प्रेम के पनारे

*______क्रंदन______*
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चोटों में दर्द प्रणय का है,
पर जख्म अभी भी भारी है।
ओठों में आश मिलन की है,
पलको मे क्रंदन जारी है।।

चित्राक्ष कहा यूं जाती हो,
छोड़ के मेरी बस्ती को।
चित्रांग कही हर न ले ये,
तेरी इस भूली हस्ती को।।

यादों में तेरे ठिठक उठा था,
पर आज अश्रु की धारी है।
ओठों में आश मिलन की है,
पलको मे क्रंदन जारी है।।

दाही का रूप क्यूं धरे प्रिये,
ऊपर से अश्क बहार किया।
जैसे खुद के बगिया में,
माली ही जघन्य प्रहार किया।।

चाहत है मेरी दीर्घकाल तक,
तुम पर कतरा कतरा वारी है।
ओठों में आश मिलन की है,
पलको मे क्रंदन जारी है।।

जाओ पर यादें ले जाओ,
आँखों में कम सूजन हो।
खुद की दुआ खुदा से है,
चिरआयु तुम्हारा जीवन हो।।

फिर ये विछल उठा है मन,
कि यार तु कितनी प्यारी है।
यादों मे कुछ तो है लिखना,
ये अपनी ही जिम्मेदारी है।

ओठों में आश मिलन की है,
पलको मे क्रंदन जारी है।।

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  मैं मटका होता
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 काश मैं एक मटका होता।
किसी गोरी कमर मे लटका होता।
वो जाती हमें लिए पनघट तक
फिर सहजता से जल मे पटका होता।
                          काश मैं एक मटका होता..
वो लिए हमें फिर घर को चलती।
मैं मुग्द होता देख,कमर हलती।
चलते चलते वो पत्थर से टकरा जाती
काश उसका पैर थोड़ा सा चटका होता।
                           काश मैं एक मटका होता..
वो रुक कर वही बैठ जाती।
वही पास मटका सहलाती।
पहुचने मे उसे हो जाती देर
काश उसकी मम्मी उसे डपटा होता।
                           काश मैं एक मटका होता..
डपट सुन के वो मम्मी की रो पडती।
उसी समय आँसू की बूदें मटके मे पडती।
उन बूदो को उसकी मम्मी देख लेती
काश फिर पनघट भेजने को मन खटका होता।
                            काश मैं एक मटका होता..
फिर से लेकर हमें वो चलती।
खाली मटका कमर जो हलती।
पवन देव ने हवा चलाइ
काश झुरमुट मे पल्लू अटका होता।
                            काश मैं एक मटका होता..
फस जाती वो गोरी प्यारी।
रुदन करने लगती बेचारी।
फिर मैं मटके से बाहर आता
काश पकड के पल्लू झटका होता।
                            काश मैं एक मटका होता..
वो पूछ लेती तुम हो कौन।
मैं बन जाता मटका मौन।
समझ जाती, ये मटका मेरा
काश इसे मैं पटका होता।
                            काश मैं एक मटका होता..


       मोहब्बत
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मोहब्बत भूल जाती हो
विरह के गीत गाती  हो।
हमी तो थे तेरे यारा 
मेरा ही दिल दुखाती हो।।
                    मोहब्बत भूल जाती हो।
                     विरह के गीत गाती  हो।
पहले तो मिलने आती थी
अभी तो भाव खाती  हो।
वही मेरे मिलने जुलने से
अभी तक रूस जाती हो।।
                 मोहब्बत भूल जाती हो।
                 विरह के गीत गाती  हो।
वो जब बातें होती थी तो
क्या वो दिन याद करती हो।
वो रात दिन एक होती थी
अभी तुम कैसे रहती हो।।
                 मोहब्बत भूल जाती हो।
                  विरह के गीत गाती  हो।
अभी तक याद आती हो
हमारे दिल मे रहती हो।
कही भी आता जाता हूँ 
हमारे साथ चलती हो।।
                 मोहब्बत भूल जाती हो।
                  विरह के गीत गाती हो।।


