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ज़िन्दगी

"भीशु शायद कुछ साँसे बाकी हैं....।"

अब बस भी कर ज़िन्दगी, इंसान ही हैं कोई सुपरमैन नहीं। पिछले 6 महीने से जो खाट पकड़ी है तो उसी के हो कर रह गए हैं। रह-रह कर मेरी 25 सालों की ज़िंदगी किसी पिक्चर के माफ़िक आँखों के सामने तैरती रहती है। ज़िन्दगी क्या बस समझिये कोई पहेली रही जिसे हम सुलझाते रहे और वो उलझती रही। फ्लैशबैक में चलते हैं, शुरू से बताते है....

एक बचपन था जो बहुत उदासी और ठोकरों के बीच गुज़रा। हम तो मासूम थे, लेकिन वक़्त उतना ज्यादा मासूम नहीं था। रोज़ एक जंग थी जीवन के लिए। हम लेकिन पक्की जान थे। जहाँ ज़िन्दगी हमको पीछे छोड़ रही थी वहीं हम उसी से शर्त लगाए हुए थे।

'बिरजू' नाम रखा गया था हमारा । जब हम पैदा हुए तो बहुत घनघोर गरीबी से हमारा स्वागत हुआ । हमारी 2 बड़ी बहनें थीं। पिता हमारे शराबी थे। हमेशा डूबे रहते थे नशे में। माँ को मारते और पड़ोसियों से भी झगड़ते । लेकिन जहाँ माँ उनकी डांट-फटकार और मार सहन कर जाती थी वहीं पड़ोसियों से आम तौर पर पिताजीे का छत्तीस का आंकड़ा रहता। गुंडागर्दी के माहौल में रह कर वो कई बार जेल यात्रा भी कर आए। तो औलाद तो हम भी उनकी ही थे। हम भला उन्नीस कैसे रह जाते। होश संभालते और सब जानते समझते हम बदमाशी में उनके भी बाप बन रहे थे। एक तो माँ बाप हमें पढ़ा नहीं पा रहे थे दूसरा कुछ बड़े हुए तो हमने उनकी ये समस्या भी दूर कर दी। स्कूल छोड़ दिया हमने । जब 12 साल के हुए तो याद है वो दिन अब तक..... जब हमारे पिता की मौत हुई थी। जिस माहौल में वो रहते थे वो ऐसा था कि एक ना एक दिन ऐसा होना ही था। हमारे पिता भी शायद उस वक़्त तक चोरी-चकारी और पैसे ले कर मार-पीट करने लगे थे। तो शायद किसी ने बदला लिया होगा । उनका नहर में तैरता शव बरामद हुआ था धोबियों को। खैर जो भी था बहुत डरावना था और उससे ज़्यादा गरीब को दरिद्र का मतलब समझाने वाला था।

अब उनके जाने के बाद हमारे घर की जो हालत हुई वो मैंने अपनी इन्हीं आँखों से देखी और करीब से महसूस की थी। मैं जाता था मजदूरी करने और वहाँ से मिले पैसे से घर चलता था जैसे तैसे। माँ दूसरों के खेतों पर धान काटती थी जिससे हमें भी कुछ अनाज धान मिल जाया करता था। अब इसे बचपन कह लीजिये या जवानी क्योंकि जब हमने कलम को छोड़ा तो वक़्त ने हाथों में तसला और फावड़ा पकड़ा दिया। उन छालों की चुभन आज भी ज़ेहन में जिंदा है। कभी सोचते के काश स्कूल में ज़बरदस्ती ही सही अगर पढ़ लेते तो ठीक रहता। पर अगर स्कूल जाते तो काम करने कौन जाता? स्कूल हमारे लिए सिरदर्द था। हमें ना गुरूजी की बदसूरत शक़्ल पसंद थी। ना हमसे सवाल बनते थे। उससे अच्छा हमें फावड़ा चलाना ही लगता था क्योंकि उससे कम से कम कुछ पैसे तो मिलते थे, जिनकी हमें ज़रूरत थी।

