Aadhunik Bharat ki kavitaye - fir koi mahakavy books and stories free download online pdf in Hindi

आधुनिक भारत की कविताएँ - फिर कोई महाकाव्य

फिर कोई महाकाव्य - आनन्द सहोदर


हिमालय से ऊंचे
विशाल हृदय वाले
दहकते अंगारों के समान
आखों पर अनोखी शीतलता
वर्फ से ढके हुए कंधे
आधे पैरों को जमीन में गाढ़े हुए
हे कल्पना पुरुष तुम कब से खड़े हो।

तुम्हारे भाल के तल में
वही हुई ज्ञान गंगा का
एक भाग पृथ्वी पर अवतीर्ण होगा
युग फिर गूंज उठेगा
किसी महाकाव्य की वाणी से।

हां हां सुनाई दे रहा है
हर स्वर हर एक कम्पन
पर उसका आदि अन्त नहीं
कहाँ से होगी कथा प्रारम्भ
बाल्मीकि की रामायण से
जो किसी भविष्य की तरह
लिखी जा चुकी है।
यह कथा है कथा
कहीं से भी प्रारम्भ हो सकती है।

मेरे कमरे से भी
रात के साये से
शायद उगते हुए सूरज
गाँव से शहर से।
परछाइयाँ उड़ते हुए पंछी
लहलहाती फसल कहीं से भी
कालीदास के मेघदूत के दो श्लोक
कामायनी के किसी सर्ग की कुछ पंक्तियां
मुहल्ले में होती हुई लड़ाई के वोलों
संसद भवन में नेता की बहस
किसी नींद में गुर्राते हुए आदमी से।

कहीं से कहीं तक भी
चार पन्ने इसके
चार पन्ने उसके लेकर भी
मेरी कहानी का क्रम
नहीं टूटता है।

पर अब मैं
ऐसी कोई परिकल्पना
नहीं कर सकता हूं
जो मेरी भागीरथी को
खींच कर पृथ्वी पर पटक दे।

मेरे राम किसी कारण से नहीं
स्वेच्छा से अवतीर्ण होते है
मेरे धरातल पर
दुष्ट भी भजन करते हैं
कोई रावण सीता का
हरण नहीं करता है
हाथ में मंजीरा लेकर
अपनी लंका में बैठा
भजन करता है।

यह क्या गजब हो गया
कोई स्वप्न भंग हो गया
टूट गयीं परिकल्पनाएँ
यज्ञ के भाग को
गद्हा ले गया है।

हां राम मानव हो सकते हैं
पर कोई मानव राम नहीं
मानव विकार है
एक ऐसा आकार है
जिसके अन्दर
वासनाएं भरी पड़ी हैं
इन सजीली आँखों के पीछे
आग है नाग है
जिगर में बड़ा दाग है
दुनियाँ उसके लिए साग है
खा जाना चाहता है
समस्त जीवों को
मार डालना चाहता है
तभी तो उगल रहा है जहर।

भाई चारा सिर्फ चारा है
न कोई लक्ष्मण प्यारा है
समता समरसता नारा है
मानव कलंक सा लगता है।

किसी गरीब की भार्या को
किसी ने चुरा लिया
कहीं पे बेंच दिया
किसी ने उसे बाहों में
ऐसा कहा कि
हमेशा के लिए
अपना बना लिया
अब मिलने पर भी
नहीं जाऐगी नहीं जाऐगी
मानव उच्छलृखल हो गया।

कर्तव्य की लकीरें मिट गई हैं
आदर्श चकरा गये हैं
किसी ने कोई आज्ञा नहीं मानी
न कोई वन में गया है
दूसरी भाषा में
घोर कलयुग आ गया है।

पर चाहता हूं
अब कोई रावण न हो
कोई सीता का हरण न हो
क्योंकि ऐसा हुआ तो
कोई समुद्र पार नहीं कर पाऐगा
कोई सेतु नहीं बांध पाऐगा
शायद समुद्र में डूब जाऐगा।
पर महाकाव्य अधूरा नहीं होगा
फिर भी कोई पन्ना पूरा नहीं होगा
क्योंकि यह कथा है कथा
न आदि है न मध्य है न अन्त
संग्राम होगा संग्राम होगा।
तलवारों का नहीं
धनुष वालों का नहीं
परमाणु युद्ध भी नहीं
पर युद्ध होगा
बड़ा भयानक होगा
कांप जाऐगी सम्पूर्ण सृष्टी
मानव पिस जाऐगा
झूठ को झूठ भड़का देगा
घृणा ही घृणा को मारेगी
अहंकार का फुकना फूट जाऐगा
जब अपने आपसे
बिना युद्ध के ही
कोई रावण मर जाऐगा।
पर मैं यह नहीं कहूंगा
कि यह संग्राम नहीं है
ऐसा कोई गाँव नहीं है
ऐसा कोई शहर नहीं है
जहां रावण नहीं है।

