पहचान - हरमहिंदर चहल Subhash Neerav द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
शेयर करे

पहचान - हरमहिंदर चहल

पंजाबी कहानी

पहचान

हरमहिंदर चहल

अनुवाद : सुभाष नीरव

दोपहर के करीब दो बजे मैं पार्किंग लॉट में कार खड़ी करके बाहर निकला तो लगा जैसे आसपास आग जल रही हो। इतनी गरमी ! तौबा तौबा ! तीन अन्य स्टेटों को छोड़कर आज विर्जिनिया में तापमान पूरे अमेरिका से अधिक है। बाहर का तापमान बरदाश्त से बाहर पहुँच चुका है। ऊपर से पड़ती धूप यूँ लग रही है मानो सिर में छेद हो रहा हो। और आज ह्यूमडिटी भी हद दर्जे की है। साँस कौन-सा आ रहा है ! मैं फुर्ती से कार का दरवाज़ा बन्द कर सामने वाले क्विक स्टोर में जा घुसा। अन्दर प्रवेश करते ही ए.सी. से ठंडे हुए स्टोर में बड़ा सुकून मिला। यह एक छोटा-सा कन्वीनेंट स्टोर है, जहाँ मैं कैशियर की पार्ट टाइम नौकरी करता हूँ। मैनेजर ने पिछली शिफ्ट क्लोज कर दी थी और दो बजते ही मैंने चैक-इन कर लिया। थोड़ा हिसाब-किताब सा सैट करके मैं शैल्फें और कोक मशीनें चैक करने के वास्ते स्टोर में चक्कर लगाने के लिए उठा। काउंटर से पैर नीचे रखते ही मेरा ध्यान एक नुक्कड़ की ओर गया। आज भी वह एक कोने में पीठ करके सोया पड़ा है और साथ ही उसका सामान से भरा बिस्तरबंद रखा हुआ है। उसके एक पैर में फटा जूता फंसा हुआ है और दूसरे में घिसी हुई चप्पल। बड़े बड़े सूजे हुए पैर बाहर झांक रहे हैं। बढ़ी हुई दाढ़ी से ढंका हुआ उसका गोरा सुर्ख चेहरा धुआंखा-सा हुआ पड़ा है। मैं उसे यूँ ही पड़ा छोड़कर अपना काम खत्म करके वापस काउंटर पर आ गया। पिछले तीन दिनों से दोपहर के समय यह होमलैस गोरा चुपके से यहाँ आकर सो जाता है। इससे पहले मैं इसे कंधे पर सामान वाला बिस्तरबंद उठाये दिनभर पार्किंग लॉट में घूमते हुए देखता था। परन्तु, पिछले दिनों ही बेतहाशा गरमी ने इसको भी कोई ठंडी जगह ढूँढ़ने के लिए विवश कर दिया लगता है। पहले दिन यह सीधे अन्दर घुसा और एक तरफ कोने में जाकर लेट गया। मैंने इसे रोकना चाहा तो थोड़ी देर आराम करने का कहकर वह चुप्पी साध गया। फिर जब यह लेटते ही सो गया तो मैंने यह सोचते हुए इसे उठकर जाने के लिए नहीं कहा कि बाहर तो बेइंतहा गरमी पड़ रही है और इस समय बिजनेस भी बहुत धीमा है। उसके बाद यह कब वहाँ से उठकर चला गया, मुझे पता ही नहीं चला। कल जब यह उठकर जाने लगा तो मुझे पता चल गया। मैंने इसके चेहरे की ओर देखा। इसकी आँखों की ओर देखते हुए मुझे उसका चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा