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सहोदर की कहानियां

सहोदर की कहानियां

1

पांची

आनन्द सहोदर

गांव की छोकड़ के नीचे एक महिला ने देखते ही देखते बांस के डंडे पर स्वयं की फटी पुरानी धोती लपेट कर अपना झंडा गाड़ दिया। अब उसके शरीर पर मात्र फटा हुआ दुपट्टा लिपटा हुआ था । उसने अपने चारों और पत्थरों का ढेर लगा कर एवं स्वयं भी अपने हाथ में पत्थर लेकर डंडे की छाया में बैठ गई । उसके आसपास भीड़ जमा थी भीड़ में बच्चों की संख्या अधिक थी बच्चे रह-रहकर उसे चिढ़ा रहे थे वह कभी गाली बकती कभी मुंह बनाती और अधिक बिगड़ जाने पर पत्थर फेंकने लगती थी । उपस्थित जनसमूह तितर-बितर हो जाता था ।

पांची का गांव में यह पहला दिन था । आते ही उसने उत्पात मचा दिया । पूरे गांव में शोर मच गया कि पागल आई है । लोगों ने पांची के डर से बच्चों को बाजार भेजना बंद कर दिया । लोग पांची से बहुत डरते थे । कोई उसे भूल से पांची कह देता तो उसकी खैर नहीं । उसका उत्पात कई दिनों तक चला पर अब वह कुछ सामान्य हो गई थी परंतु जब भी किसी से चिढ़ जाती तो उसे गाली अवश्य देती थी वैसे भी उसकी बड़बड़ाने की पुरानी आदत थी वह कभी बाजार में फुटपाथ पर या किसी मंदिर के समीप पड़ी रहती थी अपनी आवश्यकता अनुसार भोजन मांग लेती थी कुछ लोग उसे स्वेच्छा से पैसे भी दे देते थे जिनका भी कुछ खरीद लेती थी कभी-कभी उसे वस्त्र भी मिल जाया करता था परंतु वह ठहरी पागल पहना तो पहना नहीं तो फाड़ डाला या कहीं गुमा दिया मैं क्या लोग भी यही समझते थे परंतु सत्य कुछ और ही था ।

आध्यात्मिक सत्संग मंडल की ओर से प्रतिवर्ष सर्दी के दिनों में निराश्रितों को कंबल वितरित किए जाते थे । मंडल ने अबकी बार पांची का नाम भी निराश्रितों की सूची में सम्मिलित किया एवं उसे एक कंबल प्रदान किया गया । कुछ दिनों बाद पता चला कि वह कंबल उसने कहीं खो दिया है । पूछने पर उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया । मुझे लगता है वह किसी को दे आई है या पर वह कौन है ? मुझे पता नहीं परंतु इतना अवश्य है कि वह कोई उससे भी अधिक दरिद्र होगा ।

एक समय में किसी दुकान पर कुछ सामान खरीद रही थी । मैं भी वहां उपस्थित था । मैंने उससे पूछा - पांची तुम्हें हिसाब लगाना आता है ।

उसने कहा - मैं कोई पागल हूं हिसाब नहीं लगा सकूं ।

मैंने कहा - जब तुम पागल नहीं हो तो पागलपन का नाटक क्यों करती हो ।

मेरी बात पर पांची कुछ गंभीर हो गई और बोली - भैया पेट भरवे के लाने सब कछु करनो पड़े हैं

मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ पेट भरने के लिए पागलपन पर यह सच था । क्योंकि इस छोटे कद वाली दुबली-पतली अनपढ़ गवारूं पांची को इससे बढ़िया रास्ता नहीं दिखा होगा ।

गांव के बुजुर्ग त्रिपाठी जी के द्वार पर एक दिन पांची भीख मांग रही थी तभी एक भिखारिन भी वहां आ कर भीख मांगने लगी इस पर त्रिपाठी जी ने पांची के साथ-साथ एक रोटी उसे भी दे दी । भिखारिन को एक रोटी में संतुष्टि नहीं हुई एक रोटी और मांगने लगी इस बार पांची ने उसे ठोकते हुए कहा - तोय रोटी चाहिए ना ले मेरी रोटी और चल जहां से । पांची ने अपनी कुल दो रोटी में से उसे एक रोटी दे दी शायद पांची का संकेत था की भीख भी एक जगह पर एक ही बार मांगी जाती है । बार-बार नहीं । कितना धैर्य होगा उसमें जो भीख में मिले अन्न को भी दान कर दें ।