                    _*तेरी जुल्फें*_
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जुल्फों के नीचे बैठ गया गर अच्छा कवि बन जाऊँगा।
तेरी ही जुल्फों पर मैं अच्छी कविता लिख जाउंगा।

कभी जुल्फों का उडना लिखता कभी जुल्फों का रुकना 
उन जुल्फें की रचना होती जिन्हें कभी न छूं पाऊँगा।।

ऐसी ऐसी जुल्फें आती जो पार्लर में ही कट जाती।
कटी हुई जुल्फों की रचना मेरी पुस्तक में छप जाती।

ऐसी जुल्फों की रचना में कभी नहीं घबराऊगा।
जुल्फों के नीचे बैठ गया गर अच्छा कवि बन जाऊँगा।

सबसे अच्छी कविता होती खाने में पड़ती जो जुल्फें।
घृणा से न त्यागू मैं खाना याद दिलाती तेरी जुल्फें।

तेरी याद में लगता है भूखा ही मर जाऊँगा।
जुल्फों के नीचे बैठ गया गर अच्छा कवि बन जाऊँगा।

दे दे जुल्फों की अब छाया,प्यार में जलती मेरी काया।
इसको ठंडक दे सकती है, अब केवल तेरी ही छाया।

बिना छाया के बैठूँ प्रिन्शु,पर जल के राख हो जाऊंगा।
जुल्फों के नीचे बैठ गया गर अच्छा कवि बन जाऊँगा।


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           व्रीड़ा
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मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।
छोड़ कर क्यूं यूं चली गई,देकर दिल मे पीड़ा।।
        तू छोड़ गई दिल की रजधानी
        बहता  बस आंखों से  पानी ।
        कटती नहीं ये रात की रानी
        दिल भी करता है मन मानी।
तू  ये क्या  खेल रही है,बच्चो  वाली क्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।
           कभी कभी लम्बी बातों मे
           छोटे छोटे विवाद हो जाते।
           कभी कभी बिन बोले ही
           बड़े-बड़े  संवाद  हो जाते।
कभी कभी बिन चोटों के ही,दे जाती यूं पीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।
            चपल नैन चितवन है तेरी
            कुछ दिन पहले बोली थी।
            वही नैन बन गया चकोर
            जिस दिन नफरत बोली थी।
ऐसे क्यूं लगता है मुझको,तुझे हुआ प्रेम से ज्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।
          शायद मैं भी भूल जाऊँगा
          पर दिल मे दर्द तो होता है।
          वो बेवफा क्या जाने
          बस मर्द ही मर्द तो होता है।
माना की जिस्मो ने जिस्मो से खेला है क्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।


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*खुद के दिल से पूछो सही*
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खुद का दिल खुद पूछ लेगा,
              कौन आता है दिलो मे।
रात भर यह सोचोगी जो,
               मौन होता है दिनो मे।।

फिर कहोगी वो ही मेरा,
                 प्यार का आधार है।
यूं मचल मन फिर कहेगा,
                 वो भी तो लाचार है।।

मेरी गंधवाही ये जुल्फें,
           टूटी जब टकरा के उससे।
मुझसे माफी मागा था,
         प्यारा भी बोला था मुझसे।।

प्यार करता है वो मुझसे,
            देखने आता है किलो मे।
खुद का दिल खुद पूछ लेगा,
            कौन आता है दिलो मे।१।

मेरे प्रणय समर मे क्या वो,
               मेरा साथ निभाएगा।
कैसे पूछू हिचक रही हूँ,
            क्या प्यार मे कदम मिलाएगा।

पर आंखें से लगता है उसके,
              छाव मिलेगी हमको भी।
वो प्यारा सा प्यार मिलेगा,
               चाव मिलगे हमको भी।

खुद का दिल खुद पूछ लेगा,
               कौन आता है दिलो मे।
रात भर यह सोचोगी जो,
               मौन होता है दिनो मे।२।

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      *एक औरत का डर*
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डरती हूँ तन्हाई में खुद से,
भीड़ भरे रास्तो में ज़माने से डर लगता हैं,
जन्म देती हूं एक नई जान को,
पर खुद की जान से ही डर लगता हैं.....