प्रतीत हुआ। मैं सोचने लगा कि यह कौन हो सकता है, पर कुछ याद नहीं आया। आज फिर यह अन्दर आकर सोया पड़ा है। फिर मेरा ध्यान इससे हटकर अपने घर की ओर चला गया जहाँ से अभी-अभी मैं मैडम से बहस करते हुए आया हूँ। मन तो सवेर का ही उखड़ा हुआ है। कल रात काम से काफ़ी देर से लौटकर सोया था कि किसी के फोन ने सुबह की गहरी नींद में से जगा दिया। कोई स्पेनिश पूछ रहा था कि क्या मुझे अपने लॉन का घास कटवाना है ? मैंने रूखे स्वर में न करते हुए फोन काट दिया। ऐसे छोटे काम वालों के आजकल फोन आना एक आम बात हो गई है। एक दोस्त बता रहा था कि ये बेरोज़गार स्पेनिश लोग, फोन-बुक उठाकर सुबह-सुबह ही लोगों के घरों में फोन करने लग पड़ते हैं। अधिकांश को तो प्रत्युत्तर में झाड़ ही पड़ती है, पर एक-आध जॉब मिल भी जाती है। खैर, मेरी और मेरी पत्नी की तल्ख़ी आजकल आम ही हो गई है। हर रोज़ किसी न किसी बात पर उलझ पड़ते हैं। बात कोई ख़ास नहीं होती और कसूर भी किसी का नहीं होता। कसूर तो सारा हालातों का है। कुछ समय पहले तक सबकुछ बढ़िया चल रहा था। मेरी नौकरी भी अच्छी थी और पत्नी की भी। छोटा-सा अपना घर और दोनों के पास अपनी-अपनी कार। लेकिन जब रिसिशसन वाला धमाका हुआ तो मेरी नौकरी पहली छंटनी में ही चली गई। पत्नी को उसकी कम्पनी ने ऑफर दी कि या तो वह नौकरी छोड़ दे या कम तनख्वाह पर किसी छोटे पद पर तैनात हो जाए। पत्नी ने कम्पनी की बात मानकर छोटा पद स्वीकार कर लिया। इस तरह आमदनी घट गई तो घरेलू खर्चों में कटौती करने के लिए हमने एक कार बेच दी। फिर घर की किस्तें परेशान करने लगीं। अच्छी नौकरी तलाश करते हुए मुझे बमुश्किल किसी सिक्युरिटी कम्पनी में रात की नौकरी मिली। इससे पूरा नहीं पड़ा तो मैं साथ ही यह पार्ट टाइम नौकरी करने लग पड़ा। आज शाम यहाँ से छूटूँगा तो सीधा सिक्युरिटी वाली नौकरी पर जाऊँगा। यही कारण था कि मैंने आज कार लाने के लिए जिद्द की थी जबकि पत्नी का कहना था कि कार वह लेकर जाएगी क्योंकि उसकी कम्पनी दूर है और बसें-गाड़ियाँ बदलते ही दिन खराब हो जाता है। बस, इसी बात पर तल्ख़ी बढ़ गई और मैं चुपचाप कार लेकर इधर आ गया। उधर कुछ खड़का हुआ तो मैं ख़यालों में से निकल पीछे की ओर गया। यह तो उस गोरे ने लेटे लेटे करवट बदली तो उसका पैर अल्मारी से जा लगा था। मैं उसके करीब हो गया। उसकी एक बांह एक तरफ फैली हुई थी। मैं कुछ और करीब हुआ तो दृष्टि उसकी बांह पर खुदे हुए नाम पर चली गई। लिखा था - 'जैक मैक'। मेरे दिमाग में अचानक कुछ कौंधा।