उपरोक्त बात का जिक्र करते हुए दो अक्टूबर को गांधी एवं शास्त्री जन्मोत्सव समारोह का संचालन करते हुए ग्राम के वयोवृद्ध शिक्षक तोमर साहब ने कहा था वास्तव में पांची परमहंस है । उसे किसी बात की परवाह नहीं है । उसमें कितनी समझ है कि उसने अपने हाथ की रोटी तक दे दी । वहां उपस्थित जनसमूह में पांची भी थी और उनकी बात पर मंद मंद मुस्कुरा रही थी । उसी समय उन्होंने पांची को एक लूंगड़ा भेंटकर उसे सम्मानित किया ।

गांव के पूर्वी छोर पर देवी का छोटा मंदिर है । पांची अक्सर वहां बैठी रहती है । मैं अपने मित्र के साथ भ्रमण के लिए उधर से निकला तो पांची के हाल-चाल जानने के लिए उसके पास गया मैंने कहा क्या कर रही हो - बैठी हूं भैया

खाना खाया - हां अवहि खायो

तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है - मोय तो कछु भी परेशानी नहीं है ।

तुम मुझे जानती हो - नहीं ।

अच्छा तुमसे एक बात पूछूं तो सच-सच बताओगी - हओ पूछो कांई पूछ रहे हो ।

तुम्हारा नाम क्या है - नाम माम तो मोय मालुम नहीं है शुरू से ही सब पांची केवे ।

रहने वाली कहां की हो - ताजपुरा ।

शादी कहां हुई थी - गांव में ही ।

अच्छा अपनी जाति बताओगी - भील ठाकुर है भैया ।

इस तरह मैं पांची से जानकारी लेता गया और सब बताती गई । उसने बताया कि आज भी उसका भरा पूरा परिवार है परंतु वह अब घर कभी नहीं जाएगी । अंत में जब मैंने उससे घर छोड़ने का कारण पूछा तो वह बहुत गंभीर हो गई एक गहरी सांस लेते हुए बोली वहां जो कछु होत तो वह मुझसे देखो नहीं जाततो । जैसे मैं घर छोड़ के आ गई , वहां वे पशु पक्षियों को काटते उनके शरीर से खून बहतो । तो जोर से चिल्लाते , मुझसे उन्हें देखो नहीं जाततो। यह सब कुछ इस तरह कह रही थी मानो वह कोई सपना देख रही हो । मुझे लगता है कि पांची का मर्मांतक नारी हृदय इन सब दृश्यों को देखकर विदीर्ण हो गया और वह पागल हो गई । मैंने देवी को प्रणाम किया और वहां से चल दिया । जाते समय पांची ने मुझसे राम राम कि जवाब में मैंने भी उससे राम-राम कहा ।

