड़ सकता हूं। तुम पर चिल्ला सकता हूं। दर्द की बात सौ सौ बार दोहरा सकता हूं। तुम सुनती हो कि कहां कहां यह होता है, आँत की कौनसी भीतरी परत में कि पसलियों के पार कहीं । मैं खुद के खोल से बाहर आता हूं।

मैं जानकर दोस्तों को कॉल करके कहता हूं मैं पिज़ा हट में या सीसीडी में अनिंद्या के साथ हूं, माय गर्लफ्रेंड! वे उदार हैं, मेरे सामने नहीं हंसते। मैं तुम्हारे साथ आवारा घूमने की खुशी में कांपता हूं। तुम बंक मार कर चिंता करती हो अटैंडेंस कम होने की। हमें मैट्रो कहां कहां ले जाती है। मैं तुम्हें चूम पाता हूं, एक बार, दो बार । किसी दूरस्थ मैट्रो के सुनसान स्टेशन पर। तुम हमेशा कल मिलने का वादा करती हो, पर वह कल पखवाड़ा या महीना लगा लेता है। तुम कहती हो मैं प्रेक्टिकल नहीं हूं। मैं बहस करता हूं ज्ञिंदगी मेरे साथ प्रेक्टीकल नहीं है सो? तुम मुंहासे पर चिंतित हो जाती हो, मैं अपनी सिकुड़ती और नष्ट होती नर्व्ज़ पर चिंतित न होऊं? मैं तुम्हारी बड़ी काली आँखों की चमक के लिए अपना सारा जेबखर्च उड़ा देना चाहता हूं।

तुम दूरी बरतने लगी हो, दो सप्ताह से। मैं क्या करूं नहीं बरदाश्त होता तुम्हारा स्लीवलैस टॉप और छोटी स्कर्ट पहनना। कितना छोटा इश्यू है यह जिस पर हम बिल्लियों की तरह झगड़ पड़े थे। तुम्हारे कॉलेज के पिछले गेट पर। तुम शर्मिंदा हुईं थीं। तुमने ब्रेकअप की बात कही। अपनी चिट्ठियां और कार्ड्स लौटाने की बात। लौटा दूंगा। पर प्लीज़ छोटे कपड़े इतना ईश्यू नहीं है। थोड़े दिन बस मेरे लिए तुमसे बदलने की उम्मीद एक्सट्रा चीज़ पिजा में भी और चीज़ मांगने जैसा है न! तुम मना करती थी नहीं पचेगा मत लो, पर मैं स्वाद को दर्द पर तरजीह देता था।

मैं बिस्तर तक सिमट जाऊं, उससे पहले मैं तुम्हें तुम्हारा सामान लौटाने आना चाहता हूं। पापा - मम्मी सर्जरियों से थक चुके हैं। हम अब फॉलो अप विज़िट पर भी नहीं जाते, बस वही दवाएं जो मैं हर खाने के बाद पान या टॉफी की तरह खा लेता हूं।

आजकल मक्खियां तक मुझे चिढ़ा जाती हैं अनिंद्या, मैं कोसता हूं उन्हें। मैं बिना चीखे रोना चाहता हूं दर्द फेड नहीं होता। फिर नींद का इंजेक्शन मुझे सुला जाता है। मैं तुम्हारे प्यार से परेशान होकर रोता हूं कि मैं क्या कर सकता हूं तुम्हारे लिए? यह सच है कि तुमने मेरी उम्र दो साल बढ़ा दी। लेकिन तुमने दूर होकर ठीक नहीं किया।

