उजड़ता आशियाना - अनकही दास्तान - 5 Mr Un Logical द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

उजड़ता आशियाना - अनकही दास्तान - 5

वह एक थकी हुई सी शाम थी,हर तरफ खामोशी फैली हुई थी।लग रहा था जैसे कोई तूफान गुजरा था।जिसके द्वारा किये गये बर्बादी पर मातम मनाया जा रहा हो।कई सालों से मैं लगभग रोज इन रास्तों से शाम को गुजरा करता था।लेकिन मुझे याद नही इससे पहले कभी इतनी सन्नाटा फैली रही हो।कुछ चाय के दुकान,कुछ किराना के और एक दो नाश्ते की दुकान थी।जो हमेशा शाम को गुलजार रहती थी।
  कभी कभी तो ऐसा महसूस होता जैसे पूरे देश की राजनीतिक , सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों के जानकार इस चौराहे पर ही शाम को जमा हो जाते हैं।सारी दुनियाँ के ज्वलन्त समस्याओं का कारण एवं निदान यहाँ समझ आ जाता। चाय की प्याली खाली और सारे विद्वत जन घर की ओर चल देते हैं। करीब रात केे आठ बजे तक यह जगह गुलजार रहता है।इस तरह की खामोशी बहुत सारे सवाल मन में पैदा कर रही थी।
   इसी उधेड़बुन में कुछ आगे बढ़ा तो एक दुकान के अंदर एक पहचान वाला नजर आया।कदम खुद ब खुद उसके तरफ बढ़ चले।जब उसके पास पहुँचा तो बिना एक पल देरी किये मैंने पूछ लिया।भैय्या आज इस तरह की शांति क्यों है?
थोड़ा ठहर कर उसने बड़े सुस्त स्वर में कहा आपको को पता नहीं आज कश्मीर में हुए आंतकी हमलों में अपने इलाके के भी दो जवान शहीद हो गए।अचानक लगा जैसे किसी ने कान के पर्दे पर हथोड़े से जोरदार चोट किया हो। थोड़ी देर के लिए दिमाग सन्न रह गया।
 अभी चंद दिन पहले उन दोनों को यही देखा था।कुछ ही समय तो हुए थे उन्हें नौकरी में गये हुए।एक कि अभी चंद दिन पहले शादी हुयी थी।घर में बूढ़े माँ बाप और एक बहन।समझ नही आ रहा था उन की क्या हालत होगी।कितने सपने हम बुन लेते हैं अपने अपनों के लिए।पल भर में बिखर जाता है जैसे बस एक रेत की दीवार हो।
  क्या जिंदगी होती है सरहद पर खड़े जवानों और उनके घरवालों की। एक तरफ वतन पर मर मिटने का जोश होता है और दूसरी तरफ उनके परिजन हमेशा एक अनकहा डर अपने सीने से लगाकर जीते हैं। जब इस कदर कोई जवान बेमौत मरता है तो कितना चोट लगता होगा उनके परिवार वालों को । क्या एक फौजी की जिंदगी का सारांश बस इतना है । 
     हम आज 1947 से 2019 में पहुँच गए । कितनी ही पानी सिन्धु और रावी से बह गयी होगी । लेकिन राजनीतिक अदूरदर्शिता की निशानी कश्मीर की समस्या आज तक ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है । राजनीतिक कमजोरी की बलि हमारे नौजवान चढ़ रहे हैं । क्या एक सैनिक की जिंदगी की कीमत उनके मौत के बाद उनके परिवार को मिलने वाली राशी ही है । अगर कोई वीर जवान अपने प्राणों की आहुति देश की रक्षा करने में देता है तो एक संतुष्टि होती है उसके परिवार जनों को और शायद उसकी आत्मा को भी ।
 लेकिन इस तरह से आतंकी हमलों में बेमौत मरना दुर्भाग्यपूर्ण है । कब तक यह सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा । क्यों एक सैनिक का परिवार अपने सदस्यों की आहुति इस तरह के आतंकी हमलों में देता रहे । यह पूर्ण रूप से कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण आज भी कश्मीर जल रहा है और उस आग में हमारे नौजवान अपनी जान की बलि देते हैं।

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