''अरे, जैक है यह ?'' मैं उसकी ओर देख ही रहा था कि वह तेज़ी से उठा। एक तरफ रखा बिस्तरबंद कंधे पर डालकर वह चल दिया। जब उसके चेहरे को और नज़दीक से देखा तो मैंने उसको अच्छी तरह पहचान लिया कि यह जैक ही है। वह मेरे पास से निकलने लगा तो मैंने 'जैक' कहकर आवाज लगाई। लेकिन वह बगैर मेरी ओर देखे बाहर निकल गया और सामने पॉर्किंग लॉट की तरफ चला गया। उसे जाते हुए देखकर मुझे वह समय स्मरण हो आया जब जैक मेरा बॉस हुआ करता था। उन दिनों मैं दिन में नौकरी करता और रात को कालेज जाता था। मेरे साथ एक अन्य पंजाबी लड़का काम करता था। हमारी कम्पनी 'होम सर्विसिज़' का काफ़ी बड़ा वेयरहाउस थी और जैक वहाँ मैनेजर था। नज़दीक ही एक बहुत बड़ी माडर्न अपार्टमेंट बिल्डिंग थी। इन अपार्टमेंटों का एक हिस्सा सैमी होटल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। यहाँ रोज़ाना, सप्ताह भर या महीना भर रुकने वाले अधिकांश तौर पर बिजनेसमैन ही ठहरा करते थे। जैक की कम्पनी 'होम सर्विसिज' इन अपार्टमेंटों में रोज़ाना की ज़रूरत का सामान जैसे कि बिस्तरे, किचन का सामान, टी.वी. वी.सी.आर आदि किराये पर देती थी। जब नये ग्राहक आते तो हम एक ट्रक में सामान लाद कर ले जाते और कमरों में सजा आते। जब ग्राहक मूव होते तो पुराना सामान ट्रक में भरकर वेयरहाउस में ले आते। जैक का पूरा नाम जैकसन मैकडेनियल है। पर सब उसे छोटे नाम यानी जैक से ही बुलाया करते थे। जैक का स्वभाव बड़ा मिलनसार था और यह बहुत जौली व्यक्ति था। जब काम अधिक होता तो किसी को कान खुजाने की फुरसत न मिलती, पर जब कभी काम धीमा हो जाता तो हमें ट्रक धोने और वेयरहाउस की साफ़-सफाई के अलावा और कोई काम न होता। ऐसे समय में जैक वेयरहाउस में ऊँची आवाज़ में गाने लगाकर, साथ-साथ गाता घूमता। इधर-उधर घूमता कभी किसी से मजाक करता तो कभी किसी से। कई बार मैं और दूसरा लड़का घर से लाई रोटी खा रहे होते तो वह हमारे पास आकर एक रोटी उठा लेता और उसके ऊपर सब्जी रखकर उसको रोल कर लेता और फिर चलते-फिरते खाता रहता। ऐसे दिन वह शाम को आधा घंटा पहले ही दफ्तर बन्द करके वेयरहाउस को ताले लगवा देता। फिर सभी पैसे इकट्ठे करके बियर लाते। घंटा घंटा भर बियर चलती रहती। लेकिन काम के ज़ोर पकड़ते ही जैक मैनेजर के रूप में आ जाता। अधिक काम के वक़्त वह वीकएंड पर इम्पाइल्ज़ के साथ मिलकर पार्टियाँ मनाता। हम उसकी वीकएंड वाली पार्टियों में कम ही शामिल होते थे। हमारे ट्रक का हैल्पर होजे कई बार चला जाता था। एक बार होजे ने बताया कि पिछले इतवार जैक ने अपनी मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी दी थी और वहाँ सबने बहुत इन्जॉय किया था। यह बात सुनकर मैंने उस दिन शाम के वक्त दफ्तर में बैठे जैक को 'हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी' कहा तो वह थैंक्स कहता हुआ चौंक उठा। मैं समझ गया कि वह हमें निमंत्रण देना भूल गया लगता है। खैर, इसकी कमी उसने अगले रविवार को पूरी कर दी जब वह मुझे और सत्ते को बियर पिलाने क्लब में ले गया। वहाँ उसके संग उसकी वाइफ़ पैगी भी थी। जैक ने पैगी से परिचय कराते हुए बताया कि उन्होंने सालभर पहले ही विवाह किया है और यह उनकी पहली एनिवर्सरी है। उनका एक तीन साल का बेटा है। उसने आगे बताते हुए कहा कि वह पैगी को नर्सिंग की पढ़ाई करवा रहा है ताकि उनकी ज़िन्दगी और बेहतर बन सके।

