उजड़ता आशियाना - पतझड़ - 2 Mr Un Logical द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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उजड़ता आशियाना - पतझड़ - 2

आज बहुत दिनों के बात एक सुहानी शाम को कुछ फुरसत के पल मिले थे।ऐसा लग रहा था जैसे हम कितने दूर निकल गए,और बहुत कुछ पीछे छूट गया था।अतीत के झरोखों से बहुत सी यादें मन को प्रफुल्लित कर रही थी।उन्हीं यादों की दुनियाँ में टहलते टहलते कदम एक जगह जाकर ठिठक गयी।
  वो शामें याद आ रही थी जब हम दिन भर के भाग दौड़ के बाद बगल के पार्क में अपने दोस्तों के साथ बैठकर दिन भर का थकान उतारा करते थे।वो हरे भरे पेड़, उनकी लहराती डालियों पर रंग बिरंगी फूलों की एक मनमोहक दुनियाँ। और उस पर चिड़ियों का कलरव, इस टहनी से उस टहनी फुदकना।वास्तव में वह दृश्य मन को आनंदित कर देता था।लगता था जैसे वक्त कुछ देर के लिए ठहर सा गया है।
 आज फिर से एक बार उन लम्हों को महसूस करने की प्रबल इच्छा दिल में जागृत हो गयी,और पैर खुद ही उस पार्क की ओर चल पड़े।बहुत उल्लासित मन से जब पहुँचा तो एक अलग ही अनुभव मिला जो कि मेरे कल्पना से बहुत ही अलग था।पेड़ तो थे लेकिन पत्ते पेड़ पर नही जमीन पर थे।सब कुछ उजड़ा उजड़ा से लग रहा था।मन बड़ा बेचैन सा लगने लगा।कुछ देर निहारने के बाद बहुत ही थके मन से मैं वही एक बेंच पर बैठ गया।तभी याद आया ये तो पतझड़ का मौसम है।पुराने रिश्तों के खत्म होने का और नए रिश्तों के स्वागत के लिए फिर से तैयार होने का।
 अब मन उस पार्क से बाहर निकल कर इस जीवन रूपी बगीचे में विचरण करने लगा था।क्या जीवन में भी उसी पार्क की तरह है।जिसमे कभी वसंत की मादकता होती है, कभी शीत का ठहराव ,कभी ग्रीष्म की उद्गीनता तो कभी सुख और दुख का बरसात।जीवन भी पतझड़ से गुजरता है।बहुत सारे सवाल बड़ी चतुराई से मन के अंदर आने लगे और मैं विचारों में खोता चला गया।
कितनी समानता है जीवन और प्रकृति में।दोनों अपना रूप बहुत तेजी से बदलते रहते है।हमें जब यह बदलाव महसूस होता है तब तक फिरसे सब बदलने लगता है।नए लोग आते है,पुराने कहीं खो जाते हैं।हम कुछ देर उन पुराने रिश्तों का शोक मनाते हैं और फिर अपने नए रिश्तों के साथ जीवन पथ पर आगे बढ़ जाते हैं।यह सिलसिला चलता रहता है अनवरत जिदंगी के अंत तक,और एक दिन हम भी पेड़ के पुराने पत्तों की तरह सूख कर गिर जाते है।जीवन और मृत्यु के बीच का यह सफर खत्म हो जाता है।
अब शाम रात के आगोश में समाने के लिए व्याकुल हो रही थी,और भी बड़े भारी मन से अपने विचारों में उलझा हुआ वहाँ से निकल घर की ओर चल दिया।धीमे धीमे कदम और व्याकुल मन लिए जब घर पहुँचा सब कुछ बदला हुआ सा नजर आ रहा था।आज न तो घर पहुँचने की खुशी महसूस हो रही थी और न ही कहीं शान्ति ही नजर आ रही थी।जीवन का एक पूर्ण सत्य मन को झकझोर रहा था।

बिखरे सूखे उन पत्तों में अब अपना अक्स नजर आता था,
जीवन की क्या सच्चाई यही है मन को अब यही लगता था।