कभी बाजार में, कभी घर के अंदर,
कभी रास्तो में, कभी मंदिर के अंदर,
डरती हूँ मैं उन निगाहों से,
जो घूरते है मुझे, खा जाने की ख़ातिर.....

बचपन में झोले वाले बाबा से डरती थी,
जवानी में दिलफेंक मजनूओं से डरती हूँ,
बांध गले में मंगलसूत्र किसी के नाम का,
फिर भी अनजान लोगों से डरती हूँ.....

कभी किसी की नज़र मेरे उभारो पर पड़ती हैं,
कभी कोई एकटक मेरी जांघो को देखता हैं,
बहुत डरती हूँ मैं, कहीं कोई ना पाक ना कर दे,
खुद के मान को बचाने के लिए डरती हूँ.....

डर डर कर जीती हूँ, क्योंकि मरने से डरती हूँ,
खामोशी से डरती हूँ, शोर से डरती हूँ,
ना जाने कितने डर है मेरे दिल में,
औरत हूँ ना इसीलिए हर बात से डरती हूँ......!



____मयकश मे जाना_____
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कों मे कैद चांदनी तेरे
ओठों मे सुर्ख रवानी है।
बिन तेरे मयकश मे जाना
ये बेकार जवानी है।।
              बिन तेरे मयकश मे.....
साथ बैठ के पीते है
लहजो पर तेरे जीते है
एक एक लहजे नशे मे तेरे
प्यार की एक रवानी है।।
               बिन तेरे मयकश मे.....
मधुरस मे डूबे हाथ तेरे
आ चल दे थोड़ा साथ मेरे
पता है तुझको मधुशाला मे
तु गढ़ती नई कहानी है।।
              बिन तेरे मयकश मे.....
मधुरस का मैं मधुकर हूँ
तेरे तप का भी वर हूँ 
दे दे अपने हाथ से थोड़ा
जिसकी दुनिया दिवानी है।।
              बिन तेरे मयकश मे.....
मधुर मधुर मीठे बोलो मे
तीखें रस जल के घोलो मे
आ मिल कर अब पी जाते
फिर रचते नई कहानी है।।
              बिन तेरे मयकश मे.....


*______चिरवियोग______*
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चिरवियोग की कथा लिखू जब
नैनो से बस रस धार बहे।
बला ये कैसी आ पड़ी अब
अब किससे कैसी बात कहे।।

बलवा भी अब बड़े-बड़े
तेरे ही कारण जनम लिए।
यूं ताके तुझको खड़े-खड़े
नया जनम पुनः अब भरम लिए।।

हिय मे हाय बनी रहती है
कही नया न अपना प्यार गहे।
चिरवियोग की कथा लिखू जब
नैनो से बस रस धार बहे।

सुनाम नहीं बदनाम सही मैं
पर यादें नहीं भुला पाऊँगा।
सुनाल सरीखे नैन जो तेरे
उन्हीं मे कुछ बंदिश गाऊगा।।

पनहा नहीं मैं प्रिन्शु हूँ
कि दिल तुझको हिय का चोर कहे।
चिरवियोग की कथा लिखू जब
नैनो से अब रस धार बहे।


*______यादें______*
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तेरी यादें कुछ यूं आती है।
रग रग मे मेरे वस जाती है।

जब रात अंधेरी आती है।
जुल्फों की याद सताती है।
कभी चाँदनी रातो मे बस
तेरा रूप शौन्दर्य दर्शाती है।।

जब तमसा के तट मे जाता हूँ।
कुछ यादें वहाँ भी पा जाता हूँ।
झरनों मे नूपुर की यादें
और बंदिश वही पे गा जाता हूँ।।