'होम सर्विस' में हमने दो वर्ष और काम किया और जब वहाँ से नौकरी छोड़ी तो जैक उस समय भी वहाँ मैनेजर था। पढ़ाई पूरी करके मैं कहीं और अच्छी नौकरी पर लग गया और इधर से मेरा सम्पर्क टूट गया। काफ़ी समय बाद जैक अचानक एक शॉपिंग सेंटर में से निकलता हुआ मिल गया। हालचाल पूछने के बाद मैंने उससे 'होम सर्विसिज' के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह दो सप्ताह की छुट्टी पर है। क्योंकि आजकल काम की मंदी चल रही थी और कम्पनी की ओर से हिदायत हुई थी कि सभी के घंटे कम किए जाएँ। उसने बताया कि सबसे पहले उसने अपने ही घंटे घटाने के लिए दो हफ्ते की छुट्टी कर ली। दो-चार बातें करके हम अपनी अपनी राह पर चल दिए।

इसके पश्चात् वह एक बार मुझे चर्च में से आता हुआ मिला। पैगी उसके पीछे पीछे बेटे की उंगली थामे आ रही थी। दोनों एक-दूसरे से बेपरवाह से चल रहे थे। वह मुझसे सिर्फ औपचारिक रूप में ही मिला। उसने बताया कि रिसिशसन की वजह से 'होम सर्विसिज' कम्पनी बन्द हो गई। उसको नौकरी पर से स्थायी तौर पर छुट्टी हो गई। आजकल वह खाली घूम रहा था। महीनाभर बाद मैंने एक दिन जैक को सड़क किनारे साइनबोर्ड लगाते हुए देखा। यह तब की बात है जब वर्ष 2008 में प्रेजीडेंट का चुनाव हो रहा था। शायद ये दिहाड़ीदार कर्मी किसी उम्मीदवार की मशहूरी के बोर्ड लगाते घूम रहे थे। मैंने कुछ पल उसकी ओर देखा, पर जब उसका ध्यान मेरी ओर न हुआ तो मैं आगे बढ़ गया। अगली बार मैं एक शराब की दुकान के बाहर खड़े जैक से मिला। उसने घिसे हुए पुराने कपड़े पहन रखे थे और उसकी खस्ता-सी हालत थी। मैंने उसको उत्साह में भरकर बुलाते हुए हाथ आगे बढ़ाया।

''हे सिंह !'' उसने हल्का-सा हाथ मिलाया। मैंने उसका हालचाल पूछा तो उसने चलताऊ-सा कहा कि ठीक ही है हाल। उसकी बिल्लौरी आँखों की पुतलियाँ वीरान-सी लग रही थीं।

''जैक, डू यू नीड ऐनी हैल्प ?'' मैंने सोचा कि शायद वह किसी राइड की प्रतीक्षा न कर रहा हो।

''सिंह, अगर तुम बुरा न मानो तो मेरा एक फेवर करो ?'' वह मेरी कही बात को अनसुनी करता हुआ बीच में ही बोला।

''बोल जैक।''

''फ्रैंड ! मुझे आज बियर पिला फिर।''

''ओ श्योर ! कम ऑन।'' मैं उसको नज़दीक के पीज़ा हट में ले गया। एक तरफ टेबल पर बैठते ही मैंने बियर का ऑडर दिया और साथ ही कुछ खाने का भी। बैरे के बियर रखते ही जैक ने फुर्ती से गिलास उठाकर जल्दी से मुँह से लगा लिया और गर्दन झुकाकर चुपचाप बियर पीता रहा।

''जैक, और फिर क्या हो रहा है आजकल ?''

''कुछ नहीं, माई फ्रैंड।'' उसने गिलास खाली करके एक तरफ रख दिया तो बैरा बियर का दूसरा गिलास रख गया। जैक ने दूसरा गिलास उठाकर पीना आरंभ कर दिया। कुछेक मिनट बाद उसकी आँखों में नशे की लाली उभरी तो उसने मेरी तरफ देखा।

''कैसे है फिर ?'' उसकी तरफ देखते हुए मैंने मजाकिया लहजे में पूछा।

“मैं सबकुछ गवा चुका हूँ।'' उसकी आँखों में पानी तैर रहा था।

''क्या मतलब ?''

''मेरा मतलब सबकुछ, माई फ्रैंड।''

''यह एक दुखद कहानी है मिस्टर सिंह।

''जैक, अगर तुम बताना चाहो तो मुझे बता सकते हो।''

''सिंह, पहले मेरी नौकरी गई और बाद में सब कुछ ही चला गया।''

''और पैगी ?... मेरा मतलब है, वह कहाँ है ?''

''पैगी !'' वह बुरा-सा मुँह बनाकर मुस्कराया और फिर अपनी कहानी बताने लगा।

''जब पैगी मुझे मिली थी, उस समय मेरे पास अपना घर था। बढ़िया कार और होम-सर्विस की अच्छी नौकरी थी। हमने मिलने के कुछ समय बाद ही फैसला कर लिया था कि हम मैरिज करेंगे। फिर मैंने पैगी को पढ़ने के लिए उत्साहित किया और उसने नर्सिंग की पढ़ाई दुबारा शुरू कर ली जो कि पहले पैसे के अभाव में उसको बन्द करनी पड़ी थी। अब काफ़ी मदद मैं करता था और वह भी पार्ट टाइम जॉब करने लगी। उसके बाद हमारे घर बेटे का जन्म हुआ। फिर उसकी पढ़ाई पूरी हो गई और उसको स्थानीय अस्पताल में जॉब मिल गई। लेकिन, इसके बाद हमारे बीच अनबन रहने लगी।''