14 के रहे होंगे उन दिनों । क्रिकेट खेल रहे थे गली में। फील्डिंग करवा कर एम्पायर बना दिया था लड़कों ने । हमने उसको आउट करार क्या दे दिया सरपंच का लड़का लगा ऊटपटांग बोलने- "अबे साले आउट दे दिया बॉल तो बैट से लगी भी नहीं।" "अंपायर डिसीजन लास्ट डिसीजन" हमने फैसला दोहराया। उसका भाई भड़क उठा - "अरे साला चोर का बेटा है कुत्ते की औलाद का खून है सच थोड़ी बोलेगा।" बाप भले ही चोर रहा हो पर हम भी उतने सीधे नहीं थे। दिमाग भन्ना गया। दिया 'ससुर के' को हमने एक कनपट्टी पे। आ गए दोनों भाई सिखाने मुझको सबक। अब उनको क्या अंदाजा रहा होगा कि उनके पास बाप के पैसे की गर्मी थी तो वहीं हमारे खून में जो पैदाइशी उबाल था वो उस पैसे की गर्मी से कहीं ज़्यादा था। वो दोनों हट्टे-कट्टे और उम्र में हमसे कुछ बड़े। जब दोनों चढ़ गये मुझे मारने तो जाग पड़ा था हमारा भी अंदर का रौद्र बिरजू। छीना उसी का बैट और दे दिया घुमा के बड़े वाले के सर में। उसका तरबूज़ सा खोपड़ा ऐसे नहा गया खून में जैसे की लाल पानी की फुहार सी फूट पड़ी हो अचानक। सर फट गया उसका और वो वहीं गिर पड़ा। खून देख कर उसका छोटा भाई भाग कर बाप-चाचा को बुलाने भागा। अब किसने क्या कहा, क्या बोला वो कौन देखने वाला था। सबको दिखाई दे रहा था छोटे सरपंच का खून से भीगा हुआ कुरता। कोई लड़का कहता ये मर गया कोई कहता अब बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा इसको। अब हम भी बहुत घबरा गए खून देख कर। वहाँ से तुरंत भाग कर आ गए और घर में छिप गए।

माँ तक बात आते देर ना लगी। पड़ोस वाला 'तोतलु कलुआ' मेरे पीछे ही आ गया था खबर पहुँचाने ।"काकी बिरजू चाचा सरपंच के बिटुवा की खोपड़ी खिला दिए बल्ला मार के ... अब बड़े अस्पताल ले गए हैं बाबू लोग। "अगले कुछ पलों बाद ही हमारी माँ चूल्हा फूँकने वाली फूँकनी ले कर हमारे सामने खड़ी थी अपनी लाल-लाल आँखों से मुझे देखते हुए। बिना कुछ कहे ही उसकी वो आँखें किसी साधारण बच्चे का पाजामा गीला करने के लिए काफी थी। पर हम साधारण नहीं असाधारण प्राणी थे। मुँह से फूट पड़ा-

"अब हमें चोर का बेटा बोलेगा तो उसको छोड़ेंगे क्या.. तू बता माँ कोई तेरे पति को चोर बोल...."

बस इतना ही पैरवी कर पाए थे अपनी कि वो फूँकनी सनसनाती हुई हमारे कंधे पर आ कर लगी।

एक दम सही से लगा था वो प्रहार। दर्द से बिलख उठे। लगता था टूट गया कन्धा। अब क्या करें। कुछ सूझा नहीं और जो भागे वहाँ से सरपट तो गांव से बाहर वाला जो भोलेनाथ का मंदिर है वहीं जा कर शरण लिए।

सुनसान मंदिर , सिर्फ हम और वो पुराना शिवलिंग जिसके पास बैठे हम दर्द से कराह रहे थे। रोते रहे दर्द से उतना दर्द कभी नहीं सहा था। पड़े रहे वहीं हाथ को पकड़े हुए।