तेरी यादें कुछ यूं आती है।
रग रग मे मेरे वस जाती है।
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न मैं राजा बना न तु रानी
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ना मैं राजा बना, ना तु रानी बनी
ना मैं राजा बना, ना तु रानी बनी
एक आधी अधूरी कहानी बनी।
जमाना हंसता रहा, दिल ये फंसता रहा
मैं दीवाना बना, तु दीवानी बनी।
ना मैं राजा बना, ना तु रानी बनी
एक आधी अधूरी कहानी बनी।

ना हमने किया, ना तुमने किया
ना हमने किया, ना तुमने किया
शराफत फिर कैसे शैतानी बनी।
न मिले हम कभी, न मिले तुम कभी
न मिले हम कभी, न मिले तुम कभी
चांदनी फिर कैसे रात रातरानी बनी।
ना मैं राजा बना, ना तु रानी बनी
एक आधी अधूरी कहानी बनी।


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आधुनिकता मे खोता बचपन 
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हम भूल गए उस बचपन को
जब कागज की नाव बनाते थे।
बारिश के मौसम में हम सब
अपनी नाव बहाते थे ।१।

अब लिए मोबाइल गलियों में
पागल की भांति फिरते हैं ।
आधुनिकता के गड्ढे में अब
ठोकर खा के गिरते हैं ।२।

हम भूल गए उस बचपन को
जब मिल के रोटी खाते थे।
स्कूलों में मैडम जी को
अच्छे अच्छे गीत सुनाते थे।३।

नए जमाने में हम सब
अब मैगी इटली खाते है।
लिए मोबाइल जेबों मे
बस हनी सिंह ही गाते हैं।४।

बचपन में हम लोगों की
होती छोटी कश्ती थी।
देख हमारे इन कर्मों को
मेरी मम्मी हँसती थी।५।

नये जमाने के चक्कर मे
डूब गई वो मेरी कश्ती।
व्हॉट्सएप के चुटकुलों में
अब तो पूरी दुनिया हंसती।६।

बचपन में वो मेरी मम्मी
हमको प्रिन्शु लल्ला कहती थी।
प्यार भरी थोड़ी बातों में
फिर दोनों की आँखें बहती थी।७।

नए जमाने के कारण अब
लोकेश बना अब फिरता हूँ।
उसी प्यार की बोली में अब
फट से जबाब दे देता हूँ।८।

बचपन की एक बात निराली
मित्र होते सब पक्के।
लड़के हो या लड़कि हो
होते थे दिल के सच्चे।९।

आज-काल के परिवेशों में
मित्र कहाँ वो मित्र रहे।
न ही उनमें प्रेम भाव है
हम तो जढ़ के जड़ ही रहे।१०।

इसीलिए कहता हूँ प्यारे
बचपन जैसा भाव रखो।
आधुनिकता को गोली मारो
प्रेम सभी से सामान रखो।११।

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जन्नत
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सुबह जन्नत सी मिल गई।
अंगना मे आ के देखा मम्मी जी दिख गई।१।

फिर चल दिया टहलने को,
बगिया भी  खिल गई।
चारो मे ओस की बूदो को जब देखा,
ऐसे लगा जैसे मोती ही मिल गई।२।

फिर घर से दूर जा बैठे एक शिला पर,
वही एक झुरमुट मे तितलियां भी दिख गई।
कुछ देर तक देखता रहा उन्हें,
कुछ ही देर मे सारी तितलियां भी उड़ गई।३।

फिर कुछ देर मे घर को चल दिया,
रास्ते मे देखा की कुछ मोती भी झड़ गई।
पहुँच गया एक नदी तट पर,
वहाँ भी कुछ मछलियाँ नजर लग गई।४।

झुक धुलने लगा जब हाथ - पैर,
सूर्य की किरणें भी दिख गई।
सूर्य की करणों को देखकर,
वहाँ वशुधा तो दुलहन सी सज गई।५।

फिर आगया मैं घर पर,
फिर से जन्नत मिल गई।
क्योंकि घर के अंगना पर ,
मेरी मम्मी जो दिख गई।६।

***

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