''पर क्यों ?'' मैंने बीच में टोका।

''क्योंकि वह कहने लग पड़ी कि मैंने उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी है।''

''बर्बाद ! पर तूने तो उसको पढ़ाकर उसकी ज़िन्दगी बनाई थी।''

''नहीं, यह बात नहीं है सिंह। इस बात का तो वह हमेशा एहसान मानती थी। पर उसका कहना था कि यदि मैं उसको न मिला होता तो वह सिंगल रहते हुए और ज्यादा इन्जॉय करती।''

''क्या ?'' मैंने हैरान होकर उसकी ओर देखा।

''देख, वह उम्र में मुझसे छोटी थी। पहले शायद उसको यह महसूस नहीं हुआ होगा, पर जब वह नर्स बनने के बाद इंडिपैंडेंट हो गई, तभी उसको यह ख़याल आया होगा कि अभी उसको विवाह नहीं करवाना चाहिए था।''

''मैं उसको समझाता रहता था, पर कुछ दिन ठीक रहकर वह फिर चिड़चिड़ी हो जाती थी। इस बीच रिसिशसन शुरू हो गया। पहले मेरी जॉब गई। जब जॉब न रही तो घर की किस्तें बन्द हो गईं। किस्तों के रुकने से बैंक ने मेरा घर छीन लिया। मैंने छोटी-मोटी नौकरियों का प्रबंध किया और अपार्टमेंट में मूव हो गया। पर हमारे बीच दूरियाँ बढ़ती गईं। उन दिनों काम करते हुए मुझे चोट लग गई तो मैं घर बैठ गया। इन दिनों में तो पैगी बहुत ज्यादा अपसैट हो गई। फिर एक दिन वह अपना सारा सामान इकट्ठा करके अपने नये ब्वॉय फ्रेंड के साथ चली गई।''

''और तुम्हारा बेटा ?''

''उसको वह मेरे पास छोड़ गई थी। पर मैं अकेला और बेरोज़गार उसको कैसे संभाल सकता था। मैंने एक दिन उसको सोशल सर्विसिज़ वालों के हवाले कर दिया और खुद अपार्टमेंट छोड़कर होमलैस शैल्टर में चला गया। कुछ दिन बाद वहाँ से भी निकलना पड़ा और फिर मैं सड़क पर आ गया।''

''जैक, तेरा कोई और रिश्तेदार... मेरा मतलब है कि माँ-बाप या कोई भाई-बहन?''

''माँ-बाप तो खुद सीनियर सिटीज़न होम में दिन काट रहे हैं। एक भाई है, वह डकैती के केस में जेल में सज़ा भुगत रहा है।''

''चलें फिर ?'' इतना कहते हुए मैं उठने लगा तो वह भी कुछ सोचता हुआ-सा मेरे साथ ही उठ खड़ा हुआ। दरवाजे से बाहर निकलते हुए मुझे पीछे से उसकी आवाज़ सुनाई दी।

''मि. सिंह, एक फेवर तो दे।'' उसकी आवाज़ सुनकर मैं चलते-चलते रुक गया तो उसने मुझसे बीस डॉलर मांगे। मैंने कुछ झिझक-सी दिखलाई तो वह थोड़ा रूखा होकर बोला।

''उधार ही मांग रहा हूँ। जब मेरे पास पैसे आ जाएंगे, मैं लौटा दूँगा।''

मैंने गौर से उसके चेहरे की ओर देखा और फिर अनमने मन से जेब में से दस का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। उसने नोट पकड़ा और मैं अपनी कार में जा बैठा।

करीब दो महीने बाद मैं हाईवे चढ़ने के लिए बड़ी ट्रैफिक लाइट पर रुका हुआ था तो मैंने देखा कि दायीं ओर की पुलिया के नीचे कोई गर्दन झुकाये बैठा था और साथ ही उसका सामान पड़ा था। ऊपर पुलिया की छत होने के कारण शायद किसी ने इस जगह को आसरा बना रखा था। करीब आकर उसको पहचानते हुए मेरे अन्दर से एक ठंडी आह निकली, क्योंकि वह जैक था।