रात हुई ... बाहर आकर देखा । घुप्प अँधेरा हो चुका था। लगता था जैसे उस पूरे मंदिर में बस हम ही हैं और है सन्नाटे को चीरती वो झींगुरों की आवाज़। ऊपर से भूत-पिशाचों का भी डर लगता था हमको। कितना कहती थी माँ पूजा करने को, दिया-बाती जलाने को, हनुमान चालीसा पढ़ने को। पर हम सुनते कहाँ थे किसी की। तब उनकी बात मान लिए होते और पाठ करना सीख लिए होते तो आज हनुमान जी हमारे काम आ जाते। पर सुने थे कि हनुमान जी जो हैं, वो शंकर जी के ही अंश हैं... माने अवतार हैं।फिर क्या था बैठ गए हम शिवलिंग के सामने। लगे जपने 'ॐ नमः शिवाय।'"अब हम गांव नहीं जाएंगे , जब माँ हमको कल सुबह खुद ढूंढते-ढूंढते आएगी तब ही जाएंगे.... और आसानी से मानेंगे भी नहीं.. कोई ऐसे मारता है क्या... कितना दर्द हो रहा है हमको.. क्या गलती थी हमारी .. ऊ साला लोग खुद हमको गाली दिया और फिर खुद ही मारने दौड़े।" और ऊ ससूरे कलुआ को भी नहीं छोड़ेंगे... पर माँ ने उल्टा हमें ही मारा, कोई बात ना कहने दी ना ही ..."आह! माँ..... मेरा हाथ। मर गए! रात में तो इसमें और ज़्यादा दर्द हो रहा है। हिला भी नहीं पा रहे है इसको।"हम हाथ पकड़ कर बैठे थे और आँखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। एक ध्यान हाथ पर था क्योंकि दर्द सहन ना होता था। दूसरा ध्यान शिवलिंग पर था। कहीं जाप बीच में छूट गया तो कौन जाने किस पल कोई भूत आ जाए पीछे से। रात काफी गहरी हो चुकी रही शायद आधी बीत चुकी थी।जून की वो रात जो आम तौर पर गर्म होती थी जब हम अपने घर में सोते थे, वही रात अब खुले में कितनी ठंडी हो आती थी। पैरों को आपस में मिलाए , घुटनों को पेट में घुसाए हम वहीं ढेर हो गए ।

कुछ घण्टे दो घण्टे बाद कुछ आवाज़ों से नींद खुली। चाँद को देखा कोई चार -साढ़े चार बजे होंगे सुबह के।" ये भूत नहीं हो सकता" खुद को दिलासा दिया। क्योंकि दूर किसी मंदिर से घण्टा बजने की आवाज़ आ रही थी और हमारा मानना था के भूत रात तीन बजे से पहले शिकार करके लौट जाते हैं और घण्टा बजने पर कभी नहीं आते सामने। हम फुर्ती से उठे और मंदिर की दीवार के पीछे आ गए। वो शोर समझते हमें ज्यादा देर ना लगी। सरपंच के आदमी आ गए थे हमें ढूंढने।"पक्का कह रहे है भैया जी, ससुरा यहीं कहीं आसपास होगा...जाएगा कहाँ, जान से मार देंगे मिलते ही… बबुआ की आत्मा को तभै शांति मिलेगी। "हमने एक लठैत को कहते सुना। उनकी बातों से हम जान गए थे कि सरपंच का लड़का मर चुका है अस्पताल में।