ग्राम के पहाड़ी भाग पर टेकरी का मंदिर है । यह राम सीता का मंदिर है जो कच्चा है । मंदिर के आगे दालान टूटी हुई है फिर मैदान ठीक सामने हनुमान जी की मडिया बनी हुई है एवं आगे चबूतरा है इस पर आठ दस लोग आसानी से बैठ सकते थे । प्रति मंगलवार यहां रात्रि सत्संग होता है । सत्संग मंडल के प्रमुख तोमर साहब है । जब मैं वहां पहुंचा तो करीब आठ दस लोग थे । गणेश जी के भजन से हमारी सभा प्रारंभ हुई पार्वती के लाल गजानन आज सभा में आओ रे इस तरह राम कृष्ण शंकर आदि देव के भजन सब ने मिलकर गाए अंत में आरती फिर कोई दृष्टांत । तोमर साहब के श्रीमुख से आज सुना तो मैं हतप्रभ रह गया क्योंकि वह सब काल्पनिक नहीं एक सत्य घटना थी । उन्होंने जो कहा वह घटना मेरे सामने तस्वीर की बात ही घूम रही है और मैं कह रहा हूं पांची तुम्हें धन्यवाद । गांव के पूर्वी छोर पर रेंज ऑफिस है थोड़ी दूरी पर एक कुआं है घटना वही की है । एक व्यक्ति सूअर के बच्चों को पकड़कर उसके बाल जोर से खींच रहा था इस कारण सूअर के बच्चे को दर्द हो रहा था और वह तड़पकर चीत्कार कर रहा था । पांची भी वहीं पर खड़ी हुई थी । उससे सूअर के बच्चे का आर्तनाद ना सुनाना गया । वह शीघ्र ही पास आकर उस व्यक्ति से बोली तू जाए छोड़ दे कैसे छटपटा रहो है बेचारो । पांची की बात पर युवक ने कोई ध्यान नहीं दिया वह सूअर के बच्चे को कष्ट देता ही जा रहा था एवं सुअर चीत्कार कर रहा था । इस बार पांची से रहा नहीं गया उसे क्रोध आ गया वह बोली तू जाए छोड़ रहो कि नहीं जल्दी छोड़ दे नहीं तो तोय पत्थर से मारूंगी । इधर पांची का पत्थर उठाना था उधर से तोमर साहब आना हुआ । उन्हें देखकर पांची बोली मारसाब मैं जासे कह रही हूं तू सुअरे छोड़ दे छोड़ नहीं रहो । आप जासे कह दो कि सुअर छोड़ दे नहीं तो मैं जाए पत्थर से मारूंगी । उन्होंने पांची की बात का समर्थन करते हुए कहा - देखो भाई पांची ठीक कहती है यदि तुम सूअर को नहीं छोड़ोगे तो मैं और पांची दोनों तुम्हें मिलकर पत्थर मारेंगे । इस बार व्यक्ति ने सूअर के बच्चे को छोड़ दिया ।

मुझे लगता है वह अहिंसा में पूरी पूरी आस्था रखती है उसके हृदय में मानव के प्रति ही नहीं अपितु पशु पक्षियों के प्रति भी करुणा का भाव छिपा हुआ है यही कारण है कि वह जहां कहीं भी मानवता को तड़पते हुए देखती है वह स्वयं भी तड़पने लगती है हम जिस पांची को पागल समझते हैं वह हमसे भी अधिक समझदार है और हम उससे भी ज्यादा पागल ।

***

सहोदर की कहानियां

2

झूंठा मुंह

सूर्य रश्मियां पीपल के पत्तों पर खेल रही थीं । नारायण का गधा भैयालाल गांव के प्राथमिक विद्यालय के मैदान में चौकड़ी भर रहा था । नशे में धुत नारायण एक तरफ खड़ा होकर उसके इस करतब से अत्यधिक प्रसन्न हो रहा था । लगता था जैसे भैयालाल को किसी बड़ी प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जा रहा है यूं तो गधों की दौड़ प्रतियोगिता होते मैंने आज तक नहीं देखी परंतु गांव में दो-चार गधे जब एक साथ दौड़ते हैं तो किसी प्रतियोगिता से कम नहीं लगता है ।

नारायण की जीविका का एक मात्र साधन भैयालाल ही था । जंगल से लकड़ी लाने एवं मिट्टी धोने का काम भैयालाल ही करता था । अपने हष्ट पुष्ट और तेज तर्रार गधे को देखकर नारायण फूला नहीं समाता था । भैयालाल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह नारायण की एक-एक आज्ञा को शिरोधार्य करता था । यही कारण था कि नारायण उसे अपने बच्चों की तरह स्नेह करता था ।