दरवाज़ा खोलकर एक ग्राहक अन्दर आया तो मेरे ख़यालों की लड़ी टूटी। ग्राहक मुझे बुलाकर एक तरफ चला गया जहाँ पर अख़बार और पत्र-पत्रिकायें पड़ी थीं। उसने एक नक्शा उठाया और पाँच-सात मिनट उसे खोलकर देखता रहा। मैंने सोचा कि यह नक्शा खरीदेगा, पर उसने अपना काम निकाला और नक्शा वापस रख दिया। मैं मन मसोसकर रह गया कि घंटे भर बाद तो एक ग्राहक आया था और वह भी यूँ लौट गया। बाहर की ओर देखने पर फिर से जैक मेरे ख़यालों में घुसने ही लगा था कि मन इंडिया की ओर चला गया।

मेरा दादा बहुत सख्त और रूखे स्वभाव का था। वह साधुओं और अन्य भिखारियों के बहुत खिलाफ़ रहता था। वह इनमें से किसी को भी भीख नहीं देने देता था। साधुओं को देखते ही वह लाठी उठा लेता। जो जानते थे, वे हमारी गली में आने का साहस न करते। वह मांगने वालों को लानतें देते हुए कहता कि हट्टे-कट्टे होकर मांगने की बजाय कोई काम करो, मुफ्त का खाने पर क्यों कमर कस रखी है। एक बार गर्मियों की शिखर दोपहरी में किसी भाट ने आकर दरवाजे पर आवाज़ लगाई कि वह भूखा है, कुछ खाने को दो। उसका कद लम्बा था, पतला शरीर, सूखा हुआ चेहरा और चेहरे पर लम्बी घुंघराली मूंछें थीं। सिर पर बूटियों वाला बड़ा-सा पग्गड़ आड़ा-तिरछा करके लपेटा हुआ था। ये भाट पिछले कई दिनों से हमारे गाँवों में घूम रहे थे। उनके गायों के झुण्ड थे जिन्हें वे चराते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव जाते रहते थे। घर की बूढ़ी स्त्रियों ने दादा की ओर देखा, भाट को इशारे से चले जाने के लिए कहा, पर तब तक दादा पास आ गया। दादा ने उससे पूछा कि वह कौन है। उसने बताया कि वह भाट है और उधर राजस्थान में सूखा पड़ गया है, जिस कारण उनकी फ़सल, बाजरी-गवार वगैरह सब कुछ मारा गया है। धरती सूख गई और पशु भूखे मरने लगे। इसी कारण वह पशुओं को चराने के लिए इधर आए हैं। दादा ने उसको बिठाया। फिर बूढ़ी औरतों को कहकर उसके लिए रोटी मंगवाई और वह वहीं पर बैठकर खाने लगा। मैंने डरते हुए दादा से पूछा कि आज आप मंगते पर कैसे मेहरबान हो गए। दादा ने त्यौरी चढ़ाते हुए कहा कि यह मंगता नहीं है। इस पर तो कुदरत की मार पड़ी है। वरना ये मांगने वाले लोग नहीं हैं। एक मेरा चाचा हुआ करता था, जिसका नाम था - बग्गा। उसका परिवार बाहरवाले घर में रहा करता था। लोग उसको बग्गा दानी कहा करते थे, क्योंकि वह किसी भी मंगते को खाली नहीं लौटाया करता था। वह जब किसी मंगते को ख़ैर डालता तो उसके चेहरे पर बेचारगी के भाव आ जाते। वह हमेशा कहता कि पता नहीं किस विपदा का मारा यह मंगता बना घूमता है। मुझे उसकी यह बात बहुत अच्छी लगती।

दरवाज़ा खुलने की आवाज आई तो मेरा ध्यान उस तरफ हो गया। मैंने देखा कि सामने जैक खड़ा था। उसने आधा दरवाज़ा खोलकर छोड़ दिया और वह अन्दर आते-आते रुक गया। फिर वहीं से वापस लौट गया और एक तरफ दीवार की छाया तले जाकर बैठ गया। मैं फुर्ती से उसके पीछे गया और जेब में से दस डॉलर निकाल कर उसकी झोली में रख दिए। वह अचानक उठ खड़ा हुआ और मेरी ओर तीखी निगाहों से देखते हुए उसने दस डॉलर दूर फेंक दिए।

''लानत है ! तुमने मुझे क्या भिखारी समझा है ?'' इतना कहकर उसने बिस्तरबंद कंधे पर लटकाया और तेज़ी से चलता हुआ आँखों से ओझल हो गया।

----