हम छिपते-छिपाते पीछे खेतों से होते हुए निकलने लगे। लेकिन खेतों में बड़ी-बड़ी घासों में हमारी सरसराहट उन लोगों ने सुन ली और भागे हमारी ओर और टॉर्च मारी हम पर।"ऊ रहा साला कुत्ते का बच्चा .. पकड़ो उसे।" अब हम खेतों की घासों और ईख के सूखे पत्तों को चीरते हुए आगे -आगे और सरपंच के लठैत हमारे पीछे-पीछे। पर वो कहाँ जाने.. जो दौड़ हमारे लिए खेतों में वो अब लगा रहे हैं ये उनके लिए ठीक वैसा ही है जैसे हाथी को खेत में खरगोश पकड़ना हो। कहाँ हाथ आने वाले थे हम उन पाजियों के। आखिर इन्हीं खेतों की ही खाक तो छान रहे होते थे हम ईख चुराते हुए, जब बाक़ी साथ के बच्चे स्कूल में पहाड़े याद कर रहे होते थे। ऐसे सरपट दौड़े के खेतों को अंदर ही अंदर चीरते हुए कुछ मिनटों में ही बाहर गांव की पक्की सड़क पर निकल आए थे। अब एक तरफ हमारा गांव था और दूसरा रास्ता जाता था शहर को। हम एक हाथ से अपने टूटे कंधे को संभाले रोड पर भागे चले जाते थे। सांस टूट रही थी पर वो हौसला....ना टूटने पर अड़ा हुआ था। पीछे से आती एक ट्रेक्टर ट्रॉली को देखा हमने। पुराना खेल काम आया। कैसे हम सड़कों पर चलते हुए ट्रैक्टर, टेम्पू पर चुपके से पीछे से भाग कर चढ़ जाया करते थे और लटक कर दूर तक झूल आते थे। हमनें लपक लिया झटके में उसको और चढ़ गए। भूसा ले जाया जा रहा !था। हम लेट गए उसी भूसे पर जो हमें किसे गद्दे से कम ना जान पड़ता था। हम सोच रहे थे कि ना जाने अब हम कहाँ जा रहे हैं.... अब क्या करेंगे कहाँ रहेंगे। हमारी माँ का क्या होगा। !एक तरफ हमारा गांव था जो ट्रेक्टर !के उस धुंए के साथ पीछे छूट रहा था वहीं हमारी आँखों में फिर बह निकले थे आँसू जो हमारी माँ के थे। जाने क्या सुलूक करेंगे मेरे घर वालों से वो लोग । "माँ ना तू हमको मारती ना हम घर से भागते... और कितना अच्छा होता हम कल क्रिकेट खेलने ही ना जाते।" आँखों में नींद भरी थी और दिल में एक अजीब सा डर और दर्द से बेहाल हमारा टूटा कन्धा। "मर्डर कर दिए है, पुलिस ढूंढेगी ... फांसी हो जाएगी क्या?? या बचा लेंगे भोलेनाथ। बालमन सिसकता हुआ खुद को तसल्ली दिए जा रहा था। इन्हीं सवालों का ताना-बाना बुनते हुए जून की वो हल्की गर्म सुबह और चलती ठंडी बयार ने ना जाने कब हमको सुला दिया पता ही ना चला। खैर फिर जागेंगे ... जीने के लिए। मरना ही होता तो यूँ भागते ना अपना गांव छोड़कर......।

आँखें खुलीं तो जाने सूरज सर पर चढ़ चुका था और हमारा बदन पसीने में भीगा हुआ था। हमने पाया कि ट्रैक्टर एक जगह रुक चुका था। हम नीचे उतरे और वहाँ से चलते हुए बाज़ार से बाहर आ गए जहाँ से बाज़ार शुरू होता था। कोई अनाज मंडी जान पड़ती थी। "भाई ये कौनसी जगह है?" एक आदमी से हमने पूछा। "दिखता नहीं मंडी है।"