भैया लाल अपने मालिक के अलावा यदि किसी को प्रेम करता था तो वह दीवान की गधी मुन्नी थी । मुन्नी से ज्यादा उसकी किसी से पटती भी नहीं थी । सुंदरता में मुन्नी का गदहियों में कोई सानी नहीं था वह भी भैयालाल को सच्चे दिल से प्रेम करती थी । उस दिन भैयालाल बहुत दुखी हुआ था जब मुन्नी गड्ढे में गिर गई थी । शायद उसकी टांग में चोट आ गई । चलने में असमर्थ मुन्नी को देख कर कितना दुख हुआ होगा उसे । फिर दीवान ने भी गुस्से में आकर कम नहीं पीटा था । भैयालाल बहुत उदास था । नारायण को उसकी उदासी का पता चल चुका था इसीलिए वह नशे में धुत होकर दीवान को निरंतर गाली दे रहा था ।

दीवान को भैयालाल बिल्कुल नहीं सुहाता था । वैसे भी भैयालाल अपने मालिक के अलावा किसी की सुनता भी नहीं था । उस दिन जब दीवान ने उसे मारा तो शायद इसलिए चुप रहा होगा कि वह मुन्नी के गड्डे में गिर जाने का दायित्व अपने ऊपर ले चुका होगा । किंतु आज ऐसा कुछ नहीं था । दीवान ने उसे बिनावजह ही मारा और फिर गालियां दी भलां भैयालाल कब सहने वाला था सो एक दुलत्ती दीवान की टांग में जड़ दी ।

माया मोह के महासमुंद में डूबा हुआ सांसारिक मनुष्य पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुका है वह अपने ज्ञान दृष्टि तो क्या साधारण से चर्म चक्षुओं से भी अपने स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं देखता है फिर वह प्राणी में परमात्मा को कैसे अनुभव कर सकता है । सामाजिक विद्वेश रखने वाले दीवान को देखकर मुझे रामचरितमानस की एक चौपाई याद आती है –

जे परदोस लखहि सहसाखी । परहित घृत जिनके मन माखी ।।

भैयालाल की लात खाकर दीवान की बुद्धि सुधरने की अपेक्षा और अधिक बिगड़ गई । पता नहीं नारायण से उसका कब का वैर था । यह तो वह भी नहीं जानता था परंतु भैयालाल तो उसका दुश्मन बन ही चुका था । आज भी दीवान की टांग में कम दर्द नहीं था वह गुस्से में था कि भैयालाल फिर आ धमका शायद मुन्नी के हाल-चाल जानने के लिए ही आया होगा । आज तो दीवान ने गजब ही कर दिया । जरा सी बात को लेकर भैयालाल की गर्दन में फंदा डालकर आम की शाखा से बांध दिया और उसके चारों पैरों को बांध दिया । फिर कुछ गाली…. देख लूंगा कौन क्या करता है । दीवान भैयालाल को नशे में धुत्त होकर बेतहाशा मारता है आखिर भैयालाल की मौत हो जाती है ।

पंचायत द्वारा भैयालाल की मौत का जिम्मेदार दीवान को माना जाता है और पंचों द्वारा उसे जाति से पृथक कर दिया जाता है । दीवान को इसमें भावी संकट नजर आता है और वह अपने को जाति में मिलाने के लिए पंचों के सामने वह अपनी बात रखता है ।

एक मैदान में सभा का आयोजन किया जाता है जिसमें दीवान को जाति में मिलाने की बात कही जाती है । नारायण की निगाहें टेढ़ी हो जाती है वह दीवान को जाति में नहीं मिलाना चाहता है। पंचों द्वारा यह निर्णय लिया जाता है कि नारायण को भैया लाल के पूरे दाम दिला दिए जाएं और समाज का झूठा मुंह करा दिया जाए तो वह दीवान को जाति में मिला लेगी । परन्तु नारायण भैयालाल के दाम लेने से इंकार कर देता है और वहां से चल देता है ।

दीवान की लंबी चौड़ी दालान में पंगत लगी हुई थी । लोग झूठामुंह कर रहे थे तथा सामने देखकर आपस में हंस रहे थे । कुछ लोग दालान के बाहर एक तखत पर बैठे हुए थे । सामने ही आम की छाया में नारायण नशे में धुत पड़ा हुआ था ।

***

आनन्द सहोदर

तिलकचौक – मधुसूदनगढ़

जिला – गुना (मध्यप्रदेश)

पिन कोड 473287

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