वो बेकसूर.. Satyendra prajapati द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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वो बेकसूर..

ये खुदा तेरे बनाए इंसान से, अब इंसानियत बहुत दूर है।
अब इन्हें इंसानियत पर नहीं, हैवानियत पर गुरूर है।
बचे हैं जो कुछ इंसा यहां, क्या उनका इंसान होना कुसूर है।
फिर क्यों मिला है दर्द जमाने से उन्हें, बता मेरे खुदा_ वो जो बेकसूर हैं।।?


क्या हो गया इन दुनिया वालों को, हा मै उन दुनिया वालों की बात कर रहा हूं। जहां के लोग एक नई दुनिया की खोज कर चुके हैं।
हा मै उन समझदार दुनिया वालों की बात कर रहा हूं, जिनकी समझ ने सारी दुनिया ही बदल दी।
मगर अफसोस बदलते- बदलते इंसान इतना बदल गया कि कई हद तक वो अपनी इंसानियत भी खो चुका है।
मैं आय दिन देखता हूं इंसानी रूप में उन शैतानों को जिन्हें इंसानी लिबाज़ में पहचानना बड़ा मुश्किल हो गया है। आज लोगो के लिए कागज के टुकड़ों की कीमत - कीमती हो गई हैं। अब ये लोग सांसों की कीमत नहीं समझते। सच कहते हो तुम दुनिया वालों तुमने सबकुछ बदल दिया है। मौत बनाने और बाटने वाले कितने आगे निकल गए  जिनकी शक्तिशाली होने की प्रशंसा अब गली गली में होती हैं।
कुछ बहुत थोड़े से है ज़िन्दगी बनाने और बचाने वाले लोग मगर वो इस दौड़ में पीछे रह गए।
मै आज तक यही नहीं समझा कि ये हासिल क्या करना चाहते हैं। किस ओर जा रहे ये बदली हुई नई दुनिया के रास्ते।
यकीनन बड़ा और शक्तिशाली बनना चाहते है बनो.. मै कहां मना कर रहा हूं। बांटो ज़िंदगियां, जीत लो प्रेम से सारी दुनिया फिर कौन होगा तुमसे ज्यादा शक्तिशाली।
हां अगर तुमसे प्यार नहीं बांटा जाता तो ठीक है। दे दो मौत उन शैतानों को जो बेकसूरों को जीने नहीं दे रहे।
मेरा अफसोस तुम्हारी तरक्की से नहीं, तुम्हारी समझदारी से है। 
ओ दुनिया के शक्तिशाली देशों, ये मौत का सामान आखिर बनाया तो बेगुनाही को बचाने के लिए ही हैं। फिर तुम क्यों इस आतंकवाद के नाम के शैतान को मिट्टी में नहीं मिला देते। तुम तो दुनिया में सबसे ज्यादा शक्तिशाली हो इतना तो कर ही सकते हो। अगर नहीं कर सकते तो किस बात शक्ति शाली हो कोई हक नही तुम्हें खुद को ताकतवर बताने का।
रोज- रोज जलता हूं मैं उन बेकसूर चीखों से, मगर आज एक धमाके ने मेरे अंदर की आग को ज्वालामुखी का रूप दे दिया। तुमने भी सुना होगा ' सीरिया" देश का नाम आज वहां इंसानी लिबाज़ में शैतानों ने हजारों बच्चों को अनाथ कर दिया।
वो दूध पीते बच्चें जिन्हें अपने होने और ना होने का एहसास भी नहीं। क्या बिगाड़ा उन्होंने उन बेकसूरों ने  है जवाब कोई ये दुनिया के खुद को ताकतवर और शक्तिशाली बताने वाले देशों।
वो मुट्ठी भर शैतान हर रोज तुम्हें चुनौती देते, बेकसूरों का खून पीते। क्यों नहीं ker देते इन शैतानों के टुकड़े तुम्हारे लिए तो कोई बड़ी बात नहीं हैं। माना वो देश तुम्हारा नहीं है तो क्या हुआ इंसानियत कि तो कोई सरहदे नहीं होती।
वक़्त है बचालो उन बेकसूरों को ऐसा ना हो कल ये हाल तुम्हारे घर देश में हों और फिर तुम जागो जब तक  और कई हजार बेकसूर अनाथ हो जाए।
मैं भी नासमझ किन समझ दारों को समझाने की छोटी - छोटी कोशिश कर रहा हूं। जिन्हें झूठे रुतबे के सिवा कुछ आता कहां है। इस दुनिया में इंसान बचे ही कहां है जिनसे मै चिल्ला- चिल्ला कर कहूं, जो कुछ बचे है वो डर से सोए हुए है।
मगर मै जागा हूं तुम लोग तो सुनोगे नहीं, जाता हूं उन पत्थरों के पास जिन्हें तुम खुदा, भगवान, इशा मसीह , कहते हो, शायद सुन ले वो इन बेकसूरों की चीखें :--- 

मेरे नन्हें - नन्हें क़दमों को, उठाना ही ना था।
ममता भरी मां की गोद में, सुलाना ही ना था।
औरों के जैसे गर हसाना ही ना था
फिर क्यों दी ज़िन्दगी, जो रुलाना ही था।
ये खुदा बताते तू अपना पता, पूछूंगा आकर  ये सब बजह।
इतने है रंग दुनिया में, मैंने देखा ना कोई।
बस तन्हाई के सिवा, साथी है ना मेरा कोई।
शिकायते है तुझसे इतनी, जाने ना और कोई।
देख जा आकर खुदा, इस जन्नत जमी पर तू भी ज़रा।
हो गई यहां पर अब, अंधेरी हर सुबहा।
ये खुदा बताते तू अपना पता, ढूंढूं मै अब तुझको कहां।
पुछू मै किससे तेरा पता, बतादे तू मुझको अपना पता।
पूछूंगा आकर ये सब बजहा।
क्यों हक नही है मेरा, इन खुशियों के लम्हों में,
भीगा फिर मै क्यों नहीं हूं, होली के रंगों में।
हर एक आंसू मेरा पूछे, तुझसे जीने की बजहा।
ये खुदा बता दें तू, अपना पता.....

? समाप्त ?

 आपका सत्येन्द्र कुमार ✍️ 
?धन्यवाद ?