उसने हँसते हुए जवाब दिया। "हम नए हैं यहाँ और खो गए हैं... हम बिहार से हैं। ये कौन सा देश है?" "ये बरेली मंडी है... पास में थाना है वहाँ चले जाना वो तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुँचा देंगे।" उस आदमी ने इंसानियत जताते हुए कहा। उसको 'ठीक है'बोल कर हम वहाँ से निकले। अब हमें थाने ही जाना होता तो यहाँ क्यों आते। वो इंतज़ाम तो गांव वाले करके बैठे थे। वैसे भी थाने वाले हमको ढूंढ रहे होंगे गांव में। अब हम सबसे बचते हुए थाने से दूर निकल आए।हमने धूप से बचते हुए एक चाय की दुकान पर बैठना ठीक समझा। कल से भूखे थे पेट में चूहे कूद रहे थे। लेकिन अच्छी बात ये थी कि दिन भर सोने से कंधे में दर्द पहले से कम था। हम जा कर बैठ गए वहाँ। "क्या चाहिए???" समोसा ले आओ... और चाय ले आओ.. समोसे चार लाना।" कुछ देर में वो लड़का मेरा नाश्ता ले आया। हम टूट पड़े खाने पर। साला पेट की आग होती ही इतनी कुत्ती चीज़ है कि वह इंसान से कुछ भी करवा सकती है.....जैसे हमसे करवा रही थी। जहाँ एक ओर हमने आर्डर दे दिया था नाश्ते का और नाश्ते पर टूट रहे थे वहीं दूसरी ओर डर ये भी था कि आगे क्या होने वाला है हमारे साथ क्योंकि हमारे पास जेब में एक नया पैसा भी नहीं था। अब ना जाने ये ढ़ाबे वाला क्या हाल करने वाला है हमारे साथ। वो जो होगा देखा जाएगा बाद में, अभी समोसे...सिर्फ समोसे देखे जाएंगे।नाश्ता कर चुकने के बाद जब हम चुपके से वहाँ से चलने लगे तो ढाबे वाला लड़का चिल्लाया- "अरे जाता कहाँ है? बिल को भरेगा?" "हमारे पास पैसे नहीं हैं।" "अबे पैसे नहीं हैं तो क्या यहाँ खैरात बाँट रहे हैं हम पैसे निकाल वरना।" उसने जो ही मेरा हाथ पकड़ा हम चिल्ला पड़े। हमारा हाथ जो टूटा हुआ था उसमें भयंकर दर्द उठा। हम रोने लग गए। "हमारे पास पैसे नहीं हैं... हमको चोट लगी है कंधे में, और कल से कुछ नहीं खाया है हमने ।" हम रोए जा रहे थे। ढाबे में बैठे लोगों के बीच एक सन्नाटा सा छा गया। "कितने पैसे हुए इसके?" एक भारी सी आवाज़ गूंजी। "4 समोसे के 20 और 5 चाय के, कुल 25 रूपए।" ढाबे वाले ने हिसाब समझाया। "ये पकड़ो 25 रूपए उसको जाने दो।"एक सज्जन आदमी ने हमारा बिल चुका दिया था। देखने में वो हट्टे-कट्टे ,गोरे लंबे आदमी थे। शक़्ल -सूरत साधारण थी पर इस समय वो मुझे कोई असाधारण मानव जान पड़ते थे। मेरा मन उनके लिए आदरविभूत हो उठा। लगता था शायद कुछ दयालु लोग बाक़ी हैं दुनिया में। बाहर जाते हुए मैंने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। कुछ दूर जाने पर उन्होंने मुझे देख लिया। अपने पास बुलाया और मुझसे पूछा- क्या हुआ बताओ...बहुत दुखी लगते हो।" अब सच तो बता नहीं सकते थे।"साहब, हमारा इस दुनिया में कोई नहीं है.... हम गांव से काम की तलाश में आए है..ये देखिए आते समय हमको गुंडों ने बहुत मारा हमको कंधे में चोट है।" हमको उस समय यही झूठी बातें बुनना ठीक लगा। शायद उस भले इंसान को मुझ पर दया आ गयी थी। "मेरे साथ काम करेगा?"