राम एक हैं बड़े नेक हैं
व्याप्त हैं सबमें
रावण में भी
इसीलिए तो कहता हूं
आदमी अपनी दुष्प्रवर्तियों से
जब घबरा जाऐगा
अपनी औकात पर उतर आएगा
नहीं तो तृप्त होकर
आत्म हत्या कर बैठेगा।


मैं चौराहे पर खड़ा हूं
या अपने विस्तर पर पड़ा हूं
मुझे कुछ होश नहीं है
पर एक बात जानता हूं
उसी को अपना मानता हूं
यह दुनियाँ मेरी नहीं है
न कोई रास्ता मेरा है
बस मैं जहां खड़ा हूं
वहीं पर खड़ा रहूंगा।

मेरा धरातल
किसी महाकाव्य के
नायक से खड़ा होता है
जो बड़ा शांत है निर्भीक है
सत्यवादी है
खड़ा है खड़ा है
कुछ समझा रहा है
मानव कौन से धरातल पर खड़ा है
तन्मय होकर बताया रहा है
और कह रहा है
स्थान बदलने पर
मानव मानव न रहकर
दानव हो जाऐगा
जो सबको खाता हुआ
अपने को खा जाऐगा
कहता कहता विशाल हो गया
फिर चट्टान हो गया
जो न कभी टूटती है न बिखरती है
न दिखाई ही देती है
अर्थात अदृश्य हो गया।
अभी बहुत कुछ बांकी है
हम घूम रहे हैं
अपनी जमीन के आसपास
शायद कभी लौट आऐं
अंधेरी रात है
हम आँखें मूंदकर पड़े हैं
कुछ दिखाई नहीं दे रहा है
सीता दिखाई दे रही है
जिसके नाक है कान हैं
दो आँखें हैं बड़ा सुन्दर चेहरा है
सीता बीच सड़क से गुजर रही है
हाथ में महाकाव्य है
एक सीटी बजती है
सीता बहुत डरती है
ये लड़के हैं या गिद्ध हैं
नहीं नहीं ये गिद्ध नहीं
यह भारत के वासी नहीं
गिद्ध बड़ा अच्छा होता है
जो सीता की रक्षा करता है
धन्य है जटायू जिसने
सीता की रक्षा के लिए
अपने प्राणों का वलिदान किया
धन्य हैं भारत के पक्षी।
यहां एक रावण नहीं
बहुत से रावण हैं
जिनकी नजर सीता पर है
आदर्श कहाँ चले गए
भावनाएँ कैसी हो गईं।


यह एक ड्रामा है
मैं एक भिखारी हूं
एक रोटी का सवाल है
नहीं नहीं रोटी का नहीं
नारी की इज्जत का सवाल है
कितना सम्मान है यहाँ
धन्य भारतीय आदर्श।
भारत क्या है
उसका क्षेत्रफल क्या है
भारत भारत है
उसका क्षेत्रफल कम से कम
और ज्यादा से ज्यादा है
क्योंकि मानव जहाँ खड़ा है
वहाँ भारत है और
दानव जहाँ खड़ा है
वहाँ भारत नहीं है
यदि भूल से दानव
भारत में खड़ा होगा
तो मानव के हाथों मारा जाऐगा
या मानव दानव को मारकर
उस भूमिपर नया भारत बनायेगा।

चल रही है कथा
इसका आदि मध्य अन्त नहीं
यह महाकाव्य है
इसका बड़ा प्रभाव है
इसमें राम हैं राम
राम राम होते हैं
जो रावण को मारकर
पैदा होते हैं।
बस प्रतीक्षा में हूं
संग्राम छिड़ जाए
रावण मर जाए
मेरे हृदय में एक ही बात है
उसका ही आघात है
मेरे आसपास राक्षस मंडरा रहे हैं
देव घबरा रहे हैं
रामलीला कर रहे हैं
राक्षस नहीं मर रहे हैं
पता नहीं यह कब तक होगा
पर मन में विश्वास है
एक ही आश है
ये हमारी कुंठाऐं वासनाऐं
जो हमारे अन्दर
कुरूप धारण करके बैठी हैं
इनका अन्त अवश्य होगा
फिर कोई महाकाव्य लिखा जाऐगा
जिसमें रावण नहीं होगा
केवल राम होंगे।

मधुसूदनगढ़, जिला - गुना (म. प्र )

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