तुमने कहा था तुम हर जगह मेरे साथ चलोगी, मेरे पिछले बर्थ डे पर हम कितना घूमें फ्रेस्को में, जनपथ पर। हम कहां - कहाँ छुप कर बैठे गार्डन्स की बैंचों पर, सब वे में, मैट्रो स्टेशनों पर। तुमने मुझे चूम लेने दिया। सुनहरी पिंडलियों से लेकर होंठों तक। मैं प्रेक्टिकल बबिलकुल नहीं प्यार में। मुझे पाने से बेहतर सब्र लगता था। कितने महीनों में हिम्मत कर सका। तुम्हारे गोल चेहरे के क्यूट पिंपल पर ही मेरी सारी खुशी टिक गई। तुमसे बातें, तुम्हारा साथ। तुम दूर जा रही हो तो लग रहा है, तुम्हें और लड़कियों की तरह कहीं सीमाओं का अतिक्रमण तो नहीं चाहिए था? या तुम्हें लगा कि तुम हारे हुए घोड़े पर समय बर्बाद कर रही हो। मैं खुद तुम्हें नहीं बता सका कि मुझे क्या हुआ है, मेरी सर्जरियाँ कोई परिणाम ला सकीं कि नहीं? मैं शिद्दत से चाहने लगा था कि मेरा अनाम दर्द काश मेरा ड्रामा या सायकॉलॉजिकल इमोशनल प्ले ही निकले।

याद है एक बार तुम घर आई थीं, मैं बिस्तर में कराह रहा था। मेरे होंठों पर लाल दाने हुए थे। तेज बुखार था। तुम पास आकर पैरों की तरफ बैठ गईं। तुमने धीमे से मुस्कुरा - मुस्कुरा कर कहा था - कि चूमने से यह सब हुआ है क्या!

वो दाने तुरंत गायब हो गए, बुख़ार उड़नछू। हम स्केटिंग करने गए शाम को। तुम बहुत कुछ बदल सकी हो, मैं ही नाशुक्रा हूं, अपने ही कॉम्प्लेक्स का मारा.

मैं बड़ा और ठीक हो चुका हूँ। बचपन और टीन एज मुझे कब के छोड़ चुके हैं। मेरा मन दुख से भरा है। मैं उन दिनों को वापस कैसे लाऊं? हमने सपना देखा था अंतहीन प्रेम का, शादी का। साथ बैठ बच्चों के नाम तक सोच लिए थे। मैं अब भूल तो नहीं पा रहा, इस कैंपस से दूर चले जाना बस में नहीं, तुम्हें कई बार सुबह बस के लिए भागते देखता हूं, तुम कई बार सड़क के स्पीडब्रेकर से टकरा कर बैलेंस खो देती हो। मेरा मन करता है पहले की तरह दौड़ आऊं. मेरे साथ किए तुम्हारे बचकाने रोमांस को मेरा मन दया मानने को तैयार नहीं होता। दया में कोई झगड़ता नहीं है। मैं बहन के आगे अब तुम्हारा नाम नहीं लेता। वह शाम की सैर के समय पूछती है। मैं उसे दुखी और बोर क्यों करूं? पर मैं अतीत की गलियों में चलता हूं, पिछले बुरे और हिंसक वाक़ये की खटास से उबरना चाहता हूं। मैंने माफ़ कर दिया तुम्हारे पापा को। ग़लती मेरी थी पर मैं बहुत दिन उनसे नाराज़ रहा था। उनको बताना मत, मैंने ही उनकी नई कार पर लंबा स्क्रेच लगाया था।

अपने कैंपस के गार्डन की बैंच और जामुन के पेड़ों के रास्तों पर अब भी धुंधले पड़ गए हमारे चुंबन बिखरे हैं। बारिश ने उन्हें धोया नहीं है। लाल कलंगी वाली चिड़ियाँ उन जामुनों पेड़ों पर घोंसला बना चुकी हैं, जिनके नीचे हम देर रात तक बातें करते थे।

पापा! वह ऐसी फिल्में देखता था या हम जिन फिल्मों को हम साथ देखते थे उनके अंत हमेशा ऐसे होते कि नायक - नायिका की एन उस पल मृत्यु हो जाती जब वे खुशियों के करीब होते। या तो वे अपनी सदाबहार जवानी में ही पथरीले हो जाते, या दूर पटक दिए जाते, पागलखानों में, दूसरे देश में कैद “ प्रिजनर ऑफ़ द वार’ । मैं पूछती तुम इन फिल्मों को क्यों देखते हो? चलो इन फिल्मों का अंत बदल कर सोचें, हम ये कहानियां बदल दें।