"करेंगे साहब। "और वो ले आया था मुझको अपने घर। उनका नाम राजेंद्र था। वो एक ट्रक ड्राइवर थे और घर में उसकी बीवी और एक छोटा सा बेटा था। मुझे उन्होंने डॉक्टर को दिखाया और कई महीनों चले इलाज के बाद हमारा कंधा भी ठीक हो गया। अपने किसी छोटे भाई की तरह उन्होंने हमारा ध्यान रखा। कुछ महीनों में ही मैंने उनको और उन्होंने मुझको परिवार में शामिल मान लिया था। उनकी बीवी को हम भाभी कहा करते थे। दिन वहीं कटने लगे।अब हमारा काम था छोटे बच्चे की देखभाल करना और घर के काम करना और समय मिलने पर भैया के गैराज जा कर कुछ काम करने में मदद करना।कुछ समय तो ठीक चला ..उसके बाद भाभी हमसे बैर करने लगी। डाँटना-लताड़ना , गाली देना , काम हद से ज़्यादा करवाना और खाना भी ताने मार-मार कर देना।बर्दाश्त की हद भी एक मोड़ पर आ कर जवाब देने लगती है।बहुत दिल को लगी थी उनकी वो बात...."अगर हम तुझे ना लिवा लाते तो पड़ा होता किसी गटर में, यहाँ जानता नहीं तू कितनी महंगाई है। खाने को मन भर चाहिए तुझे और काम करने में कतराता है हरामी।"हमने सोचा था अब लाइफ सेट हो गई है पर शायद ये एक पड़ाव भर था और अब हमें लगने लगा ' बिरजू' अब नहीं चल सकेगा। हमनें वहाँ से अपना झोला समेटा और एक रात निकल लिए बिना किसी को कुछ बताए। मन में लेकिन भैया के लिए आदर था। उन्होंने उस वक़्त हमें उठाया था जब हम दुनिया से उठने वाले थे।वहाँ से भाग कर कुछ रातें फुटपाथों पर सोये। काम ढूंढते-ढूंढते एक इंडस्ट्रियल एरिया में आ गए। एक फैक्ट्री में मजदूरी मिल गयी। सामान को पीठ पर लादकर ट्रक में भरवाना होता। जो भी था अच्छा नहीं था पर भूख मिटाने के लिए तो कुछ पैसे चाहिये ना। ये जो पेट की आग है बाबू ये रोज़ लगती है..रोज़ हम बुझाते हैं। पर जब तक ये आग है तब तक हम ज़िंदा है वरना आग खत्म, समझो फिर हम खुद एक आग होंगे। आखिरी आग। जो रोज़ नहीं जलेगी। जलेगी एक बार और बुझेगी फिर हमेशा के लिए। पर तब तक क्या....?तब तक सिर्फ संघर्ष है। 'रूपा' जो हमारे ही चौल में रहती है, ले दे कर बस वही हमारी एक दोस्त रही शहर में। उसी से हम बात कर लेते दुःख बाँट लेते। वो हमारे बारे में सब जानती थी हमारी राज़दार। माँ - बाबा के साथ रहती है और घरों में काम करती है। सोचते है जब कोई लड़की शादी नहीं करेगी ना तो रूपा को ही बोल देंगे .... लेकिन छोड़ो हम उसके लायक कहाँ । हम तो फक्कड़ हैं, हमारा क्या भरोसा, उसको क्यों दुःख दें इस दर्द के बियाबान में ला कर।

कई सालों तक काम किया हमने उसी फैक्ट्री में खून पसीने एक किया। लेबर से सुपरवाईजर तक आए और बड़ी मशीन के पुख़्ता कारीगर भी बन गए। ऊपर से मालिक के वफादार भी। पिछले नौ सालों में जब से हम घर से भागे रहे ज़िन्दगी में क्या पाए क्या खोए कभी हिसाब लगाया तो यही पाए कि खोया तो सब कुछ था लेकिन पाया रत्ती भर ही। माँ छूटी, परिवार छूटा ।साला अब ना कोई अपना कहने वाला था , ना कोई मरने पर रोने वाला है। 'रूपा' भी ना जाने कब तक साथ होगी। उसकी भी तो शादी हो जाएगी कहीं। और पाया तो सिर्फ़ इतना के अब रोड़ से हम घर में आ गए थे। हमारा अपना खुद का छोटा सा एक कमरे का घर था , हमारा खुद का स्कूटर था । हमने सोच के रखा था के एक दिन जब खूब पैसे वाले हो जाएंगे तो माँ को अपने पास शहर बुलवा लेंगे किसी ना किसी तरह। दिन-रात एक करते थे हम काम में।लेकिन दुनिया को शराफत रास कहाँ आती है। मालिक से हमारी निकटता लोगों को अखरने लगी थी। चाल खेल कर जीते भी तो क्या जीते। फैक्ट्री के कुछ लोगों ने नई मशीनों के खरीद के हिसाब में हमारे दोस्त 'भीशु' को चोर साबित कर दिया। वो हमारे साथ ही काम करता था। पर हम जानते थे वो चोर नहीं है। हमने लाख समझाया मालिक को, इतने साल नौकरी का हवाला देते रहे .... पर जो इंसान चापलूसों में घिर जाता है वो फिर सच झूठ में फर्क कहाँ कर पाता है। नौकरी से भी निकाला और उसको चोर मान लिया। लगे उससे पैसा वसूलने।अब जब चोर मान ही लिए हो उसको और हमारी बात की भी कोई कीमत नहीं है। भीशु बेचारा कहाँ से लाता। इतने खुद्दार तो हम भी थे कि खुद्दारी बचा जाएं। हमने अपना स्कूटर बेचा और कुछ जोड़ा हुआ पैसा निकाला। 30 हज़ार मालिक को देने पर बचता था सिर्फ 12 हज़ार। वो हमनें 'भीशु' को दे दिया और हमने उसी दिन से वहाँ से नौकरी छोड़ दी। कुछ दिन खस्ताहाली में गुज़रे। कुछ नया काम मिलता दूसरी फैक्ट्री में तो वहाँ भी बात फ़ैल गयी कि बिरजू चोर है और दोस्त के साथ मिल कर मालिक का पैसा दबाया है।एक जानकार की मदद से हमको ऑटो किराये पर चलाने को मिल गया। जुनूनी तो थे ही । सुबह निकलते और रात में खूब कमाई करके वापिस लौटते...होटल से खाना ले कर और दारु ले कर। ये शौक भी पाल लिए थे। शौक भी क्या ...ये दवाई है दर्द भूल जाने की। जब माँ की याद आती है तो खूब रोते हैं...चुपचाप खाना खा कर सो जाते थे, पर नींद नहीं आती थी । जब से पीने लगे हैं तबसे कुछ याद नहीं रहता। कब लेटे और कब नींद आ गयी।रूपा बहुत रोकती है। सोचते हैं छोड़ देंगे। अब अच्छा पैसा कमा रहे थे। अपना खुद का ऑटो ले लेंगे ये धनतेरस आते-आते। फिर घर भी तो बसाना है। गांव की ख़बर लेने के लिए 'भीशु' को भेजा वो अंजान बन कर मेरे गांव गया और गुपचुप तरीके से ख़बर ली। पता चला गांव में अब कोई नहीं है। बताते हैं के कुछ साल पहले हमारी दोनों बड़ी बहनें गायब हो गयीं। पुलिस को ना कुछ सुराग़ मिला ना ही मृत शरीर। माँ ने भी प्राण त्याग दिए । अब वहाँ कुछ नहीं बचा है।हम बहुत रोए.... अब किसके सहारे जियें और किसके लिए जियें। एक उम्मीद थी जो बुझ चुकी थी। गांव दूर जाता दिखाई दिया।उधर रूपा के लिए भी रिश्ते देखे जा रहे थे। हमने एक दिन उससे पूछ ही लिया-"रूपा क्या तू हमसे ब्याह करेगी??""हम अच्छे दोस्त हतें बिरजू..बाबा की नाक कटी जाए अगर हम उनके खिलाफ कछु करें... झेर खा लें वो।" उधर से भी शॉक खा लिए।ज़्यादा नहीं गिड़गिड़ाए.... जिसने अपना परिवार खोया हो वो प्यार के खोने पर क्या रोएगा। आजमाईश थी जो हो चुकी थी। शायद हम दोस्त ही थे।अब हमने शराब को ही दोस्त मान लिया था। पत्थर हो गए थे अंदर से। समय के साथ ज़िन्दगी बदल रही थी। दिन भर काम और शाम भर शराब। जीने के यही दो सहारे। काम इसलिए क्योंकि आग अभी भी बुझानी थी और दारु इसलिए कि वो भी आग बुझाती थी..... वो आग जो अंदर जलती है। दिल की आग....!शराब भी कब तक साथ देती जब शरीर ही बस में ना रहे। बीमारी ने घर कर लिया हममें आखिरी बार जाने हम कब बीमार हुए थे। जंगली थे हम आसानी से बीमार नहीं होते थे।डॉक्टर बताते खून की कमी है। इलाज भी चला और हम ने काफी हद तक शराब भी छोड़ दी। पर जब जीने की इच्छा ना हो तो दवा भी क्या करे। हालत और ख़राब होती जाती है। कोई डॉक्टर कहता है किडनी में इन्फेक्शन है। डायलिसिस किया गया कुछ बार...कई महीने हुए पर कुछ आराम नहीं। अब रिपोर्ट बताती है कि किडनी फेल है और दूसरी में भी इन्फेक्शन बढ़ चुका है। इस आखिरी वक़्त में बस 'भीशु' हमारे साथ है अस्पताल में । बताता है कि रूपा ब्याह के चली गयी है। उसका पति कच्चा चपरासी है .. हो सकता है पक्का भी हो जाए। बहुत अच्छा रिश्ता हुआ है रूपा का।फफक कर लिपट गये । भीशु का कन्धा हमारे आंसुओं से भीगा था और हमारी कनपटी उसके आंसुओं से गीली थी।"हम जानते हैं फेल किडनी नहीं साला हमारी लाइफ है। ये शराब का पीना और ये खून की कमी सब बहानें हैं 'भीशु'...। कोई होता बिरजू को अपना कहने वाला तो भोलेनाथ की कसम ....हम मौत को भी गच्चा दे देते। अब सोएंगे तो कभी नहीं जागेंगे ।'भीशु' तू रोता क्यों है। ये नींद आखिरी होगी। ना अब गरीबी होगी ना किसी का डर होगा.. और ना कोई छोड़ कर जाने वाला होगा।बहुत मात दिए इसको। पर 'भीशु' अब हम हार गए ज़िन्दगी से।"

**समाप्त**

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