वह इस यक़ीन में ख़ुश हो जाता - यह कहानियां बदलेंगी, तुम बदलोगी इनको। किस्मत की हवा का रुख़ सही हो, सही वक्त लौट आए। बुरे दिनों का हिसाब वह भूलने लगता। उसे कॉफ़ी और संतरों की महक़ घेर लेती। सीसीडी के बाहर हरे घास के टुकड़े में सूरज की रोशनी के स्क्वायर में दो गिलहरियां एक दूसरे से खेलतीं। उसके बदन में सिहरनों का इज़ाफ़ा होता, भूख खुल जाती और एक्स्ट्रा चीज़ मांगता वह अपने बर्गर में।

जिस दिन आपने उसे थप्प्ड़ मारा था उसके बाद वह अपने घर में बंद हो कर रह गया था. उसके साथ आए लड़के ने उसके दोस्तों में बात फैला दी कि आपने उसे थप्पड़ मारा था वह एक प्रतिशोधी ख़ामोशी में बंद हो गया था। अनजान दर्दहद से आगे जाकर उसे बेहोश करने लगा था. ऐसी हद से बाहर की तकलीफ़ में डॉक्टर उसे मॉर्फ़ीन का इंजेक्शन देते. वह कभी – कभी जब मॉर्फ़ीन के इंजेक्शनों से उबरता तो चैट करता था मुझसे. उसने अपने अकेलेपन को एक रकसैक की तरह लगा कंधे पर बांध लिया था और सारी दुनिया का भूगोल उसने घूम डाला ....गूगल अर्थ पर ....। वह घबराता था अंतरिक्ष के ब्लैक होल्स से। मौत के बाद क्या के सवालों पर....

पापा, मेरी चिंता मत करना मैं उसके न होने को अपनी ज़िंदगी पर हावी नहीं होने देना चाहती। खुद को व्यस्त करलूं। सपनों में डुबो दूं। मैं जानती हूँ जीना. अभी भले ही मुझे आँख बंद करनी पड़ती है ताकि मुझे कुछ याद न आए।

मैंने आपको जानबूझ कर नहीं बताया, उस दिन आपकी एनीवर्सरी थी.

फरवरी का एक भीगा सवेरा था, सवेरे की सपाट ख़ामोशी में मैं कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही थी। फोन बजा तो भीतर अनजानी आशंका का तरल कांपा! उसकी बहन का फोन था - अनिंद्या रोहन नहीं रहा। आज सुबह पांच बजे तक लैपटॉप उसने कोई डॉक्यूमेंट्री फिल्म देखी होगी। सुसाइडल बर्ड्स पर। लैमनेड पिया, पीते ही उलटी की तो मैं उठ बैठी। वह दर्द से हल्का सा - चीखा फिर बिस्तर पर उल्टा गिरा। पापा ने सीधा किया तो वह जा चुका था।

फिल्म तब भी उसके लैपटॉप पर चल रही थी। कह कर बहन सिसकने लगी।

मैंने अपने हाथ में खुली लिप्सटिक बंद करके रख दी। टेबल पर रखे पापा आप के और अपने टिफिन में से बिना अपना टिफिन उठाए अपना बैग लिए मैं सीढ़ियां उतर आई। मम्मी पुकारती रहीं, मैंने अपनी रुलाई छुपाते हुए चीख कर बिना उनकी तरफ देखे कहा था – मुझे जल्दी पहुंचना है. लंच तक लौट आऊंगी. दो मिनट में मैं सड़क पर थी! मैं नहीं जानती थी मैं कहाँ जाऊंगी? चार सौ घरों वाले इस कैंपस में एक घर में जहाँ से वह चला गया था? उसके लिए शोक मनाने जहाँ उसके माता – पिता के परिचित जुटेंगे. वहाँ जाने का मेरे पास न अधिकार था, न मोहलत। फिर किसे विदा देती? जो अब था ही नहीं?

मैं बेमक़सद दिल्ली कैंटोनमेंट की सुनसान सड़क पर चलने लगी। जमीन पर बिछा था, पतझड़ी पत्तो में लिपटा भीगा सवेरा, सच में मुझे लगा हज़ारों लाल कलंगी वाली काली चिड़ियाँ अपने टूटे पंखों के साथ सड़कों पर टपकी पड़ी हों। उनकी लाल कलंगियां स्लोमोशन में पन्नियों की तरह गिर रही हों।

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